गंभीर बीमारी में किसी की देखभाल करने के क्या मायने हैं?

इकबाल* (35) को वर्ष 2022 में अंतिम चरण के फेफड़ों के कैंसर का पता चला। बीमारी के शारीरिक और मानसिक असर से जूझने के साथ-साथ उन्हें और उनके परिवार को कई कठिन फैसले भी लेने थे। उनकी पत्नी नीना* को अब अपने दो छोटे बच्चों की देखभाल के साथ परिवार की मुख्य कमाने वाली सदस्य की भूमिका निभानी थी। इकबाल ने कोई वसीयत तैयार नहीं की थी, जिससे उनकी संपत्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई थी। इसके अलावा, अपने माता-पिता के साथ तनावपूर्ण संबंधों के कारण वे उन्हें अपनी बीमारी की गंभीर स्थिति के बारे में बताना भी नहीं चाहते थे।
इकबाल वर्ष 2023 में हमारे मरीज़ थे। हमारी टीम, जिसमें एक डॉक्टर, दो नर्सें और एक काउंसलर शामिल थे, उनसे मिलने गयी, ताकि यह समझा जा सके कि उन्हें किस तरह की सहायता की ज़रूरत है। डॉक्टर ने उनके लक्षणों का आकलन किया और देखभाल की एक योजना तैयार की। चूंकि इकबाल आंशिक रूप से बिस्तर तक सीमित हो चुके थे, नर्स ने उन्हें त्वचा और मुंह की देखभाल से जुड़ी ज़रूरी बातें बतायी। काउंसलर ने दंपती की भावनात्मक ज़रूरतों को ध्यान से सुना, जिनमें अपने छोटे बच्चों को इस स्थिति के बारे में बताने की चिंता भी शामिल थी। नीना गहरे भावनात्मक तनाव से गुज़र रही थी। वहीं इकबाल स्वयं अवसाद से जूझ रहे थे और दवाइयां लेने से इनकार कर रहे थे। जब उन्होंने आखिरकार अपने माता-पिता को अपनी बीमारी के बारे में बताने का फैसला किया, तो वे यह बात खुद नहीं कहना चाहते थे। ऐसे में हम उनके माता-पिता के साथ चार घंटे तक बैठे रहे।हमने उन्हें इकबाल की बीमारी की गंभीरता समझायी, उनके सवालों के जवाब दिए, और उन जटिल भावनाओं को संभालने में उनका साथ दिया, जिनसे वे उस समय गुज़र रहे थे।
हम एक दिन छोड़कर परिवार से मिलने जाते थे और इस कठिन परिस्थिति से जूझने में उन्हें चिकित्सकीय तथा मनोसामाजिक सहयोग प्रदान करते थे। इसके साथ ही, हमने उन्हें एक कानूनी विशेषज्ञ का संपर्क भी उपलब्ध कराया, जो उनकी संपत्ति और उससे जुड़े मामलों को व्यवस्थित करने में मदद कर सके।
यह हमारे जीवन का एक सामान्य दिन है।
हम, श्रुति और अंकिता, मुंबई में काउंसलर और नर्स के रूप में काम करती हैं। हम पैलकेयर की एक मेडिकल टीम का हिस्सा हैं। यह जिमी एस बिलिमोरिया फाउंडेशन द्वारा संचालित एक सेवा है, जो गंभीर और घातक बीमारियों से जूझ रहे मरीज़ों को घर-आधारित उपशामक देखभाल (पैलिएटिव केयर) उपलब्ध कराती है, ताकि वे दर्दमुक्त, आरामदायक और भावनात्मक रूप से स्थिर जीवन जी सकें। मुंबई में ऐसी कुल नौ टीमें काम कर रही हैं, और हमारी टीम सीधे तौर पर 50 से 60 मरीज़ों के साथ जुड़ी हुई है। हमें ज़्यादातर मरीज़ ऑन्कोलॉजी विभागों से रेफरल के माध्यम से मिलते हैं, जबकि कुछ लोग ऑनलाइन या परिचितों के ज़रिए भी हमारे पास पहुंचते हैं। हमारे अधिकांश मरीज़ कैंसर की अंतिम अवस्था से गुज़र रहे लोग होते हैं।
