साझा संसाधनों के लिए क्यों ज़रूरी है सामुदायिक डेटा?
पीढ़ियों से भारत के अलग-अलग समुदाय अपने आसपास के प्राकृतिक संसाधनों—जंगलों, आर्द्रभूमियों, चरागाहों, नदियों, तटीय इलाकों और जल स्रोतों—की देखभाल करते आए हैं। यह काम वे साझा सांस्कृतिक परंपराओं, स्थानीय नियमों और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे पारिस्थितिक ज्ञान के आधार पर करते रहे हैं। सामूहिक देखभाल और प्रबंधन की इन व्यवस्थाओं ने लोगों की आजीविकाओं को सहारा दिया है और जैव विविधता को बचाए रखा है। साथ ही इसने समुदायों तथा उन प्राकृतिक संसाधनों के रिश्ते को भी सींचा है, जिन पर उनका जीवन निर्भर करता है।
लेकिन इस सामुदायिक ज्ञान का बड़ा हिस्सा आज भी औपचारिक व्यवस्थाओं से बाहर है। इनमें से कई प्राकृतिक क्षेत्र, खासकर वे जिनका प्रबंधन साझा संसाधनों (कॉमंस) के रूप में होता है, न तो ठीक से मानचित्रों में दर्ज हैं और न ही उनकी कानूनी स्थिति स्पष्ट है। सरकारी रिकॉर्ड में भी इनके बारे में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है। भारत में साझा भूमि (कॉमन लैंड्स) का आखिरी व्यापक आकलन 25 साल पहले वर्ष 1998 में हुआ था। इसके बाद के वर्षों में हुए अनुमानों से पता चलता है कि अलग-अलग ज़िलों में साझा भूमि का 1 से 32 प्रतिशत तक हिस्सा खत्म हो चुका है।
डेटा और रिकॉर्ड में मौजूद इन कमियों के चलते प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी जानकारी अलग-अलग सरकारी दस्तावेजों और नियोजन प्रक्रियाओं में बिखरी रहती है। मौसम के चक्रों, संसाधनों की सीमाओं और अपने पारिस्थितिक इतिहास के बारे में समुदायों के पास जो पारंपरिक ज्ञान है, उसे इन प्रणालियों में शायद ही कभी जगह मिलती है। इसका नतीजा यह है कि कई साझा संसाधन अतिक्रमण, क्षरण और खराब प्रबंधन का शिकार बनते जा रहे हैं।
जैसे-जैसे पर्यावरणीय चुनौतियां गहराती जा रही हैं, चाहे वह जल संकट हो, बाढ़, तटीय कटाव या प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण, वैसे-वैसे पारिस्थितिकी से जुड़े ऐसे डेटा की ज़रूरत भी बढ़ती जा रही है जो अधिक सहभागी और सुलभ हो। इसमें समुदायों द्वारा तैयार किए गए रिकॉर्ड, स्थानीय पारिस्थितिक ज्ञान और मौखिक परंपराओं से मिली जानकारी भी शामिल हैं। इन स्रोतों को मान्यता देना और उन्हें निर्णय-निर्माण का हिस्सा बनाना आज पहले से कहीं अधिक ज़रूरी हो गया है।
भागीदारी का माध्यम बने डेटा
अगर डेटा को समुदाय-आधारित पारिस्थितिक शासन को मजबूत करना है, तो वह केवल रिकॉर्ड बनकर नहीं रह सकता। उसे ऐसा माध्यम बनना होगा जिसमें स्थानीय सरकारें, नागरिक समाज संगठन और समुदाय सहित विभिन्न पक्ष अपनी जानकारी जोड़ सकें, उसे आसानी से देख और समझ सकें, और अपने निर्णयों में उसका इस्तेमाल कर सकें।
