पर्यावरण

प्रकृति को बचाने वालों का ख़याल कौन रखेगा?

संरक्षण के काम में जुटे लोग किस कीमत पर इसे अंजाम दे रहे हैं? सीमित संसाधनों के संकट से जूझते संरक्षणकर्मियों का मानसिक स्वास्थ्य भी अब संकट में है।
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यह कहानी रिनचेन की है।

सितंबर 2025 समाप्त होने को है, और हमने अभी-अभी किश्तवाड़ राष्ट्रीय उद्यान से काफी अंदर कियार नाला तक 60 किलोमीटर की पैदल यात्रा पूरी की है। हर दिन 7–10 घंटे पैदल चलते हुए, हालिया बाढ़ से क्षतिग्रस्त हो चुके रास्तों को पार करते हुए और बकरवालों (पशुपालक समुदाय) की अस्थायी झोपड़ियों में रुकते हुए, हम लगभग 1500 मीटर की ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं। इस दौरान हमने रास्ते में 12 कैमरा ट्रैप लगाए, जो आने वाले महीनों में यह कैद करेंगे कि जम्मू और कश्मीर के इस क्षेत्र में हिम तेंदुए किस प्रकार निवास करते हैं।

वर्ष 2023 से नेचर कंज़र्वेशन फाउंडेशन के वैज्ञानिक किश्तवाड़ राष्ट्रीय उद्यान में हिम तेंदुओं की आबादी पर पहला व्यापक बेसलाइन अध्ययन कर रहे हैं, और हमारा यह कैमरा-ट्रैप अभियान उसी का एक हिस्सा है।

जैसे ही हमें मोबाइल नेटवर्क मिला, रिनचेन को पता चला कि उनकी मां गंभीर रूप से बीमार हैं। बीते एक हफ्ते से हमारा बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं था।

रिनचेन स्पीति में कार्यरत संरक्षणकर्मियों के एक समूह का हिस्सा हैं और पिछले 12 वर्षों से हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। मेरे लिए, वे उन अधिकांश संरक्षणकर्मियों की भावना और समर्पण का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनके साथ पिछले छह वर्षों में काम करने का मुझे सौभाग्य मिला है। समय के साथ रिनचेन जैसे कई लोग मेरे घनिष्ठ मित्र भी बन गए हैं। उनके अनुभव जलवायु संकट के दौर में संरक्षण कार्य की ज़मीनी हकीकत को सामने लाते हैं।

बढ़ते तापमान, और घटते वन क्षेत्र से लेकर वन्यजीवों के बदलते व्यवहार तक, पर्यावरण और जलवायु से जुड़ी ख़बरों की चर्चा आज चारों ओर है। हम चाहें या न चाहें, लेकिन अब इस मुद्दे को टाला नहीं जा सकता। वर्ष 2024 में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) ने जलवायु परिवर्तन पर दुनिया का सबसे बड़ा जनमत सर्वेक्षण पीपल्स क्लाइमेट वोट प्रकाशित किया। इसमें आधे से अधिक उत्तरदाताओं ने बताया कि वे प्रतिदिन या कम-से-कम हर हफ्ते जलवायु परिवर्तन के बारे में सोचते हैं। इसी प्रकार, वर्ष 2023 में भारत में किए गए येल के एक सर्वेक्षण में 2,178 उत्तरदाताओं में से 86 प्रतिशत ने कहा कि वे पौधों और पशुओं की कई प्रजातियों के विलुप्त होने को लेकर चिंतित हैं।

आज जब दुनिया इस बात पर सहमत होती दिख रही है कि जलवायु संकट पर तुरंत कार्रवाई ज़रूरी है, तब कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इसके भीषण प्रकोप का आगे बढ़कर सामना कर रहे हैं। मसलन, ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले शोधकर्ताओं, संरक्षण वैज्ञानिकों और अन्य तकनीकी विशेषज्ञों का एक पूरा समुदाय कई सालों से रेनफ़ॉरेस्ट कैनपी के नीचे, केवल हेडटॉर्च की टिमटिमाती रोशनी के सहारे काम कर रहा है।

