विविधता और समावेश

क्या सोशल सेक्टर सवाल पूछने से कतराने लगा है?

जैसे-जैसे गैर-लाभकारी संस्थाओं का प्रभाव बढ़ रहा है, क्या उनकी स्वतंत्र और सवाल उठाने वाली आवाज़ कमज़ोर पड़ती जा रही है?
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बीते कुछ सालों से ऐसा लगने लगा है जैसे भारत का सामाजिक क्षेत्र प्रभाव (इंपैक्ट) और पैमाने (स्केल) की दौड़ में अपनी आवाज़ खोता जा रहा है। लेकिन सवाल स्केल का नहीं, बल्कि यह है कि उसे हासिल करने की प्रक्रिया में हम क्या खोने का जोखिम उठा रहे हैं? आमतौर पर यह तर्क दिया जाता है कि बड़े पैमाने पर काम करने की कोशिश ज़मीनी हकीकत की जटिलता, विविधता और सबसे बढ़कर उन लोगों की आवाज़ को कमज़ोर कर देती है, जिनके साथ हम काम करते हैं। लेकिन इससे भी बड़ी चिंता यह होनी चाहिए कि कहीं इस प्रक्रिया में सामाजिक क्षेत्र की सामूहिक आवाज़ ही न कमज़ोर पड़ जाए।

यह भावना तब और स्पष्ट होकर सामने आती है जब हम हाल के यूनियन बजट को लेकर हुई चर्चाओं पर नज़र डालते हैं। कई अकादमिक विशेषज्ञों ने इस बजट को पूंजी-समर्थक (प्रो-कैपिटल) बताया। उनका तर्क था कि इसमें सामाजिक कल्याण से जुड़ी पहलों के लिए बजटीय आवंटन में कमी की गई है। इसके विपरीत, विकास क्षेत्र के अनेक लीडरों और नागरिक समाज संगठनों ने अपने-अपने नज़रिए से इस बजट का स्वागत किया और इसकी सराहना की। कुछ लोगों ने इसमें निहित मंशा की प्रशंसा की (भले ही उसमें सुधारों को लेकर कोई स्पष्ट विवरण मौजूद नहीं था), तो वहीं कुछ अन्य ने इस बात को सराहा कि बजट में युवाओं को ‘भविष्य के निर्माता’ के रूप में मान्यता दी गई है।

इन प्रतिक्रियाओं में एक समान बात दिखाई देती है—बिना किसी ठोस या सार्थक आलोचना के सरकारी प्राथमिकताओं का पक्ष लेना। यह स्थिति एक हालिया घटना की भी याद दिलाती है, जब अमेरिका में प्रौद्योगिकी क्षेत्र के कई लीडर सार्वजनिक रूप से कुछ नीतियों से असहमति जताने के बावजूद राजनीतिक शपथग्रहण समारोहों में उपस्थित रहे।

उनका यह कदम एक साफ संदेश देता है: प्रभाव और पहुंच बनाए रखने के लिए असहमतियों के बावजूद सत्ता के साथ दिखना ज़रूरी समझा जाता है। आज नॉन-प्रॉफिट क्षेत्र का एक प्रमुख लक्ष्य यह है कि कार्यक्रमों का विस्तार यथासंभव कुशलता और प्रभावी ढंग से किया जाए। ऐसे वातावरण में सरकारी नीतियों की सार्वजनिक आलोचना को अक्सर एक ‘जोखिम’ के रूप में देखा जाता है, जिसे संगठन या तो उठाना नहीं चाहते, या उठा नहीं सकते। नतीजतन, वे नैतिक दायित्व जो नॉन-प्रॉफिट संगठनों को समाज का ‘तीसरा क्षेत्र’ बनाते हैं, इन व्यावहारिक विचारों के दबाव में आते दिखाई देते हैं।

