हाल ही में हमने देखा कि देशभर में युवा जवाबदेही की मांग करते हुए सड़कों पर उतर आए। उनके नारों की गूंज, गीतों की खनक और मीम्स में ख़िलाफत का अपना एक अलग अंदाज़ था। हमेशा की तरह सरकार और बड़े उद्योगपतियों ने उनकी तरफ आंखें मूंदकर रखी। लेकिन इस बार एक ख़ास तबके की चुप्पी ने भी सबका ध्यान खींचा। हम बात कर रहे हैं नॉन-प्रॉफिट, यानी गैर-लाभकारी संस्थाओं की।
हमारी टीम के कुछ सदस्यों ने बीते पूरे हफ़्ते सोशल मीडिया पर अलग-अलग संस्थाओं के अकाउंट पर नज़र बनाए रखी। ख़ासकर ऐसी संस्थाएं, जो युवाओं के साथ काम करती हैं। हम जानना चाहते थे कि जिन लोगों के लिए संस्थाएं काम करती हैं, वे मुश्किल समय में उनके साथ खड़ी हैं या नहीं?
हमने देखा कि केवल गिनती की कुछ संस्थाओं ने युवाओं के आंदोलन के समर्थन में कोई पोस्ट, स्टोरी या ट्वीट जारी किया। यानी जब युवा सत्ता को आईना दिखा रहे थे, तब सोशल सेक्टर ने उनकी मदद के लिए किसी भी तरह के डिजिटल संसाधन या सलाह मुहैया कराने की ज़हमत नहीं उठायी।
हम अक्सर सरकार, फिलैंथ्रॉपिस्ट, उद्योगों और पितृसत्तात्मक सोच रखने वाले समाज से लगातार जवाबदेही की मांग करते हैं। हम अक्सर कहते हैं कि वे समाज में अपना पूरा योगदान नहीं दे रहे हैं। लेकिन जब समय आया, तो हम ख़ुद कहीं खड़े नज़र नहीं आए। हम, जो ख़ुद को सामाजिक बदलाव का ज़रिया मानते हैं, इस पूरे दौर से गायब थे। जब युवाओं ने अपना भविष्य, रोज़गार और पूरा जीवन दांव पर लगाकर अपनी आवाज़ बुलंद की, तो हम पीछे हट गए। हमने अपनी ख़ामोशी को सबसे बेहतर विकल्प माना और चुपचाप एक कोने में बैठे रहे।
यह दोगलापन है।
हम अपने फंडर्स से साहस की उम्मीद करते हैं। उनसे कहते हैं कि वे हमारे एक्टिविज़्म और एडवोकेसी के संघर्षों में हमारे साथ खड़े हों। हम उनसे अपील करते हैं कि वे मानवाधिकार, सामाजिक न्याय, कानूनी सुधार और स्वतंत्र मीडिया के पक्ष में काम करने वाली आवाज़ों का हाथ थामें। हम उनसे उम्मीद करते हैं कि वे अपने कारोबार पर पड़ने वाले जोखिमों से डरे बिना अपनी ताक़त का इस्तेमाल उन लोगों के लिए करें, जिनकी आवाज़ अक्सर दबा दी जाती है। और जब वे जोखिम उठाने के बजाय कोई सुविधाजनक रास्ता चुनते हैं, तो हम उनकी आलोचना करने से भी नहीं चूकते।


हम जिन युवाओं और उनके परिवारों के साथ काम करते हैं, उनसे भी साहस की उम्मीद करते हैं। हम लड़कियों से कहते हैं कि वे कॉलेज जाने के अपने अधिकार के लिए डटकर खड़ी हों, नौकरी के लिए दूसरे शहर जाने का फ़ैसला ख़ुद लें, कम उम्र में शादी का विरोध करें और यह तय करने का अधिकार अपने हाथ में रखें कि परिवार कब और कैसे शुरू करना है। हम उनकी मांओं से भी कहते हैं कि वे घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएं, परिवार के दबाव के आगे न झुकें, कम बच्चे पैदा करने का फ़ैसला लें और समाज की तमाम बंदिशों को चुनौती दें।
हम हमेशा दूसरों से साहस की उम्मीद करते हैं। हम चाहते हैं कि वे आगे बढ़ें, जोखिम उठाएं और उन रूढ़ियों को तोड़ें, जो उनकी रोज़ी-रोटी ही नहीं, उनकी जान भी ले सकती हैं।
लेकिन जब हमारी बारी आती है, तो हम कौन-सा रास्ता चुनते हैं?
कड़वा सच यह है कि हम ख़ुद साहस की कसौटी पर खरे नहीं उतरे हैं।
पिछले एक हफ़्ते में हमारी बातचीत कई बड़ी, ज़्यादातर शहरी नॉन-प्रॉफिट संस्थाओं के प्रमुखों से हुई। लगभग हर बातचीत में एक ही बात बार-बार सुनने को मिली। अगर उन्होंने खुलकर कुछ कहा, तो उनका एफसीआरए लाइसेंस रद्द हो सकता है। फंडर्स साथ छोड़ सकते हैं। और अगर संस्था ही बंद हो गयी, तो हज़ारों लोगों की नौकरियां चली जाएंगी, प्रोग्राम ठप पड़ जाएंगे, और जिन युवाओं के साथ वे काम करते हैं, उन्हें सहारा देने वाला कोई नहीं बचेगा।
इन सभी तर्कों के पीछे कुछ ऐसी धारणाएं हैं, जिन पर हमें ठहरकर सोचने की ज़रूरत है।
क्या हम यह मान बैठे हैं कि नॉन-प्रॉफिट संस्थाओं के बिना समुदाय असहाय हो जाएंगे? कि अगर कोई एक संस्था बंद हो जाए, तो लोग अपने हक़ के लिए लड़ना छोड़ देंगे? कि वे अपनी ज़िंदगी के फ़ैसले लेने और बदलाव की राह ख़ुद बनाने में सक्षम नहीं हैं?