सामुदायिक संसाधनों की योजना और प्रबंधन में समुदायों को सक्षम बनाने वाली डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पहल कोर स्टैक के सह-संस्थापक आदितेश्वर सेठ बताते हैं कि जब डेटा समुदायों के हाथ में होता है, तो उसकी दो महत्वपूर्ण भूमिकाएं होती हैं। पहली, यह निर्णय लेने में मदद करता है, क्योंकि इससे आपको पता चलता है कि क्या कदम उठाने हैं और कब उठाने हैं। दूसरी, यह संवाद और चर्चा की शुरुआत करने का माध्यम बनता है। दर्ज जानकारी के आधार पर लोग बीते अनुभवों पर विचार कर सकते हैं, सवाल उठा सकते हैं और मिलकर आगे की योजना बना सकते हैं। इस तरह डेटा से बनने वाले डिजिटल रिकॉर्ड समुदायों के बीच हुई बातचीत और फैसलों का दस्तावेज बन जाते हैं, जिनका सहारा लेकर स्थानीय शासन और सामाजिक जवाबदेही को और मज़बूत किया जा सकता है।
यह सोच कोर स्टैक के तहत विकसित किए गए विभिन्न उपकरणों में भी दिखाई देती है। इनमें से एक है कॉमंस कनेक्ट। यह एक एंड्रॉयड-आधारित सहभागी एप्लिकेशन है, जो समुदायों के स्थानीय ज्ञान को भू-स्थानिक (जियोस्पेशियल) डेटा के साथ जोड़ता है। यह मंच स्थानीय संरक्षकों को प्राकृतिक संसाधनों का मानचित्रण करने, उनकी योजना बनाने और उनका प्रबंधन करने में सक्षम बनाता है।
झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों में, जहां पेसा अधिनियम लागू है, हाशिये पर रह रहे समुदायों के साथ काम करने वाली गैर-लाभकारी संस्था सपोर्ट इस मंच का उपयोग करती है, ताकि समुदायों से सुझाव और जानकारी जुटा सके। इन जानकारियों के आधार पर ग्राम सभा की बैठकों से पहले डेटा-आधारित प्रस्ताव तैयार किए जाते हैं।
दुमका जिले के जिन गांवों में इस पहल को लागू किया गया है, वहां कॉमंस कनेक्ट ने जल संरक्षण, सिंचाई, वृक्षारोपण और आजीविका से जुड़े डेटा-आधारित प्रस्ताव तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रपोज़ल के एक समान फॉर्मेट से यह प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित और प्रभावी हुई है। साथ ही, बाहरी तकनीकी सहायता पर निर्भरता भी कम हुई है और डेटा को अधिक पारदर्शी तरीके से साझा किए जाने के कारण समुदायों की भागीदारी और स्वामित्व की भावना भी मज़बूत हुई है।
यह उदाहरण दिखाता है कि जब कॉमंस से जुड़ा ज्ञान लोगों की पहुंच में होता है, तो शासन प्रक्रियाओं में सार्थक भागीदारी करने की उनकी क्षमता बढ़ती है। इस तरह डेटा केवल जानकारी का स्रोत नहीं रहता, बल्कि सतर्क और सहभागी निर्णय-निर्माण को संभव बनाने वाला एक महत्वपूर्ण साधन बन जाता है।
अधिकार जताने का माध्यम भी है डेटा
डेटा की भूमिका केवल लोगों तक जानकारी पहुंचाने तक सीमित नहीं है। यह समुदायों को प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से जुड़े फैसलों पर सवाल उठाने और उन्हें प्रभावित करने का अवसर भी देता है।
इसका एक उदाहरण वन अधिकार अधिनियम में वर्ष 2012 में किए गए संशोधन में देखा जा सकता है। इस संशोधन के तहत सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देने की प्रक्रिया में जीआईएस आधारित मानचित्रण को शामिल किया गया था। इसका उद्देश्य यह था कि अधिकारी ग्राम सभाओं की मदद से जंगलों की पारंपरिक सीमाओं का मानचित्रण करें। लेकिन कई मामलों में इस तकनीक का इस्तेमाल उन क्षेत्रों के आकार को नए सिरे से परिभाषित करने और उन्हें कम दिखाने के लिए किया गया, जिन्हें अधिकारों के तहत मान्यता मिलनी थी।