सुबह 7:00 बजे
श्रुति: मैं सुबह 7 और 7:30 बजे के बीच उठती हूं, नाश्ता बनाती हूं और दिन के लिए तैयार हो जाती हूं। मैं अपने पति के साथ रहती हूं। मैं 17 साल की उम्र में मनोविज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने के लिए कोलकाता से मुंबई चली आयी थी, और तब से यहीं रहती हूं। मेरे परिवार में कोई भी चिकित्सा क्षेत्र में नहीं है, लेकिन मैं स्कूल में इससे परिचित होने के बाद मनोविज्ञान का अध्ययन करना चाहती थी। मानव भावनाओं और व्यक्तित्व में अंतर्दृष्टि, खासकर जब हमारा मस्तिष्क संकट महसूस करता है, मेरे लिए हमेशा बहुत दिलचस्प विषय रहा है।
जब मैं वर्ष 2022 में नैदानिक मनोविज्ञान (क्लीनिकल साइकोलॉजी) में अपनी मास्टर डिग्री पूरी कर रही थी, तब एक भर्तीकर्ता (रिक्रूटर) हमारी यूनिवर्सिटी में आए और हमें साइको-ऑन्कोलॉजी के बारे में बताया। यह कैंसर देखभाल का एक अंतः विषयक क्षेत्र है, जो रोगी और उनके परिवार की भावनात्मक, व्यवहारिक और सामाजिक आवश्यकताओं का अध्ययन करता है।
इसी दौरान मुझे उपशामक देखभाल (पैलिएटिव केयर) के बारे में पता चला। समाज में आज भी इसके बारे में बहुत सी गलत धारणाएं हैं। समय के साथ मेरे अपने परिवार की भी पैलिएटिव केयर को लेकर समझ काफी गहरी हुई है। जब मैंने इस क्षेत्र में काम शुरू किया था, तब उन्हें यह तक नहीं पता था कि पैलिएटिव केयर होता क्या है। वे मुझसे पूछते थे कि मैं आखिर इस क्षेत्र में क्यों काम करना चाहती हूं? वे अक्सर कहते थे कि मैं उन लोगों को काउंसलिंग क्यों देना चाहती हूं, जिनका जीवन ख़ात्मे की कगार पर खड़ा है। उन्हें यह समझाना भी मुश्किल था कि मुझे इस काम के लिए दूसरों के घरों तक जाने की ज़रूरत क्यों पड़ती है।
लोग कैंसर जैसी बीमारियों को अस्पताल या हॉस्पिस से जोड़ते हैं। अमूमन यह भी माना जाता है कि उपशामक देखभाल (पैलिएटिव केयर) केवल जीवन के अंतिम चरण के लिए होती है। लेकिन यह तथ्य नहीं है। गंभीर बीमारियों में, उपशामक देखभाल (पैलिएटिव केयर) की शुरुआत जल्दी ही कर लेनी चाहिए और यह उपचार के साथ जारी रहनी चाहिए। ऐसा इसलिए, क्योंकि यह लक्षणों को नियंत्रित करने और दर्द के प्रबंधन में मदद करती है, और रोगियों और उनके परिवारों को जानकारी-आधारित निर्णय लेने में भी मददगार होती है।
यह भी सच है कि किसी लाइलाज बीमारी का सामना करना मरीज़ और उसके परिवार, दोनों के लिए बेहद गहरे और जटिल तनाव का कारण बन सकता है। जब बीमारी के ठीक होने की संभावना होती है, तो बातचीत में उम्मीद बनी रहती है, जो लोगों को परिस्थितियों से जूझने का सहारा देती है। लेकिन जब किसी मरीज़ के पास जीने के लिए केवल एक महीना या एक साल बचा हो, तब क्या किया जाए? ऐसी स्थिति की वास्तविकता का सामना करने में आप मरीज़ और उसके परिवार का साथ किस तरह दे सकते हैं?