सामाजिक क्षेत्र आज एक दोराहे पर खड़ा है

वर्तमान में भारत के गैर-लाभकारी संगठनों और सामाजिक उद्यमों को राष्ट्रीय तथा वैश्विक स्तर पर व्यापक मान्यता मिल रही है। उदाहरण के लिए, माधव चव्हाण, जिन्होंने प्रथम की स्थापना की, को शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिष्ठित वाइज़ प्राइज़ फॉर एजुकेशन से सम्मानित किया गया। इसी प्रकार, एजुकेट गर्ल्स को प्रसिद्ध रैमन मैग्सेसे पुरस्कार प्रदान किया गया। अनेक गैर-लाभकारी संगठन एक दशक से भी पहले से 30 करोड़ रुपये से ज़्यादा सालाना बजट के साथ सफलतापूर्वक काम कर रहे हैं। यह इस क्षेत्र की बड़ी, जटिल और बहुस्तरीय टीमों तथा परियोजनाओं का प्रभावी प्रबंधन करने की क्षमता को दर्शाता है। परोपकारी फाउंडेशन (फिलांथ्रॉपिक फाउंडेशन्स) भी अब केवल कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) की सीमाओं तक सीमित नहीं हैं। वे सार्थक प्रभाव के निर्माण में सक्रिय साझेदार के रूप में आगे बढ़ रहे हैं।

ये उपलब्धियां इस बात का संकेत देती हैं कि गैर-लाभकारी पारिस्थितिकी तंत्र, यानी नॉन-प्रॉफिट इकोसिस्टम फल-फूल रहा है। लेकिन इस सफलता के पीछे एक चिंताजनक विरोधाभास भी छिपा हुआ है: जैसे-जैसे यह क्षेत्र अधिक सक्षम और प्रभावशाली होता जा रहा है, ऐसा प्रतीत होता है कि वह अपनी आलोचनात्मक और स्वतंत्र आवाज़ ऊंची नहीं करना चाहता। आज गैर-लाभकारी क्षेत्र तीन स्पष्ट दबावों के बीच काम कर रहा है। इनमें से हर एक दबाव अपनी जगह जायज़ है, बल्कि कई मामलों में ज़रूरी भी है। लेकिन जब ये एक साथ काम करते हैं, तो ऐसी परिस्थितियां बनती हैं जो धीरे-धीरे इस क्षेत्र के मूल स्वरूप को बदल सकती हैं।

1. बड़े पैमाने पर काम करने की अनिवार्यता

भारत की विशाल जनसंख्या ऐसे समाधानों की मांग करती है जो लाखों लोगों तक पहुंच सके। इसलिए सार्थक सामाजिक प्रभाव के लिए बड़े पैमाने पर काम करना ज़रूरी है। किसी संगठन की पहुंच जितनी ज़्यादा होती है, उसका काम उतना ही ज़्यादा दिखाई देता है और उसे वित्तीय सहयोग मिलने की संभावना भी उतनी ही बढ़ जाती है। यही कारण है कि गैर-लाभकारी संस्थाएं लगातार अपनी पहुंच या काम के दायरे को बढ़ाने के दबाव में रहती हैं, ताकि वे प्रासंगिक बनी रहें और संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकें। लेकिन सवाल यह है कि क्या बड़े पैमाने पर काम करने का यह दबाव कभी-कभी संस्थाओं को उनके मूल उद्देश्य से भटका देता है?

2. पैसों की कमी

जब हम निरंतर प्रासंगिक बने रहने की आवश्यकता पर विचार करते हैं, तो एक स्वाभाविक प्रश्न सामने आता है: यह कैसे सुनिश्चित हो कि संसाधन सबसे प्रभावी समाधानों तक पहुंचें? चिकित्सा, रक्षा या एआई जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान एवं विकास की तरह, सामाजिक नवाचार भी लंबे समय तक निरंतर प्रयास, परीक्षण, पुनरावृति और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप समाधान विकसित करने की मांग करता है। लेकिन वित्तीय सहयोग के लिए शीघ्र विस्तार (रैपिड स्केलिंग) की ज़रूरत एक दुविधा पैदा करती है।

