एक बीमा, एक हेल्थ चेक-अप: क्या ऐसे होती है एनजीओ कर्मचारियों की देखभाल?
वर्ष 2005 में मुंबई में भीषण बाढ़ आयी थी। उस समय हमारी टेंट-नुमा बस्ती एक पुल के पास थी। जल्द ही चारों ओर से बाढ़ का पानी मलबे समेत हमारी बस्ती में घुस आया। मेरे पिता लगभग तीन दिनों तक उस बाढ़ में फंसे रहे। इस दौरान उन्हें कई तरह के संक्रमण हो गए, जिसके चलते कुछ समय बाद उनका निधन हो गया।
हम घिसाड़ी गाड़िया लोहार समुदाय से हैं, जो एक विमुक्त जनजाति है और लोहे से औज़ार तथा हथियार बनाने का काम करती है। हमारे पूरे परिवार में मेरे पिता ही मुख्य कारीगर थे, जबकि हम केवल धौंकनी चलाने या कोयला इकट्ठा करने में उनकी मदद करते थे। उनके निधन के बाद मेरी मां पर पांच बेटियों की ज़िम्मेदारी आ गयी, जिनमें सबसे छोटी बेटी की उम्र केवल चार साल थी। हमारे पास रोज़ी-रोटी कमाने का जो इकलौता साधन था, हम उसके बारे में भी ज़्यादा नहीं जानते थे।
लेकिन आने वाले चंद महीनों में हमने देखा कि आसपास रहने वाले कई लोहार परिवारों ने हमारे काम को अपने काम के साथ जोड़ लिया। वे हमारे यहां आते, लोहे को आकार देते, और फिर बाकी काम पूरा करने के लिए हमें सौंप देते। इसके लिए कोई औपचारिक व्यवस्था नहीं थी। लगभग डेढ़ साल तक हम इसी तरह काम करते रहे। यही वह दौर था, जो मुश्किल घड़ी में हमारे परिवार का सहारा बना।
उस अनुभव को ही मैं आज सामूहिक देखभाल, यानी कलेक्टिव केयर का नाम देती हूं। एक ऐसी व्यवस्था, जिसमें लोग एक-दूसरे का ख्याल रखते हैं। इस व्यवस्था को विशेष रूप से ऐसे समुदाय पीढ़ियों से जीवित रखते आए हैं, जिन्हें मुख्यधारा से कभी कोई सहयोग नहीं मिला। यह कोई कार्यक्रम या नीति नहीं है। अधिकांश संगठन, यहां तक कि वे भी जो सीधे ऐसे समुदायों के साथ काम करते हैं, अपने स्टाफ की देखभाल के बारे में सोचते समय इन अनुभवों और परंपराओं से प्रेरणा नहीं लेते।
विकास सेक्टर की चर्चाओं में ‘देखभाल’ (केयर) का महत्व भले बढ़ रहा हो, लेकिन जिन समुदायों ने पीढ़ियों से इसकी परंपराएं गढ़ी हैं और इसे आत्मसात किया है, उन्हें ही इन चर्चाओं के हाशिये पर धकेला जा रहा है। आज देखभाल की बात अक्सर बीमा योजनाओं, वेलनेस कार्यक्रमों और सेल्फ-केयर के संदर्भ में की जाती है। ये सभी ऐसे नज़रिए हैं, जो व्यक्ति को केंद्र में रखते हैं और यह मानकर चलते हैं कि लोगों के पास कई बुनियादी संसाधनों और सुविधाओं तक पहुंच है। जबकि अधिकांश ज़मीनी समुदाय हमेशा से इन संसाधनों और सुविधाओं से वंचित रहे हैं। वहीं एक-दूसरे की सामूहिक रूप से देखभाल कैसे की जाए, इस बारे में इन समुदायों के पास जो अनुभव और समझ है, वह शायद ही कभी इन चर्चाओं का हिस्सा बन पाता है।
मैंने वर्ष 2016 में अनुभूति ट्रस्ट की स्थापना की थी। हमारी टीम के अधिकांश सदस्य आदिवासी, दलित, घुमंतू और प्रवासी समुदायों से हैं। इनमें कई सिंगल महिलाएं हैं, कुछ तलाकशुदा हैं, और कुछ ने कामकाजी दुनिया में लौटने से पहले 10–12 साल का लंबा अंतराल लिया था। जब मैंने इन तमाम बातों पर गौर किया, तो यह साफ हो गया कि संस्थाओं में प्रचलित देखभाल की व्यवस्थाएं (बीमा, बीमारी की छुट्टियां या सालाना स्वास्थ्य जांच) कुछ ऐसी धारणाओं पर आधारित हैं, जो हमारी टीम के अधिकांश लोगों के जीवन से मेल नहीं खाती।
देखभाल से जुड़ा कल्चर कैसा होता है?