ऐसी बातचीतें हमारे रोज़मर्रा के काम का हिस्सा हैं। अंकिता और मैं मरीज़ों के घर के दौरे के लिए हर सुबह 9 से 9:30 बजे के बीच रेलवे स्टेशन पर मिलते हैं।
अंकिता: मैं तैयार होने के लिए सुबह लगभग 7 बजे उठती हूं। मैं अपने परिवार के साथ रहती हूं। मेरे पिताजी सेवानिवृत्त हैं, मां गृहिणी हैं, और बहन एक एकाउंटेंट के रूप में काम करती है। 12वीं कक्षा पूरी करने के बाद, मुझे यह स्पष्ट हो चुका था कि मैं चिकित्सा क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहती हूं। लेकिन मैं अनिश्चित थी कि मैं डॉक्टर बनना चाहती हूं या नर्स। मेरी दो रिश्तेदार नर्स हैं, इसलिए मेरी मां ने मुझे वही पेशा अपनाने की सलाह दी।
मैंने दो साल तक अस्पतालों में काम किया। कोविड-19 महामारी के दौरान, मेरे एक दोस्त ने मुझे उपशामक देखभाल (पैलिएटिव केयर) से परिचित कराया। पैलकेयर में शामिल होने के बाद, मैंने उपशामक देखभाल (पैलिएटिव केयर) से संबंधित विशिष्ट तकनीकों को सीखने के लिए आंतरिक और बाहरी प्रशिक्षण प्राप्त किया। हमारा काम केवल चिकित्सकीय उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि देखभाल और सहारा देने से भी जुड़ा है। इसमें संवेदनशीलता और धैर्य के साथ संवाद करना, प्रेशर सोर, मतली, सांस फूलना, बेचैनी और लिम्फेडेमा जैसे लक्षणों को संभालना, और मरीज़ की देखभाल कर रहे मुख्य देखभालकर्ता (केयरगिवर) को इन सबकी जानकारी और प्रशिक्षण देना शामिल होता है।
पिछले पांच वर्षों से अधिक समय से उपशामक देखभाल (पैलिएटिव केयर) में काम करने के बाद आज मुझे अपने इस फैसले पर खुशी होती है। लोगों की देखभाल करना और उन्हें कुछ राहत पहुंचा पाना मुझे गहरा संतोष देता है।
तैयार होने के बाद, मैं सुबह 9 बजे तक श्रुति से मिलने के लिए निकल जाती हूं।

सुबह 9:00 बजे
श्रुति और अंकिता: हर दिन अलग होता है। चूंकि हर मरीज़ को हर दिन देखना संभव और अक्सर ज़रूरी नहीं होता, इसलिए हम उन्हें उनकी चिकित्सा स्थिति के आधार पर ‘निम्न’, ‘मध्यम’ और ‘उच्च’ प्राथमिकता में वर्गीकृत करते हैं और उसी के अनुसार अपने दौरों की योजना बनाते हैं। यह आकलन हम हर दिन मरीज़ और उनके परिवार की अलग-अलग ज़रूरतों को ध्यान में रखकर करते हैं, ताकि देखभाल की प्रक्रिया लचीली बनी रहे और परिस्थितियों के अनुसार बदली जा सके।
उदाहरण के लिए, कोई मरीज़ शारीरिक रूप से अपेक्षाकृत स्थिर हो सकता है, लेकिन उसे या उसके परिवार को भावनात्मक सहारे की ज़रूरत हो सकती है। ऐसे मामलों में शारीरिक लक्षणों के लिहाज़ से वह ‘निम्न प्राथमिकता’ में आता है, फिर भी उसे नियमित संपर्क और सहयोग की आवश्यकता बनी रहती है। इस स्थिति में श्रुति उनसे अधिक बार मिलती हैं। वहीं, जिन मरीज़ों को शारीरिक लक्षणों को संभालने में अधिक मदद की ज़रूरत होती है, वहां अंकिता सीधे तौर पर उनकी देखभाल और सहायता में अधिक सक्रिय भूमिका निभाती हैं।
