भारत में विकलांगता से प्रभावित लोगों की संख्या लाखों में है। देश में विकलांगता के क्षेत्र में काम करने वाले 62,500 से अधिक गैर-लाभकारी संगठन सक्रिय हैं। ये संगठन प्रारंभिक हस्तक्षेप और थैरेपी, शिक्षा, वकालत तथा देखभालकर्ताओं (केयरगिवर) के सहयोग जैसी अनेक सेवाएं प्रदान करते हैं। इसके बावजूद, सामाजिक क्षेत्र में विकलांगता आज भी सबसे कम फंडिंग प्राप्त करने वाले क्षेत्रों में से एक है।
लेकिन यह कमी आज भी क्यों बनी हुई है? और इसे दूर करने के लिए फंडर और गैर-लाभकारी संगठन क्या कर सकते हैं?
बेंगलुरु स्थित थिंक-टैंक पैक्टा की एक हालिया रिपोर्ट इस स्थिति को ‘कम फंडिंग का दुष्चक्र’ कहती है। इस क्रम में सबसे पहले कम फंडिंग के चलते संस्थाओं की क्षमता कमज़ोर पड़ती है। इसके कारण फंडर का संस्था पर भरोसा कमज़ोर होता है, और अंत में भरोसे में आई कमी फंडिंग को ख़त्म कर देती है। इस तरह यह चक्र लगातार खुद को दोहराता रहता है।
रिपोर्ट के निम्नलिखित निष्कर्ष बताते हैं कि यह चक्र किस प्रकार काम करता है और इसे तोड़ने के लिए फंडर तथा गैर-लाभकारी संगठनों को कौन-से कदम उठाने होंगे।
1. विकलांगता के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाएं बहुत हैं, लेकिन फंडिंग बेहद कम है
भारत के लगभग 10 प्रतिशत गैर-लाभकारी संगठन विकलांगता के क्षेत्र में कार्य करते हैं। इसके बावजूद, वर्ष 2022 में कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के कुल व्यय 26,000 करोड़ रुपये में से विकलांगता से जुड़े कार्यों को केवल 0.9 प्रतिशत, यानी लगभग 234 करोड़ रुपये की ही फंडिंग प्राप्त हुई।
यह अंतर दर्शाता है कि विकलांगता के क्षेत्र में किए जा रहे प्रयासों के पैमाने और उन्हें उपलब्ध वित्तीय सहयोग के बीच एक गहरा असंतुलन है। अनेक फंडर अब भी विकलांगता को एक विशिष्ट (स्पेशलाइज़्ड) विषय के रूप में देखते हैं, न कि एक ऐसे बहुआयामी मुद्दे के रूप में, जिसका संबंध शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका जैसे अनेक क्षेत्रों से है। यही वजह है कि फंडिंग के मामले में विकलांगता का मुद्दा अक्सर उन मुद्दों से पीछे रह जाता है, जिनसे फंडर अधिक परिचित होते हैं।
आंकड़े स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि विकलांगता के क्षेत्र को बेहतर फंडिंग की आवश्यकता है। रिपोर्ट के अनुसार, विकलांग व्यक्तियों में 64 प्रतिशत बेरोज़गार हैं और उनकी साक्षरता दर 52.2 प्रतिशत है, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 72 प्रतिशत है।
2. सरकारी प्राथमिकताओं में भी विकलांगता को पर्याप्त जगह नहीं मिलती
सरकार की प्राथमिकताएं अक्सर परोपकारी वित्तपोषण (फिलैंथ्रॉपिक फंडिंग) की प्राथमिकताओं को प्रभावित करती हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि वे यह संकेत देती हैं कि किन मुद्दों पर निवेश और ध्यान देने की ज़रूरत है। लेकिन भारत में विकलांगता से संबंधित संयुक्त सरकारी बजट का अनुमान जीडीपी का लगभग 0.04 प्रतिशत है, जो समान परिस्थितियों वाले कई देशों की तुलना में बेहद कम है। इसके अतिरिक्त, हालिया वर्षों में विकलांगता से संबंधित प्रमुख सरकारी योजनाओं के लिए वित्तपोषण में भी गिरावट है।


