
हल्का-फुल्का
एक बरसाती पैनलिस्ट की दास्तान
पैनल में बोलने की पूरी तैयारी थी...लेकिन तीन घंटे बारिश में सफर करके पहुंचे, तो दर्शक-दीर्घा हमारे इंतज़ार में थी!इस 15 अगस्त सोशल सेक्टर मांगे… आज़ादी
आज़ादी सिर्फ सत्ता से नहीं, कभी-कभी अपनी बनाई व्यवस्थाओं से भी चाहिए होती है। सोशल सेक्टर में भी कुछ ऐसे तौर-तरीके हैं, जो धीरे-धीरे टूल से तख्त बन बैठे हैं।कुच्चू-पुच्चू! सस्ता ऑफिस स्पेस बता दो ना…
आजकल शहर में ऑफिस ढूंढना संस्था की ज़रूरत बन गया है। दुख बस इतना है कि उसका किराया भरने के लिए एक नया फंडर भी ढूंढना पड़ता है।फंडर्स की कहानी, बॉलीवुड की जुबानी
डेटा, स्केल या सस्टेनेबिलिटी? बॉलीवुड गानों से समझिए फंडर्स का नया अंदाज़।प्यारे आंदोलन, …..
वह कभी किसान बनकर लौटता है, कभी छात्र, कभी जंगल, कभी पहाड़। उसका आना सड़क और संसद, दोनों के लिए ज़रूरी है। इसलिए आज एक खुला ख़त, आंदोलन के नाम।दावत-ए-नेटवर्किंग!
कॉन्फ्रेंस के लंच में सिर्फ मेनू नहीं, रिश्ते भी परोसे जाते हैं। अपनी नेटवर्किंग को मुकाम तक पहुंचाने के लिए अपनाइए हमारे कुछ ख़ास नुस्खे!आपको वेलकम किट मिली क्या?
हर नौकरी एक वेलकम किट साथ लाती है। बस किसी में लैपटॉप होता है, तो किसी में सर्वे का रजिस्टर। पेश है कॉर्पोरेट और एनजीओ की दुनिया का एक आम पहला दिन।फंडर से बातचीत? योगा से होगा!
फंड आए न आए, सांस आती रहेगी!लीक: हमारी सबसे सफल सूचना व्यवस्था
फंडिंग से लेकर सैलरी और एमओयू की शर्तों तक, कुछ सूचनाएं ऐसी होती हैं जो आधिकारिक घोषणा से पहले ही सार्वजनिक संपत्ति बन जाती हैं।सपनापुर में आख़िरी आदमी की तलाश!
लोकतंत्र का हाल चाहे कितना बेहाल हो, आंकड़े उसे सुंदर बना ही देते हैं। क्योंकि पेड़ बचाने से ज़्यादा ज़रूरी है पेड़ लगाने की फोटो!
पेड़ लगाने के अभियान अक्सर सुर्खियां बटोरते हैं, लेकिन पेड़ों और जंगलों को बचाने की ज़िम्मेदारी नज़रअंदाज़ कर दी जाती है।हंसते हुए को रुलाएं: नुस्खे एनजीओ वाले
सामाजिक क्षेत्र में बदलाव की कोशिशों के बीच उलझनों, उम्मीदों और ‘इम्पैक्ट’ की दुनिया पर एक व्यंग्य।