किसी मरीज़ के साथ देखभाल की प्रक्रिया शुरू करने के लिए हमारी पहली मुलाकात सबसे अधिक गहन होती है। इस दौरान हम मरीज़ का पूरा चिकित्सकीय इतिहास दर्ज करते हैं, और डॉक्टर, नर्सें तथा काउंसलर परिवार को अपनी-अपनी भूमिकाओं के बारे में विस्तार से बताते हैं। हम यह भी समझाते हैं कि घर-आधारित उपशमक देखभाल (पैलिएटिव केयर) में क्या-क्या शामिल होता है। उदाहरण के लिए, कैसे यह देखभाल इलाज के साथ-साथ चलती है, किस तरह तकलीफ़देह लक्षणों को कम किया जा सकता है, और काउंसलिंग की प्रक्रिया कैसी होती है।
यदि कोई मरीज़ जीवन के अंतिम चरण के करीब होता है, तो हम उसे और उसके परिवार को यह समझाने की कोशिश करते हैं कि इस समय सबसे बेहतर देखभाल कैसे दी जा सकती है। जब मरीज़ असहनीय दर्द से गुज़र रहा हो, तो हम परिवार को मॉर्फ़ीन जैसी ओपिऑइड दवाओं के सुरक्षित और ज़रूरी इस्तेमाल के बारे में जानकारी देते हैं। इसमें उनकी आशंकाओं और झिझक को समझना और दूर करना भी शामिल होता है। साथ ही दवाओं के संभावित दुष्प्रभावों, जैसे शुरुआती दिनों में अधिक नींद आना, के बारे में भी स्पष्ट रूप से बताया जाता है।
अगर किसी परिवार को वित्तीय सहायता की ज़रूरत होती है, तो हम उन्हें अन्य ग़ैर-लाभकारी संगठनों से भी जोड़ते हैं।
हम अपने मरीजों और उनके परिवारों से लगातार संपर्क में रहते हैं और टीम को अपडेट करते रहते हैं। भले ही मरीज़ बेहतर होने लगें, हम कम से कम एक से दो साल तक उनसे संपर्क में रहते हैं, ताकि इस दौरान रोगमुक्ति या किसी अन्य जटिलता की जांच की जा सके।
हर सोमवार हमारी टीम अलग-अलग मरीज़ों से जुड़े मामलों और चिंताओं पर विस्तार से चर्चा करती है, प्रत्येक मरीज़ की प्राथमिकता की स्थिति का आकलन करती है, और आने वाले सप्ताह की देखभाल और दौरों की योजना बनाती है।
अगर किसी परिवार को वित्तीय सहायता की ज़रूरत होती है, तो हम उन्हें अन्य ग़ैर-लाभकारी संगठनों से भी जोड़ते हैं।
श्रुति: हमारी टीम का प्रत्येक सदस्य एक विशिष्ट भूमिका निभाता है। लेकिन हमारा एक-दूसरे, मरीज़ के परिवार और उनके मुख्य डॉक्टर के साथ लगातार समन्वय बनाए रखना बेहद ज़रूरी होता है, ताकि हम मरीज़ की बीमारी की प्रगति को समझ सकें। उदाहरण के लिए, अंतिम चरण के लीवर कैंसर से पीड़ित रोगी को मतिभ्रम होने की संभावना होती है। यदि मुझे बीमारी की प्रगति के बारे में पता नहीं है, तो मैं उनके लक्षणों को मनोविकृति समझ सकती हूं, जो एक गलत विश्लेषण होगा।
अंकिता: हमारी मरीज़ और उनके परिवार के प्रति ज़िम्मेदारी होती है। हमें अक्सर दोनों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। यह उन मामलों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहां मरीज़ को अपनी बीमारी और रोग के पूर्वानुमान की पूरी जानकारी नहीं होती है। मरीज़ के घर पर पहली बार जाने से पहले हम देखभाल करने वालों के साथ यही प्राथमिक जानकारी स्थापित करते हैं। परिवार कई कारणों से मरीज़ से उनकी स्थिति के बारे में जानकारी छिपाते हैं। जैसे कि उन्हें दर्द और चिंता से दूर रखने के लिए। कभी-कभी परिवार के लिए यह परिस्थिति से मुकाबला करने का एक तरीका भी होता है। हमारी भूमिका उन्हें जज करने की नहीं, बल्कि सहयोग प्रदान करने की है।
