अगर किसी देश की अर्थव्यवस्था को सिर्फ इस आधार पर समझा जाए कि उसकी जीडीपी कितनी बढ़ रही है या वहां कितने अरबपति हैं, तो तस्वीर अधूरी रह जाती है। इसलिए यह जानना भी ज़रूरी है कि उस विकास का फायदा किन लोगों तक पहुंच रहा है और कौन उससे लगातार बाहर छूट रहा है। इस संदर्भ में, महिलाओं की स्थिति का आकलन इस सवाल को सबसे स्पष्ट तरीके से सामने लाता है।
वैश्विक असमानता रिपोर्ट 2026 बताती है कि महिलाओं की आर्थिक ग़ैर-बराबरी केवल वेतन तक सीमित नहीं है। यह उनके काम, आय, संपत्ति और अवसर, चारों स्तरों पर दिखाई देती है। रिपोर्ट के मुताबिक महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक घंटे काम करती हैं, लेकिन उनकी कमाई कम होती है। इसकी बड़ी वजह यह है कि उनके काम के एक बड़े हिस्से को अर्थव्यवस्था में ‘काम’ माना ही नहीं जाता।
यह रिपोर्ट अर्थशास्त्री लुकस चांसेल, रिकार्डो गोमेज़-कैरेरा, रोवाइदा मोशरिफ़ और थॉमस पिकेटी ने तैयार की है। इसे वर्ल्ड इनइक्वेलिटी लैब से जुड़े 200 से अधिक शोधकर्ताओं के सहयोग से प्रकाशित किया गया है। साल 2018 और 2022 के बाद यह इस श्रृंखला की तीसरी रिपोर्ट है।
रिपोर्ट के सह-निदेशक थॉमस पिकेटी कहते हैं कि यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है, जब दुनिया कई राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियों से गुज़र रही है। उनके अनुसार, अगर बराबरी की दिशा में लगातार प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में सामाजिक और जलवायु संबंधी संकटों का सामना करना और मुश्किल हो जाएगा।
भारत में आय और संपत्ति की तस्वीर
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में आर्थिक असमानता अब भी बहुत गहरी है। देश की कुल आय का लगभग 58 प्रतिशत हिस्सा सबसे अमीर 10 प्रतिशत लोगों के पास जाता है, जबकि निचले 50 प्रतिशत लोगों के हिस्से में केवल 15 प्रतिशत आय आती है।
संपत्ति के मामले में यह अंतर और भी बड़ा है। भारत की कुल संपत्ति का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा शीर्ष 10 प्रतिशत लोगों के पास है। इनमें भी सबसे अमीर एक प्रतिशत आबादी के पास देश की लगभग 40 प्रतिशत संपत्ति है।
रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2014 से 2024 के बीच आय के लिहाज़ से शीर्ष 10 प्रतिशत और निचले 50 प्रतिशत लोगों के बीच का यह अंतर लगभग स्थिर बना हुआ है। यानी आर्थिक विकास के बावजूद असमानता में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है।
क्रय शक्ति (एक देश की मुद्रा से कितनी चीजें खरीदी जा सकती हैं)) के आधार पर भारत की औसत प्रति व्यक्ति वार्षिक आय लगभग 6,200 यूरो यानी करीब 6.5 लाख रुपये है। वहीं प्रति व्यक्ति औसत संपत्ति लगभग 28 हज़ार यूरो, यानी करीब 29 लाख रुपये बताई गई है। हालांकि औसत के ये आंकड़े समाज के भीतर मौजूद अंतर को पूरी तरह नहीं दिखाते, क्योंकि संपत्ति का बड़ा हिस्सा अपेक्षाकृत बहुत कम लोगों तक सीमित है।


महिलाओं का काम अधिक, कमाई कम
रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि दुनिया भर में महिलाओं और पुरुषों के बीच वेतन का अंतर अब भी बना हुआ है। यह समस्या विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र में अधिक दिखाई देती है।
रिपोर्ट के अनुसार, यदि घर के भीतर किए जाने वाले अवैतनिक काम, जैसे खाना बनाना, बच्चों और बुज़ुर्गों की देखभाल, सफाई और घरेलू प्रबंधन को भी काम के रूप में गिना जाए, तो महिलाएं एक सप्ताह में औसतन 53 घंटे काम करती हैं। इसके मुकाबले पुरुष औसतन 43 घंटे काम करते हैं। यानी कुल काम के घंटों के लिहाज़ से महिलाएं पुरुषों से अधिक काम कर रही हैं। लेकिन इस काम का बड़ा हिस्सा ऐसा है जिसके लिए उन्हें कोई आर्थिक भुगतान नहीं मिलता।
इस वजह से जब केवल वेतन वाले काम की बात होती है, तब भी महिलाओं को प्रति घंटे मिलने वाला भुगतान पुरुषों की तुलना में काफी कम होता है। रिपोर्ट के अनुसार, महिलाएं पुरुषों के प्रति घंटे के वेतन का केवल 61 प्रतिशत ही कमा पाती हैं।
अगर घरेलू और देखभाल से जुड़े अवैतनिक श्रम को भी इस तुलना में शामिल किया जाए, तो महिलाओं की वास्तविक आय पुरुषों की तुलना में घटकर केवल 32 प्रतिशत रह जाती है। यानी महिलाओं के काम का भार अधिक है, लेकिन उसका आर्थिक मूल्य बहुत कम आंका जाता है।


अदृश्य श्रम का असर सिर्फ वेतन पर नहीं पड़ता
रिपोर्ट इस बात पर ज़ोर देती है कि घरेलू ज़िम्मेदारियों का असमान बंटवारा केवल महिलाओं की मौजूदा आय को प्रभावित नहीं करता, बल्कि उनके पूरे आर्थिक जीवन पर असर डालता है।
