विकास सेक्टर
एक महल हो सपनों का!
ऊपरी सजावट तो ज़बरदस्त है, लेकिन नींव का क्या? क्या आपकी संस्था में भी ऐसा ही हो रहा है?पहली बार मैनेजर बनने पर इन बातों का रखें ध्यान
पहली बार मैनेजर बनना केवल पद बदलना नहीं होता। काम, टीम और ज़िम्मेदारियों को देखने का हमारा तरीका भी बदल जाता है। विकास सेक्टर के मैनेजरों के अनुभवों से जानिए, इस बदलाव में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और उन्हें कैसे संभालें।अबकी बार, पोषण की सरकार!
सितंबर आया नहीं कि पोषण की फाइल सबसे ऊपर आ जाती है। मीटिंग की बात हो, कैंपेन का नारा या सोशल मीडिया पर पोस्ट—हर जगह पोषण की हाज़िरी लगनी चाहिए।युवाओं को समझने से पहले, हमें खुद को समझना होगा
हम अक्सर सवाल करते हैं कि युवाओं में क्या बदला जाए। लेकिन अगर समाज उन्हें अपनी क्षमताओं का इस्तेमाल करने की आज़ादी ही न दे, तो क्या इतना काफ़ी है?जेल सुधार: सज़ा नहीं, सोच बदलने की ज़रूरत
भारत में जेल सुधार के प्रयास अलग-अलग खांचों में बंटे हैं। लेकिन रिहाई के बाद पुनर्वास के लिए पैरवी, भरोसेमंद फंडिंग और संवेदनशीलता की ज़रूरत है।विकास सेक्टर की डेवलपिंग भाषा
विकास सेक्टर की भाषा किसके लिए कैसी होनी चाहिए? चलिए, पता लगाते हैं!शिक्षक दिवस की बधाई मिली क्या?
शिक्षक दिवस पर, एक शिक्षक की डायरी- सम्मान और जश्न के बीच वह सब, जो अक्सर अनकहा रह जाता है। इसके सभी पात्र काल्पनिक हैं भी और नहीं भी।एक सालाना रिपोर्ट की बनने से पहले ही थक जाने की दास्तान
भारत की हजारों जमीनी संस्थाओं में हर साल एक रस्म दोहराई जाती है—वार्षिक रिपोर्ट बनाना। शुरुआत संस्थापक के जोशीले भाषण से होती है, अफरातफरी से गुजरती है और आखिर में एक ऐसी चमचमाती रिपोर्ट सामने आती है, जिसे पता नहीं कितने ही लोग पढ़ते हैं!सरल कोश: हैमलेट क्या होता है और इसे समझना क्यों ज़रूरी है?
हैमलेट की पहचान और उसकी स्थिति को समझना संस्थाओं के लिए इसलिए उपयोगी हो सकता है क्योंकि इससे किसी इलाके में सेवाओं, सुविधाओं और संसाधनों की पहुंच का अधिक बारीकी से आकलन किया जा सकता है।सरकारी तंत्र में एआई को कैसे शामिल किया जाए?
सरकारी व्यवस्था में एआई लागू करने के अनुभव से तीन ग़ैर-लाभकारी संस्थाएं बता रही हैं कि एक कारगर समाधान के लिए क्या ज़रूरी है।एक बरसाती पैनलिस्ट की दास्तान
पैनल में बोलने की पूरी तैयारी थी...लेकिन तीन घंटे बारिश में सफर करके पहुंचे, तो दर्शक-दीर्घा हमारे इंतज़ार में थी!बिना बड़े बजट के, बड़े संवाद की शुरुआत कैसे करें?
बड़े बजट और तय एजेंडे के बिना भी ऐसा संवाद संभव है, जिसमें हर आवाज़ को बराबर जगह मिले। जानिए, ज़मीनी संगठन कैसे अनकॉन्फ़्रेंस के ज़रिए ऐसा मंच बना सकते हैं।