अप्रेज़ल: सबका अप्रैल एक जैसा नहीं होता

देश में अप्रैल का महीना एक साथ कई रंग लेकर आता है। आम के पेड़ों में बौर आती है, और परीक्षाओं के नतीजे भी। साथ ही देशभर के दफ्तरों में एक अजीब किस्म की बेचैनी भी पसरने लगती है। इस बेचैनी को हिंदी में मूल्यांकन और नौकरीपेशा ज़ुबान में अप्रेज़ल कहा जाता है।
अप्रेज़ल से ठीक पहले कॉर्पोरेट कर्मचारी सालभर की उपलब्धियों की सूची बनाते हैं, और अपने मैनेजर को उतना प्यार देते हैं जितना माता-पिता अपनी पहली संतान को देते हैं। कुछ कर्मचारी तो कंपनी के लिए किए गए काम की 30 पेज की पीपीटी तक बना देते हैं, और उसका सारा क्रेडिट अपने मैनेजर को देते हैं।
सरकारी कर्मचारी इस आपाधापी से थोड़ा परे रहते हैं। उन्हें पता है कि जनवरी में तनख्वाह बढ़ चुकी है। वे तो बस बकाये का इंतज़ार करते हैं, जो अप्रैल तक आता है। बाकी वे खुश हैं कि इस बार अप्रैल में चुनाव भी हैं। सरकारी कर्मचारियों के लिए चुनाव वैसा ही है, जैसे धान के लिए मॉनसून।
वहीं दूर कहीं किसी गांव में ज़मीनी बदलाव लाने के लिए पसीना बहाती एनजीओ कर्मचारी को अप्रैल में बताया गया कि उसके काम का बहुत बड़ा इम्पैक्ट हुआ है। ऐसी ही बात उसे पिछले साल और पिछले के पिछले साल भी बताई गई थी। उसकी अथक मेहनत का इम्पैक्ट सब पर हो रहा था, बस उसके वेतन पर नहीं।
उधर दिल्ली में दौड़-धूप कर रहे डिलीवरी वाले भैया को इससे फर्क ही नहीं पड़ता कि ये कौन सा महीना है। उनका जीवन कैलेंडर नहीं, बल्कि घड़ी के घंटे, मिनट और कभी-कभी सेकेंड वाले हाथों को देखते हुए बीतता है। उनके काम का मूल्यांकन तो ग्राहक हर बार रेटिंग देकर कर ही देते हैं। कभी पांच सितारा, कभी एक और कभी कुछ भी नहीं।
इसे संयोग ही कहिए कि इस अप्रैल में ही देश के मज़दूरों को भी पता लग गया कि उनकी बात यूं नहीं सुनी जाएगी। इसलिए वे सड़क पर आकर फैक्टरी मालिकों, मीडिया और सरकारों को याद दिला रहे हैं कि उनका अप्रेज़ल तो अनंत काल से नहीं हुआ है।

लेखक के बारे में
- राकेश स्वामी आईडीआर में सह-संपादकीय भूमिका मे हैं। वह राजस्थान से जुड़े लेखन सामग्री पर जोर देते हैं। राकेश के पास राजस्थान सरकार के नेतृत्व मे समुदाय के साथ कार्य करने का एवं अकाउंटेबलिटी इनिशिएटिव, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च मे लेखन एवं क्षमता निर्माण का भी अनुभव है। राकेश ने आरटीयू यूनिवर्सिटी, कोटा से सिविल अभियांत्रिकी में स्नातक किया है।
- सलमान फहीम, आईडीआर के सभी डिजिटल कैंपेन व कंटेंट प्लानिंग तथा उसके प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी संभालते हैं। इससे पहले सलमान द लॉजीकल इंडियन हिंदी के को-फाउंडर रह चुके हैं और उन्होंने न्यूज18 के लिये सोशल मीडिया कोऑर्डिनेटर के तौर पर भी काम किया है। इसके साथ ही उन्होंने चेंज डॉट ऑर्ग में हिंदी ऑपरेशन्स को लीड करते हुए प्लेटफॉर्म की यूज़र संख्या को 10 हज़ार से बढ़ाकर 10 लाख तक पहुंचाया है।