ओडिशा के कालाहांडी जिले में कई गांवों ने इसका जवाब अपने स्तर पर जीपीएस आधारित मानचित्रण करके दिया। समुदाय के लोग अपने जंगलों की पूरी सीमा पर पैदल चले और ऐसे साक्ष्य जुटाए जिन्हें औपचारिक व्यवस्थाओं के भीतर भी मान्यता मिल सके। उन्होंने अपना डेटा तैयार किया और उसका उपयोग भी किया। इससे वे कई गलतियों को चुनौती दे पाए और जंगलों के प्रबंधन से जुड़े फैसलों में अपनी भूमिका को भी मज़बूती से स्थापित किया।
यह उदाहरण दिखाता है कि डेटा समुदायों को साझा संसाधनों और उनसे जुड़ी नीतियों के केवल उपभोक्ता या लाभार्थी बने रहने के बजाय सक्रिय संरक्षक बनने में मदद कर सकता है। इससे वे संस्थाओं के साथ अधिक प्रभावी ढंग से संवाद कर पाते हैं और संसाधनों के शासन में अपनी सार्थक भागीदारी सुनिश्चित कर सकते हैं।


डेटा, जो जीवन के अनुभवों से निकले ज्ञान को सामने लाए
भले ही डेटा भागीदारी को बढ़ावा दे और सामूहिक निर्णय-निर्माण को मजबूत बनाए, फिर भी एक अहम सवाल बना रहता है—वह क्या दिखाता है और क्या छोड़ देता है?
कॉमंस से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें—जैसे पारंपरिक सीमाएं, संसाधनों का मौसमी उपयोग और स्थानीय पारिस्थितिक ज्ञान—अक्सर दस्तावेज़ों में दर्ज नहीं होती या औपचारिक रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं बन पाती। ऐसे में इन पारिस्थितिक तंत्रों को समझने योग्य बनाना केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए अलग-अलग प्रकार के ज्ञान को साथ लाना ज़रूरी है। यानी भू-स्थानिक (जियोस्पेशियल) डेटा, प्रशासनिक रिकॉर्ड, और किसी जगह से जुड़े लोगों के निजी अनुभवों से उपजा स्थानीय ज्ञान। तभी कॉमंस को उसकी पूरी जटिलता और समृद्धि के साथ समझा जा सकता है, और वह भी उन लोगों की नज़र से जो उसके साथ रहते हैं और उसकी देखभाल करते हैं।
छत्तीसगढ़ में बैगा आदिवासी समुदायों का अनुभव इसका एक उदाहरण है। इन समुदायों ने अपने खाद्य वनों, मौसमी संसाधनों और जंगलों में आग लगने के पैटर्न का मानचित्रण किया। कई गांवों के लोगों ने मिलकर जंगल के विभिन्न हिस्सों को उनके पारंपरिक नामों के आधार पर चिन्हित किया और यह भी दर्ज किया कि अलग-अलग मौसमों में दालें, पत्तेदार सब्ज़ियां, औषधीय जड़ी-बूटियां और अन्य संसाधन कहां और कितनी मात्रा में उपलब्ध होते हैं।
इस प्रक्रिया ने समुदायों को ऐसे पारिस्थितिक बदलावों की पहचान करने में मदद की, जिन्हें औपचारिक प्रणालियों के जरिए समझ पाना अक्सर मुश्किल होता है। समुदाय के लोगों ने बदलते वर्षा पैटर्न, जंगलों के क्षरण और पारंपरिक खेती के तौर-तरीकों में आए बदलावों के कारण स्थानीय फसलों की पारंपरिक किस्मों और औषधीय पौधों में हो रही कमी को दर्ज किया।
इस मानचित्रण ने संरक्षण के प्रयासों को भी समृद्ध किया। जिन संसाधनों की उपलब्धता घट रही थी, उनकी पहचान होने के बाद समुदायों ने उन्हें बचाने के लिए अधिक योजनाबद्ध तरीके से काम करना शुरू किया। वहीं, सामूहिक निगरानी की व्यवस्था ने जंगलों में आग लगने की घटनाओं को कम करने और स्थानीय पारिस्थितिक तंत्रों की बेहतर देखभाल सुनिश्चित करने में भी मदद की।
