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एक बीमा, एक हेल्थ चेक-अप: क्या ऐसे होती है एनजीओ कर्मचारियों की देखभाल?
जब तक विकास सेक्टर कॉर्पोरेट एचआर नीतियों से हटकर ज़मीनी समुदायों के तौर-तरीके और सामाजिक न्याय के मूल्य नहीं अपनाता, तब तक सामूहिक देखभाल का विचार सिर्फ कागज़ों पर नज़र आएगा।आज़ादी के आठ दशक बाद भी वन विभाग के नियंत्रण में क्यों हैं मध्य प्रदेश के वन ग्राम?
वन ग्राम वे बस्तियां हैं जिन्हें वन विभाग ने अपने नियंत्रण वाले वन क्षेत्रों में बसाया या अपने प्रशासनिक ढांचे में शामिल किया। इनमें भूमि, रिकॉर्ड और प्रशासन लंबे समय तक राजस्व विभाग के बजाय वन विभाग के अधीन रहे हैं।क्या शहरों की यातायात से जुड़ी समस्याओं का समाधान सिर्फ इलेक्ट्रिक वाहन हैं?
भारत में बिजली से चलने वाले परिवहन के बढ़ते उपयोग के बीच, पटना और लखनऊ का अनुभव दिखाता है कि शहरी आवाजाही का भविष्य केवल तकनीक नहीं, बल्कि सुरक्षित, सुलभ और समावेशी परिवहन पर भी निर्भर करेगा।गंभीर बीमारी में किसी की देखभाल करने के क्या मायने हैं?
मुंबई में एक काउंसलर और नर्स के जीवन का एक दिन-जहां वे घर-आधारित पैलिएटिव केयर के ज़रिए मरीज़ों और उनके परिवारों को बीमारी, क्षति और अनिश्चितता का सामना गरिमा के साथ करने में सहारा देती हैं।पंचायतों से जुड़ी संस्थाएं सरकारी पोर्टल्स का बेहतर इस्तेमाल कैसे करें?
अगर कोई संस्था अपने फील्ड सर्वेक्षण, समुदाय की बातचीत या स्थानीय अनुभवों की तुलना सरकारी आंकड़ों से करती है, तो उसे क्षेत्र की स्थिति को अधिक गहराई से समझने में मदद मिलती है।दलितों के स्वाभिमान का साहित्य है लोकगाथा सलहेस
राजा सलहेस सिर्फ बिहार या किसी एक जाति विशेष की लोकगाथा का नायक नहीं, बल्कि बहुजन समाज के साझा नायक हैं। सलहेस की लोकगाथा प्रेम, संवेदना, विद्रोह और सामाजिक न्याय की अनूठी अभिव्यक्ति है।बदलाव की योजना: थ्योरी ऑफ चेंज कैसे काम करती है?
थ्योरी ऑफ चेंज एक तरह का रोडमैप है। यह बताता है कि हम आज कौन सी समस्या देख रहे हैं, उसे कैसे हल किया जा सकता है, और हमारे काम का क्या दीर्घकालिक प्रभाव हो सकता है।सिस्टम में बदलाव: हकीकत से ज़्यादा भ्रम
‘सिस्टम्स चेंज’ के प्रति बढ़ता आकर्षण संस्थाओं की प्राथमिकताओं को असंतुलित और ज़मीनी स्तर पर सार्थक प्रयासों को कमज़ोर बना सकता है।भारत के शहरों में डायबिटीज़, हाईपरटेंशन और बढ़ती स्वास्थ्य असमानताएं
बढ़ते गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) के बीच सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच अब भी सीमित है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि शहरी अनौपचारिक बस्तियों में स्वास्थ्य समानता के लिए सामुदायिक स्तर पर कार्रवाई ज़रूरी है।वैश्विक जोखिम रिपोर्ट 2026: भारत के सोशल सेक्टर के लिए क्या हैं इसके मायने?
वैश्विक जोखिम दूर लगते हैं, पर उनका असर गांवों, कस्बों और शहरों में स्पष्ट दिखता है। महंगाई, बाढ़, गर्मी, गलत सूचना, बेरोज़गारी और सामाजिक तनाव अब भारतीय सामाजिक क्षेत्र की रोज़मर्रा की हकीकत हैं। यही इस रिपोर्ट की प्रमुख प्रासंगिकता है।एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 का संस्थाओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
प्रस्तावित संशोधनों के तहत गैर-लाभकारी संगठनों के ऊपर यह संकट बना रहेगा कि यदि उनका एफसीआरए पंजीकरण समाप्त हो जाता है या रद्द कर दिया जाता है, तो विदेशी फंड से तैयार संपत्तियों पर उनका नियंत्रण खत्म हो सकता है