ऐसे में कई गैर-लाभकारी संस्थाएं उन मौजूदा तंत्रों की तलाश करती हैं, जिनके माध्यम से वे जल्दी से बड़ी आबादी तक पहुंच सकें। अधिकांश क्षेत्रों में इसका सबसे स्पष्ट उत्तर सरकार होती है। यह हकीकत कि सरकारी व्यवस्थाएं बड़े पैमाने पर पहुंच बनाने का सबसे तेज़ (और अक्सर सबसे टिकाऊ) माध्यम हैं, पूरे क्षेत्र की रणनीतिक प्राथमिकताओं को प्रभावित करती है। ऐसे में सरकार के साथ साझेदारी केवल एक विकल्प नहीं रह जाती, बल्कि अनेक संगठनों के लिए प्रभाव पैदा करने और अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए ज़रूरी हो जाती है।

3. तकनीक के ज़रिए तेज़ी से विस्तार

पिछले एक दशक में प्रौद्योगिकी और एआई के बढ़ते उपयोग ने गैर-लाभकारी संगठनों के कामकाज को दो अहम तरीकों से बदल दिया है। पहला, जैसे-जैसे संगठन बढ़ते पैमाने और जटिलता के साथ काम करने लगे हैं, संस्थापकों का समय तथा ऊर्जा एक दुर्लभ संसाधन बन गए हैं। ऐसे में प्रौद्योगिकी को आंतरिक प्रक्रियाओं को अधिक कुशल बनाने और सीमित संसाधनों का बेहतर उपयोग करने के एक साधन के रूप में देखा जाता है।

दूसरा, संस्थाओं ने प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल सरकारी व्यवस्थाओं के भीतर बेहतर निगरानी, पहुंच और समन्वय स्थापित करने के लिए भी किया है, वह भी बिना अपने संगठनात्मक ढांचे को उसी अनुपात में बढ़ाए। डिजिटल इंडिया जैसे पहल के साथ मिलकर इसने ऐसी नीतिगत परिस्थितियां बनाई हैं, जिनमें प्रौद्योगिकी के सहारे अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचना और प्रभाव पैदा करना संभव माना जाता है। नतीजतन, सेक्टर की चर्चाओं में ‘नवाचार’ और ‘प्रौद्योगिकी’ एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं। तकनीकी समाधानों को मिलने वाली प्राथमिकता और वित्तपोषण ने भी इस प्रवृत्ति को और मजबूत किया है। इससे गैर-लाभकारी संस्थाओं पर ऐसे मॉडल और क्षमताएं विकसित करने का दबाव बढ़ा है, जो तकनीक-आधारित हों और बड़े पैमाने पर लागू किए जा सकें। इस तकनीक का उपयोग और इसे संस्थाओं की दैनिक दिनचर्या में अपनाने का बोझ अक्सर फ्रंटलाइन कर्मचारियों पर पड़ता है।

इन चुनौतियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, लेकिन इनका समाधान संभव है। कई संस्थाओं ने सोच-समझकर बनाई गई रणनीतियों के ज़रिए प्रभाव और संतुलन, दोनों बनाए रखने की कोशिश की है। उदाहरण के लिए, ग्राम विकास, एजुकेट गर्ल्स और लीडरशिप फॉर इक्विटी जैसी संस्थाओं ने अपने काम का दायरा लगातार बढ़ाने के बजाय कुछ चुनिंदा राज्यों में गहराई से काम करने का रास्ता चुना है। वहीं अक्षय पात्र, सेंट्रल स्क्वायर फाउंडेशन और जनाग्रह जैसी संस्थाओं ने एक स्पष्ट समस्या पर अपना ध्यान केंद्रित रखा, लेकिन अलग-अलग भौगोलिक और सामाजिक संदर्भों में काम करते हुए अपने प्रभाव का विस्तार किया।