यह समुदाय समुद्र में काम करता है, जहां खारा पानी उनकी त्वचा को लगातार झुलसाता रहता है। वे घुमावदार पहाड़ी पगडंडियों पर लंबी पैदल यात्राएं करते हैं, ताकि उन समुदायों तक पहुंच सकें जिनके पास पारिस्थितिकी तंत्र की जटिलताओं को समझने वाली अहम जानकारियां हैं।

लेकिन, एक ओर जहां संरक्षणकर्मी हमारे समय की सबसे गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने में जुटे हैं, वहीं उनकी सामाजिक, भावनात्मक और भौतिक ज़रूरतें अक्सर अनदेखी रह जाती हैं। जलवायु नीति और निर्णय-निर्माण की प्रक्रियाओं में भी उनके वास्तविक अनुभवों को शायद ही जगह मिल पाती है।

इसी कमी को दूर करने के उद्देश्य से थॉमस पिएनकॉव्स्की और मुनीब ख़नयारी ने वर्ष 2023 में एक अध्ययन किया। अपने पीएचडी शोध के दौरान दो महाद्वीपों में संरक्षणकर्मियों के साथ हुई बातचीत और अनेक अनुभवजन्य साक्ष्यों (ऐनेकडोटल एविडेन्स) के आधार पर उन्होंने 122 देशों के 2,300 से अधिक पेशेवर लोगों का सर्वेक्षण किया।

इस अध्ययन के निष्कर्षों ने संरक्षण क्षेत्र में मानसिक स्वास्थ्य संकट की गंभीरता को उजागर किया। सर्वेक्षण में शामिल प्रत्येक चार संरक्षणकर्मियों में से एक से अधिक में मध्यम या गंभीर स्तर के मनोवैज्ञानिक तनाव के संकेत पाए गए। महिलाओं में पुरुषों की तुलना में अधिक मानसिक तनाव दर्ज किया गया। इसी प्रकार यह भी पाया गया कि करियर की शुरुआत कर रहे लोगों में अधिक अनुभवी लोगों की तुलना में तनाव ज़्यादा था। अध्ययन में यह भी सामने आया कि जिन प्रतिभागियों में आशावाद का स्तर कम था (संरक्षण कार्य के प्रति या सामान्य रूप में), जिनका शारीरिक स्वास्थ्य खराब था, या जिन्हें सीमित रूप में सामाजिक सहयोग हासिल था, उनमें मानसिक तनाव का जोखिम सबसे अधिक था। ज़रूरत से ज़्यादा काम, काम का दबाव और संगठनात्मक अस्थिरता मानसिक तनाव बढ़ाते हैं। इसके विपरीत, नौकरी में स्थिरता, काम से संतुष्टि और यह एहसास कि उनका काम संरक्षण में योगदान दे रहा है, तनाव को कम करने में मददगार थे।

इन निष्कर्षों के साथ-साथ अध्ययन ने उन क्षेत्रों की भी पहचान की, जहां नियोक्ता संरक्षणकर्मियों की चिंताओं को कम कर सकते हैं, उनके लिए बेहतर कार्य-परिस्थितियां बना सकते हैं और उनके मानसिक स्वास्थ्य व समग्र कल्याण को मजबूत कर सकते हैं। इसका लाभ उन प्राकृतिक क्षेत्रों को भी मिलेगा, जिनकी रक्षा के लिए ये संरक्षणकर्मी काम कर रहे हैं।

पहाड़ी पर एक व्यक्ति_संरक्षण
किश्तवाड़ राष्ट्रीय उद्यान के पर्वतीय क्षेत्रों में भ्रमण। | चित्र साभार: तन्मयी गिध