इस प्रक्रिया ने जीवनानुभवों और मौखिक परंपराओं में निहित ज्ञान को सामूहिक उपयोग के लिए अधिक सुलभ बनाया। इससे समुदायों को इस ज्ञान पर मिलकर चर्चा करने, समय के साथ उसे समृद्ध करने और उसके आधार पर फैसले लेने तथा कार्रवाई करने का अवसर मिला।
इस अर्थ में डेटा केवल कॉमंस का रिकॉर्ड भर नहीं बनाता। वह यह भी तय करता है कि लोग उन्हें किस तरह समझते हैं, किसके ज्ञान को मान्यता मिलती है, और संसाधनों से जुड़े फैसले कैसे लिए जाते हैं।
कॉमंस के लिए डेटा को उपयोगी बनाना
कॉमंस के डेटा-आधारित शासन को मज़बूत बनाने की दिशा में काम कर रहे नीति-निर्माताओं और विकास क्षेत्र के पेशेवरों के लिए ज़रूरी है कि उनका ध्यान केवल डेटा जुटाने पर नहीं, बल्कि इस बात पर भी हो कि डेटा व्यवहार में किस तरह काम करता है। इसके लिए डेटा को रोज़मर्रा की निर्णय-निर्माण प्रक्रियाओं का हिस्सा बनाना होगा, उसे अलग-अलग हितधारकों के लिए सुलभ बनाना होगा, और ऐसी व्यवस्थाएं विकसित करनी होंगी जो उसके प्रभावी उपयोग को संभव बना सकें।
1. डेटा को रोज़मर्रा के निर्णयों से जोड़ें
जलवायु नवाचार और मॉडलिंग से जुड़ी संस्था इक्विनॉक्ट कम्युनिटी सोर्स्ड मॉडलिंग सॉल्यूशंस के सह-संस्थापक मधुसूदनन सीजी का कहना है कि लोग डेटा से तब जुड़ते हैं, जब वह उनकी तत्काल समस्याओं के समाधान में मदद करता है। वह कहते हैं, “अगर कोई उपकरण या जानकारी किसानों की मौजूदा चुनौतियों, जैसे खेतों में जलभराव या फसलों के लिए पानी की कमी, का समाधान नहीं करती, तो उसके प्रति उनकी रुचि बनने की संभावना कम होती है। इसलिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि कोई उपकरण किस सामूहिक समस्या के समाधान के लिए बनाया गया है।”
केरल के एर्नाकुलम ज़िले का उदाहरण इस बात को अच्छी तरह दिखाता है। यहां ज्वारीय बाढ़ (टाइडल फ्लडिंग) लोगों के दैनिक जीवन को प्रभावित करती है। इस चुनौती से निपटने के लिए इक्विनॉक्ट ने सीसाइट नामक एक वेब प्लेटफॉर्म विकसित किया है, जो ज्वारीय बाढ़ का पूर्वानुमान लगाने और उसे जीवंत दृश्य की तरह प्रस्तुत करने का काम करता है। स्थानीय सरकारों और समुदायों के सहयोग से विकसित यह मंच वैज्ञानिक मॉडलिंग और स्थानीय जानकारियों को एक साथ जोड़ता है, ताकि योजना बनाने, समय रहते चेतावनी जारी करने और राहत एवं प्रतिक्रिया संबंधी कामों को बेहतर बनाया जा सके।
इस पहल के तहत सहभागी मानचित्रण और समुदाय-आधारित बाढ़ निगरानी जैसे प्रयास भी किए गए हैं। प्रभावित पंचायतों की कुडुम्बश्री नेटवर्क से जुड़ी महिलाओं ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने यह दर्ज किया कि बाढ़ कब और किन इलाकों में आती है, ताकि एझिक्कारा जैसी पंचायतों में स्थानीय कार्य योजनाएं तैयार करने में मदद मिल सके।
दीर्घकालिक अनुमान लगाने और जटिल विश्लेषण करने वाले उपकरण शोधकर्ताओं और नीति-निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। लेकिन जब डेटा स्थानीय स्तर पर रोज़मर्रा के निर्णय लेने में भी मदद करता है, तब वह साझा संसाधनों और परिदृश्यों का प्रबंधन कर रहे समुदायों के लिए कहीं अधिक उपयोगी और प्रभावी बन जाता है।
