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ज़मीनी संस्थाएं फंडर से कैपेसिटी बिल्डिंग और संस्थागत विकास पर बातचीत कैसे करें?

क्षमता निर्माण और संगठनात्मक विकास को अक्सर परियोजनाओं से अलग ज़रूरत माना जाता है, जबकि यही किसी संस्था के दीर्घकालिक सामाजिक प्रभाव की बुनियाद हैं। दानदाताओं के साथ संवाद और नेगोशिएशन की रणनीति इस सोच को बदलने में अहम भूमिका निभा सकती है।

फोर्ब्स फाउंडेशन द्वारा समर्थित क्षमता वर्धन (कैपेसिटी बिल्डिंग) पर आधारित सात लेखों की यह श्रृंखला ज़मीनी संस्थाओं के काम के असर को बेहतर बनाने के लिए ज़रूरी बातों पर ध्यान देती है। इसका उद्देश्य संस्थाओं और उनसे जुड़े लोगों को ऐसी आसान और उपयोगी जानकारी देना है, जिससे वे अपने नेतृत्व, अंदरूनी व्यवस्थाओं, काम करने के तरीकों और संसाधनों को बेहतर बना सकें।

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पिछले कुछ वर्षों में विकास क्षेत्र में ‘सिस्टम्स’, ‘लीडरशिप’, ‘थ्योरी ऑफ चेंज’ और ‘ऑर्गेनाइजेशनल डेवलपमेंट’ जैसे शब्द तेज़ी से चर्चा में आए हैं। लेकिन ज़मीनी स्तर पर काम करने वाली संस्थाओं का अनुभव बताता है कि इन विषयों पर बात करना जितना आसान है, इनके लिए संसाधन जुटाना उतना ही कठिन।

इस पर उड़ीसा की स्प्रेड संस्था के संस्थापक बिद्युत मोहंती कहते हैं, “आज फंडिंग पहले से कहीं अधिक प्रतिस्पर्धी, परिणाम-आधारित, प्रोजेक्ट ओरियेटेंड और बहुत ज़्यादा नियम-कायदों वाली (compliance-heavy) हो चुकी है। ऐसे में कई छोटी संस्थाएं अपना अधिकांश समय अगला ग्रांट पाने में लगा देती हैं।

और धीरे-धीरे हम अपनी ज़रूरतों जैसे, टीम का विकास, नेतृत्व, सिस्टम, फाइनेंस, टेक्नोलॉजी या गवर्नेंस आदि में पीछे छूट जाते हैं। फिर इन्हीं चीज़ों की कमी के कारण बाद में संस्था की क्षमता और प्रभाव पर गहरा असर पड़ता है। इसलिए यह बहुत ज़रूरी है कि संस्थाएं सामुदायिक विकास के साथ-साथ संस्थागत विकास पर भी गौर करें।”

क्या ज़मीनी संस्थाएं फंडर से संस्थागत विकास पर बात कर सकती हैं?

कई संस्थाओं के साथियों के साथ हमारी बातचीत के आधार पर निकले अनुभव बताते हैं कि अक्सर फंडर से संस्थागत विकास पर बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकलता। लेकिन फिर भी संस्था को निश्चित तौर पर इसके लिए फंडर से बातचीत करनी चाहिए। 

इस पर राजस्थान के अजमेर ज़िले की संस्था जीएसवीएस के निदेशक अभय कहते हैं, “पिछले कुछ वर्षों में फंडिंग का पैटर्न भी बदला है। अब संस्थाएं और फंडर ज़्यादा प्रोफ़ेशनल हो गए हैं। जैसे, आप प्रोजेक्ट के बजट का 10-20 फीसदी हिस्सा ही संस्थागत विकास, एचआर आदि पर खर्च कर सकते हैं। यही नहीं इन वर्षों में प्रोजेक्ट्स में फंडर की भागीदारी इतनी बढ़ी है कि संस्थाओं के पास धरातल पर काम करने के जो अनुभव और वास्तविकताएं हैं उन्हें साझा करने की जगहें काफी कम हो गई हैं। इसलिए अपनी बात कहने के लिए बहुत ठोस आधार चाहिए।”