जब संरक्षण आजीविका बन जाता है

अधिकांश लोग प्रकृति के प्रति अपने प्रेम और उसके संरक्षण में सार्थक योगदान देने की इच्छा से प्रेरित होकर संरक्षण के क्षेत्र में आते हैं। लेकिन सबसे सक्षम और सबसे अधिक प्रेरित लोग भी तब मानसिक और शारीरिक रूप से थक जाते हैं, जब उन्हें पेशेवर विकास का कोई ढांचा न मिल पाए।

संरक्षण कार्य को अक्सर एक ‘अपरंपरागत पेशा’ माना जाता है। इस क्षेत्र में काम करने वाले लोग ऐसी परिस्थितियों में काम करते हैं, जो उन वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियों जितनी ही अनिश्चित और अस्थिर हैं, जिनसे वे जूझ रहे हैं। लंबे समय तक काम करना, कई हफ्तों तक परिवार और सामाजिक जीवन से दूर रहना, दूरस्थ और दुर्गम इलाकों में काम करना, और सीमित संसाधनों के बीच लगातार बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना—यह सब उनकी दिनचर्या का हिस्सा मान लिया जाता है।

शोध जिस इलाक़े में किया जा रहा हो, उसके आधार पर संरक्षणकर्मियों की ज़िम्मेदारियां और भी जटिल हो जाती हैं। सटीक आंकड़े इकट्ठा करने के साथ-साथ उन्हें स्थानीय समुदायों के साथ संबंधों का संतुलन बनाए रखना पड़ता है, व्यक्तिगत चुनौतियों का सामना करना होता है, पारिस्थितिक अस्थिरता से जूझना पड़ता है और कुछ मामलों में सैन्य या सीमा संबंधी तनावों के बीच भी काम करना पड़ता है।

स्पीति के पर्वतीय क्षेत्र से बहुत दूर पश्चिमी घाट में भी एक ऐसी ही कहानी सामने आती है। संघर्ष की घटनाओं में लगातार इज़ाफ़ा देख रहे इस क्षेत्र में मेरे एक करीबी मित्र पिछले एक दशक से अधिक समय से स्थानीय समुदायों और वन्यजीवों के बीच होने वाले नकारात्मक टकरावों को कम करने के समाधान खोजने में जुटे हैं।

उन्हें अक्सर गंभीर नुकसान या जानलेवा घटनाओं के बाद पैदा हुई तनावपूर्ण परिस्थितियों को संभालना पड़ता है। साथ ही उन्हें वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में बदलाव लाने के लिए अलग-अलग हितधारकों के बीच लगातार संवाद और जनसंपर्क भी करना पड़ता है।

उनके लिए यह काम हमेशा एक संतुलन साधने जैसा रहा है: एक ओर कार्यस्थल की अत्यधिक तनावपूर्ण परिस्थितियां और दूसरी ओर निजी जीवन। फाइनेंस की पढ़ाई छोड़कर वन्यजीवों के प्रति अपने प्रेम के कारण इस क्षेत्र में आए इस व्यक्ति की आंखों की चमक तब साफ़ दिखाई देती है, जब वे अपनी प्रिय प्रजाति (जीव-जंतुओं) के साथ किसी अप्रत्याशित मुलाकात का वर्णन करते हैं।

ऐसे पल इस कठिन पेशे में राहत और संतोष का एहसास कराते हैं और प्रकृति के संरक्षण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को नई ऊर्जा देते हैं। लेकिन मेरे मित्र का यह भी मानना है कि ‘जुनून’ और ‘प्रतिबद्धता’ की तो अक्सर सराहना होती है, पर बेहतर बीमा, रोज़गार की सुरक्षा, कार्य-सुविधाओं और काम का बोझ बांटने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित कर्मचारियों जैसी बुनियादी ज़रूरतों को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता।