इसके अलावा, रॉकेट लर्निंग और अदालत एआई जैसी पहलें ऐसे नवाचारी टूल विकसित कर रही हैं, जो साझा चुनौतियों से निपटने के तरीकों को ही बदल रहे हैं। इन उदाहरणों से पता चलता है कि बड़े पैमाने पर प्रभाव पैदा करने और अपने मूल उद्देश्य के प्रति प्रतिबद्ध बने रहने के बीच संतुलन बनाना संभव है।

ये उपलब्धियां दिखाती हैं कि भारत की मध्यम आकार की गैर-लाभकारी संस्थाओं में आज ब्रैक (बीआरएसी) जैसी वैश्विक संस्थाओं का समकक्ष बनने की क्षमता है।

रेत के मैदान में रखा लाउडस्पीकर_नॉनप्रॉफिट
भारत की मध्यम आकार की गैर-लाभकारी संस्थाओं में ब्रैक (बीआरएसी) जैसी वैश्विक संस्थाओं का समकक्ष बनने की क्षमता है। | चित्र साभार: पेक्सल्स

अदृश्य सत्य

मुझे जिस बात की सबसे अधिक चिंता है, वह सतह के नीचे छिपी हुई है। ये वे सवाल हैं जिन पर बंद कमरों में, निजी बैठकों और अनौपचारिक बातचीतों में चर्चा तो होती है, लेकिन सार्वजनिक विमर्श में उनका ज़िक्र शायद ही कभी होता है।

अगर बड़े पैमाने पर प्रभाव पैदा करने वाली गैर-लाभकारी पहलों की बात करें, तो इसका सबसे स्पष्ट और अच्छी तरह दर्ज उदाहरण सूचना के अधिकार (आरटीआई) आंदोलन के शुरुआती दौर में दिखाई देता है, जिसका नेतृत्व मज़दूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) ने किया था। इस संगठन ने व्यवस्थित रूप से यह मांग उठाई कि लोगों को जानकारी पाने का अधिकार मिले और सार्वजनिक कार्यों में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।

वर्ष 1994 का एक उदाहरण इसे स्पष्ट करता है। एक गांव की बैठक में एमकेएसएस के कार्यकर्ताओं ने 80,000 रुपये की स्वीकृत सार्वजनिक निर्माण परियोजना से जुड़े रिकॉर्ड को पढ़कर सुनाया। रिकॉर्ड के अनुसार परियोजना के लिए 78 ट्रॉली पत्थर, 18 ट्रॉली रेत और 40 ट्रॉली सीमेंट का प्रावधान किया गया था। लेकिन समुदाय के लोगों ने बताया कि इनमें से कोई भी सामग्री कभी गांव तक पहुंची ही नहीं।

इस उदाहरण में एमकेएसएस की आवाज़ साफ़, स्पष्ट और बेझिझक सुनाई देती है। यही भारत के ‘तीसरे क्षेत्र’ की वह आवाज़ थी, जो सत्ता से सवाल पूछने और जवाबदेही की मांग करने से नहीं हिचकती थी।

नागरिक समाज की भूमिका केवल समाधान लागू करने की नहीं है। उसकी ज़िम्मेदारी यह भी है कि वह यह सवाल उठाए कि क्या काम कर रहा है और क्या नहीं, और न्याय तथा अपेक्षित परिणाम सुनिश्चित करने के लिए स्वयं के साथ-साथ सार्वजनिक संस्थाओं और पदाधिकारियों को भी जवाबदेह ठहराए।

आइए एक और उदाहरण देखें। 2006 की असर रिपोर्ट में माधव चव्हाण लिखते हैं, “शिक्षा के मौलिक अधिकार की उपेक्षा, अधिक संसाधनों की आवश्यकता, निगरानी व्यवस्था में सुधार, स्कूलों के निर्माण, या इस तरह और उस तरह के शिक्षकों की नियुक्ति और प्रशिक्षण पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है। लेकिन अब कहने के लिए कुछ नया नहीं बचा है। आज की युवा पीढ़ी की भाषा में कहें तो बस इतना कहा जा सकता है—‘जस्ट डू इट!’”

