नागरिक संगठन
एक बीमा, एक हेल्थ चेक-अप: क्या ऐसे होती है एनजीओ कर्मचारियों की देखभाल?
जब तक विकास सेक्टर कॉर्पोरेट एचआर नीतियों से हटकर ज़मीनी समुदायों के तौर-तरीके और सामाजिक न्याय के मूल्य नहीं अपनाता, तब तक सामूहिक देखभाल का विचार सिर्फ कागज़ों पर नज़र आएगा।प्रारंभिक शिक्षा की नींव पर पुनर्विचार
2025 के टीचिंग लर्निंग प्रैक्टिसेज़ सर्वे के अनुसार भागीदारी, लेखन और कक्षा में संवाद का अभाव मूलभूत लर्निंग परिणामों को प्रभावित कर रहा है।सिस्टम में बदलाव: हकीकत से ज़्यादा भ्रम
‘सिस्टम्स चेंज’ के प्रति बढ़ता आकर्षण संस्थाओं की प्राथमिकताओं को असंतुलित और ज़मीनी स्तर पर सार्थक प्रयासों को कमज़ोर बना सकता है।एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 का संस्थाओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
प्रस्तावित संशोधनों के तहत गैर-लाभकारी संगठनों के ऊपर यह संकट बना रहेगा कि यदि उनका एफसीआरए पंजीकरण समाप्त हो जाता है या रद्द कर दिया जाता है, तो विदेशी फंड से तैयार संपत्तियों पर उनका नियंत्रण खत्म हो सकता हैमहिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा रोकने की स्थायी राह कैसे खुलेगी?
लैंगिक असमानताएं सामाजिक और संस्थागत ढांचों में गहराई से जड़ें जमाए हैं। अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाली महिलाएं और लड़कियां हर रोज इसका सामना करती हैं।भारत में थैरेपिस्ट प्रशिक्षण में क्वीयर अनुभवों की अनदेखी
क्वीयर-अफर्मेटिव मानसिक स्वास्थ्य सेवा इतनी दुर्लभ क्यों हैं? क्योंकि मनोविज्ञान की शिक्षा में क्वीयर अनुभव अब भी केंद्र में नहीं, हाशिए पर है।जातिवाद और कच्ची नौकरियों से जूझते भारत के सफाई कर्मचारी
शहरी भारत में स्वच्छता सेवाओं के निजीकरण के साथ जातिवाद की जड़ें, मजदूरी में कटौती, और दलित कामगारों पर सामाजिक संकट गहराते जा रहे हैं।फोर-लेन रिट्रीट की सिंगल-लेन रिएलिटी
सोशल सेक्टर रिट्रीट का हाल किसी मल्टी-लेन हाईवे जैसा नजर आता है—कागज़ पर कई रास्ते, जमीन पर एक!सोशल सेक्टर कॉन्फ्रेंस: समान मंच की असमान सच्चाई
भारत में विकास सेक्टर के सम्मेलन अक्सर भाषा, विविधता और समावेशन की कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं। क्या यह सच में एक समान मंच हैं?जिला ‘इम्पैक्टपुर’ में इम्पैक्ट की आंधी, तूफान और बवंडर!
जिला इम्पैक्टपुर में शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय संस्थाओं ने ऐसा कमाल किया कि स्कूलों की संख्या कम पड़ गई। कैसे? यहां जानिए!