ऐसे में संस्थाओं के लिए किसी फंडर से अपनी बात कहना आसान नहीं रह गया है। उदयपुर की जतन संस्था के संस्थापक निदेशक कैलाश बृजवासी भी इस बात पर ज़ोर देते हैं कि आजकल अधिकतर प्रोजेक्ट्स के लिए फंडिंग संस्थाओं द्वारा तय किए गए फॉर्मेट में आती है। इस वजह से इसमें संस्थागत विकास या कैपेसिटी बिल्डिंग के लिए फंड जोड़ने की ज़्यादा गुंजाइश नहीं होती है। लेकिन फिर भी बात करने से ही बात बनती है।

तो फंडर से कैसे करें बात की शुरुआत कि बात बन जाए? 

1. आप फंडर से जो चाहते हैं उसके बारे में खुद भी स्पष्ट रहें

ज़मीनी संस्थाओं की कैपेसिटी बिल्डिंग पर काम करनी वाली संस्था ‘आत्मा’ से कविता और तरुणा बताती हैं कि जब ज़मीनी संस्थाएं फंडर से कैपेसिटी बिल्डिंग या संस्थागत विकास की बातचीत शुरू करती हैं, तो अक्सर वे अपनी ज़रूरत को सही तरीके से और स्पष्टता के साथ नहीं बता पातीं। सिर्फ यह कहना कि हमें प्रशिक्षण चाहिए, पर्याप्त नहीं होता। फंडर यह भी जानना चाहता है कि वह प्रशिक्षण संगठन की किस कमी को दूर करेगा और उससे कार्यक्रम के परिणामों पर क्या असर पड़ेगा।

कैपेसिटी बिल्डिंग की ज़रूरत को संगठन के दीर्घकालिक लक्ष्यों से जोड़ें: यदि आपकी संस्था अगले दो वर्षों में अपने फंडर्स का दायरा बढ़ाना चाहती है अथवा फंडिंग में विविधता लाना चाहती है, तो इसके लिए फंडरेज़िंग (Fundraising), कम्यूनिकेशन या संसाधन जुटाने वाली टीमों की कैपेसिटी बढ़ाने को अपनी संस्था के दीर्घकालिक लक्ष्यों में शामिल करें। इस तरह का तर्क फंडर के लिए अधिक प्रभावी होता है।

महसूस की गई ज़रूरत और वास्तविक ज़रूरत में अंतर समझें: कई बार किसी संस्था को लगता है कि उसे नई तकनीक की ज़रूरत है, जबकि हो सकता है कि असल समस्या तकनीक के साथ-साथ डेटा प्रबंधन, वित्तीय प्रणालियों या प्रोजेक्ट प्रबंधन से जुड़ी हो। सही आवश्यकता की पहचान आपकी विश्वसनीयता बढ़ाती है।

अपनी तैयारी और प्रतिबद्धता दिखाएं: फंडर को यह भरोसा दिलाएं कि आपकी टीम केवल फंडिंग की अपेक्षा नहीं कर रही, बल्कि सीखने, बदलाव लाने और नई प्रक्रियाओं को अपनाने के लिए समय और ऊर्जा लगाने को भी तैयार है।

2. अपने फंडर को समझें

हो सकता है कि हमें हर फंडर के साथ बातचीत के मौके न मिलें, लेकिन हमें ऐसे मौके तलाशने होंगे। अभय बताते हैं, “हमारे लिए भी संस्थागत विकास के लिए फंडिंग निकालना अधिकतर आसान नहीं होता। इसके लिए पहले आप अपने फंडर को समझिए। अक्सर सीएसआर से जुड़ी फंडिंग में आपको मौका कम मिलेगा, क्योंकि उनके फॉर्मेट लगभग तय होते हैं। लेकिन विदेशी फंडिंग के मामले में इस विषय को लेकर गुंजाइश रहती है। दूसरी तरफ अब कुछ स्थानीय फंडर भी इसके बारे में समझते हैं। हाल ही में हमें एक स्थानीय फंडर के सामने अपनी बात रखने का मौका मिला, बाद में वे हमसे सहमत हो गए।”