अब 20 साल आगे बढ़ते हैं और उन नेताओं की बात सुनते हैं, जिनका प्रभाव 1994 के एमकेएसएस या 2006 के माधव चव्हाण से कहीं अधिक है। वे कहते हैं, “हमें खुशी है कि शिक्षा मंत्रालय ने इस देशव्यापी प्रयास के सकारात्मक संकेतों को रेखांकित किया है। हम विकसित भारत के निर्माण में भारत सरकार के साथ हैं।” दिलचस्प बात यह है कि यहां ‘सकारात्मक संकेत’ से आशय आठ वर्षों में बच्चों की अपनी मातृभाषा में एक साधारण अनुच्छेद पढ़ पाने की क्षमता में केवल 2.5 प्रतिशत की वृद्धि से है। वहीं शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़े मूलभूत प्रश्न—जैसे शिक्षकों की थकान, उनकी निर्णय लेने की क्षमता और छोटे स्कूलों की चुनौतियां—अक्सर उन लोगों की सार्वजनिक टिप्पणियों से गायब रहते हैं, जो बड़े पैमाने पर बदलाव लाने का दावा करते हैं।

डेयरी किसानों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए अमूल के एआई सहायक सरलाबेन के शुभारंभ को भी उसके प्रभाव के लिए व्यापक सराहना मिली। नागरिक समाज के प्रमुख सदस्यों ने समस्या की रूपरेखा प्रस्तुत करने में सरकार की दूरदृष्टि और समाधान उपलब्ध कराने के लिए गैर-लाभकारी क्षेत्र की तत्परता की प्रशंसा की। ये प्रयास बेशक सराहनीय हैं। लेकिन ऐसी कौन-सी बाज़ारगत विफलता थी, जिसका समाधान न तो व्यवसाय कर सके और न ही सरकार? क्या इस प्रयास के लिए परोपकारी हस्तक्षेप (फिलांथ्रॉपिक इंटरवेंशन) वास्तव में ज़रूरी था?

ये उदाहरण किसी भी तरह से पूरे क्षेत्र का प्रतिनिधित्व नहीं करते। लेकिन वे एक महत्वपूर्ण भावना को अवश्य उजागर करते हैं। गैर-लाभकारी संगठनों की वर्तमान भूमिका क्या है और उन्हें वास्तव में कौन-सी भूमिका निभानी चाहिए, इन दोनों सवालों के बीच एक तनाव मौजूद है। साथ ही इससे यह सवाल भी जुड़ा हुआ है कि हम फंडिंग मिलने और अपने फर्ज़ को निभाने के बीच तालमेल कैसे बनायें?

नागरिक समाज या गैर-लाभकारी क्षेत्र क्या है?

गैर-लाभकारी संस्थाओं पर अपने चर्चित काम में लेखक और शिक्षाविद् पीटर ड्रकर ने ‘तीसरे क्षेत्र’ को उस क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया है, जो उन लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने का प्रयास करता है, जिन तक न सरकार पर्याप्त रूप से पहुंच पाती है और न ही बाज़ार।

यह एक महत्वपूर्ण सच्चाई की ओर इशारा करता है। समाज में हमेशा कुछ ऐसे लोग और समुदाय रहेंगे, जिनकी ज़रूरतें पूरी नहीं हो पाती। बाज़ार के लिए उनकी सेवा करना लाभकारी नहीं होता और सरकारें भी हर परिस्थिति के अनुसार उतनी तेज़ी से खुद को ढाल नहीं पाती। ऐसे में नागरिक समाज की सबसे अहम भूमिका है इन लोगों की बात सुनना, उनकी समस्याओं को समझना और उनके समाधान की दिशा में काम करना।

क्या हम अपनी उपलब्धियों का जश्न मनाते हुए भी मुश्किल सवाल पूछ सकते हैं? क्या हम सरकारी व्यवस्थाओं के साथ साझेदारी करते हुए भी उनकी आलोचनात्मक समीक्षा करने की स्वतंत्रता बनाए रख सकते हैं?