एक जटिल व्यवस्था को बदलाव की ज़रूरत है

बीते कुछ सालों में भारत में संरक्षण के क्षेत्र में वैज्ञानिक पद्धतियों के मज़बूत होने और दुनिया के अन्य हिस्सों के साथ सहयोग बढ़ने के कारण उल्लेखनीय प्रगति हुई है। इसके बावजूद, यह क्षेत्र आज भी प्राथमिकता और संसाधनों के लिए संघर्ष कर रहा है। इसके अलावा, विकास के एक मौजूदा मॉडल से इसका टकराव लगातार बना हुआ है। जब मैं यह लेख लिख रही हूं, तब ग्रेट निकोबार परियोजना को पर्यावरण विशेषज्ञों और निकोबारी समुदायों के व्यापक विरोध के बावजूद राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) से मंजूरी मिल चुकी है। वहीं, ओडिशा में ग्रामीण एक बॉक्साइट खनन परियोजना का भारी विरोध कर रहे हैं, क्योंकि इससे पूर्वी घाट में और अधिक खनन का रास्ता खुलेगा तथा जंगलों में रहने वाले हज़ारों आदिवासी समुदायों के विस्थापित होने का ख़तरा पैदा हो जाएगा।

जब पर्यावरणीय चुनौतियां लगातार और जटिल होती जा रही हों, तब अग्रिम पंक्ति में काम कर रहे लोगों पर सीमित समय का दबाव क्या असर डालता है?

अपनी पुस्तक द साइकॉलॉजी ऑफ़ क्लाइमेट एंग्ज़ायटी में लेखक जोसेफ डॉड्स लिखते हैं, “जलवायु संबंधी चिंता किसी भी उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकती है। लेकिन इसका सबसे गहरा प्रभाव अक्सर युवाओं, प्राकृतिक आपदाओं से जुड़े कर्मियों, और उन पर्यावरण वैज्ञानिकों व कार्यकर्ताओं पर पड़ता है, जिन्हें इस संकट से जुड़ी जानकारी का लगातार सामना करना पड़ता है।”

आने वाले दशकों में पर्यावरण संकट और जटिल होगा। ऐसे में हमें उस कार्य-संस्कृति (वर्क-कल्चर) को बदलना होगा जो मानसिक और शारीरिक थकावट (बर्नआउट) को समर्पण, अत्यधिक काम को कर्तव्य और कम वेतन को त्याग का प्रतीक मानती है। संरक्षणकर्मी पहले से ही कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं। उनके लिए रोज़ इस ज़मीनी हकीकत का सामना करना ही भारी पड़ता है। ऐसे में जब उन पर अत्यधिक काम का बोझ, सीमित संसाधन और कमजोर संस्थागत व सामाजिक सहयोग का दबाव भी जुड़ जाता है, तो उनकी चुनौती कई गुना बढ़ जाती है।`

समूह में चर्चा करते कुछ लोग_संरक्षण
सत्यमंगलम टाइगर रिज़र्व में नृवंशविज्ञान (एथ्नोग्राफिक) अध्ययन के लिए समुदाय के सदस्यों का साक्षात्कार। | चित्र साभार: तन्मयी गिध

संरक्षण के काम में देखभाल को शामिल करना

हालांकि संरक्षण क्षेत्र में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चर्चाएं निश्चित रूप से बढ़ी हैं, लेकिन इस जागरूकता को अब ठोस कार्रवाई में बदलने की ज़रूरत है। संगठनों को स्पष्ट और खुले संवाद के मौके बनाने चाहिए, जहां विविध भूमिकाओं से जुड़े तनावों को सुना जा सके। इसके अनुसार कार्यकर्ताओं की अलग-अलग ज़रूरतों के लिए समाधान तैयार किए जाने चाहिए।