इसी बारे में कैलाश बृजवासी कहते हैं, “हम प्रोजेक्ट में उपलब्ध कैपेसिटी बिल्डिंग के बजट के भीतर ही संस्थागत विकास के कुछ हिस्से शामिल कर लेते हैं और इसकी जानकारी फंडर को भी दे देते हैं। हमारे एक फंडर ने बोर्ड सदस्यों को संस्थागत प्रशिक्षण में शामिल करने की अनुमति दी थी। अगर आपके और आपके फंडर के बीच एक समझ बन जाए तो काम बन जाता है।”
आत्मा संस्था से कविता और तरुणा इसमें जोड़ती हैं कि नए फंडर की तुलना में वह फंडर, जो आपकी यात्रा देख चुका होता है, कैपेसिटी बिल्डिंग के लिए ज़्यादा तैयार होता है। विश्वास यहां सबसे बड़ी पूंजी होती है।

3. फंडर को बताएं कि संस्थागत विकास प्रोजेक्ट से अलग चीज़ नहीं

आमतौर पर संस्थाएं संस्थागत विकास अथवा कैपेसिटी बिल्डिंग को फंडर के सामने एक “अतिरिक्त ज़रूरत” की तरह प्रस्तुत करती हैं, मानो कार्यक्रम की फंडिंग ही असली काम हो और कैपेसिटी बिल्डिंग उससे अलग कोई चीज़ हो। यह सोच बातचीत को शुरू से ही कमज़ोर कर देती है। जब तक संस्था स्वयं कैपेसिटी बिल्डिंग को अपनी मुख्य प्राथमिकताओं में शामिल नहीं करेगी, तब तक फंडर भी उसे उसी नज़र से देखेगा। 

संस्थाओं को संस्थागत विकास और कैपेसिटी बिल्डिंग को प्रोग्राम के लाइन बजट का हिस्सा बनाना होगा, ताकि कम से कम फंडर के साथ इस पर बातचीत की शुरुआत तो हो सके। यदि फंडर व्यापक कैपेसिटी बिल्डिंग कार्यक्रम के लिए तैयार नहीं है तो:

छोटी शुरुआत करने से भी नहीं हिचकें: इसके लिए निगरानी एवं मूल्यांकन (Monitoring & Evaluation), वित्तीय प्रबंधन या नेतृत्व विकास जैसे किसी एक क्षेत्र से शुरुआत की जा सकती है। उसके परिणामों का दस्तावेज़ीकरण करें और अगली बार फंडिंग के लिए फंडर से बातचीत करते समय उन्हें दिखाएं कि कैपेसिटी बिल्डिंग में किया गया निवेश कार्यक्रम की गुणवत्ता, प्रभाव और दीर्घकालिक परिणामों को कैसे बेहतर बनाता है। साथ ही, कार्यक्रम की गतिविधियों और उनके परिणामों के बीच का स्पष्ट संबंध भी सामने रखें।

4. ‘थ्योरी ऑफ़ चेंज’ में मौके तलाशें

आज अधिकांश फंडर प्रोजेक्ट प्रस्तावों में थ्योरी ऑफ़ चेंज शामिल करने के लिए कहते हैं। यानी संस्था को यह बताना होता है कि उसकी गतिविधियां अपेक्षित बदलाव तक किस तरह पहुंचेंगी।कैलाश बृजवासी का मानना है कि यही वह हिस्सा है, जहां संस्थाएं कैपेसिटी बिल्डिंग और संस्थागत विकास की ज़रूरत को मज़बूती से रख सकती हैं। वे कहते हैं,आजकल प्रोजेक्ट में फंडर ‘थ्योरी ऑफ़ चेंज के बारे में पूछते हैं। नाम भले बदल गए हों, लेकिन इसी सेक्शन में सबसे ज्यादा संभावनाएं हैं। आप यहाँ उन्हें यह स्पष्ट कर सकते हैं कि अगर टीम प्रशिक्षित नहीं होगी, नेतृत्व मज़बूत नहीं होगा या संस्थागत प्रक्रियाएं बेहतर नहीं होंगी, तो अपेक्षित बदलाव हासिल करना मुश्किल होगा।”

