विकास सेक्टर
फंडर से बातचीत? योगा से होगा!
फंड आए न आए, सांस आती रहेगी!जून 2026 एफसीआरए संशोधन: नॉन-प्रॉफिट संस्थाओं के लिए इसके क्या मायने हैं?
गृह मंत्रालय ने एफसीआरए नियमों में संशोधन किया है। जानिए क्या सब बदला है और आपकी संस्था कैसे इन नए नियमों का पालन कर सकती है।क्या सोशल सेक्टर सवाल पूछने से कतराने लगा है?
जैसे-जैसे गैर-लाभकारी संस्थाओं का प्रभाव बढ़ रहा है, क्या उनकी स्वतंत्र और सवाल उठाने वाली आवाज़ कमज़ोर पड़ती जा रही है?लीक: हमारी सबसे सफल सूचना व्यवस्था
फंडिंग से लेकर सैलरी और एमओयू की शर्तों तक, कुछ सूचनाएं ऐसी होती हैं जो आधिकारिक घोषणा से पहले ही सार्वजनिक संपत्ति बन जाती हैं।सामाजिक संस्थाओं में कम्युनिकेशन को ‘जुगाड़’ नहीं, व्यवस्था की ज़रूरत है
गैर-लाभकारी संस्थाएं अक्सर कम्युनिकेशन से जुड़ी चुनौतियों का समाधान अधिक लोगों की नियुक्ति करने या एकबारगी कार्यशालाओं में निवेश करने में तलाशती हैं।साझा संसाधनों के लिए क्यों ज़रूरी है सामुदायिक डेटा?
समुदायों का कॉमंस से पुराना रिश्ता है, जिसमें उनकी मौखिक परंपराएं, अनुभव और ज्ञान शामिल हैं। सवाल यह है कि क्या डेटा प्रणालियां इस रिश्ते को अहमियत देने के लिए तैयार हैं?सपनापुर में आख़िरी आदमी की तलाश!
लोकतंत्र का हाल चाहे कितना बेहाल हो, आंकड़े उसे सुंदर बना ही देते हैं। एक बीमा, एक हेल्थ चेक-अप: क्या ऐसे होती है एनजीओ कर्मचारियों की देखभाल?
जब तक विकास सेक्टर कॉर्पोरेट एचआर नीतियों से हटकर ज़मीनी समुदायों के तौर-तरीके और सामाजिक न्याय के मूल्य नहीं अपनाता, तब तक सामूहिक देखभाल का विचार सिर्फ कागज़ों पर नज़र आएगा।हंसते हुए को रुलाएं: नुस्खे एनजीओ वाले
सामाजिक क्षेत्र में बदलाव की कोशिशों के बीच उलझनों, उम्मीदों और ‘इम्पैक्ट’ की दुनिया पर एक व्यंग्य।गंभीर बीमारी में किसी की देखभाल करने के क्या मायने हैं?
मुंबई में एक काउंसलर और नर्स के जीवन का एक दिन-जहां वे घर-आधारित पैलिएटिव केयर के ज़रिए मरीज़ों और उनके परिवारों को बीमारी, क्षति और अनिश्चितता का सामना गरिमा के साथ करने में सहारा देती हैं।फील्ड में एक बार- कोई तो बताओ कि सोना कहां है?
जब फील्ड के सरप्राइज़ दिन के साथ-साथ रात में भी आपका पीछा न छोड़ें।