जब किसी व्यक्ति के पास घर और देखभाल की अधिक ज़िम्मेदारी होती है, तो उसके लिए पूर्णकालिक नौकरी करना, बेहतर रोज़गार चुनना, अतिरिक्त प्रशिक्षण लेना या नेतृत्व की भूमिकाओं तक पहुंचना कठिन हो जाता है।
इसी का असर महिलाओं की बचत, निवेश और संपत्ति पर भी पड़ता है। लंबे समय में आर्थिक संसाधनों तक उनकी पहुंच पुरुषों की तुलना में कम रह जाती है।
भारत में श्रम बाजार से दूर महिलाएं
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में महिलाओं की श्रम भागीदारी भी चिंता का एक बड़ा विषय है।
देश में केवल 15.7 प्रतिशत महिलाएं ही श्रम बल (लेबर फोर्स) का हिस्सा हैं। रिपोर्ट बताती है कि पिछले लगभग एक दशक में इस स्थिति में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है।
इसका मतलब यह नहीं है कि बाकी महिलाएं काम नहीं करती। उनमें से बड़ी संख्या घरेलू और देखभाल से जुड़े ऐसे काम करती है, जिन्हें औपचारिक अर्थव्यवस्था में रोज़गार नहीं माना जाता। नतीजतन, उनके काम का आर्थिक मूल्यांकन नहीं हो पाता और वे सामाजिक सुरक्षा, नियमित आय तथा भविष्य की आर्थिक स्थिरता जैसे लाभों से भी वंचित रह जाती हैं।
आय से आगे बढ़कर अवसरों की असमानता
रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं और पुरुषों के बीच ज़िम्मेदारियों का असमान बंटवारा केवल कमाई तक सीमित नहीं रहता।
जब महिलाओं का अधिक समय बिना वेतन वाले घरेलू कामों में जाता है, तो उनके लिए रोज़गार, नेतृत्व, राजनीति और निर्णय लेने वाली भूमिकाओं तक पहुंचना भी मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि महिलाओं के पास संपत्ति अर्जित करने और आर्थिक सुरक्षा के अवसर भी अपेक्षाकृत कम होते हैं।
इस तरह आर्थिक असमानता और लैंगिक असमानता एक-दूसरे को लगातार बढ़ावा देती हैं।
दुनिया की तस्वीर भी बहुत अलग नहीं
रिपोर्ट बताती है कि यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है।
दुनिया के शीर्ष 10 प्रतिशत कमाने वाले लोग बाकी 90 प्रतिशत आबादी की कुल आय से भी अधिक कमाते हैं। संपत्ति के मामले में असमानता और गहरी है। वैश्विक संपत्ति का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा शीर्ष 10 प्रतिशत लोगों के पास है, जबकि निचले आय वर्ग के हिस्से में केवल दो प्रतिशत संपत्ति आती है।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि 1990 के दशक के बाद से दुनिया के अरबपतियों की संपत्ति औसतन आठ प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ी है। यह दर दुनिया की निचली आधी आबादी की संपत्ति वृद्धि से लगभग दोगुनी है।
हालांकि इस दौरान गरीब आबादी की आय और संपत्ति में भी कुछ वृद्धि हुई है, लेकिन उसकी गति सबसे अमीर तबके की तुलना में कहीं नहीं टिकती।
यह अंतर औसत संपत्ति के आंकड़ों में भी दिखाई देता है। निचले 50 प्रतिशत लोगों के पास औसतन लगभग 6,500 यूरो की संपत्ति है, जबकि शीर्ष 10 प्रतिशत लोगों के पास औसतन करीब 10 लाख यूरो की संपत्ति है।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि दुनिया के केवल 56 लोगों की औसत संपत्ति लगभग 53 अरब यूरो प्रति व्यक्ति है। यह आंकड़ा दिखाता है कि संपत्ति का संकेंद्रण दुनिया के सबसे छोटे और सबसे अमीर तबके में कितना अधिक है।
महिलाओं की असमानता को समझने का नया नज़रिया
विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 यह संकेत देती है कि महिलाओं की आर्थिक स्थिति को केवल उनकी तनख़्वाह या रोज़गार दर से नहीं समझा जा सकता। इसके लिए यह देखना होगा कि वे कुल कितना काम करती हैं, उस काम का कितना हिस्सा भुगतान वाला है, उनके पास संपत्ति बनाने के कितने अवसर हैं और आर्थिक फैसलों में उनकी भागीदारी कितनी है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में आय, संपत्ति और लैंगिक असमानता एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। इसलिए यदि आर्थिक बराबरी हासिल करनी है, तो केवल रोज़गार बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। ऐसी नीतियों की ज़रूरत होगी जो महिलाओं के अवैतनिक काम को मान्यता दें, उनकी श्रम भागीदारी बढ़ाएं और उन्हें आय तथा संपत्ति पर अधिक अधिकार हासिल करने में मदद करें।
इस नज़र से यह रिपोर्ट केवल असमानता के आंकड़े नहीं दर्शाती, बल्कि यह भी बताती है कि महिलाओं की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने के लिए किन संरचनात्मक बदलावों की ज़रूरत है।
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