मनोरंजन
फोर-लेन रिट्रीट की सिंगल-लेन रिएलिटी
सोशल सेक्टर रिट्रीट का हाल किसी मल्टी-लेन हाईवे जैसा नजर आता है—कागज़ पर कई रास्ते, जमीन पर एक!तारीख पर तारीख!
गांव और शहर के चुनाव में उतना ही फर्क है, जितना घर की दीवार और फेसबुक वॉल में।लिंक्ड-इन पर जैसा दिखता है, वैसा होता नहीं है?
लिंक्ड-इन एक ऐसा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है जो करियर के लिहाज से बहुत जरूरी है लेकिन यहां पर जो दिखाया जाता है और असल जिंदगी में जो होता है, उसमें जमीन-आसमान का अंतर होता है।बूझो तो जानें: विकास सेक्टर की कुछ मजेदार पहेलियां
इन पहेलियों में सिर्फ विकास सेक्टर के लोग नहीं बल्कि कुछ जाने पहचाने शब्द और अवधारणाएं भी छुपी हैं, आइए देखें आप किन-किन को पहचान पाते हैं।इम्पैक्ट, उम्मीद और एक प्लेलिस्टः नये साल में बस काम चलता रहे
कभी फील्ड की थकान, कभी अंतहीन मीटिंग्स और कभी फाइलों का बोझ; ऐसे में संगीत ही है जो साथ चलता है। नए साल में ये धुनें हमें याद दिलाती हैं कि बदलाव की राह लंबी सही, लेकिन हर छोटा कदम मायने रखता है।विकास सेक्टर के सालाना अवॉर्ड्स: इस बार कौन सी ट्रॉफी, किसके नाम?
ये अवॉर्ड उन कार्यकर्ताओं के नाम हैं जो समाज को बेहतर बनाते-बनाते लंच ब्रेक को अगले मिशन तक टाल देते हैं।जिंगल बेल… जिंगल बेल… इज़ द फंडिंग वेल?
इस क्रिसमस एनजीओ ने भी अपनी विश लिस्ट निकाली है! इनके सैंटा कोई और नहीं, बल्कि फंडर्स ही हैं।जिला ‘इम्पैक्टपुर’ में इम्पैक्ट की आंधी, तूफान और बवंडर!
जिला इम्पैक्टपुर में शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय संस्थाओं ने ऐसा कमाल किया कि स्कूलों की संख्या कम पड़ गई। कैसे? यहां जानिए!वर्क-फ्रॉम-होम के लिए कोई वजह चाहिए क्या?
पेश हैं घर से काम करने की सात अजीबोगरीब वजहें, जो शत-प्रतिशत सच हैं।वर्कशॉप – “आप आईये तो सही!”
संस्थाओं की वर्कशॉप में “हम आएंगे” जितना आम है, उतना ही “नहीं आ पाएंगे” भी।फंडिंग के पीछे की कहानीः हैलो, हैलो, नमस्ते…
सीएसआर फंडरेजिंग केवल फाइल, रिपोर्ट्स और कॉल नहीं है, यह धैर्य, संवाद और लगातार उम्मीद बनाए रखने की कला है।ख़ुसरो काम क्लाइमेट का, उड़ गया संग अनार!
दिल्ली में दीवाली पर शुरू हुई पटाखों की धम-फटाक और उनका असर कई दिनों बाद भी जारी है। तो प्रस्तुत है हमारे साहित्यिक-सांस्कृतिक बुजुर्ग अमीर ख़ुसरो की शैली में कुछ मजेदार कह-मुकरियां।