श्रुति: हालांकि हम पूरे परिवार के साथ काम करते हैं, लेकिन हमारी देखभाल और बातचीत का केंद्र हमेशा मरीज़ की स्वायत्तता होती है। हम मरीज़ों के साथ बातचीत में ‘आस्क-टेल-आस्क’ (पूछें-बताएं-पूछें) पद्धति अपनाते हैं। हम पहले यह समझते हैं कि वे अपनी स्थिति के बारे में पहले से क्या जानते हैं और कितना जानना चाहते हैं। फिर उसी के अनुरूप जानकारी साझा करते हैं। और अंत में यह जानने की कोशिश करते हैं कि उन्होंने बात को कितना समझा और उस पर उनकी भावनात्मक प्रतिक्रिया क्या है। इससे बातचीत संवेदनशील, सम्मानजनक और मरीज़-केंद्रित बनी रहती है।
एक मामले में, 50 वर्षीय एक व्यक्ति को बक्कल म्यूकोसा कैंसर था। लेकिन उनके परिवार ने उन्हें बताया कि उन्हें मधुमेह के कारण एक जटिल अल्सर है। उन्हें डर था कि सच बताने से उनका मनोबल टूट जाएगा और उनकी जल्द मृत्यु हो जाएगी। उनका इलाज कर रहे डॉक्टर ने भी मरीज़ को बीमारी के बारे में नहीं बताया था। हमारे दौरों के समय, मरीज़ अक्सर निराशा व्यक्त करते थे और पूछते थे कि अल्सर क्यों नहीं भर रहा है, जबकि वे इलाज करा रहे हैं और इतनी सारी दवाएं ले रहे हैं। ऐसे में हमने उनके परिवार के सदस्यों के साथ अलग-अलग बैठकर उनसे पूछा कि जब उन्हें यह खबर दी जाएगी, तो उनकी प्रतिक्रिया क्या हो सकती है?
अक्सर परिवार यह नहीं समझ पाते कि बीमारी की सच्चाई सामने आने के बाद की स्थिति को कैसे संभालें। नौकरी, घर की ज़िम्मेदारियों और देखभाल के बीच संतुलन बनाते हुए वे खुद को बेहद थका हुआ और असहाय महसूस कर सकते हैं। यदि बीमारी के साथ मरीज़ का मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित होने लगे, तो परिवार को यह समझ नहीं आता कि इस स्थिति का सामना कैसे किया जाए। ऐसे समय में हमारा काम होता है कि परिवार को बीमारी से जुड़ी जानकारी को समझायें और उसे संवेदनशील ढंग से मरीज़ तक पहुंचाने में उनकी मदद करें।
इसे समझाने के लिए हम अक्सर एक उदाहरण देते हैं: कल्पना कीजिए कि आप अचानक खुद को एक बॉक्सिंग मैच में पाते हैं, जिसके बारे में आपको पहले कभी बताया ही नहीं गया। सोचिए, पहला मुक्का कितना अप्रत्याशित और झकझोर देने वाला होगा, और आप उसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं होंगे।
इसी तरह, यदि किसी व्यक्ति को यह पता हो कि उसका जीवन अब सीमित समय का है, तो वह शायद अपने तरीके से उसके लिए तैयार होना चाहे। पुराने दोस्तों से मिलना, टूटे रिश्तों को सुधारना, या अपने प्रियजनों के लिए कुछ यादें छोड़ जाना। लेकिन यह सब करने के लिए समय चाहिए, चाहे वह कितना भी सीमित क्यों न हो।
