सुई और धागे से अवसर बुनने का सामाजिक उद्यम
क्या कारीगरों का हित और कारोबार, दोनों साथ चल सकते हैं? लखनऊ की चिकनकारी से निकला एक सामाजिक उद्यम बता रहा है कि स्थानीय स्तर पर रोज़गार की दिशा कैसे बदली जा सकती है।क्या दिल्ली के गांवों का शहर पर हक़ नहीं है?
जून 2025 में दिल्ली के नारायणा गांव में एक जनसुनवाई हुई। इसने दशकों की सरकारी उपेक्षा के साथ-साथ स्थानीय समुदाय के उभरते प्रतिरोध को भी सामने रखा।आपको वेलकम किट मिली क्या?
हर नौकरी एक वेलकम किट साथ लाती है। बस किसी में लैपटॉप होता है, तो किसी में सर्वे का रजिस्टर। पेश है कॉर्पोरेट और एनजीओ की दुनिया का एक आम पहला दिन।डेटा से नहीं, लोगों से सीखना
भारत के ट्रकिंग समुदाय के साथ काम करते हुए हमने जाना कि फील्ड में समय बिताना, भरोसा बनाना और उन समुदायों को समझना कितना अहम है, जो अक्सर औपचारिक आंकड़ों से बाहर रह जाते हैं।बदलते मॉनसून के दौर में बारिश की एक-एक बूंद सहेजना जरूरी
जलवायु परिवर्तन, अल नीनो और बदलते मॉनसून के बीच भारत में चरम मौसम की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे समय में बारिश की हर बूंद का संरक्षण ही जल और खाद्य सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार है।फंडर से बातचीत? योगा से होगा!
फंड आए न आए, सांस आती रहेगी!जून 2026 एफसीआरए संशोधन: नॉन-प्रॉफिट संस्थाओं के लिए इसके क्या मायने हैं?
गृह मंत्रालय ने एफसीआरए नियमों में संशोधन किया है। जानिए क्या सब बदला है और आपकी संस्था कैसे इन नए नियमों का पालन कर सकती है।सरल कोश: बेसलाइन सर्वे क्या होता है और यह क्यों ज़रूरी है?
जब कोई संस्था किसी नए कार्यक्रम या पहल की शुरुआत करती है, तो ‘बेसलाइन सर्वे’ शब्द अक्सर उसकी शुरुआती तैयारियों में सुनने को मिलता है।क्या वीबी-जी राम जी महिलाओं को नरेगा जैसे मौके दे पायेगा?
दक्षिणी राजस्थान की महिलाओं के लिए नरेगा सिर्फ़ रोज़गार नहीं, बल्कि सशक्तिकरण का माध्यम रहा है। अब वीबी–जी राम जी को लेकर उनका सवाल है कि क्या ये उन्हें नरेगा जैसे अवसर दे पाएगा?क्या सोशल सेक्टर सवाल पूछने से कतराने लगा है?
जैसे-जैसे गैर-लाभकारी संस्थाओं का प्रभाव बढ़ रहा है, क्या उनकी स्वतंत्र और सवाल उठाने वाली आवाज़ कमज़ोर पड़ती जा रही है?