
इंद्रेश शर्मा
इंद्रेश शर्मा आईडीआर हिंदी में पार्टनरशिप और आउटरीच हेड हैं। वे संगठन की पहुंच बढ़ाने और असरदार साझेदारी बनाने के लिए विकास सेक्टर से जुड़े विभिन्न हितधारकों के साथ मिलकर काम करते हैं। इन्द्रेश संस्थागत सहयोग को मजबूत करने के साथ-साथ जमीनी संगठनों के लिए कैपेसिटी बिल्डिंग से जुड़े लेखन में भी सक्रिय रूप से योगदान देते हैं। उनके पास विकास सेक्टर में 13 वर्षों से अधिक का पेशेवर अनुभव है। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता, ग्रामीण विकास और पंचायती राज जैसे क्षेत्रों में काम किया है। इससे पहले वे प्रथम और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च संस्थाओं से जुड़े रहे हैं, जहां उन्होंने रिसर्च, कार्यक्रम निर्माण और प्रशिक्षण जैसे कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई है।
इंद्रेश शर्मा के लेख
हल्का-फुल्का फंडर्स की कहानी, बॉलीवुड की जुबानी
डेटा, स्केल या सस्टेनेबिलिटी? बॉलीवुड गानों से समझिए फंडर्स का नया अंदाज़।हल्का-फुल्का प्यारे आंदोलन, …..
वह कभी किसान बनकर लौटता है, कभी छात्र, कभी जंगल, कभी पहाड़। उसका आना सड़क और संसद, दोनों के लिए ज़रूरी है। इसलिए आज एक खुला ख़त, आंदोलन के नाम।हल्का-फुल्का तुम करते क्या हो…हैं?
वह देश बदल सकता है, सिस्टम जगा सकता है, आंदोलन कर सकता है। बस अपना काम समझाने के सिवा सोशल सेक्टर का योद्धा सब कर सकता है।हल्का-फुल्का विकास सेक्टर के सालाना अवॉर्ड्स: इस बार कौन सी ट्रॉफी, किसके नाम?
ये अवॉर्ड उन कार्यकर्ताओं के नाम हैं जो समाज को बेहतर बनाते-बनाते लंच ब्रेक को अगले मिशन तक टाल देते हैं।हल्का-फुल्का वर्कशॉप – “आप आईये तो सही!”
संस्थाओं की वर्कशॉप में “हम आएंगे” जितना आम है, उतना ही “नहीं आ पाएंगे” भी।हल्का-फुल्का दिवाली सेल में सामाजिक बदलाव पर स्पेशल डिस्काउंट!
अब सामाजिक बदलाव पर भी मिल रहा है स्पेशल डिस्काउंट! जल्दी करें, ऑफर सीमित समय के लिए लागू।हल्का-फुल्का फील्ड में एक बार: जब डेटा हर जगह था, प्राइवेसी कहीं नहीं!
क्लासरूम से वॉशरूम तक, टाइम यूज स्टडी में रिसर्चर की डायरी में हर गतिविधि की एंट्री होती है, उसमें खर्च हुए वक्त के साथ।हल्का-फुल्का अब संस्थाओं का असर सिर्फ महसूस किया जाएगा, देखा नहीं जा सकेगा!
क्या हो अगर संस्थाएं अपना काम तो करें, पर बता न सकें? हो सकता है कि रिपोर्टिंग, मॉनिटरिंग और फंडिंग, सब कुछ भावनाओं से ही समझना पड़े। हल्का-फुल्का ऑनलाइन मीटिंग: विकास का वर्चुअल विलाप
जब एजेंडा हो पुराना, स्लाइड हो नई और आवाज़ें हो म्यूट, तो समझ जाइए आप ऑनलाइन मीटिंग में हैं।हल्का-फुल्का सरकारी योजना 404: लाभ नॉट फाउंड
सरकारी योजनाएं सबके लिए हैं, बस धैर्य आपका मजबूत हो और उम्र लंबी।हल्का-फुल्का अप्रेजल का महीना: क्या हुआ तेरा वादा?
अप्रेजल के महीने में संस्थाओं के कर्मचारियों की उम्मीदें सातवें आसमान पर रहती हैं। हालांकि अप्रेजल की घोषणा होते ही उन्हें आसमान से जमीन पर उतरने में ज्यादा समय नहीं लगता।हल्का-फुल्का ये सब तो कहना ही पड़ता है: ‘महिला दिवस’ विशेषांक
महिलाओं की स्थिति वास्तव में बदले या ना बदले, लेकिन भाषणों की बड़ी-बड़ी बातें कभी नहीं बदलेंगी। सार्वजनिक मंचों पर उन बातों को दोहराना जरूरी है, जिनसे लगे कि सब ठीक चल रहा है।











