शहरी भारत
शहरों में रहने वाले लोगों की चुनौतियों, अवसरों और पहलों के समझना जहां रोजगार, आवास, स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक समावेशन जैसे मुद्दे लगातार बदलते शहरी जीवन को आकार देते हैं।
क्या दिल्ली के गांवों का शहर पर हक़ नहीं है?
जून 2025 में दिल्ली के नारायणा गांव में एक जनसुनवाई हुई। इसने दशकों की सरकारी उपेक्षा के साथ-साथ स्थानीय समुदाय के उभरते प्रतिरोध को भी सामने रखा।क्या शहरों की यातायात से जुड़ी समस्याओं का समाधान सिर्फ इलेक्ट्रिक वाहन हैं?
भारत में बिजली से चलने वाले परिवहन के बढ़ते उपयोग के बीच, पटना और लखनऊ का अनुभव दिखाता है कि शहरी आवाजाही का भविष्य केवल तकनीक नहीं, बल्कि सुरक्षित, सुलभ और समावेशी परिवहन पर भी निर्भर करेगा।जन आंदोलन लंबे समय तक कैसे जिंदा रहते हैं?
आंदोलन की असली ताकत सामुदायिक भागीदारी, जमीनी नेतृत्व और व्यापक गठबंधन होते हैं। छोटी-छोटी जीतों, अदालती आदेशों और नीतिगत बदलावों के बावजूद संघर्ष लगातार जारी रहता है।पोरंबोके: शहरी सामुदायिक संसाधनों की पुनर्कल्पना
अगर पानी साफ तौर पर दिखाई दे, सबके लिए आसानी से उपलब्ध हो, और रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाए, तो हमारे शहर कैसे दिखेंगे?शहर में बेघर, ऊपर से ठंड का कहर
अक्सर शहरों को सुंदर बनाए जाने के दौरान बेघर लोगों से उनके अस्थाई आश्रय भी छीन लिए जाते हैं जो ठंड और बारिश में उनका जीवन और कठिन बना देता है।हाशिये पर मौजूद युवाओं के लिए मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े प्रयास कैसे होने चाहिए?
युवाओं से जुड़े मानसिक स्वास्थ्य के प्रयास तब अधिक प्रभावी होते हैं जब ये उनके लिए प्रासंगिक, लोगों पर ध्यान केंद्रित करने वाले और समुदाय द्वारा चलाए जाने वाले हों।शहर और गांव की पहचान क्या है और इसे कैसे तय किया जाना चाहिए?
शहरी अध्ययन पर शोध और विमर्श रखने वाले अकादमिक व्यक्तित्व, गौतम भान से द थर्ड आई की बातचीत के कुछ अंश।क्या शिमला शहर का अस्तित्व अब संकट में है?
शिमला उदाहरण है कि कैसे कोई शहर अनियोजित निर्माण, जलवायु परिवर्तन तथा असंगत विकास नीतियों के चलते अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने पर मजबूर हो सकता है।