उनके अनुसार, अधिकांश संस्थाएं यह गलती करती हैं कि वे थ्योरी ऑफ़ चेंज को केवल समस्या और समाधान तक सीमित रखती हैं। जबकि यह बताना भी उतना ही ज़रूरी होता है कि संस्था खुद उस बदलाव को लागू करने के लिए कितनी सक्षम है और उसे किन क्षमताओं को विकसित करने की आवश्यकता है।

5. फंडर से बात करने से पहले कार्यप्रणाली और आंतरिक प्रक्रियाएं मज़बूत करें

अक्सर फंडर ऐसी संस्थाओं के साथ काम करना चाहते हैं जिनकी कार्यप्रणाली और आंतरिक प्रक्रियाएँ पहले से मज़बूत हों। नई या छोटी संस्थाओं को उस स्तर तक पहुँचने के लिए फंडर्स से आवश्यक सहयोग नहीं मिल पाता। इस पर अभय कहते हैं, “हमने अपने पॉलिसी दस्तावेज़ों में यह स्पष्ट किया है कि हम कार्यकर्ताओं को पीएफ आदि सामाजिक सुरक्षा के लाभ देते हैं। कई बार जब प्रोजेक्ट में इस पर बात आती है, तो हमारे पुराने दस्तावेज़ इसमें आधार का काम करते हैं। इससे फंडर का विश्वास मज़बूत होता है।

इसके अलावा, जिस संस्था का काम ज़मीन पर दिख रहा हो या जिसने अपने कार्यक्रमों के ठोस परिणाम दिखाए हों उसमें निवेश करना फंडर को तार्किक लगता है। तब फंडर के लिए कैपेसिटी बिल्डिंग जोखिम नहीं, बल्कि किसी संस्था की गति को बढ़ाने वाला बन जाता है। इसीलिए जब भी आपको अपने फंडर को अपना काम दिखाने का मौका मिले, तो उन्हें फील्ड विज़िट ज़रूर करवाइए। 

इसके अलावा, अगर संस्था ने फंडर को पिछले कैपेसिटी बिल्डिंग निवेश का हिसाब दिया हो और उसने उसके नतीजों का दस्तावेज़ीकरण किया हो, चाहे वह संक्षिप्त ही क्यों न हो, तो फंडर से अगली बार की बातचीत आसान हो जाती है।

एक कमरे में अलग-अलग समूहों में बैठकर काम और चर्चा करते कुछ लोग_ज़मीनी संस्थाएं
जब तक संस्था स्वयं केपेसिटी बिल्डिंग को अपनी मुख्य प्राथमिकताओं में शामिल नहीं करती, तब तक फंडर भी उसे उसी नज़र से देखेगा। | चित्र साभार: आत्मा

फंडर से बात कब करें?

कैपेसिटी बिल्डिंग के बारे में फंडर से बातचीत का कोई सही और तयशुदा समय नहीं होता। आप फंडिंग के ‘पहले’ या ‘बाद में’ कभी भी मौका मिलने पर उनसे बात कर सकते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि किसी बातचीत की शुरुआत करने के लिए किसी एक पक्ष को पहला कदम उठाना पड़ता है और अक्सर यह कदम संस्था को ही उठाना होता है।

इस पर कैलाश बृजवासी और मोहंती कहते हैं, “अक्सर संस्थाए इस विषय पर फंडर के साथ बात ही नहीं करतीं। आगे कोई नतीजा निकलेगा या नहीं इसके लिए पहला आधार ही बात करना होता है। फंड मिलने से पहले और बाद में फंडर से बात करते समय संस्थाओं को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए:

फंड मिलने से पहले: इस चरण में बातचीत का मकसद यह समझना होना चाहिए कि फंडर कैपेसिटी बिल्डिंग और संगठनात्मक विकास को किस दृष्टि से देखता है और वह किस प्रकार का सहयोग देने के लिए तैयार है। इस दौरान संस्था बहुत अधिक तकनीकी या विस्तृत विवरण में जाए बगैर फंडर को अपनी व्यापक ज़रूरतों और दीर्घकालिक लक्ष्यों का परिचय दे सकती है।