वर्तमान में केवल एक राज्य (असम) और केंद्र सरकार के तीन मंत्रालय ही विकलांगता-आधारित बजट (डिसएबिलिटी-डिसएग्रीगेटेड बजट) प्रकाशित करते हैं। जब सार्वजनिक व्यय की प्राथमिकताओं में विकलांगता स्पष्ट रूप से नज़र नहीं आती, तब फंडरों के लिए इसे एक दीर्घकालिक निवेश वाले क्षेत्र के रूप में स्वीकार करना और ज़्यादा मुश्किल हो जाता है।) और केंद्र सरकार के तीन मंत्रालय ही विकलांगता-आधारित बजट (डिसएबिलिटी-डिसएग्रीगेटेड बजट) प्रकाशित करते हैं। जब सार्वजनिक व्यय की प्राथमिकताओं में विकलांगता स्पष्ट रूप से नज़र नहीं आती, तब फंडरों के लिए इसे एक दीर्घकालिक निवेश वाले क्षेत्र के रूप में स्वीकार करना और ज़्यादा मुश्किल हो जाता है।
3. फंडिंग के मौजूदा मानदंड विकलांगता पर काम करने वाली संस्थाओं के पक्ष में नहीं हैं
रिपोर्ट के अनुसार, फंडर जिन चीज़ों को महत्व देते हैं और विकलांगता के क्षेत्र में काम जिस तरह आगे बढ़ता है, इसके बीच एक बड़ा अंतर है। फंडर आमतौर पर ऐसे परिणामों को प्राथमिकता देते हैं जिन्हें आसानी से मापा जा सके, बड़े पैमाने पर लागू किया जा सके और जिनके साथ मज़बूत संगठनात्मक व्यवस्था तथा स्पष्ट रिपोर्टिंग प्रणाली जुड़ी हो। इससे उन्हें यह तय करने में आसानी होती है कि किस संस्था को संसाधन दिए जायें और कहां निवेश का जोखिम कम है।
लेकिन विकलांगता के क्षेत्र में काम के नतीजे हमेशा स्पष्ट तौर पर नज़र नहीं आते। मसलन, किसी बच्चे का बात करना सीखना, किसी परिवार की सोच में बदलाव आना या किसी विकलांग व्यक्ति का वर्षों के सहयोग के बाद रोज़गार हासिल करना—ये सभी बड़ी उपलब्धियां हैं। लेकिन इन्हें किसी एक पैमाने से मापना आसान नहीं होता। ऐसे बदलाव धीरे-धीरे आते हैं और इसमें अक्सर कई साल लग जाते हैं।
रिपोर्ट में शामिल एक गैर-लाभकारी संस्था के प्रतिनिधि के शब्दों में, विकलांगता के क्षेत्र में काम के लिए “निरंतर, लंबे समय तक और समग्र सहयोग” की ज़रूरत होती है। लेकिन मौजूदा फंडिंग ढांचा अक्सर उन्हीं पहलों को प्राथमिकता देता है, जिनके परिणाम जल्दी दिखें और दूसरी परियोजनाओं से उनकी तुलना की जा सके।
4. फंडिंग की कमी के कारण संस्थाएं खुद को को फंडिंग के लायक नहीं बना पाती
कई संगठन फंडिंग इसलिए नहीं जुटा पाते क्योंकि संसाधनों की कमी उनकी संस्थागत क्षमता को ही सीमित कर देती है। फंडर आमतौर पर ऐसी संस्थाओं को प्राथमिकता देते हैं जिनके पास मजबूत अनुपालन (कम्प्लायंस) व्यवस्था, फंड जुटाने के लिए समर्पित कर्मचारी, प्रभाव का आकलन करने की स्पष्ट प्रणाली और बेहतर संस्थागत ढांचा हो। लेकिन इन क्षमताओं को विकसित करने के लिए भी पर्याप्त संसाधनों की ज़रूरत होती है।


विकलांगता के क्षेत्र में काम करने वाले कई संगठन छोटी टीमों और सीमित फंडिंग के साथ काम करते हैं। उन्हें मिलने वाला अधिकांश पैसा केवल कार्यक्रमों को चलाने तक सीमित होता है। ऐसे में वे न तो फंड जुटाने के लिए अलग टीम बना पाते हैं, न प्रभाव का आकलन करने की प्रणाली विकसित कर पाते हैं और न ही अपनी संस्थागत व्यवस्था को मज़बूत कर पाते हैं। यानी जिन संस्थाओं को सबसे ज़्यादा संस्थागत सहयोग की ज़रूरत होती है, वही अक्सर फंडरों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की स्थिति में नहीं होती।