सामूहिक देखभाल के कल्चर की शुरुआत मानवाधिकार, नारीवाद और भारतीय संविधान के मूल्यों के प्रति स्पष्ट प्रतिबद्धता से होती है। जब किसी टीम में घुमंतू, आदिवासी और ग्रामीण पृष्ठभूमियों के सदस्य होते हैं, तो यह समझना ज़रूरी होता है कि उन्होंने जीवन में कई तरह के संघर्ष देखे होते हैं। ऐसे में यह मानना गलत होगा कि हर व्यक्ति सामाजिक, मानसिक या भावनात्मक रूप से एक ही स्तर पर काम करने में सक्षम है। अपनी टीम के सदस्यों की परिस्थितियों को समझना संस्थाओं को प्रेरणा और निरंतरता की राह दिखा सकता है।
उदाहरण के लिए, झारखंड के एक आदिवासी समुदाय से आने वाले हमारे एक सहयोगी हिंदी में अधिक सहज थे। इसलिए हमने टीम की बैठकों को हिंदी में करना शुरू किया। हम अपने इस फैसले से यह संदेश भी दे रहे थे कि किसी व्यक्ति के बोलने का तरीका या भाषा का ज्ञान उसकी क्षमता का पैमाना नहीं है। जब उम्मीदवार बताते हैं कि इंटरव्यू के दौरान एक सामान्य “जय भीम” सुनना उनके संगठन से जुड़ने के फैसले में निर्णायक था, तो यह दिखाता है कि कार्यस्थलों में उनकी पहचान और मान्यताओं के लिए ऐतिहासिक रूप से कितनी कम जगह रही है। इसी तरह, जब टीम के लोग बिना यह सोचे-समझे कि एक-दूसरे के टिफिन में क्या है, साथ बैठकर खाना खाते हैं, तो उसका भी अपना महत्व है। खासकर ऐसे समाज में, जहां खानपान आज भी जाति के बोझ से मुक्त नहीं है, और अक्सर दफ्तरों में इससे जुड़ी भेदभाव की कई घटनाएं देखने को मिलती हैं।
हाशिये पर खड़े समुदायों के साथ काम करने वाले संगठन भी अपने भीतर वही जातिगत, लैंगिक, वर्गगत और विकलांगता-आधारित पूर्वाग्रह ढो सकते हैं, जिनसे वे बाहर की दुनिया में लड़ने का दावा करते हैं। इस तरह की सोच में मौजूद खामियां हमेशा तुरंत नज़र नहीं आती। अमूमन वे तभी ज़ाहिर होती हैं, जब कोई उनकी ओर ध्यान दिलाता है।
मसलन, हमारी टीम के एक सदस्य ने किसी दूसरे संगठन में बच्चों की एक गतिविधि देखी, जिसमें वे घर से कैनवस जूते लाकर उन पर सजावट करते थे। उन्होंने सुझाव दिया कि हम भी अपने समुदाय में ऐसी ही गतिविधि कर सकते हैं। तब सवाल उठा कि हमारे समुदायों में कितने बच्चों के पास घर पर कैनवस के जूते होते हैं, और कितने बच्चों को इसके लिए इधर-उधर से जुगाड़ करना पड़ेगा?
