विषय
महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा रोकने की स्थायी राह कैसे खुलेगी?
लैंगिक असमानताएं सामाजिक और संस्थागत ढांचों में गहराई से जड़ें जमाए हैं। अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाली महिलाएं और लड़कियां हर रोज इसका सामना करती हैं।ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक को क्यों निरस्त किया जाना चाहिए
एलजीबीटीक्यूआईए+ कलेक्टिव द्वारा जारी बयान में 2026 के ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक की आलोचना की गई है। इस आलोचना में साक्ष्यों की कमी, अपर्याप्त परामर्श, और हाशिए के समुदायों का बहिष्कार जैसे कई कारण शामिल हैं। न छांव, न सुरक्षा: दिल्ली के लेबर चौकों पर मजदूरों का संघर्ष
दिल्ली के लेबर चौकों पर काम करने वाले मजदूरों को उम्र के आधार पर भेदभाव, कम मजदूरी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में संघर्ष करना पड़ता है। जानें, कैसे निष्क्रिय कल्याणकारी राशि के उपयोग से इन्हें बेहतर बनाया जा सकता है।क्या भारत की स्वास्थ्य बीमा व्यवस्था सच में सभी की रक्षा करती है?
स्वास्थ्य बीमा का उद्देश्य बीमारी के समय आर्थिक बोझ को कम करना है। लेकिन बड़ी संख्या में विकलांग व्यक्तियों के लिए बीमा तक पहुंच अब भी चुनौतीपूर्ण है।गांव का युवा आज भी स्किल ट्रेनिंग से दूर क्यों है?
डीडीयू-जीकेवाई योजना का उद्देश्य ग्रामीण युवाओं को कौशल प्रशिक्षण और रोजगार से जोड़ना था। लेकिन वर्तमान में यह जागरूकता की कमी, सामाजिक रुकावटों और पाठ्यक्रम की कमियों से जूझती नजर आती है।क्या क्षेत्रीय भाषाएं क्राउडफंडिंग को ज़्यादा प्रभावी बनाती हैं?
स्थानीय भाषा और संस्कृति को दर्शाने वाले फंडरेजिंग कैंपेन डोनर्स का विश्वास जीतने में बेहतर साबित हो सकते हैं।आंगनवाड़ी: शिक्षा की नींव या सिर्फ पोषण का केंद्र?
आंगनवाड़ी शुरुआती बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा की आधारशिला है। लेकिन प्रशासनिक और पोषण संबंधी जिम्मेदारियों के दबाव में कार्यकर्ता गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और देखभाल पर पूरा ध्यान नहीं दे पाती हैं।क्या मनरेगा की खामियों को भर पाएगा वीबी-जी राम जी?
केरल और ओडिशा के आंकड़े बताते हैं कि मनरेगा एक अधिकार से अधिक प्रशासनिक योजना बन गई है। ऐसे में वीबी-जी राम जी को क्या अलग करना होगा?आईडीआर इंटरव्यूज | डॉ. राम पुनियानी
देश में धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के सवालों पर मुखर हस्तक्षेप करने वाले वरिष्ठ चिंतक डॉ. राम पुनियानी आईडीआर से बातचीत में भारत में सांप्रदायिकता, लोकतांत्रिक मूल्यों, बहुलतावाद और सामाजिक सद्भाव के सामने खड़ी चुनौतियों पर अपने अनुभव और विचार साझा कर रहे हैं।रोजगार के सवाल पर 2026 का बजट क्या कहता है?
बजट 2026 के रोजगार दावे मनरेगा, मजदूरी और सरकारी योजनाओं की जमीनी सच्चाइयों से मेल खाते नहीं दिखते। असंगठित श्रमिकों के हालात दर्शाते हैं कि कौशल विकास के बावजूद स्थायी रोजगार अब भी एक दूर का लक्ष्य है।सोशल सेक्टर कॉन्फ्रेंस: समान मंच की असमान सच्चाई
भारत में विकास सेक्टर के सम्मेलन अक्सर भाषा, विविधता और समावेशन की कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं। क्या यह सच में एक समान मंच हैं?