
सिद्धार्थ भट्ट
सिद्धार्थ आईडीआर में एडिटोरियल एसोसिएट हैं। इससे पहले वे यूथ की आवाज़ हिन्दी और युवानिया जैसे डिजिटल प्लैटफॉर्म्स के साथ संपादकीय भूमिका में काम कर चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने जनसंगठनों के साथ काम करने वाली संस्था श्रुति के साथ लंबे समय तक काम किया है।
सिद्धार्थ भट्ट के लेख
हल्का-फुल्का फील्ड में एक बार- ये उत्तर किधर है…कोई इसका उत्तर देगा!
क्या हो जब फील्ड में पहुंचे और दिशा तलाशने के लिए कम्पस की जरूरत पड़ जाएशिक्षा शिक्षा से रोज़गार तक: युवा श्रम बल पर एपीयू रिपोर्ट के 6 मुख्य बिंदु
सामाजिक क्षेत्र की संस्थाओं के लिए यह रिपोर्ट विशेष रूप से उपयोगी है, क्योंकि यह युवाओं, शिक्षा व रोज़गार को व्यापक संदर्भ में प्रस्तुत करती है। नीतिगत समझ बेहतर बनाने के साथ-साथ यह हस्तक्षेप की दिशा तय करने में भी सहायक है।सामाजिक न्याय कॉमन्स और बाजार के बीच कहां खड़े हैं वन आश्रित समुदाय?
समुदायों की बाज़ार में समान भागीदारी सुनिश्चित करने वाली व्यवस्थाओं को मजबूत करने के साथ यह तय करना भी जरूरी है कि वन और प्रकृति, बाजार की ताकतों के अधीन न हो जाएं।नेतृत्व और हुनर विकास सेक्टर में नेतृत्व परिवर्तन: कब, क्यों और कैसे?
सामाजिक संस्थाओं में नेतृत्व परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है। यह प्रकिया व्यक्ति और संस्था, दोनों के बीच आकार लेती है। नेतृत्व की पहचान के लिए संस्था को बहुत धैर्य और खुले विचारों के साथ आगे बढ़ना आवश्यक है।हल्का-फुल्का बूझो तो जानें: विकास सेक्टर की कुछ मजेदार पहेलियां
इन पहेलियों में सिर्फ विकास सेक्टर के लोग नहीं बल्कि कुछ जाने पहचाने शब्द और अवधारणाएं भी छुपी हैं, आइए देखें आप किन-किन को पहचान पाते हैं।पर्यावरण कॉमन्स और स्वशासन: समुदायों की भागीदारी क्यों जरूरी है
सामुदायिक संसाधनों पर चर्चा और जागरुकता बनाए रखने के लिए ग्राम-सभाओं को सशक्त बनाना और उनके एजेंडे को कॉमन्स और समुदाय की जरूरतों पर केंद्रित करना जरूरी हो गया है।हल्का-फुल्का जिंगल बेल… जिंगल बेल… इज़ द फंडिंग वेल?
इस क्रिसमस एनजीओ ने भी अपनी विश लिस्ट निकाली है! इनके सैंटा कोई और नहीं, बल्कि फंडर्स ही हैं।सामाजिक न्याय आईडीआर इंटरव्यूज | राजिम केतवास
पिछले चार दशकों से श्रमिक एवं महिला अधिकारों के मुद्दों पर सक्रिय रही राजिम केतवास मध्य प्रदेश के श्रमिक आंदोलन में भागीदारी से लेकर अपने संगठन दलित आदिवासी मंच की स्थापना तक की यात्रा और अनुभवों को साझा कर रही हैं।हल्का-फुल्का सोशल सेक्टर में कैपेसिटी बिल्डिंग: किसके लिए क्या मायने?
विकास सेक्टर में सबके लिए कैपेसिटी के मायने अलग हैं - किसी के लिए यह सीख है, किसी के लिए चुनौती तो किसी के लिए महज एक और पीपीटी।नेतृत्व और हुनर बेहतरी के लिए सीखना: लर्निंग और डेवलपमेंट के आयाम
विकास सेक्टर में लर्निंग और डेवलपमेंट की क्या उपयोगिता है और इसकी वर्तमान स्थिति को बेहतर बनाने के लिए कौन से कदम उठाये जा सकते हैं।फंडरेजिंग और संवाद जन-संगठन आर्थिक आत्मनिर्भरता कैसे हासिल कर सकते हैं?
जमीनी संगठनों के लिए समुदाय से रिश्ता बनाए रखना सबसे अधिक जरूरी है क्योंकि समुदाय, यदि संगठन की अहमियत समझेगा तो वह उसकी आर्थिक जरूरतों का भी खयाल रखेगा।हल्का-फुल्का फील्ड सर्वे करने जाएं तो ऐसे जवाबों के लिए तैयार रहिएगा
फील्ड सर्वे के दौरान समुदाय से मिले, जरूरी सवालों के कुछ दिलचस्प और मजेदार जवाब।