इस एक सवाल ने हमारे लिए एक बड़ी चर्चा का रास्ता खोल दिया। हमने बात की कि किस तरह अक्सर योजनाएं बनाते समय हम अपनी धारणाओं को परखना भूल जाते हैं। यह भी उभरकर आया कि संस्थाओं में संपन्न सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाला नेतृत्व (लीडरशिप) अनजाने में ऐसी बातों को नज़रअंदाज़ कर सकता है।
इसलिए देखभाल की संस्कृति तभी पनप सकती है, जब संस्थाएं लगातार यह परखती रहें कि वह कहां चूक रही हैं। यह इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि एक असमान समाज में पूर्वाग्रह किसी न किसी रूप में भीतर रास्ता बना ही लेते हैं।
कॉर्पोरेट देखभाल की धारणा से बाहर कैसे निकला जाए?
मैंने अपने 25 सहकर्मियों से उन क्षणों के बारे में सोचने को कहा, जब उन्हें वास्तव में लगा हो कि संस्था ने व्यावहारिक रूप से उनकी देखभाल की है। जो प्रतिक्रियाएं सामने आयी, वे बेहद सहज, ज़मीनी, और कई मामलों में ऐसी थी जिन्हें सुनने की मैंने अपेक्षा भी नहीं की थी।
1. संस्था में भर्ती (हायरिंग) के लिए जीवन के अनुभवों को महत्व देना
हमारे काम को आकार देने वाली एक अहम प्रक्रिया, जो किसी औपचारिक नीति का हिस्सा नहीं है, भर्ती (हायरिंग) को लेकर हमारा नज़रिया है। हम जाति, प्रवास, जेंडर और पहचान से जुड़े जीवनानुभवों को एक प्रमुख कौशल (कोर स्किल) मानते हैं, क्योंकि यह ज्ञान हमारे काम के लिए पूरक नहीं, बल्कि बुनियादी है।
अक्सर ऐसे अनुभवों को उन पैमानों के पीछे धकेल दिया जाता है, जिन्हें अधिक महत्व दिया जाता है—जैसे शैक्षणिक योग्यता, अन्य गैर-लाभकारी संगठनों में काम करने का अनुभव, अंग्रेज़ी भाषा पर पकड़, कंप्यूटर कौशल आदि। हमारी टीम के कई सदस्यों ने बताया कि इंटरव्यू के दौरान इस नज़रिए के बारे में सुनकर उन्हें पहली बार लगा कि उनका जीवन अनुभव कोई कमी नहीं, बल्कि उनकी ताकत हैं।
2. स्वास्थ्य बीमा से आगे सोचना
अधिकांश संगठन स्वास्थ्य बीमा प्रदान करते हैं, लेकिन उसका लाभ केवल अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति में मिलता है, जो आमतौर पर तीन से पांच वर्षों में एक बार ही होता है। हमारी टीम के सदस्यों ने बताया कि वे इससे कहीं अधिक नियमित रूप से बीमार पड़ते हैं। स्थानीय डॉक्टर से परामर्श या पास के क्लिनिक से दवाइयां खरीदने जैसे रोज़मर्रा के स्वास्थ्य संबंधी खर्च बीमा के दायरे में आते ही नहीं हैं। इसलिए उनमें से कई लोग चुपचाप ऐसे खर्चों को टालते रहे थे, क्योंकि अपने ऊपर 100 या 400 रुपये खर्च करना उन्हें उचित नहीं लगता था। जेंडर से जुड़ी भूमिकाओं ने इस व्यवहार को इतना सामान्य बना दिया था कि उन्हें स्वयं भी यह एहसास नहीं था कि वे ऐसा कर रहे हैं। इस समस्या के समाधान के लिए हम उनके वेतन में हर महीने एक निश्चित अतिरिक्त राशि सीधे जोड़ देते हैं। इसके उपयोग पर कोई शर्त या प्रतिबंध नहीं है।