यह सच है कि बहुत सी संस्थाओं को अपनी कथनी और करनी में सत्ता से असहमत होने के चलते अक्सर निशाना बनाया गया है। लेकिन क्या यह कोई नई बात है?
जब हमने इस सेक्टर में काम करने का फ़ैसला किया था, क्या तब हम नहीं जानते थे कि शायद एक दिन हमें इसकी कीमत भी चुकानी पड़ सकती है?
जब हमने समुदायों से कहा कि वे वह करें, जो उन्होंने पहले कभी न किया हो, तब हम जानते थे कि एक दिन हमें भी वही करना होगा। उनके साथ खड़ा होना होगा। वही जोखिम उठाना होगा।
हम यह भी जानते थे कि ऐसे दौर में, जहां असहमति की गुंजाइश लगातार सिमटती जा रही हो, एक सिविल सोसाइटी संगठन होने की यही कीमत है।
तो फिर आज हम किस बात से पीछे हट रहे हैं?
ज़रा सोचिए। अगर हमने सचमुच साहस दिखाया होता, तो क्या होता?
आख़िर क्या होगा अगर हम में से कुछ संस्थाएं ही सही, खुलकर बोलें? उन लोगों के साथ खुलकर खड़ी हों, जिनके लिए हम हर दिन काम करने का दावा करते हैं – युवा, किसान, महिलाएं और अल्पसंख्यक समुदाय।
हो सकता है तब, जब सरकार हमारे ख़िलाफ़ कार्रवाई का डर दिखाए या एफसीआरए, 12A और 80G जैसे नियमों को और कड़ा करे, तो हम भी अपने अधिकारों के लिए डटकर खड़े होना सीख जाएं।
हो सकता है तब हम सेक्टर की बदहाली पर बंद कमरों और व्हाट्सऐप ग्रुप्स में अफ़सोस जताने के बजाय, खुलकर अपनी बात कहें। अन्याय के ख़िलाफ़ लिखें। बदलाव की मांग कर रहे लोगों के साथ सड़कों पर उतरें। अपनी सामूहिक आवाज़ इतनी बुलंद करें, कि उसे अनसुना करना मुश्किल हो जाए।
बेशक, हमें इसकी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है। हमारा लाइसेंस रद्द हो सकता है। सालों की मेहनत से खड़ी की गई संस्थाएं बंद हो सकती हैं। जिन समुदायों के साथ हम काम करते हैं, उन्हें भी कुछ समय के लिए इसका असर झेलना पड़ सकता है।
लेकिन अगर सच बोलने और सही के साथ खड़े होने की वजह से कुछ संस्थाएं बंद हो जाती हैं, तो यह एक मज़बूत सिविल सोसाइटी का अंत नहीं, उसकी शुरुआत होगी। क्योंकि कोई भी काम सिर्फ किसी एक संस्था के सहारे नहीं चलता है। जिस दिन हम यह समझ जायेंगे कि जो काम हम कर रहे हैं, वह बस हमारे बलबूते नहीं चल रहा है, उसी दिन हम अपनी असफलता को भी स्वीकार करना सीख जाएंगे।
शायद हमारे कुछ प्रोग्राम बंद हो जाएं। शायद हम किसी बड़ी संस्था के फाउंडर या एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर न रहें। शायद कुछ लोगों की नौकरियां चली जाएं।
लेकिन जिस दिन हम यह सब खो देने के डर से बाहर आ जाएंगे, उस दिन हमारे अंदर सच बोलने का साहस भी आ जाएगा। अपने अधिकारों के लिए खड़े होने का साहस। उन लोगों के साथ बिना किसी हिचक के खड़े होने का साहस, जिनके साथ होने का वादा हम हमेशा से करते आए हैं।
और सबसे अहम बात। अगली बार जब हम अपने समुदायों से साहस की उम्मीद करेंगे, तब हमें यह डर नहीं होगा कि वे पलटकर हमसे पूछ बैठेंगे – जब हमारी बारी आई थी, तब आप कहां थे? हम उनसे कदम से कदम मिलाकर यह कह सकेंगे कि जब जंतर-मंतर पर युवा अपनी जान जोखिम में डाले हुए थे, जब केन-बेतवा में महिलाएं अपने अधिकारों के लिए नदी में उतरी हुई थी, और जब ऋषिकेश में लोग पेड़ों को बचाने के लिए उनसे लिपटकर खड़े थे, तब हम तमाशबीन नहीं बने हुए थे।
शायद उस दिन वह हम पर भरोसा करेंगे। इसलिए नहीं कि हमने उनके लिए काम किया। बल्कि इसलिए, कि सबसे मुश्किल वक़्त में हम चुप नहीं थे।
बरसों से हम शिकायत करते आए हैं कि सोशल सेक्टर की आवाज़ कमज़ोर पड़ती जा रही है। हमारी बात सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंचती। बदलाव की गुंजाइश लगातार सिमटती जा रही है। लेकिन अब समय आ गया है कि हम अपने भीतर झांकें और ख़ुद से पूछें कि आख़िर ऐसा क्यों है?
अगर हमें इस देश में अपनी जगह बनाए रखनी है, तो हमें कम-से-कम उतना साहस तो दिखाना ही होगा, जितना इस देश के आम नागरिक हर दिन दिखाते हैं।
वरना वह दिन दूर नहीं, जब हम बदलाव की ताक़त बनने के बजाय, सत्ता के हाथों का एक औज़ार बनकर रह जाएंगे।
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