2. स्थानीय शासन व्यवस्थाओं के साथ मिलकर काम करें
डेटा पर भरोसा कायम करने और उसके दीर्घकालिक उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी है कि उसे मौजूदा शासन व्यवस्थाओं का हिस्सा बनाया जाए। इस प्रक्रिया में पंचायतों और अन्य स्थानीय संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ये संस्थाएं डेटा की पुष्टि करने, उसका अर्थ समझने और उसके आधार पर कार्रवाई करने में मदद करती हैं।
जब डेटा को इन व्यवस्थाओं के साथ जोड़ा जाता है, तो वह किसी बाहरी हस्तक्षेप की तरह नहीं दिखता, बल्कि पहले से मौजूद निर्णय-निर्माण प्रक्रियाओं का हिस्सा बन जाता है। इससे जवाबदेही भी बेहतर होती है, क्योंकि डेटा सीधे उन औपचारिक मंचों और तंत्रों से जुड़ जाता है, जहां फैसले लिए और लागू किए जाते हैं।
मधुसूदनन कहते हैं, “हमें पंचायत स्तर के निर्वाचित प्रतिनिधियों और ज़िला प्रशासन के साथ बहुत करीबी सहयोग में काम करना पड़ा, ताकि ज्वारीय बाढ़ से जुड़ी चेतावनियां समय पर लोगों तक पहुंच सकें। स्थानीय पंचायतों के साथ काम करने से हमें समुदाय के भीतर भरोसा बनाने में भी मदद मिली।”
एर्नाकुलम में ज्वारीय बाढ़ से जुड़े डेटा को शासन प्रक्रियाओं के माध्यम से आगे बढ़ाने का तरीका इसका एक उदाहरण है। इक्विनॉक्ट ने ग्राम सभाओं और कॉन्फ्रेंस ऑफ पंचायत जैसे मंचों के ज़रिए पंचायतों, जिला प्रशासन और स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर काम किया। जनवरी 2025 में आयोजित ऐसे पहले सम्मेलन में निर्वाचित प्रतिनिधि, ज़िला अधिकारी और विभिन्न विभागों के अधिकारियों ने मिलकर ज्वारीय बाढ़ से जुड़े साक्ष्यों पर सामूहिक चर्चा की। इस चर्चा के आधार पर यह साझा समझ बनी कि ज्वारीय बाढ़ को जलवायु परिवर्तन से बढ़े जोखिम के रूप में नियोजन प्रक्रियाओं में शामिल किया जाना चाहिए। साथ ही, इससे निपटने के लिए कुछ साझा प्राथमिकताएं भी तय की गईं।
जैसे-जैसे पर्यावरणीय चुनौतियां गहराती जा रही हैं, चाहे वह जल संकट हो, बाढ़, तटीय कटाव या प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण, वैसे-वैसे पारिस्थितिकी से जुड़े ऐसे डेटा की ज़रूरत भी बढ़ती जा रही है जो अधिक सहभागी और सुलभ हो।
समुदायों द्वारा विभिन्न मंचों पर लगातार किए गए प्रयासों और साक्ष्य जुटाने की इस प्रक्रिया का असर आगे भी दिखाई दिया। अंततः जनवरी 2026 में केरल सरकार ने ज्वारीय बाढ़ को राज्य-विशिष्ट आपदा घोषित किया।
जब ऐसी प्रक्रियाएं शासन व्यवस्थाओं के भीतर स्थापित होती हैं, तो डेटा अधिक उपयोगी बन जाता है। यह योजना बनाने, आपदा-तैयारी को मज़बूत करने और जलवायु परिवर्तन के अनुरूप दीर्घकालिक अनुकूलन करने के काम आता है।
साथ ही, शासन के विभिन्न स्तरों के बीच बेहतर तालमेल भी ज़रूरी है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि स्थानीय स्तर पर तैयार किए गए डेटा को प्रशासनिक व्यवस्थाओं में मान्यता मिले और उसका उपयोग योजनाओं तथा कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में किया जा सके।
