लोकतंत्र
‘जब सड़कें सूनी हों, तो संसद आवारा हो जाती है’
आंदोलन सिर्फ विरोध नहीं, लोकतंत्र में अपने हक़ की लड़ाई लड़ने, दबाई गई आवाज़ों को बुलंद करने, सत्ता से जवाब मांगने और समाज को बदलने की ताकत हैं।कौन बोला, कौन बोला ?
कानों की गुस्ताख़ियां माफ हों!सरपंच और पंचायत: सिर्फ कप्तान नहीं, पूरी टीम को तैयार करना होगा
पंचायती राज संस्थाओं को मज़बूत करने का मतलब सिर्फ ग्राम पंचायतों को बेहतर करना नहीं है। इसके लिए उनके साथ जुड़े पूरे तंत्र को मज़बूत करना होगा।“आपका सबसे बड़ा दुश्मन आपका डर है”
सिविल सोसाइटी में काम करना कभी आसान नहीं रहा। लेकिन हम सबको खुद से यह सवाल पूछना होगा कि आखिर हम किसके पक्ष में खड़े हैं?ज़ुल्मतों के दौर में सोशल सेक्टर की चुप्पी
सिविल सोसाइटी की पहचान सिर्फ़ उसके काम से नहीं, बल्कि इस बात से बनती है कि वह मुश्किल समय में किसके साथ खड़ी होती है।प्यारे आंदोलन, …..
वह कभी किसान बनकर लौटता है, कभी छात्र, कभी जंगल, कभी पहाड़। उसका आना सड़क और संसद, दोनों के लिए ज़रूरी है। इसलिए आज एक खुला ख़त, आंदोलन के नाम।क्या दिल्ली के गांवों का शहर पर हक़ नहीं है?
जून 2025 में दिल्ली के नारायणा गांव में एक जनसुनवाई हुई। इसने दशकों की सरकारी उपेक्षा के साथ-साथ स्थानीय समुदाय के उभरते प्रतिरोध को भी सामने रखा।सपनापुर में आख़िरी आदमी की तलाश!
लोकतंत्र का हाल चाहे कितना बेहाल हो, आंकड़े उसे सुंदर बना ही देते हैं। नमस्कार, आज के मुख्य समाचार!
अगर सोशल सेक्टर की खबरें भी हिंदी के समाचारों की तरह छपती, तो शायद हर न्यूज़ ब्रेकिंग न्यूज़ होती!तारीख पर तारीख!
गांव और शहर के चुनाव में उतना ही फर्क है, जितना घर की दीवार और फेसबुक वॉल में।