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बुजुर्गों के लिए बनी एक हेल्पलाइन समाजसेवी संस्थाओं को विस्तार के तरीके सिखाती है
किसी कार्यक्रम को बनाना और उसे विस्तार देना चुनौतीपूर्ण काम है, यह आलेख बुजुर्गों की सहायता के लिए बनाई गई एक हेल्पलाइन के जरिए बताता है कि इन चुनौतियों से कैसे निपटा जा सकता है।समाजसेवी संस्थाएं अपने कार्यक्रमों की साझेदारी कैसे तैयार कर सकती हैं?
साझेदारी से समाजसेवी संस्थाएं अपने विचार और नजरिए को विस्तार दे सकती हैं, ऐसा करने के लिए संगठनों को उपयुक्त साथी की जरूरत होती है जिसमें नीचे दिए गए सुझाव काम आ सकते हैं।चार जनजातियां, चार व्यंजन और परंपरागत खानपान पर ज्ञान की चार बातें
चार जनजातियों के रसोइये अपने व्यंजनों के साथ अपनी खाद्य संस्कृति पर आए खतरों पर चर्चा कर रहे हैं क्योंकि जंगलों के खत्म होने के साथ उनके समुदाय आजीविका के लिए संघर्ष करते हुए शहरों का रुख करने लगे हैं।क्यों बाल-विवाह पर असम के मुख्यमंत्री की कार्रवाई पर रोक लगनी चाहिए?
बाल-विवाह का अपराधीकरण कर असम सरकार एक तरफ जहां महिलाओं के निजी चुनाव के अधिकार का हनन कर रही है, वहीं दूसरी तरफ इसके रोकथाम के प्रयासों को भी कमजोर कर रही है।मनरेगा के बारे में वह सबकुछ जो आपको जानना चाहिए
मनरेगा योजना से महिला और प्रवासी मज़दूरों को क्या लाभ मिल रहे हैं और तमाम राज्यों में इसका प्रदर्शन कैसा है?भारत को और अधिक युवा उद्यमियों की जरूरत है
अधिकार और नियंत्रण का अभाव और असफलता का डर भारतीय युवाओं को उद्यमी बनने से रोक रहा है जिसे बदले जाने की जरूरत है।घुमंतू और विमुक्त जनजातियों के मानसिक न्याय के लिए मानसिक स्वास्थ्य ज़रूरी है
घुमंतू और विमुक्त जनजातियां भेदभाव, अन्याय और विकास योजनाओं के अभाव का सामना करती हैं। इन समुदायों के मानसिक स्वास्थ्य को इनके संघर्ष से अलग करके नहीं देखा जा सकता है।समाजसेवी संगठन, सरकार के साथ सहजता से काम करने के लिए इन पांच रणनीतियों को अपना सकते हैं
सरकार के साथ काम करने की अपनी चुनौतियां और फ़ायदे हैं। समाजसेवी संगठन कुछ सावधानियां बरतकर, व्यवस्था के साथ अधिक टिकाऊ और प्रभावी भागीदारी तैयार कर सकते हैं।कोविड-19 ने साफ़ किया है कि ग्रामीण रोज़गार को बनाए रखने में मनरेगा की क्या भूमिका है
एक अध्ययन के मुताबिक़ मनरेगा ने कोविड-19 के दौरान गांवों में रोज़गार की स्थिति को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया है लेकिन इसका बजट और जवाबदेही बढ़ाने की ज़रूरत है।जब तक जातिगत समुदायों की कोई जानकारी ही नहीं होगी तो उनके विकास की तैयारी कैसे होगी?
भारतीय प्रशासन जाति-आधारित भेदभाव पर आंकड़े और जानकारी इकट्ठा करने से व्यवस्था के स्तर पर इनकार करता है लेकिन यह इसके ही विकास के प्रयासों को कमजोर करता है।भारत का एक ज़िम्मेदार और सक्रिय नागरिक कैसे बनें?
तरीके जिनकी मदद से एक नागरिक मतदान से इतर भी सरकार से जुड़कर स्थानीय, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर नीति-निर्माण में हिस्सा ले सकता है।