3. सुलभता और समावेशन को ध्यान में रखकर प्रणालियां विकसित करें
डेटा की सुलभता और उसके आधार पर कार्रवाई करने की क्षमता केवल कुछ तकनीकी विशेषज्ञों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। डिजिटल साक्षरता, भाषा और इंटरनेट कनेक्टिविटी में मौजूद असमानताएं अक्सर तय करती हैं कि कौन डेटा से जुड़ पाएगा और किस हद तक जुड़ पाएगा। इसलिए यह ज़रूरी है कि डेटा प्रणालियां केवल अपने उद्देश्य में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी समावेशी हों।
कोर स्टैक के आदितेश्वर सेठ कहते हैं, “हर व्यक्ति डेटा को समझने और उसका इस्तेमाल करने में सक्षम नहीं होता।” उनका मानना है कि यदि डेटा लोगों को देखने, समझने, चर्चा करने और अपने अधिकारों या ज़रूरतों को लेकर आवाज़ उठाने में मदद करना चाहता है, तो उसे केवल उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। उसे इस तरह उपयोगी बनाना होगा कि वह लोगों के रोज़मर्रा के अनुभवों और जानकारी से जुड़ने के तरीकों के अनुरूप हो।
कोर स्टैक इस दिशा में परिदृश्य संरक्षकों (लैंडस्केप स्टूअर्ड्स) के नेटवर्क के साथ काम कर रहा है। इनमें कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन और वॉलंटियर शामिल हैं, जो डेटा प्रणालियों और स्थानीय समुदायों के बीच सेतु का काम करते हैं। कॉमंस कनेक्ट जैसे उपकरणों की मदद से ये संरक्षक ग्राम स्तर पर बैठकें आयोजित करते हैं, समुदायों के साथ मिलकर स्थानीय संसाधनों का मानचित्रण करते हैं, और उनकी ज़रूरतों की पहचान करते हैं। फिर वे इस जानकारी को डेटा-आधारित प्रस्तावों में बदलते हैं, जिन्हें ग्राम सभा और पंचायत की नियोजन प्रक्रियाओं में शामिल किया जा सके।
इस तरह वे डेटा और निर्णय-निर्माण के बीच मौजूद दूरी को कम करने में मदद करते हैं। आदितेश्वर के अनुसार, यह दृष्टिकोण विशेषज्ञता को विकेंद्रीकृत (डी-सेंट्रलाइज़) करता है। इससे डेटा जुटाने और उसका उपयोग करने की ज़िम्मेदारी केवल कुछ तकनीकी विशेषज्ञों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि प्रशिक्षित सामुदायिक कार्यकर्ता भी इस प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे में विशेषज्ञों की भूमिका सहयोग और मार्गदर्शन देने तक सीमित रह जाती है।
साथ ही, सुलभता का अर्थ केवल डेटा जुटाना या साझा करना नहीं है, बल्कि उसे समझाना है। तर्कम जैसी संस्थाएं डेटा विज़ुअलाइज़ेशन को सरल बनाने और जटिल डेटा को ऐसे प्रारूपों में प्रस्तुत करने पर काम कर रही हैं, जिन्हें समुदाय और स्थानीय संस्थाएं आसानी से समझ सकें। इसमें कोर स्टैक जैसे मंचों से तैयार हुए डेटा को इस तरह प्रस्तुत करना भी शामिल है कि वह स्थानीय चर्चाओं, नियोजन और निर्णय-निर्माण की प्रक्रियाओं में उपयोगी साबित हो।
इसलिए सुलभता और समावेशन को ध्यान में रखकर प्रणालियां विकसित करने का मतलब केवल सरल उपकरण बनाना नहीं है। इसका मतलब यह भी है कि अधिक से अधिक लोगों को डेटा के निर्माण, उसकी समझ और उसके उपयोग की प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर मिले।
