दलित हिस्ट्री मंथः एक महीने की क्रांति, बाकी साल शांति

दलित हिस्ट्री मंथ आते ही संस्थाओं के कैलेंडर में अचानक एक नैतिक हलचल शुरू हो जाती है। पोस्टर बनते हैं, हैशटैग तय होते हैं, और समावेशन पर दो-चार महान विचार तैयार कर लिए जाते हैं। लेकिन इस गहमागहमी के बीच एक बात अक्सर छूट जाती है: क्या यह ‘समावेशन’ वाकई समावेशी होता है?
1. विविधता का गणित

संस्था गर्व से बताती हैः ‘हमारे पास 40 प्रतिशत कर्मचारी हाशिये के समुदायों से हैं।’
लेकिन जब आप आंकड़ों पर नज़र डालेंगे, तो पाएंगे कि यह 40 प्रतिशत कर्मचारी या तो सपोर्ट स्टाफ हैं या फील्ड में दौड़-धूप करने वाले मेहनतकश।
और लीडरशिप? उसकी तस्वीर तो अब भी वैसी ही है, जैसी पहले थी। बस ब्लैक-एंड-व्हाइट फोटो रंगीन होकर उसी पुराने अपर-क्लास और अपर-कास्ट फ्रेम में जा लगी है।
2. ‘वल्नरेबिलिटी’ उतनी ही, जितनी रिपोर्ट में फिट हो सके

“यह एक सेफ स्पेस है, आप अपनी बात खुलकर रख सकते है।”
यह बात सच है। लेकिन सिर्फ तब तक, जब तक आपकी ‘वल्नरेबिलिटी’ प्रेज़ेंट करने लायक हो—संतुलित, संक्षिप्त और थोड़ी प्रेरणादायक।
जैसे ही कोई दलित कर्मचारी अपने साथ अलगाव, भेदभाव, और संस्थागत असमानताओं की बात करे, उसे ‘इमोशनल इंटेलिजेंस’ पर एक अनौपचारिक वर्कशॉप का सुझाव दिया जाता है।
और लीडरशिप? उनकी तो फ्लाइट मिस हो जाना भी राष्ट्रीय मुद्दे से कम नहीं होता है।
3. सॉलिडेरिटी का डिजिटल शोर

इतिहास का जश्न मनाना जरूरी है। खासतौर पर तब, जब एल्गोरिदम भी यही चाहता हो।
दलित हिस्ट्री मंथ पर हैशटैग के साथ एकजुटता की पोस्ट्स आती हैं और छाती हैं।
लेकिन ऑफिस व्हाट्सऐप ग्रुप में जब कोई आरक्षण विरोधी मीम शेयर करता है, तो अचानक से सब चुप्पी साध जाते हैं।
दरअसल वो क्या है ना…खुले मंचों से ‘साथी तुम संघर्ष करो!!’ कहना अच्छा दिखता है। कमरों की चारदीवारी में नारे कमज़ोर पड़ जाते हैं।
4. फेलोशिप का परोपकार

“हम ग्रासरूट लीडर्स तैयार कर रहे हैं।”
अक्सर इस वाक्य से एक नई फेलोशिप की घोषणा होती है।
फिर फेलोज़ को छोटे स्टाइपेंड और बड़े वादों के साथ दुर्गम इलाकों में भेजा जाता है, जहां वे ख़ून-पसीना बहाते हैं।
और मेंटरशिप? वह तो कॉन्फ्रेंस रूम्स और होटलों से ऑनलाइन ही चलती जाती है।
5. खालिस रिपोर्टिंगः थोड़ी मिलावट के साथ

संस्थाएं समाज बदलने तो निकलती हैं, लेकिन एक सावधानी के साथ: फंडर की चेकलिस्ट।
हर विचार, हर शब्द, हर निष्कर्ष इस बात से गुजरता है कि वह कितना ‘स्वीकार्य’ है।
इसलिए जब कोई प्रस्ताव जातिवाद की आलोचना करता है, तो सजेशन मिलता है: “क्या हम इसकी भाषा को थोड़ा नरम कर सकते हैं?”
और इस तरह ‘ब्राह्मणवाद’ को धीरे-धीरे पचाने लायक बनाया जाता है। और सामाजिक न्याय? एकदम खालिस। बस स्वादानुसार मिलावट के साथ।
समस्या यह नहीं है कि संस्थाएं दलित हिस्ट्री मंथ मना रही हैं, समस्या यह है कि यह महीना अक्सर इतिहास तक ही सीमित रह जाता है और वर्तमान तक नहीं पहुंचता। इसलिए जब तक बोर्डरूम के सरनेम नहीं बदलते, तब तक यह महीना बस एक कैलेंडर इवेंट ही बनकर रह जाएगा।
इस लेख को तैयार करने में रिंकू कुमारी और कुमार उन्नयन ने भी योगदान दिया है।
लेखक के बारे में
- रवीना कुंवर, आईडीआर हिंदी में डिजिटल मार्केटिंग एनालिस्ट हैं। इससे पहले वे एक रिपोर्टर के तौर पर काम कर चुकी हैं जिसमें उनका काम मुख्यरूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण पर केंद्रित था। रवीना, मीडिया और कम्युनिकेशन स्टडीज़ में स्नातकोत्तर हैं।
- पूजा राठी आईडीआर हिंदी में संपादकीय विश्लेषक (एडिटोरियल एनालिस्ट) हैं। इससे पहले, उन्होंने फेमिनिज़्म इन इंडिया में सह-संपादक के रूप में काम किया है, जहां उन्होंने जेंडर, पर्यावरण और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों को कवर किया। पूजा को यूएन लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित किया गया है और वह 2024 की लाडली मीडिया फैलो भी रह चुकी हैं। इसके अलावा, वह खबर लहरिया की रूरल मीडिया फेलोशिप और एटलस फॉर बिहेवियर चेंज इन डेवलपमेंट की बिहेवियरल जर्नलिज़्म फेलोशिप की पूर्व फेलो रह चुकी हैं। पूजा ने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की है।