सामाजिक न्याय
ज़ुल्मतों के दौर में सोशल सेक्टर की चुप्पी
सिविल सोसाइटी की पहचान सिर्फ़ उसके काम से नहीं, बल्कि इस बात से बनती है कि वह मुश्किल समय में किसके साथ खड़ी होती है।विकलांगता पर काम करने वाली संस्थाओं को फंडिंग क्यों नहीं मिलती?
भारत में सीएसआर फंडिंग का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा विकलांगता क्षेत्र तक पहुंचता है। एक नयी रिपोर्ट बता रही कि है कि इस स्थिति को कैसे बदला जा सकता है।दलितों के स्वाभिमान का साहित्य है लोकगाथा सलहेस
राजा सलहेस सिर्फ बिहार या किसी एक जाति विशेष की लोकगाथा का नायक नहीं, बल्कि बहुजन समाज के साझा नायक हैं। सलहेस की लोकगाथा प्रेम, संवेदना, विद्रोह और सामाजिक न्याय की अनूठी अभिव्यक्ति है।मिठास के पीछे का कड़वा सच: मराठवाड़ा के गन्ना मज़दूरों की कहानी
मराठवाड़ा एक सूखा-प्रभावित इलाका है जहां खेती भरोसेमंद नहीं है। सन 1950 के आस-पास अहमदनगर में पहली शुगर फैक्ट्री बनी थी और वहीं से एक नई मज़दूरी की कहानी शुरू हुई।कॉमन्स और बाजार के बीच कहां खड़े हैं वन आश्रित समुदाय?
समुदायों की बाज़ार में समान भागीदारी सुनिश्चित करने वाली व्यवस्थाओं को मजबूत करने के साथ यह तय करना भी जरूरी है कि वन और प्रकृति, बाजार की ताकतों के अधीन न हो जाएं।अंबेडकरवादी गायकों का संघर्ष और नई पहचान
अंबेडकरवादी आंदोलन से जुड़े युवा दलित गायकों का संघर्ष, उनकी आवाज़ और मुख्यधारा द्वारा की जा रही अनदेखी- एक कहानी संगीत, पहचान और समानता की लड़ाई की।आखिर क्यों विवादों के घेरे में है ट्रांसजेंडर बिल?
नया ट्रांस संशोधन विधेयक ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों को कमजोर कर सकता है। इसमें आत्म-पहचान और कानूनी सुरक्षा पर सीमाएं लगाने की आशंका जतायी जा रही है। इस कारण कई एक्टिविस्ट और विशेषज्ञ इसे बड़े स्तर पर अधिकारों का हनन ठहरा रहे हैं।महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा रोकने की स्थायी राह कैसे खुलेगी?
लैंगिक असमानताएं सामाजिक और संस्थागत ढांचों में गहराई से जड़ें जमाए हैं। अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाली महिलाएं और लड़कियां हर रोज इसका सामना करती हैं।क्या भारत की स्वास्थ्य बीमा व्यवस्था सच में सभी की रक्षा करती है?
स्वास्थ्य बीमा का उद्देश्य बीमारी के समय आर्थिक बोझ को कम करना है। लेकिन बड़ी संख्या में विकलांग व्यक्तियों के लिए बीमा तक पहुंच अब भी चुनौतीपूर्ण है।आईडीआर इंटरव्यूज | डॉ. राम पुनियानी
देश में धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के सवालों पर मुखर हस्तक्षेप करने वाले वरिष्ठ चिंतक डॉ. राम पुनियानी आईडीआर से बातचीत में भारत में सांप्रदायिकता, लोकतांत्रिक मूल्यों, बहुलतावाद और सामाजिक सद्भाव के सामने खड़ी चुनौतियों पर अपने अनुभव और विचार साझा कर रहे हैं।आईडीआर इंटरव्यूज | राजिम केतवास
पिछले चार दशकों से श्रमिक एवं महिला अधिकारों के मुद्दों पर सक्रिय रही राजिम केतवास मध्य प्रदेश के श्रमिक आंदोलन में भागीदारी से लेकर अपने संगठन दलित आदिवासी मंच की स्थापना तक की यात्रा और अनुभवों को साझा कर रही हैं।