4. खुले और सहयोगात्मक डेटा तंत्र विकसित करें
डेटा तक पहुंच बढ़ाना समाधान का केवल एक हिस्सा है। डेटा को वास्तव में उपयोगी बनाने के लिए ज़रूरी है कि उसका अलग-अलग लोगों, संस्थाओं और प्रणालियों के बीच आदान-प्रदान हो सके। इसके लिए ऐसे साझा और परस्पर (इंटरऑपरेबल) डेटा तंत्र विकसित करने होंगे, जिनमें जानकारी को सामूहिक रूप से समझा और इस्तेमाल किया जा सके।
कॉमंस से जुड़े काम में यह चुनौती और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। पारिस्थितिक तंत्रों और उनके शासन से संबंधित डेटा पहले से ही कई जगहों पर मौजूद है—सरकारी विभागों, सार्वजनिक डेटाबेस, सामुदायिक रिकॉर्ड और विभिन्न संगठनों द्वारा किए गए शोधों में। लेकिन यह जानकारी अक्सर अलग-अलग खानों में बंटी रहती है और आपस में जुड़ी नहीं होती। इससे पारिस्थितिक बदलावों को समझना या अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों और शासन व्यवस्थाओं में मिले अनुभवों और निष्कर्षों का उपयोग करना मुश्किल हो जाता है।
प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े फैसले अक्सर किसी एक गांव या प्रशासनिक इकाई तक सीमित नहीं होते। वे बड़े भू-दृश्यों (लैंडस्केप्स) और प्रशासनिक सीमाओं से परे फैले होते हैं। लेकिन पंचायत स्तर की योजनाओं जैसी सूक्ष्म जानकारी शायद ही कभी जलग्रहण क्षेत्र (वॉटरशेड) या संसाधनों से जुड़े व्यापक रुझानों से जुड़ पाती है। इसी तरह भूजल स्तर में बदलाव या भूमि उपयोग में आए परिवर्तन जैसे उपलब्ध डेटा भी आमतौर पर एक-दूसरे से व्यवस्थित रूप से नहीं जोड़े जाते। नतीजतन, कॉमंस की एक समग्र तस्वीर उभरकर सामने नहीं आ पाती।
जानकारी का यह बिखराव डेटा को समझने, साझा करने और प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने की राह में बाधा बनता है। इसका असर नागरिक समाज संगठनों, शोध संस्थानों और स्वयं समुदायों सहित सभी हितधारकों पर पड़ता है।
सामाजिक क्षेत्र में डेटा के उपयोग और डेटा-आधारित संवाद को मजबूत बनाने के लिए काम करने वाली संस्था तर्कम के सह-संस्थापक आनंद सहस्रनामन कहते हैं, “संगठनों के पास पहले से ही काफी डेटा मौजूद है और वे अक्सर उसे साझा भी करना चाहते हैं। लेकिन यह हमेशा स्पष्ट नहीं होता कि इसके बदले उन्हें क्या मिलेगा या उस डेटा को अलग-अलग संदर्भों में उपयोगी कैसे बनाया जाए। नतीजतन, उपलब्ध डेटा का बड़ा हिस्सा इस्तेमाल में नहीं आ पाता।”
यहीं पर डेटा प्रणालियों की संरचना महत्वपूर्ण हो जाती है। तर्कम में इस चुनौती से निपटने के प्रयास अब तेजी से इंटरऑपरेबिलिटी पर ध्यान दे रहे हैं। यानी ऐसी व्यवस्थाएं विकसित करना, जहां अलग-अलग डेटा सेट एक-दूसरे के साथ जुड़कर काम कर सकें। इसके लिए डेटा डिक्शनरी जैसे साझा मानक विकसित किए जा रहे हैं। ये दस्तावेज़ बताते हैं कि डेटा कैसे जुटाया गया है, क्या दर्शाता है और उसका उपयोग किस तरह किया जा सकता है। तर्कम की एक अन्य सह-संस्थापक श्रुति कृष्णन कहती हैं, “हो सकता है कि हम पूरी तरह मानकीकरण हासिल न कर सकें। यानी हर कोई एक ही नामकरण पद्धति, माप की इकाइयों या डेटा जुटाने के तरीकों का पालन न करे। लेकिन डेटा डिक्शनरी और एक साझा भाषा होना ज़रूरी है, ताकि एक डेटा सेट दूसरे डेटा सेट से जुड़ सके और उसके साथ काम कर सके।”