एक और व्यवस्था, जिसका उल्लेख हमारी टीम ने किया, वह थी ‘रिवॉल्विंग लोन’। हमने देखा था कि महीने की 24 या 25 तारीख तक आते-आते कई टीम सदस्यों का पूरा वेतन खर्च हो जाता था। इसके बाद उनके पास अनौपचारिक साहूकारों से 10 प्रतिशत ब्याज़ पर कर्ज़ लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता था। जब हमने इस व्यवस्था की शुरुआत की, तब हमारी टीम के कई लोग पहले से ही इस कर्ज़ के जाल में फंसे हुए थे। चूंकि गैर-लाभकारी संगठन कानूनी रूप से ऋण नहीं दे सकते, इसलिए हमने कुछ व्यक्तिगत दानदाताओं की मदद से लगभग 2–3 लाख रुपये का एक छोटा कोष तैयार किया, जो संगठन के भीतर नियमित रूप से घूमता रहता है। यदि किसी को 10,000 रुपये की ज़रूरत हो, तो वह यह राशि ले सकता है और अपनी सुविधा के अनुसार एक साल के भीतर लौटा सकता है।
3. अधिकतम आरक्षण नीति
आरक्षण नीति से आगे जाकर अधिकतम प्रतिनिधित्व यह सुनिश्चित करता है कि विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों से आने वाले लोग संगठन के भीतर सार्थक रूप से मौजूद हों।
कई लोगों के लिए, विशेष रूप से अनुसूचित जाति, घुमंतू जनजाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों से आने वाले सदस्यों के लिए, यह उनके संस्थानों और गैर-लाभकारी संगठनों के साथ हुए पूर्व अनुभवों से बिल्कुल अलग था। उनके अनुभव में आरक्षण से जुड़ी भाषा और चर्चा को अक्सर नकारात्मक संदर्भों में इस्तेमाल किया जाता था।
इसलिए ज़रूरी है कि प्रतिनिधित्व और आरक्षण को किसी एहसान या उदारता के रूप में न देखा जाए। इन्हें अधिकार के रूप में समझा जाना चाहिए—ऐसे अधिकार, जो एक सजग नीतिगत निर्णय और सामाजिक न्याय की व्यापक दृष्टि पर आधारित हैं।


4. ऐसे कार्यस्थल बनाना, जो सभी के लिए सुलभ हों
टीम के सदस्यों ने कहा कि जब संगठन ‘सामाजिक विकलांगता’ को पहचानता है और उसके प्रति एक संवेदनशील नज़रिया अपनाता है, तो इससे उनके रोज़मर्रा के तनाव में कमी आती है। सामाजिक विकलांगता, जिसे अंग्रेज़ी में ‘सोशल डिसेबिलिटी’ के नाम से जाना जाता है, का अर्थ है जाति, वर्ग, लैंगिक असमानताओं और जीवन की परिस्थितियों से जुड़ी संरचनात्मक बाधाओं के बीच लगातार जूझते रहने से पैदा होने वाली थकान।
टीम ने बताया कि संगठन के इस रवैये से उन्हें राहत का एहसास होता है और वे अपने काम पर अधिक सहजता और एकाग्रता के साथ ध्यान दे पाते हैं। इस संदर्भ में यात्रा संबंधी नियमों में लचीलापन, काम के घंटों को लेकर लचीला रवैया, या स्थानीय आवाजाही के लिए अधिक बजट जैसी छोटी-छोटी पहलें भी बड़ा फर्क पैदा करती हैं।