कई बार इसका मतलब उन मुद्दों को सामने लाना भी होता है, जो न तो फंडर के लिए आकर्षक होते हैं और न ही नीति-निर्माताओं की प्राथमिकताओं में शामिल होते हैं। नागरिक समाज की भूमिका केवल सेवा पहुंचाने की नहीं, बल्कि उन आवाज़ों को जगह देने की भी है, जिन्हें अक्सर अनसुना कर दिया जाता है।

ऐसे में, जैसे-जैसे गैर-लाभकारी संस्थाओं का प्रभाव बढ़ता है, उन्हें नीतिगत चर्चाओं में जगह मिलती है और सत्ता के गलियारों तक उनकी पहुंच बनती है, यह उम्मीद की जा सकती है कि समाज की ओर से सवाल उठाने और उसकी पैरवी करने की उनकी क्षमता भी उसी अनुपात में मज़बूत होगी।

हालांकि, सच्चाई इसके उलट नज़र आती है। हाल के वर्षों में इस क्षेत्र पर रेगुलेटरी दबाव बढ़ा है। पांच वर्षों की अवधि में एफसीआरए लाइसेंस रखने वाले गैर-लाभकारी संगठनों की संख्या 22,678 से घटकर 14,000 से कुछ अधिक रह गई है। साथ ही, बड़े पैमाने पर प्रभाव हासिल करने के लिए सरकार के साथ साझेदारी करने की रणनीतिक आवश्यकता सार्वजनिक आलोचना को हतोत्साहित करती है।

इसका परिणाम एक ऐसे क्षेत्र के रूप में सामने आता है, जो उन समुदायों को प्रभावित करने वाले अहम मुद्दों पर लगातार मौन दिखाई देता है, जिनकी सेवा करने का वह दावा करता है। एक सजग पर्यवेक्षक यह भी देख सकता है कि दक्षता (एफिशिएंसी) और पैमाने (स्केल) जैसी अवधारणाएं, जिन्हें कॉर्पोरेट जगत से ग्रहण किया गया है, धीरे-धीरे सामाजिक कार्य के ‘सामाजिक’ पक्ष पर हावी होने लगी हैं। नतीजतन, इस क्षेत्र की आवाज़ ठीक उसी समय और धीमी होती जा रही है, जब उसका प्रभाव सबसे अधिक हो सकता था।

भारत का गैर-लाभकारी क्षेत्र जिस प्रभाव और क्षमता को बनाने के लिए लंबे समय से मेहनत करता आया है, उसकी पूरी संभावनाओं को साकार करने के लिए अब हमें अपने फैसलों से जुड़े सवालों पर नए सिरे से विचार करना होगा। सवाल अब केवल यह नहीं रह गया है कि हमें बड़े पैमाने पर काम करना चाहिए या प्रौद्योगिकी को अपनाना चाहिए।

असली सवाल इससे कहीं गहरा है। क्या हम अपनी स्वतंत्र और आलोचनात्मक आवाज़ को बनाए रखने का साहस बचाए रख सकते हैं, तब भी जब हमारा अस्तित्व और प्रभाव शक्तिशाली साझेदारियों पर निर्भर हो?

गैर-लाभकारी संस्थाओं की क्षमता पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ी है। वे अब अधिक संसाधन जुटा सकती हैं, अपनी पहुंच का विस्तार कर सकती हैं, प्रौद्योगिकी का बेहतर उपयोग कर सकती हैं और नए समाधान विकसित कर सकती हैं। लेकिन इस बदलाव के साथ एक जोखिम भी जुड़ा है—कहीं हम ऐसे दौर में तो नहीं प्रवेश कर रहे, जिसे कॉरपोरेट प्रभाव वाले नागरिक समाज के रूप में देखा जाएगा?

