हल्का-फुल्का

हम वैसे नहीं, तो ऐसे कह देते हैं!

सीधे-सीधे बोलना कभी-कभी मुश्किल हो जाता है… इसलिए हम मुहावरों में कह देते हैं।
रेगिस्तान में ऊंट को जीरा खिलाते हुए _मुहावरे

हम हिंदी पढ़ने वाले लोग ‘राउंड द विकेट’ आकर व्यंग्य कसने में उस्ताद होते हैं। और इस कला में हमारे सबसे भरोसेमंद साथी हैं—मुहावरे। जी हां, मुहावरे! हमारे पुरखों की वह जायदाद, जिस पर हम कभी सीधे-सीधे इतराते नहीं हैं…बस सही मौके पर इस्तेमाल कर सामने वाले की ठसक उतार देते हैं। 

तो हमने सोचा कि जब मुहावरों ने समाज को इतने सालों तक आईना दिखाया है, तो क्यों न आज सोशल सेक्टर को भी थोड़ा ‘रियलिटी चेक’ दे ही दिया जाए। 

अब आप पढ़िए…और बताइए—हमारा निशाना लगा या नहीं?  

1. कहते हैं कि “देने वाला जब भी देता, देता छप्पर फाड़ के।” लेकिन अगर छप्पर में पहले से ही छेद हो, तो नीचे बस इतना ही पहुंचता है:     

रेगिस्तान में ऊंट को जीरा खिलाते हुए, ऊंट के मुंह में जीरा कहावत का चित्रण_मुहावरे
चित्र साभारः राकेश स्वामी

2. जब आप कूदते-फांदते अपने प्रोजेक्ट के लिए ग्रांट लेने पहुंचते हैं लेकिन वहां पहले ही 175 संस्थाएं डेरा जमाए बैठी होती हैं: 

पेड़ पर एक अनार और नीचे कई लोगों की भीड़, एक अनार सौ बीमार कहावत का चित्रण_मुहावरे
चित्र साभारः राकेश स्वामी

3. जब प्रोजेक्ट गड़बड़ा जाए, फंडर बिगड़ जाए और आप सिर्फ इतना बोल पायें–“लगता है फील्ड टीम ने डेटा ठीक से नहीं दिया।” 

टेढ़े आंगन में खड़ा व्यक्ति, नाच न जाने, आंगन टेढ़ा कहावत का चित्रण_मुहावरे
चित्र साभारः राकेश स्वामी

4. जब आप इंस्टाग्राम पर दूसरे एनजीओ के काम को धूम मचाते देखें और मन से बस यही आवाज निकले—“असली काम तो ये ही कर रहे हैं!” 

सजावटी प्रवेश द्वार पर ढोल बजाता व्यक्ति और कुछ दूरी पर बैठकर चाय पीता एक और व्यक्ति दूर के ढोल कहावत का वर्णन_मुहावरे
चित्र साभारः राकेश स्वामी

5. जब आप लिंक्डइन पर इम्पैक्ट स्टोरी की बाढ़ देखकर फील्ड में पहुंचें और लोग आपसे कहें, “किस देश की बात कर रहे हो भाई?” 

हारमोनियम बजाता एक व्यक्ति के जरिये चित्र में थोथा चना बाजे घना कहावत का वर्णन_मुहावरे
चित्र साभारः राकेश स्वामी

6. जब फंडर को आपकी कागज पर छपी रिपोर्ट फीकी लगे, लेकिन दिल्ली वाले एनजीओ की चिकनी-चुपड़ी पीपीटी उनका मन मोह ले:

झोपड़ी और उसके आगे मुर्गी दाना चुगते हुए_मुहावरे
चित्र साभारः राकेश स्वामी

लेखक के बारे में

  • राकेश स्वामी आईडीआर में सह-संपादकीय भूमिका मे हैं। वह राजस्थान से जुड़े लेखन सामग्री पर जोर देते हैं। राकेश के पास राजस्थान सरकार के नेतृत्व मे समुदाय के साथ कार्य करने का एवं अकाउंटेबलिटी इनिशिएटिव, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च मे लेखन एवं क्षमता निर्माण का भी अनुभव है। राकेश ने आरटीयू यूनिवर्सिटी, कोटा से सिविल अभियांत्रिकी में स्नातक किया है।
  • जूही मिश्रा आईडीआर में एडिटोरिएल एसोसिएट हैं। उन्हें पत्रकारिता का 14 साल का अनुभव है और उन्होंने पत्रिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, रोर मीडिया, दूता टेक्नोलॉजी और ग्राम वाणी के साथ काम किया है। जूही ने विकास संवाद संस्था से फेलोशिप पूरी की है, जहाँ उन्होंने बसोर समुदाय में खाद्य प्रणालियों और कुपोषण के कारणों पर शोध किया।