दलित, आदिवासी और घुमंतू समुदायों से नेतृत्व विकसित करने का मतलब है लोगों के जीवन की भौतिक और सामाजिक वास्तविकताओं को समझना और उनके साथ काम करना। हमारी टीम के कई सदस्य अकेले बच्चों की परवरिश कर रहे हैं। कई ऐसे हैं, जो बिना पारिवारिक सहारे के बड़े हुए हैं। वहीं कुछ अपने पैरों पर खड़े होने के लिए घर छोड़कर दूसरे शहरों में आकर बसे हैं। ये परिस्थितियां अक्सर उनकी अवसरों तक पहुंच और रोज़मर्रा के जीवन, दोनों को प्रभावित करती हैं।
उदाहरण के लिए, हमारी टीम के कई सदस्य घर से बना खाना नहीं ला पाते थे। ऐसे में उन्हें सस्ते, लेकिन अक्सर हानिकारक भोजन पर निर्भर रहना पड़ता था। इसे देखते हुए हमने उनके लिए एक साझा रसोई की व्यवस्था की।
5. विफलता की गुंजाइश से भरोसा बनाने तक का सफर
टीम के कई सदस्यों ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि पारंपरिक भर्ती प्रक्रियाएं अक्सर कम उम्र के लोगों को प्राथमिकता देती हैं और युवावस्था को ही उत्पादकता का पर्याय मान लेती हैं। इस सोच में उन महिलाओं की वास्तविकता अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाती है, जिन्हें सामाजिक और व्यक्तिगत परिस्थितियों के कारण वर्षों तक अपनी आकांक्षाओं को पीछे रखना पड़ा। जब वे दोबारा कामकाजी दुनिया में लौटती हैं, तो उनसे अक्सर वेतन, भूमिका और नेतृत्व के अवसरों पर समझौता करने की अपेक्षा की जाती है, क्योंकि उन्हें ‘अनुभव की कमी’ वाले लोगों के रूप में देखा जाता है।
टीम के सदस्यों ने बताया कि उनके लिए सबसे ज़रूरी बात यह थी कि संगठन उन पर भरोसा जताए कि वे यह काम कर सकते हैं। ऐसा इसलिए भी क्योंकि कई बार खुद अपनी क्षमताओं को लेकर उनका भरोसा कमज़ोर होता है। लेकिन यह भरोसा सिर्फ शब्दों में नहीं, बल्कि लचीलेपन के साथ भी दिखाई देना चाहिए—किसी भूमिका में सहज होने के लिए छह महीने, आठ महीने या एक साल तक का समय देना; बिना इस दबाव के कि वे तुरंत परिणाम दिखाएं। साथ ही, प्रयोग करने, गलती करने और उनसे सीखने की गुंजाइश भी बनी रहनी चाहिए।
जब कोई व्यक्ति असफलता को अपनी व्यक्तिगत कमी या अयोग्यता के रूप में देखने लगता है, तो यह केवल उसका निजी संघर्ष नहीं होता। यह इस बात का भी संकेत है कि संगठन की देखभाल की संस्कृति में कहीं न कहीं कोई कमी रह गयी है।
उदाहरण के तौर पर, एक टीम सदस्य ने लंबे समय तक बनी रहने वाली चिंता और तनाव के बारे में बताया, जिसका असर उनके शारीरिक स्वास्थ्य पर भी दिखायी देने लगा था। ऐसे में हमने उनकी परिस्थितियों को समझते हुए प्रोबेशन अवधि के बाद उन्हें पूर्णकालिक भूमिका के बजाय अंशकालिक भूमिका की पेशकश की। हमारा मानना है कि हर व्यक्ति तुरंत पारंपरिक कार्य भूमिकाओं की ज़िम्मेदारियां निभाने की स्थिति में नहीं होता। इसी सोच के तहत हम अपनी भूमिकाओं की संरचना और उन्हें उपलब्ध कराने के तरीकों में लगभग 40 प्रतिशत तक लचीलापन बनाए रखते हैं।
