
हल्का-फुल्का
कौन बोला, कौन बोला ?
कानों की गुस्ताख़ियां माफ हों!बुरे आंदोलनकर्ता के स्लोगन
इन दिनों देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे आंदोलनों में ऐसे आंदोलनकर्ता भी दिखते हैं, जिनका राह चलते लोग, पुलिस-मीडिया और सोशल मीडिया पर मजाक उड़ाते हैं। यानी एक तरह के "बुरे आंदोलनकर्ता"।एक महल हो सपनों का!
ऊपरी सजावट तो ज़बरदस्त है, लेकिन नींव का क्या? क्या आपकी संस्था में भी ऐसा ही हो रहा है?अबकी बार, पोषण की सरकार!
सितंबर आया नहीं कि पोषण की फाइल सबसे ऊपर आ जाती है। मीटिंग की बात हो, कैंपेन का नारा या सोशल मीडिया पर पोस्ट—हर जगह पोषण की हाज़िरी लगनी चाहिए।विकास सेक्टर की डेवलपिंग भाषा
विकास सेक्टर की भाषा किसके लिए कैसी होनी चाहिए? चलिए, पता लगाते हैं!शिक्षक दिवस की बधाई मिली क्या?
शिक्षक दिवस पर, एक शिक्षक की डायरी- सम्मान और जश्न के बीच वह सब, जो अक्सर अनकहा रह जाता है। इसके सभी पात्र काल्पनिक हैं भी और नहीं भी।एक सालाना रिपोर्ट की बनने से पहले ही थक जाने की दास्तान
भारत की हजारों जमीनी संस्थाओं में हर साल एक रस्म दोहराई जाती है—वार्षिक रिपोर्ट बनाना। शुरुआत संस्थापक के जोशीले भाषण से होती है, अफरातफरी से गुजरती है और आखिर में एक ऐसी चमचमाती रिपोर्ट सामने आती है, जिसे पता नहीं कितने ही लोग पढ़ते हैं!एक बरसाती पैनलिस्ट की दास्तान
पैनल में बोलने की पूरी तैयारी थी...लेकिन तीन घंटे बारिश में सफर करके पहुंचे, तो दर्शक-दीर्घा हमारे इंतज़ार में थी!इस 15 अगस्त सोशल सेक्टर मांगे… आज़ादी
आज़ादी सिर्फ सत्ता से नहीं, कभी-कभी अपनी बनाई व्यवस्थाओं से भी चाहिए होती है। सोशल सेक्टर में भी कुछ ऐसे तौर-तरीके हैं, जो धीरे-धीरे टूल से तख्त बन बैठे हैं।कुच्चू-पुच्चू! सस्ता ऑफिस स्पेस बता दो ना…
आजकल शहर में ऑफिस ढूंढना संस्था की ज़रूरत बन गया है। दुख बस इतना है कि उसका किराया भरने के लिए एक नया फंडर भी ढूंढना पड़ता है।फंडर्स की कहानी, बॉलीवुड की जुबानी
डेटा, स्केल या सस्टेनेबिलिटी? बॉलीवुड गानों से समझिए फंडर्स का नया अंदाज़।प्यारे आंदोलन, …..
वह कभी किसान बनकर लौटता है, कभी छात्र, कभी जंगल, कभी पहाड़। उसका आना सड़क और संसद, दोनों के लिए ज़रूरी है। इसलिए आज एक खुला ख़त, आंदोलन के नाम।