साथ ही, डेटा तंत्र को मज़बूत बनाने के लिए लोगों और उनकी क्षमताओं में निवेश करना भी उतना ही आवश्यक है। कई संगठनों के पास डेटा का विश्लेषण करने या उसे व्यवहार में इस्तेमाल करने के लिए पर्याप्त समय, संसाधन या विशेषज्ञता नहीं होती। ऐसे में प्रशिक्षित डेटा संरक्षकों (डेटा स्टूअर्ड्स) का एक समूह तैयार करना इस कमी को दूर कर सकता है। ये लोग डेटा जुटाने और उसके उपयोग, दोनों प्रक्रियाओं में सहयोग दे सकते हैं। इससे डेटा को अलग-अलग संदर्भों में उपयोगी बनाना आसान होता है और कॉमंस से जुड़े अनुभव तथा सीख कुछ चुनिंदा परियोजनाओं तक सीमित न रहकर व्यापक स्तर पर साझा किए जा सकते हैं।
जब हम यह सोचते हैं कि कॉमंस को कैसे समझा जाए, उनका शासन कैसे किया जाए और उन्हें लंबे समय तक कैसे सुरक्षित रखा जाए, तो डेटा इस पूरी चर्चा के केंद्र में आ जाता है। लेकिन डेटा केवल एक तकनीकी संसाधन नहीं है, बल्कि समुदायों, सरकारों और अन्य हितधारकों के बीच निर्णय-निर्माण की एक साझा नींव भी है। जब कॉमंस को देखने और समझने योग्य बनाया जाता है, जब डेटा लोगों के रोज़मर्रा के अनुभवों और ज़रूरतों से जुड़ता है, और जब जानकारी तक पहुंच सुलभ होती है, तब वह बेहतर फैसले लेने में मदद कर सकता है और जवाबदेही को मज़बूत बना सकता है।
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लेखक के बारे में
- आंचल बंसल गांधी आईडीआर की मैनेजिंग एडिटर हैं। उनके पास मीडिया और संचार के क्षेत्र में लगभग दो दशकों का अनुभव है। आंचल ने द इंडियन एक्सप्रेस, ओपन और द इकोनॉमिक टाइम्स में पत्रकार के रूप में काम किया है, जहां उन्होंने नीतिगत मुद्दों, राजनीति और जेंडर से जुड़े संवेदनशील विषयों पर रिपोर्टिंग की। इसके बाद उन्होंने विकास सेक्टर का रुख किया और पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया तथा इंडियन स्कूल ऑफ डेवलपमेंट मैनेजमेंट में एडवोकेसी और संचार से जुड़ी भूमिकाएं निभायी। आंचल ने लेडी श्रीराम कॉलेज से अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातक की डिग्री, सोफिया पॉलिटेक्निक से सोशल कम्युनिकेशन मीडिया में स्नातकोत्तर डिप्लोमा, और एसओएएस, यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन से डेवलपमेंट स्टडीज़ में मास्टर डिग्री प्राप्त की है।
- श्रेया अधिकारी, आईडीआर के क्लाइमेट वर्टिकल की प्रमुख हैं। वे जलवायु से संबंधित कम प्रतिनिधित्व वाली आवाज़ों और कहानियों को सामने लाने का काम करती हैं। इसके साथ ही, वे आईडीआर पर पॉडकास्ट से जुड़ी जिम्मेदारियां भी देखती हैं। आईडीआर से जुड़ने से पहले श्रेया ने भारत और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई कला और सांस्कृतिक उत्सवों जैसे जयपुर लिट्रेचर फ़ेस्टिवल का आयोजन भी किया है। वे टेरा.डू फेलो हैं और उन्होंने अपना पोस्ट ग्रैजुएशन ज़ेवियर इंस्टीट्यूट ऑफ कम्युनिकेशन से किया है।