साथ ही, परिवारों को भी अपने प्रियजन को खोने के दुख का सामना करने के लिए मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक सहारा देना बेहद ज़रूरी होता है। ऐसे मामलों में हम परिवार से कम-से-कम तीन बार शोक-सहायता (बिरीवमेंट) के लिए मिलते हैं, ताकि यह समझ सकें कि वे इस दुख से कैसे जूझ रहे हैं और कहीं वे जटिल शोक (कॉम्प्लिकेटेड ग्रीफ) की स्थिति से तो नहीं गुजर रहे। हम उनके साथ इन भावनाओं को समझने और सुलझाने की कोशिश करते हैं, और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें मनोचिकित्सक के पास भी भेजते हैं।

दोपहर 01:00 बजे
श्रुति और अंकिता: मरीज़ों और उनके परिवारों की स्थिति के आधार पर, एक घर का दौरा करने में हमें एक से चार घंटे तक लग सकते हैं। हम एक दिन में तीन से पांच घरों में जाते हैं। इस बीच हम फटाफट दोपहर का भोजन भी करते हैं। यह आमतौर पर वह समय होता है, जब हम एक दूसरे से बात करते हैं कि हम तनावपूर्ण परिस्थितियों से कैसे निपट रहे हैं। क्या हमें थकान या चिंता हो रही है? क्या हम किसी मामले से विशेष रूप से प्रभावित हैं? यदि हमें भावनात्मक समर्थन की आवश्यकता होती है, तो पैलकेयर के पास इसके लिए एक मनोवैज्ञानिक उपलब्ध होता है।
साथियों का सहयोग, खुलकर संवाद करना, नियमित बैठकों में अपने अनुभव साझा करना, साथ बिताया गया अनौपचारिक समय, और अपनी देखभाल से जुड़ी व्यक्तिगत आदतें—ये सभी चीज़ें हमें भावनात्मक थकान से उबरने और बिना टूटे, संवेदनशीलता के साथ अपनी देखभाल जारी रखने में मदद करती हैं।
हम हर बुधवार को सभी ज़ोनल टीमों के साथ सत्र भी करते हैं, ताकि उपशामक देखभाल (पैलिएटिव केयर) से जुड़े नए विषयों और मुद्दों के बारे में जान सकें। हम और हर गुरुवार को मुश्किल मामलों पर चर्चा करने और एक दूसरे से सीखने के लिए भी बैठक करते हैं।
घर के दौरों और ऑनलाइन बैठकों के बीच, हमें नियमित रूप से दफ्तर आने की ज़रूरत नहीं होती है। हम दस्तावेज़ीकरण या कुछ ऐसी दवाएं, जो हम रोगियों को मुफ्त में प्रदान करते हैं, के लिए ही दफ्तर जाते हैं।

शाम 6:30 बजे
श्रुति और अंकिता: हम शाम को 5:30 बजे तक अपना काम समेटना शुरू कर देते हैं। घर पहुंचने के बाद, हम दिन के सभी मामलों और अपडेट को एक सॉफ्टवेयर में दर्ज करते हैं।
श्रुति: मेरी कुछ छोटी-छोटी दैनिक आदतें हैं, जो मुझे खुद को संभालने और तनाव से बाहर आने में मदद करती हैं। घर पहुंचने के बाद मैं नहाती हूं और बस यह कल्पना करती हूं कि दिनभर की सारी चिंताएं और मुश्किलें पानी के साथ बह रही हैं। इसके बाद मैं थोड़ी देर सो जाती हूं, ताकि मेरे पेशेवर और निजी जीवन के बीच एक ठहराव बना रहे। अगर मेरा दिन भावनात्मक रूप से बहुत भारी रहा हो, तो मैं अपने पति या परिवार के किसी अन्य सदस्य से उसके बारे में बात करती हूं।