6. संरचना के नाम पर लोगों को अलग-थलग न करना
संचार किसी भी संगठनात्मक संस्कृति का एक अहम हिस्सा है। लेकिन आज पेशेवर और डिजिटल संचार के नाम पर लोग धीरे-धीरे एक-दूसरे से कटते जा रहे हैं। ये माध्यम कामकाज को व्यवस्थित करने में भले मदद करते हों, लेकिन हमेशा ऐसी जगह नहीं बना पाते जहां लोग खुलकर अपनी बात रख सकें या अपनी पूरी मौजूदगी के साथ सामने आ सकें।
रोज़मर्रा के कामकाज के लिए डिजिटल संचार हमारे लिए भी ज़रूरी है। लेकिन इसके साथ-साथ हम आमने-सामने की व्यक्तिगत बातचीत की एक मज़बूत संस्कृति को भी सचेत रूप से बनाए रखते हैं। ये बातचीत किसी औपचारिक समीक्षा या कामकाजी अपडेट तक सीमित नहीं होती। यह एक खुली जगह होती है, जहां सहकर्मी काम, परिवार या अपने निजी अनुभवों के बारे में बात कर सकते हैं।
ऐसी बातचीत किसी व्यक्ति के व्यवहार के पीछे मौजूद परिस्थितियों को समझने के लिए बेहद ज़रूरी है। जब हमें किसी के जीवन-संदर्भों की बेहतर समझ होती है, तो हम उसके प्रति अधिक संवेदनशीलता और समझदारी से पेश आ सकते हैं। इससे जल्दबाज़ी में निर्णय देने या किसी पर कोई ठप्पा लगा देने के बजाय, उसकी ज़रूरत के मुताबिक सहयोग और सहारा देना संभव हो पाता है।
फंडर्स के सामने देखभाल की पैरवी करना
इस प्रकार की देखभाल के लिए फंडर्स के सामने तर्क रखना आसान नहीं होता। अक्सर उनके पास कल्याण, भूमिकाओं और योग्यताओं की पहले से तय परिभाषाएं होती हैं, जिनके दायरे में वे चीज़ों को समझते और परखते हैं।
ऐसे मौकों पर हमें अपनी बात पर डटे रहना पड़ता है। जब हम कहते हैं कि किसी व्यक्ति का जीवन अनुभव भी एक महत्वपूर्ण कौशल है, तो कई बार इसे गंभीरता से नहीं लिया जाता। लेकिन कुछ फंडर्स ठहरकर इस पर विचार भी करते हैं। वे पूछते हैं कि जाति, प्रवास या बहिष्करण के अनुभवों को ज्ञान के रूप में क्यों नहीं माना जाना चाहिए? यही सवाल उन स्थापित धारणाओं को चुनौती देने की शुरुआत करता है, जिनके आधार पर अब तक योग्यता और विशेषज्ञता को परिभाषित किया जाता रहा है।
हम फंडर्स से आग्रह करते हैं कि वे केवल विश्वास-आधारित फंडिंग (ट्रस्ट-बेस्ड फंडिंग) से आगे बढ़कर न्याय-आधारित फंडिंग (जस्टिस-बेस्ड फंडिंग) की दिशा में सोचें। वे खुद से पूछें—वे किन समुदायों को फंड कर रहे हैं? किन समुदायों ने ऐतिहासिक रूप से सबसे अधिक नुकसान और बहिष्करण झेला है? और समाज के निर्माण में उनका योगदान क्या रहा है?