संरक्षण कार्य का एक पक्ष बेहद प्रेरक है। यह लोगों को दुनिया के कुछ सबसे अछूते प्राकृतिक इलाकों में काम करने और ऐसा योगदान देने का अवसर देता है, जिसका असर आने वाली पीढ़ियों तक रहेगा। लेकिन इसका दूसरा पक्ष बेहद कठिन है। इस क्षेत्र में काम करने वाले सभी लोग एक जैसी परिस्थितियों में नहीं होते। वह कितने जोखिम में हैं, यह अक्सर इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें प्रशिक्षण, आजीविका, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और दूरस्थ इलाकों तक पहुंच जैसी कितनी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

ऐसे में सवाल यह है कि संगठन अपने कर्मचारियों की अलग-अलग ज़रूरतों को कैसे पहचानें, और उन्हें कैसे सहयोग दे?

1. संरक्षण क्षेत्र के कार्यबल के भीतर मौजूद असमानताओं को स्वीकार करना

संरक्षण क्षेत्र का कार्यबल एक जैसा नहीं है। इसमें स्थानीय समुदायों से जुड़े फील्ड स्टाफ भी शामिल हैं, जो सीमित मौसम के दौरान कठिन परिस्थितियों में अथक मेहनत करते हुए प्राथमिक आंकड़े जुटाते हैं। साथ ही, वे उन्हीं समुदायों का हिस्सा भी होते हैं, जो जलवायु आपदाओं और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसी समस्याओं का सबसे अधिक सामना करते हैं।

दूसरी ओर, वरिष्ठ शोधकर्ता एक साथ कई परियोजनाओं का प्रबंधन करते हैं। उन्हें शोध के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने के साथ-साथ अपनी टीम का नेतृत्व भी करना पड़ता है। ऐसे में केवल पर्यावरणीय चुनौतियों के लगातार संपर्क में रहना ही नहीं, बल्कि उनकी भूमिका से जुड़ी ज़िम्मेदारियां भी तनाव, चिंता और अलगाव की भावना को बढ़ा सकती हैं।

इन असमानताओं को स्वीकार करने का मतलब यह समझना भी है कि सुरक्षा और सहयोग की ज़रूरतें सभी कर्मचारियों के लिए एक जैसी नहीं होती। किसी टीम में सहयोगपूर्ण कार्य-संस्कृति विकसित करने की ज़िम्मेदारी भले ही कार्यक्रम प्रमुखों की हो, लेकिन संरक्षण संगठनों को व्यापक और संस्थागत स्तर पर भी बदलाव करने होंगे। उदाहरण के लिए, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में लगातार कई सप्ताह तक काम करने वाले फील्ड स्टाफ को अनुकूल और लंबे अवकाश की सुविधा दी जा सकती है। वहीं, वरिष्ठ शोधकर्ताओं के लिए विशेष कौशल वाले सहयोगी कर्मचारी उपलब्ध कराए जा सकते हैं, ताकि उनका कार्यभार संतुलित हो सके।

2. भूमिकाओं को स्पष्ट करना और कर्मचारियों को उचित प्रशिक्षण देना

मिलजुलकर रहने वाले समुदायों में, जहां सहकर्मी भी उसी समुदाय का हिस्सा होते हैं, भूमिकाओं और ज़िम्मेदारियों का स्पष्ट न होना अनजाने में अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं को असुरक्षित स्थिति में डाल सकता है। जिन भूमिकाओं में कर्मचारियों को बार-बार तनावपूर्ण परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, उनमें उन्हें फ़ील्ड में भेजने से पहले स्पष्ट संवाद, उचित प्रशिक्षण और मेंटरशिप देना बेहद ज़रूरी है। साथ ही, सुरक्षा, संरक्षा और मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य को संगठन की कार्य-प्रणाली का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

इसी तरह, संरक्षण संगठनों में विविध विशेषज्ञता वाली टीमों का होना भी महत्वपूर्ण है। प्रशिक्षित प्रशासनिक कर्मचारी, संचार विशेषज्ञ, प्रबंधक, विधि विशेषज्ञ और अन्य इन-हाउस विशेषज्ञ भूमिकाओं को स्पष्ट करने और ज़िम्मेदारियों का बेहतर बंटवारा करने में मदद कर सकते हैं। इससे फ़ील्ड में काम करने वाले कर्मचारी अपना पूरा ध्यान उसी काम पर लगा सकेंगे, जिसके लिए उन्हें नियुक्त किया गया है।