मुझे वाद्ययंत्र बजाना, मंडला बनाना और डायरी लिखना भी बहुत पसंद है। ये सब मुझे मन को शांत रखने और खुद को संतुलित महसूस करने में मदद करते हैं।
अंकिता: मैं घर पहुंचने के बाद नहाती हूं और थोड़ी देर के लिए सो जाती हूं। मैं घर के कामों में अपनी मां का हाथ बंटाती हूं, जिसमें खाना बनाना और दूसरे काम शामिल हैं। कभी-कभी मैं उनके साथ खरीदारी करने भी जाती हूं, जिससे हमें एक-दूसरे के साथ अच्छा समय बिताने का मौका मिलता है। मैं दिनभर की बातें उनसे ज़रूर साझा करती हूं, क्योंकि इससे मुझे सुकून मिलता है और हमारा रिश्ता मज़बूत होता है।
मैं अक्सर अपनी सबसे अच्छी दोस्त से बात करती हूं, जिससे मुझे सुकून मिलता है। रात का खाना खाने के बाद, मैं अपने फोन पर कुछ समय वेब सीरीज़ देखती हूं और फिर सो जाती हूं।
हालांकि, कई बार देर रात या आधी रात के बाद भी हमारे पास फ़ोन आते हैं। जब किसी मरीज़ की तबीयत अचानक बिगड़ जाती है, या देखभाल कर रहे परिजन को अचानक दवा देनी पड़ती है, तो वे घबराहट में हमसे संपर्क करते हैं। ऐसी स्थिति में, ज़रूरत पड़ने पर मैं वीडियो कॉल के ज़रिए उनसे बात करती हूं या उन्हें उनके स्थानीय डॉक्टर से जोड़ती हूं। परिस्थिति को समझते हुए हम परिवार को यह भरोसा दिलाते हैं कि अगले दिन हम उनसे मिलने आएंगे।
उपशामक देखभाल (पैलिएटिव केयर) में हमारा काम केवल चिकित्सकीय सहायता देना नहीं है। हम मरीज़ों और उनके परिवारों का साथ उस समय देते हैं, जब वे बीमारी, किसी के बिछड़ने के दुख और भविष्य की अनिश्चितताओं का सामना कर रहे होते हैं। यह देखभाल तभी संभव हो पाती है, जब उसमें समय के साथ भरोसा और मानवीय सहारा भी शामिल हो।
*गोपनीयता बनाए रखने के लिए नाम बदले गए हैं।
*इस अनुवाद में मूल लेख के अधिकांश हायपरलिंक बिना किसी परिवर्तन के शामिल किए गए हैं।
फीचर चित्र साभार: पैक्सेल्स
इस लेख का अनुवाद शब्द एआई द्वारा किया गया है।
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लेखक के बारे में
- अंकिता म्हात्रे पैलकेयर में एक पेशेवर नर्स हैं। उन्होंने पहले ग्लेनेगल्स ग्लोबल अस्पताल, एस आर मेहता कार्डियक इंस्टीट्यूट और एक COVID-19 देखभाल केंद्र में काम किया है। अंकिता के पास मुंबई के सियन अस्पताल से नर्सिंग डिप्लोमा है, और उन्होंने टाटा मेमोरियल अस्पताल और पैलिएटिव मेडिसिन अकादमी से प्रमाणित पाठ्यक्रम पूरे किए हैं।
- श्रुति मुखोपाध्याय पैलकेयर में एक मनोसामाजिक परामर्शदाता हैं, और वह उपशामक देखभाल की भावनात्मक चुनौतियों से जूझ रहे मरीजों और उनके परिवारों को सहायता प्रदान करती हैं। पालकेयर में शामिल होने से पहले, उन्होंने मुंबई के सरकारी अस्पतालों के ऑन्कोलॉजी वार्डों में मरीजों के साथ काम किया था। श्रुति ने एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय से नैदानिक मनोविज्ञान में मास्टर डिग्री प्राप्त की है।