इसका नतीजा यह होता है कि कम फंडिंग ही उन्हें उस स्तर तक पहुंचने से रोक देती है, जहां वे फंडरों की नज़र में फंडिंग पाने के लिए सक्षम संस्था बन सकें।
5. फंडिंग केवल काम की गुणवत्ता पर नहीं, बल्कि संबंधों पर भी निर्भर करती है
विकलांगता के क्षेत्र में काम करने वाले अनेक गैर-लाभकारी संगठनों के लिए फंडरों तक पहुंचना अब भी एक बड़ी चुनौती है। सर्वेक्षण में शामिल 52 संगठनों में से 35 ने बताया कि फंडर तक उनकी पहुंच सीमित है, जबकि 38 संगठनों ने कहा कि फंडर विकलांगता के मुद्दे में रुचि नहीं लेते।


यह समस्या विशेष रूप से छोटे शहरों, पूर्वोत्तर भारत और आकांक्षी ज़िलों में कार्यरत संगठनों के लिए अधिक गंभीर हैं। कई फंडर फैसला लेते समय अब भी व्यक्तिगत संपर्कों, सिफारिशों, क्षेत्रीय दौरों और पहले से बने रिश्तों पर काफी हद तक भरोसा करते हैं।
ऐसे में जिन संस्थाओं के पास पहले से मज़बूत नेटवर्क, पहचाना हुआ नेतृत्व या प्रभावशाली निदेशक मंडल होता है, उनके लिए फंडरों तक पहुंचना और उनका भरोसा जीतना अपेक्षाकृत आसान होता है। वहीं, नई और छोटी संस्थाओं के लिए किसी फंडर से पहली मुलाकात का अवसर मिलना ही सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन जाता है।
कुछ फंडर अब अलग तरीके से काम करने की कोशिश कर रहे हैं
रिपोर्ट ऐसे कई फंडरों का ज़िक्र करती है जिन्होंने पारंपरिक फंडिंग मॉडल से आगे बढ़कर विकलांगता के क्षेत्र में अधिक सोच-समझकर और दीर्घकालिक तरीके से निवेश करना शुरू किया है।
उदाहरण के लिए, बजाज फिनसर्व सीएसआर ने भारत में विकलांगता पर केंद्रित सबसे बड़े फंडिंग कार्यक्रमों में से एक विकसित किया है। यह 60 से अधिक गैर-लाभकारी संस्थाओं के साथ काम करता है। संस्था ने विकलांगता को व्यापक सामाजिक विकास कार्यक्रम का एक छोटा हिस्सा मानने के बजाय अपनी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल किया है। इसके तहत वह साझेदार संस्थाओं की क्षमता बढ़ाने में निवेश करती है, उनके साथ मिलकर दस्तावेज़ीकरण और प्रणालियों को मज़बूत बनाती है, और जहां संभव हो, लंबे समय तक सहयोग जारी रखती है।
इसी तरह, मारीवाला हेल्थ इनिशिएटिव और उपाध्याय फाउंडेशन जैसे फंडर केवल विस्तार या अल्पकालिक परिणामों पर ज़ोर देने के बजाय भरोसे, समुदाय की भागीदारी और काम की गहराई को अधिक महत्व देते हैं।
ये उदाहरण दिखाते हैं कि विकलांगता के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं के सामने मौजूद कई चुनौतियां स्वयं फंडिंग की मौजूदा व्यवस्था और उसके तौर-तरीकों से जुड़ी हैं। इसलिए, यदि फंडिंग का ढांचा बदलेगा, तो इन चुनौतियों को भी काफी हद तक बदला जा सकता है।
इस दुष्चक्र को तोड़ने के लिए फंडरों और गैर-लाभकारी संस्थाओं, दोनों को अपने तरीके बदलने होंगे