विडंबना यह है कि जिन समुदायों का योगदान सबसे अधिक रहा है, अक्सर उन्हें ही सबसे कम संसाधन और वित्तीय सहयोग मिलता है। हमारे लिए जस्टिस-बेस्ड फंडिंग का अर्थ इसी असंतुलन को पहचानना है। यह मानना कि उन समुदायों के प्रति समाज का एक बड़ा नैतिक ऋण है, जिन्होंने लंबे समय तक बिना किसी मान्यता, सम्मान या पर्याप्त संसाधनों के समाज में अपना योगदान दिया है।
सभी फंडर्स इस नज़रिए से सहज नहीं होते। कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य या आजीविका जैसे क्षेत्रों में न्याय की बात क्यों लानी चाहिए? लेकिन हम अपनी भाषा और अपने दृष्टिकोण पर कायम रहते हैं। हम इसे ‘करियर जस्टिस’ कहते हैं, क्योंकि न्याय के बिना पेशेवर विकास की कल्पना कैसे की जा सकती है? अगर किसी विशिष्ट जाति से आने वाले बच्चे को पूरी ज़िंदगी कक्षा की आख़िरी बेंच पर बैठने के लिए मजबूर किया गया हो, तो उससे यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह अचानक सबके साथ बराबरी की दौड़ में खड़ा हो जाएगा? जब तक न्याय के सवाल को नहीं समझा जाएगा, तब तक वह बच्चा अपने साथ संदेह, अपराधबोध और खुद को ही दोषी मानने की भावना लेकर आगे बढ़ेगा।
कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य या आजीविका जैसे क्षेत्रों में न्याय की बात क्यों लानी चाहिए? लेकिन हम अपनी भाषा और अपने दृष्टिकोण पर कायम रहते हैं।
फंडर्स को यह समझाना लगातार एक चुनौती बना रहता है, क्योंकि यह मुख्यधारा का मॉडल नहीं है। हम उनसे आग्रह करते हैं कि वे हमारे जैसे संगठनों को अलग नज़रिए से देखें। यानी ऐसी इकाइयां, जिनके लिए क्षमता, विकास और स्थायित्व की परिभाषाएं कारोबारी मानकों से तय नहीं की जा सकती।
हमारे लिए क्षमता का मतलब केवल काम की गति या तकनीकी दक्षता नहीं है। इसमें लोगों के जीवन अनुभव, उनके संघर्षों से हासिल समझ और उन अनुभवों से विकसित नज़रिया भी शामिल है। इसी तरह, सामूहिक देखभाल के लिए हमेशा बड़े बजट या अतिरिक्त संसाधनों की ज़रूरत नहीं होती। उसे सबसे अधिक ज़रूरत होती है सही माहौल की। एक ऐसा परिवेश, जहां लोगों की परिस्थितियों को स्वीकार किया जाए, उनके लिए असफल होने और प्रयोग करने की गुंजाइश हो, और ज़मीनी नेतृत्व को विकसित होने का अवसर मिले।
कुछ फंडर्स इस दृष्टिकोण को समझते हैं, लेकिन बहुत से लोग अब भी इस समझ से दूर हैं। यही अंतर हमारे लिए संसाधन जुटाने और संगठन के विस्तार की गति को चुनौतीपूर्ण बनाता है। साथ ही, उन वैचारिक और संरचनात्मक प्रयासों को भी पर्याप्त सहयोग नहीं मिल पाता, जो इस तरह की देखभाल-आधारित कार्य संस्कृति की नींव हैं।
संगठनों के लिए देखभाल को व्यवहार में उतारने के लिए सबसे पहले एक स्पष्ट प्रतिबद्धता की ज़रूरत होती है। इसके साथ यह समझ भी ज़रूरी है कि देखभाल एक उदार लीडरशिप द्वारा किया जाने वाला कोई एहसान नहीं है। बल्कि यह एक बुनियादी अधिकार है, जिसकी उम्मीद लोग उन संस्थाओं से कर सकते हैं, जिन्हें वे अपना श्रम और समय देते हैं।
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लेखक के बारे में
- दीपा पवार एक एनटी-डीएनटी एक्टिविस्ट, शोधकर्ता, लेखिका, ट्रेनर और काउंसलर हैं। दीपा घिसाड़ी घुमंतू समुदाय से आती हैं और प्रवास, अपराधीकरण और सामाजिक असुरक्षा जैसे अनुभव उनके जीवन का हिस्सा रहे हैं। उन्होंने ‘अनुभूति’ की स्थापना की है जो जाति-विरोधी और नारीवाद पर बात करने वाला संगठन है। अपने लंबे करियर में दीपा ने एनटी-डीएनटी, आदिवासी, ग्रामीण और बहुजन समुदाय के लोगों के साथ काम किया है। उनका काम मुख्य रूप से लिंग, मेंटल और सेक्शुअल हेल्थ, स्वच्छता और संवैधानिक समझ पर केंद्रित है। पिछड़े समुदायों के साथ मिलकर वे अभियान खड़ा करने और उन्हें अपने इतिहास और विरासत पर दोबारा दावा करने में भी मदद करती हैं।