3. ऐसी फंडिंग जो संगठनों की ज़रूरतों और प्राथमिकताओं को समझे

भारत में कई संरक्षण संगठन केवल अपने कार्यक्रमों के लिए ही नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के संस्थागत संचालन के लिए भी अनुदानों और फंडरों पर निर्भर हैं। ऐसे में फंडिंग एजेंसियां और ग्रांट मेकर उनकी वास्तविक ज़रूरतों को समझने और उन्हें अधिक उपयोगी सहयोग उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

मेरे पूर्व कार्यस्थल, रेनमैटर फ़ाउंडेशन, में संरक्षण कार्यक्रम का नेतृत्व करने वाले एक सहकर्मी ने संरक्षण संगठनों और नेटवर्कों के साथ काम करने तथा अन्य फंडिंग एजेंसियों से संवाद के अपने अनुभव साझा किए। उनके अनुसार, प्रभावी फंडिंग की कुंजी कार्यक्रम संबंधी खर्च और संस्थागत खर्च के बीच संतुलन बनाए रखने में है। जहां पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़े व्यापक लक्ष्य पहले से तय होते हैं, वहीं किसी संगठन के संचालन से जुड़ी ज़रूरतें—जैसे बेहतर वेतन, स्वास्थ्य लाभ, चिकित्सा बीमा, अधिक कर्मचारियों की नियुक्ति और अन्य संस्थागत प्राथमिकताएं—संगठन स्वयं तय करते हैं। इसलिए इन खर्चों को भी फंडिंग का अभिन्न हिस्सा माना जाना चाहिए।

दूसरी ओर, जब किसी संगठन को कई फंडिंग एजेंसियों के साथ काम करना पड़ता है, खासकर तब जब हर फंड अलग-अलग गतिविधियों और तय समय-सीमा से बंधा हो, तो कर्मचारियों की संस्थागत और प्रशासनिक ज़रूरतों को पूरा करना और मुश्किल हो जाता है। इससे निपटने के लिए ज़रूरी है कि फंडर भी यह सोचें कि संगठनों के लिए असल और अनुकूल लक्ष्य क्या होने चाहिए। आखिर हम सब मिलकर किस बड़े उद्देश्य की ओर बढ़ना चाहते हैं?

इसके साथ ही, फंडिंग एजेंसियों में ऐसे लोगों की मौजूदगी भी महत्वपूर्ण है, जिन्हें ज़मीनी स्तर पर संरक्षण कार्य का अनुभव हो। इससे वे इस क्षेत्र की वास्तविक चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझ पाएंगे और यह सुनिश्चित कर सकेंगे कि वित्तीय संसाधनों का उपयोग अधिक सार्थक और प्रभावी तरीके से हो।

संरक्षण एक ऐसा क्षेत्र है, जहां लगातार और धैर्यपूर्वक किए गए प्रयासों का असर अक्सर कई सालों बाद दिखाई देता है। इसलिए, इसे मिलने वाला सहयोग भी उतना ही दीर्घकालिक और लचीला होना चाहिए। यदि गैर-लाभकारी संगठनों को केवल परियोजनाओं और परिणामों तक सीमित रखने के बजाय अपनी प्राथमिकताएं तय करने की अधिक आज़ादी दी जाए, तो वे लंबे समय में न केवल प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र, बल्कि अपने कर्मचारियों के लिए भी अधिक स्वस्थ और टिकाऊ भविष्य तैयार कर सकते हैं।

