ज़ुल्मतों के दौर में सोशल सेक्टर की चुप्पी
सिविल सोसाइटी की पहचान सिर्फ़ उसके काम से नहीं, बल्कि इस बात से बनती है कि वह मुश्किल समय में किसके साथ खड़ी होती है।मेघालय में फुटबॉल से ज़िंदगी के मैदान पर उतरते युवा
शिलांग का यह फुटबॉल क्लब बच्चों को सिर्फ खेल नहीं, ज़िंदगी जीना भी सिखा रहा है। देखिए मेघालय से हमारी यह कहानी।ज़मीनी संस्थाएं फंडर से कैपेसिटी बिल्डिंग और संस्थागत विकास पर बातचीत कैसे करें?
क्षमता निर्माण और संगठनात्मक विकास को अक्सर परियोजनाओं से अलग ज़रूरत माना जाता है, जबकि यही किसी संस्था के दीर्घकालिक सामाजिक प्रभाव की बुनियाद हैं। दानदाताओं के साथ संवाद और नेगोशिएशन की रणनीति इस सोच को बदलने में अहम भूमिका निभा सकती है।झूम खेती के संकट से निकलने का रास्ता कैसे खोज रहे हैं मणिपुर के किसान?
बढ़ती आबादी, भूमि पर बढ़ते दबाव और बदलते पर्यावरण के बीच मणिपुर के किसानों के लिए झूम खेती अब पहले जितनी प्रभावी नहीं रही है। ऐसे में मिट्टी की सेहत सुधारने के साथ-साथ किसानों की आजीविका बेहतर बनाने के लिए खेती के नए तौर-तरीके अपनाए जा रहे हैं।प्यारे आंदोलन, …..
वह कभी किसान बनकर लौटता है, कभी छात्र, कभी जंगल, कभी पहाड़। उसका आना सड़क और संसद, दोनों के लिए ज़रूरी है। इसलिए आज एक खुला ख़त, आंदोलन के नाम।महिलाओं के काम का हिसाब आख़िर कब होगा?
वर्ल्ड इनइक्वेलिटी रिपोर्ट 2026 बताती है कि महिलाओं के साथ आर्थिक ग़ैर-बराबरी सिर्फ़ वेतन तक सीमित नहीं है। यह उनके काम, आय, संपत्ति और अवसर, हर स्तर पर नज़र आती है।जंगल के बीच पुस्तकालय चलाने वाले लाइब्रेरियन की कहानी
क़रीब 2,000 कालजयी साहित्यिक रचनाओं वाली इस लाइब्रेरी से ग़रीब मुतुवन आदिवासी नियमित तौर पर किताबें ले जाते हैं, पढ़ते हैं, और वापस कर जाते हैं।जब औरतों के नारों से गूंज उठेंगी सड़कें
1400 महिलाओं की मज़दूर यूनियन बनने के पीछे क्या है संघर्ष की कहानी? देखिए कैसे घर से बीड़ी बनाने वाली महिलाओं ने शोषण के खिलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद की।प्रकृति को बचाने वालों का ख़याल कौन रखेगा?
संरक्षण के काम में जुटे लोग किस कीमत पर इसे अंजाम दे रहे हैं? सीमित संसाधनों के संकट से जूझते संरक्षणकर्मियों का मानसिक स्वास्थ्य भी अब संकट में है।दावत-ए-नेटवर्किंग!
कॉन्फ्रेंस के लंच में सिर्फ मेनू नहीं, रिश्ते भी परोसे जाते हैं। अपनी नेटवर्किंग को मुकाम तक पहुंचाने के लिए अपनाइए हमारे कुछ ख़ास नुस्खे!विकलांगता पर काम करने वाली संस्थाओं को फंडिंग क्यों नहीं मिलती?
भारत में सीएसआर फंडिंग का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा विकलांगता क्षेत्र तक पहुंचता है। एक नयी रिपोर्ट बता रही कि है कि इस स्थिति को कैसे बदला जा सकता है।