फंड मिलने के बाद: जब साझेदारी स्थापित हो जाती है और फंडर संस्था को बेहतर ढंग से समझने लगता है, तब फंडर के साथ कैपेसिटी बिल्डिंग और संस्थागत विकास पर अधिक खुलकर और ईमानदारी से चर्चा की जा सकती है। यही वह चरण है, जहाँ ज़रूरत का आकलन करने, संस्थागत तैयारी और कैपेसिटी बिल्डिंग के लिए ठोस कार्य-योजना पर मिलकर विचार किया जाना चाहिए। 

बिद्युत मोहंती कहते हैं, “हम अक्सर प्रोजेक्ट को मज़बूत बनाने की बात करते हैं, लेकिन प्रोजेक्ट अपने-आप मज़बूत नहीं होते। उन्हें मज़बूत संस्थाएं चलाती हैं। अगर हम संस्थाओं में निवेश नहीं करेंगे, तो आगे चलकर कार्यक्रमों की गुणवत्ता भी प्रभावित होगी।”

शायद यही इस पूरी चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष भी है। संस्थागत विकास के लिए फंडर को मनाने का कोई एक तय फॉर्मूला या सार्वभौमिक मॉडल नहीं है। हर संस्था, हर फंडर और हर साझेदारी की अपनी परिस्थितियां होती हैं।

लेकिन यदि संस्थाएं अपनी ज़रूरतों को स्पष्ट रूप से रख सकें और फंडर उन्हें कार्यक्रम की गुणवत्ता, जवाबदेही और दीर्घकालिक प्रभाव से जोड़कर देख सकें तो बातचीत की दिशा बदल सकती है। तब यह बातचीत अतिरिक्त बजट की मांग से आगे बढ़कर बेहतर सामाजिक बदलाव में निवेश की बातचीत बन सकती है। शायद तभी बात बन सकती है।

इस लेख में प्रस्तुत विचार जतन संस्था के कैलाश बृजवासी, स्प्रेड संस्था के बिद्युत मोहंती, जीएसवीएस के अभय तथा आत्मा संस्था की तरुणा और कविता के साथ हुई बातचीत और उनके साझा अनुभवों पर आधारित हैं।

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लेखक के बारे में

  • राकेश स्वामी आईडीआर में सह-संपादकीय भूमिका मे हैं। वह राजस्थान से जुड़े लेखन सामग्री पर जोर देते हैं। राकेश के पास राजस्थान सरकार के नेतृत्व मे समुदाय के साथ कार्य करने का एवं अकाउंटेबलिटी इनिशिएटिव, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च मे लेखन एवं क्षमता निर्माण का भी अनुभव है। राकेश ने आरटीयू यूनिवर्सिटी, कोटा से सिविल अभियांत्रिकी में स्नातक किया है।
  • रजिका सेठ आईडीआर हिंदी की प्रमुख हैं, जहां वह रणनीति, संपादकीय निर्देशन और विकास का नेतृत्व सम्भालती हैं। राजिका के पास शासन, युवा विकास, शिक्षा, नागरिक-राज्य जुड़ाव और लिंग जैसे क्षेत्रों में काम करने का 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है। उन्होंने रणनीति प्रशिक्षण और सुविधा, कार्यक्रम डिजाइन और अनुसंधान के क्षेत्रों में टीमों का प्रबंधन और नेतृत्व किया। इससे पहले, रजिका, अकाउंटेबिलिटी इनिशिएटिव, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में क्षमता निर्माण कार्य का निर्माण और नेतृत्व कर चुकी हैं। रजिका ने टीच फॉर इंडिया, नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी और सीआरईए के साथ भी काम किया है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में बीए और आईडीएस, ससेक्स यूनिवर्सिटी से डेवलपमेंट स्टडीज़ में एमए किया है।

फोर्ब्स फाउंडेशन द्वारा समर्थित क्षमता वर्धन (कैपेसिटी बिल्डिंग) पर आधारित सात लेखों की यह श्रृंखला ज़मीनी संस्थाओं के काम के असर को बेहतर बनाने के लिए ज़रूरी बातों पर ध्यान देती है। इसका उद्देश्य संस्थाओं और उनसे जुड़े लोगों को ऐसी आसान और उपयोगी जानकारी देना है, जिससे वे अपने नेतृत्व, अंदरूनी व्यवस्थाओं, काम करने के तरीकों और संसाधनों को बेहतर बना सकें।

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