रिपोर्ट के अनुसार कम फंडिंग के इस दुष्चक्र को केवल तभी तोड़ा जा सकता है, जब फंडर और गैर-लाभकारी संस्थाएं, दोनों अपने काम करने के तौर-तरीकों में बदलाव लाएं। फंडरों के लिए रिपोर्ट कई सुझाव देती है। इनमें लंबी अवधि की और अप्रतिबंधित फंडिंग उपलब्ध कराना, अनुपालन (कम्प्लायंस) संबंधी प्रक्रियाओं को सरल बनाना और गैर-लाभकारी संस्थाओं के साथ अधिक पारदर्शिता बरतना शामिल है। खास तौर पर, उन्हें फंडिंग की समय-सीमा और चयन प्रक्रिया से जुड़े फैसलों के बारे में संस्थाओं को स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए। रिपोर्ट यह भी सुझाव देती है कि फंडर अपने मौजूदा पोर्टफोलियो में ही विकलांगता से जुड़े काम की पहचान करें। इसके लिए अलग से नई परियोजनाएं शुरू करने के बजाय वे शिक्षा, स्वास्थ्य या आजीविका जैसे क्षेत्रों में काम कर रही उन संस्थाओं को सहयोग दे सकते हैं, जिनका काम पहले से ही किसी न किसी रूप में विकलांगता से जुड़ा है।
वहीं रिपोर्ट गैर-लाभकारी संस्थाओं के लिए अनुपालन और संस्थागत व्यवस्था को मज़बूत करने तथा फंडिंग के स्रोतों में विविधता लाने की ज़रूरत पर ज़ोर देती है। यानी केवल सीएसआर पर निर्भर रहने के बजाय, उच्च निवल मूल्य वाले व्यक्तियों (एचएनआई), परोपकारी संस्थाओं और सेवा-शुल्क जैसे अन्य स्रोतों से भी संसाधन जुटाने की कोशिश की जानी चाहिए।
विकलांगता के क्षेत्र में काम करने वाले कई संगठन छोटी टीमों और सीमित फंडिंग के साथ काम करते हैं। उन्हें मिलने वाला अधिकांश पैसा केवल कार्यक्रमों को चलाने तक सीमित होता है।
रिपोर्ट सामूहिक रूप से फंडिंग जुटाने को भी एक प्रभावी रणनीति मानती है। इसमें एक राज्य में काम कर रही पांच संस्थाओं के साझा प्रयास का उदाहरण दिया गया है। साथ मिलकर काम करने से संस्थाएं फंडरों को यह दिखा सकती हैं कि अलग-अलग प्रयास किस तरह एक बड़े साझा लक्ष्य का हिस्सा हैं। इससे एक ही तरह के काम की पुनरावृत्ति से भी बचा जा सकता है।
रिपोर्ट का एक और दिलचस्प सुझाव यह है कि संस्थाएं अपने काम को किस तरह प्रस्तुत करती हैं, उन्हें इस पर भी ध्यान देना चाहिए। कई संस्थाओं ने बताया कि जब उन्होंने अपने काम को केवल विकलांगता के मुद्दे तक सीमित रखने के बजाय शिक्षा, आजीविका या मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषयों के संदर्भ में समझाया, तो उन्हें फंडरों से अधिक और लंबे समय तक सहयोग मिला।
रिपोर्ट यह भी कहती है कि प्रभाव को केवल मापना ही पर्याप्त नहीं है, उसे प्रभावी ढंग से सामने लाना भी उतना ही ज़रूरी है। यदि संस्थाएं विकलांग जनों, उनके देखभालकर्ताओं, अभिभावकों, शिक्षकों और नियोक्ताओं के अनुभवों को सामने लाएं, तो वे फंडरों को यह बेहतर ढंग से समझा सकती हैं कि विकलांगता के क्षेत्र में काम वास्तव में कैसा दिखता है और यह क्यों ज़रूरी है।
विकलांगता के क्षेत्र में कम फंडिंग के इस दुष्चक्र को समझाते हुए यह रिपोर्ट चर्चा का दायरा केवल अलग-अलग फंडिंग निर्णयों तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उन व्यापक व्यवस्थाओं की ओर भी ध्यान दिलाती है जो इन निर्णयों को प्रभावित करती हैं। यह दिखाती है कि फंडिंग के तौर-तरीके और संस्थाओं की क्षमता एक-दूसरे को लगातार प्रभावित करते हैं।
इसी वजह से, विकलांगता के क्षेत्र में काम और उसकी फंडिंग को लेकर सोचने का तरीका भी बदलने की ज़रूरत है।
अनुवाद सौजन्य: शब्द एआई
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