ईकोसिस्टम डेवलपमेंट
देश के सामाजिक सेक्टर और नागरिक संगठनों पर तार्किक और गहन विश्लेषण जिसमें यह शामिल होता है कि क्या कारगर रहा है, क्या नहीं और किस तरह के बदलावों को जरूरत है।
फंडर की भाषा समझना चाहते हैं? इन 10 शब्दों से शुरुआत करें
फंडर द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली शब्दावली कई बार ऐसी होती है, जिसे समझने के लिए सिर्फ अंग्रेज़ी जानना ही काफी नहीं होता। इन शब्दों का सही अर्थ और अलग-अलग संदर्भों में इनका इस्तेमाल समझना भी ज़रूरी होता है।बिना बड़े बजट के, बड़े संवाद की शुरुआत कैसे करें?
बड़े बजट और तय एजेंडे के बिना भी ऐसा संवाद संभव है, जिसमें हर आवाज़ को बराबर जगह मिले। जानिए, ज़मीनी संगठन कैसे अनकॉन्फ़्रेंस के ज़रिए ऐसा मंच बना सकते हैं।ज़ुल्मतों के दौर में सोशल सेक्टर की चुप्पी
सिविल सोसाइटी की पहचान सिर्फ़ उसके काम से नहीं, बल्कि इस बात से बनती है कि वह मुश्किल समय में किसके साथ खड़ी होती है।ज़मीनी संस्थाएं फंडर से कैपेसिटी बिल्डिंग और संस्थागत विकास पर बातचीत कैसे करें?
क्षमता निर्माण और संगठनात्मक विकास को अक्सर परियोजनाओं से अलग ज़रूरत माना जाता है, जबकि यही किसी संस्था के दीर्घकालिक सामाजिक प्रभाव की बुनियाद हैं। दानदाताओं के साथ संवाद और नेगोशिएशन की रणनीति इस सोच को बदलने में अहम भूमिका निभा सकती है।डेटा से नहीं, लोगों से सीखना
भारत के ट्रकिंग समुदाय के साथ काम करते हुए हमने जाना कि फील्ड में समय बिताना, भरोसा बनाना और उन समुदायों को समझना कितना अहम है, जो अक्सर औपचारिक आंकड़ों से बाहर रह जाते हैं।जून 2026 एफसीआरए संशोधन: नॉन-प्रॉफिट संस्थाओं के लिए इसके क्या मायने हैं?
गृह मंत्रालय ने एफसीआरए नियमों में संशोधन किया है। जानिए क्या सब बदला है और आपकी संस्था कैसे इन नए नियमों का पालन कर सकती है।क्या सोशल सेक्टर सवाल पूछने से कतराने लगा है?
जैसे-जैसे गैर-लाभकारी संस्थाओं का प्रभाव बढ़ रहा है, क्या उनकी स्वतंत्र और सवाल उठाने वाली आवाज़ कमज़ोर पड़ती जा रही है?एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 का संस्थाओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
प्रस्तावित संशोधनों के तहत गैर-लाभकारी संगठनों के ऊपर यह संकट बना रहेगा कि यदि उनका एफसीआरए पंजीकरण समाप्त हो जाता है या रद्द कर दिया जाता है, तो विदेशी फंड से तैयार संपत्तियों पर उनका नियंत्रण खत्म हो सकता हैसरल कोश: आखिर क्या होता है इंडिकेटर, जिससे आप अक्सर जूझते हैं!
इंडिकेटर का इस्तेमाल मुख्य रूप से योजना बनाने, मॉनिटरिंग करने और रिपोर्टिंग में किया जाता है। यह संस्थाओं को यह समझने में मदद करता है कि उनका काम सही दिशा में जा रहा है या नहीं, और उसका वास्तविक असर क्या है।हम आदिवासियों के स्वास्थ्य की जड़ें जंगल में हैं
कर्नाटक के आदिवासियों के लिए स्वास्थ्य और जीवनयापन के मुद्दे, जंगलों से उनके गहरे रिश्ते और विस्थापन के इतिहास में निहित हैं। इसलिए स्वास्थ्य का सवाल केवल दवाओं या अस्पतालों से नहीं, बल्कि हमारे अधिकारों, परंपराओं और गरिमा से भी जुड़ा हुआ है।