यह दक्षता या बड़े पैमाने पर काम करने के खिलाफ तर्क नहीं है। भारत के विकास में दोनों की भूमिका ज़रूरी है। चिंता इस बात की है कि कहीं इस प्रक्रिया में नागरिक समाज की वह पहचान कमज़ोर न पड़ जाए, जो उसे अन्य क्षेत्रों से अलग बनाती है।

नागरिक समाज की भूमिका केवल समाधान लागू करने की नहीं है। उसकी ज़िम्मेदारी यह भी है कि वह यह सवाल उठाए कि क्या काम कर रहा है और क्या नहीं, और न्याय तथा अपेक्षित परिणाम सुनिश्चित करने के लिए स्वयं के साथ-साथ सार्वजनिक संस्थाओं और पदाधिकारियों को भी जवाबदेह ठहराए।

ग़ैर-लाभकारी क्षेत्र की आवाज़ अक्सर इसलिए सुनी जाती है क्योंकि यहां कठिन मुद्दों को ग़ैर-पक्षपातपूर्ण तरीके से उठाने की एक लंबी परंपरा रही है। इसलिए हमें विचार-विमर्श और बहस करने का साहस बनाए रखना चाहिए, भले ही ऐसा करना जोखिमों से भरा हो। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो हो सकता है कि हमारी वार्षिक रिपोर्टें और आकर्षक हो जाएं, प्रभाव के आंकड़े और बड़े दिखाई दें, और साझेदारियां भी पहले से बड़ी बन जाएं। लेकिन हमारे सवाल नरम और हमारी चुप्पी साज़िश का हिस्सा बनते चले जाएंगे।

क्या हम अपनी उपलब्धियों का जश्न मनाते हुए भी मुश्किल सवाल पूछ सकते हैं? क्या हम सरकारी व्यवस्थाओं के साथ साझेदारी करते हुए भी उनकी आलोचनात्मक समीक्षा करने की स्वतंत्रता बनाए रख सकते हैं? क्या हम नीतिगत चर्चाओं में जगह मिलने पर यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि वहां केवल सरकारी प्राथमिकताओं की गूंज नहीं, बल्कि उन लोगों की आवाज़ भी पहुंचे जिनके लिए हम काम करते हैं?

यही वे सवाल हैं जो तय करेंगे कि भारत का नागरिक समाज सामाजिक बदलाव की एक वास्तविक ताकत बनता है या केवल कार्यक्रमों को लागू करने वाली एक व्यवस्था भर बनकर रह जाता है। हमारी आवाज़ मायने रखती है। सवाल यह है कि क्या हम उसका इस्तेमाल करने का साहस दिखाएंगे?

इस लेख का अनुवाद शब्द एआई द्वारा किया गया है।

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लेखक के बारे में

  • श्रीवत्सन रामास्वामी निलय फाउंडेशन के सह-संस्थापक और निदेशक हैं, जहां वह गैर-लाभकारी संगठनों, सीएसआर, सरकारों और शोध संस्थानों को परिणामों का मापन, समझ और सुधार करने में सक्षम बनाने पर काम करते हैं, ताकि वंचित समुदायों तक सेवाएं अधिक प्रभावी ढंग से पहुंच सकें। शासन, डेटा और सामाजिक प्रभाव के संगम पर काम करने वाले एक सिस्टम्स रिफॉर्म प्रैक्टिशनर के रूप में, श्रीवत्सन ने सरकारों के साथ साझेदारी में बड़े पैमाने के सार्वजनिक कार्यक्रमों का नेतृत्व किया है। उनका काम मुख्य रूप से निगरानी, मूल्यांकन और सीखने की प्रणालियां विकसित करने तथा अंतिम छोर तक प्रभावी कार्यान्वयन (लास्ट-माइल इम्प्लीमेंटेशन) को बेहतर बनाने पर केंद्रित है।
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