कियार नाला से लौटते समय कठिन पैदल यात्रा के बीच रिनचेन ने हमसे कुछ देर रुकने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि हमें थोड़ा ठहरकर पहाड़ों को ध्यान से देखना चाहिए। ऐसे ही क्षणों में उन दुर्लभ और शर्मीले खुरदार वन्यजीवों की झलक मिल सकती है, जिनका बसेरा इन पहाड़ों में है। रिनचेन इन पर्वतीय क्षेत्रों में सैकड़ों बार आ चुके थे, फिर भी उनके लिए इनका आकर्षण कभी कम नहीं हुआ था। तमाम कठिनाइयों के बावजूद यह पहाड़ उनके लिए सुकून, अपनेपन और दोस्ती की जगह है।

रिनचेन जैसे लोग और वे अनेक युवा संरक्षणकर्मी, जिन्होंने इस कठिन राह को चुना है, केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि ठोस सहयोग के भी हक़दार हैं। वे लगातार सफ़र करते हैं, दुर्गम रास्तों पर चलते हैं और उन सवालों के जवाब खोजते हैं, जिन पर हमारी साझा पर्यावरणीय विरासत का भविष्य टिका हुआ है।

लेकिन जब तक संरक्षणकर्मियों की आर्थिक, मानसिक और शारीरिक सुरक्षा को संस्थाओं की प्राथमिकताओं का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा, तब तक संरक्षण की बड़ी-बड़ी महत्वाकांक्षाएं अधूरी रहेंगी।

प्रकृति की रक्षा केवल विचारों या नीतियों से नहीं होती। इसके लिए ऐसे लोगों की ज़रूरत होती है, जो हर दिन कठिन परिस्थितियों का सामना करने का साहस रखते हों। उस साहस को बनाए रखना केवल संरक्षण संगठनों की नहीं, बल्कि हम सभी की साझा ज़िम्मेदारी है।

यह लेख एक शुरुआत भर है। संरक्षण क्षेत्र में मानसिक स्वास्थ्य पर बातचीत शुरू करने की एक कोशिश और यह पूछने का प्रयास कि हम उन लोगों की बेहतर देखभाल कैसे करें, जिनके कंधों पर संरक्षण का यह काम टिका है।

अभी भारत के अलग-अलग हिस्सों में काम कर रही महिलाओं, अग्रिम पंक्ति के समुदायों और फ़ील्ड स्टाफ की अनगिनत कहानियां सामने आना बाकी हैं। उम्मीद है कि यह बातचीत आगे और समृद्ध होगी और हमें ऐसा भविष्य गढ़ने में मदद करेगी, जहां प्रकृति के संरक्षण के साथ-साथ संरक्षणकर्मियों को भी समान रूप से महत्व दिया जाएगा।

*इस अनुवाद में मूल लेख के हाइपरलिंक शामिल हैं।

अनुवाद सौजन्य: शब्द एआई

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लेखक के बारे में

  • तन्मयी गिध अनटोल्ड अर्थ की संस्थापक हैं, जो मिक्स्ड-मीडिया पर आधारित स्टोरीटेलिंग की एक पहल है। उन्होंने पेंच टाइगर रिज़र्व में गोंड समुदाय के साथ काम किया है और हिमाचल प्रदेश में महिला-नेतृत्व वाले समूहों के साथ सामाजिक उद्यमिता को बढ़ावा दिया है। इसके अलावा, उन्होंने सत्यमंगलम टाइगर रिज़र्व में शहद संग्रहकर्ताओं के बीच एक नृवंशविज्ञान (एथ्नोग्राफिक) अध्ययन का नेतृत्व किया है और उन्हें रोप स्किल्स का प्रशिक्षण भी दिया है। उन्होंने रेनमैटर फाउंडेशन और होलेमाथी नेचर फाउंडेशन के साथ अपने काम के माध्यम से पर्यावरण और जलवायु संबंधी संचार पर भी काम किया है। तन्मयी ने फर्ग्युसन कॉलेज से दर्शनशास्त्र में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है।  
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