December 14, 2022

कोविड-19 ने साफ़ किया है कि ग्रामीण रोज़गार को बनाए रखने में मनरेगा की क्या भूमिका है

एक अध्ययन के मुताबिक़ मनरेगा ने कोविड-19 के दौरान गांवों में रोज़गार की स्थिति को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया है लेकिन इसका बजट और जवाबदेही बढ़ाने की ज़रूरत है।
6 मिनट लंबा लेख

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) 2005, रोज़गार को एक अधिकार मानता है। यह सरकार को आधिकारिक दावे के 15 दिनों के भीतर रोज़गार प्रदान करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य करता है। यह एक मांग-आधारित और संचालित कार्यक्रम है। इसे इस तरह तैयार किया गया है कि यह महामारी सरीखी आपदाओं के दौरान बीमा तंत्र की भूमिका निभाता है। नतीजतन समय-समय पर इसे कठिन परीक्षाओं से भी गुजरना पड़ता है। 2021 के नवम्बर और दिसम्बर महीनों में अज़ीम प्रेमज़ी यूनिवर्सिटी ने नैशनल कन्सॉर्टियम ऑफ़ सिविल सोसायटी ऑर्गनायज़ेशन्स ऑन नरेगा और कॉलैबरेटिव रिसर्च एंड डिसिमिनेशन (सीओआरडी) के साथ मिलकर नरेगा पर एक सर्वेक्षण किया था। इस सर्वेक्षण का उद्देश्य महामारी के दौरान आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को सहायता प्रदान करने में मनरेगा की भूमिका को समझना था। 

बिहार, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के आठ विकासखंडों (ब्लॉक) के दो हज़ार घरों के साथ यह सर्वे किया गया। इस दौरान नमूना लेने के लिए एक खास तरीके का प्रयोग किया गया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सर्वेक्षण से मिलने वाला परिणाम प्रत्येक विकासखंड के सभी जॉब-कार्ड धारकों का प्रतिनिधित्व करे। 

इस अध्ययन में मनरेगा का विश्लेषण निम्न कारकों के आधार पर किया गया: जॉब कार्ड धारक परिवारों पर कार्यक्रम का कुल प्रभाव, अधूरी रह गई मांगों की मात्रा, मजदूरी भुगतान, महामारी के दौरान कार्यक्रम के कामकाज में बदलाव और कठिन परिस्थितियों में आर्थिक सुरक्षा देने में मनरेगा की प्रभावशीलता। अध्ययन में पाया गया कि मनरेगा के तहत काम करने के इच्छुक सभी जॉब कार्ड धारक परिवारों में से लगभग 39 प्रतिशत को महामारी के पहले वर्ष 2020-21 में एक भी दिन काम नहीं मिला। साथ ही, इस साल काम करने वाले परिवारों में से औसतन केवल 36 प्रतिशत को ही काम करने के 15 दिनों के भीतर अपनी मजदूरी प्राप्त हुई।

इन कमियों के बावजूद नतीजों से यह बात सामने आई कि मनरेगा ने महामारी के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और आर्थिक रूप से सबसे कमजोर वर्ग के परिवारों को आय के नुक़सान से बचाया था। नतीजे ये भी बताते हैं कि जिन विकासखंडों में सर्वे किया जा रहा था, वहां आय में होने वाले नुक़सान की लगभग 20 से 80 फ़ीसद भरपाई मनरेगा से हुई है।

फेसबुक बैनर_आईडीआर हिन्दी

अध्ययन के सह-लेखक और अज़ीम प्रेमज़ी विश्वविद्यालय के अध्यापक राजेंद्र नारायणन कहते हैं कि “हमारे अध्ययन से पता चलता है कि मज़दूर वर्ग मनरेगा की आवश्यकता और उपयोगिता को कितना अधिक महत्व देता है। 10 में से आठ से अधिक परिवारों ने सिफारिश की कि मनरेगा को प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 100 दिनों का रोजगार प्रदान करना चाहिए। हमें बड़े पैमाने पर पर्याप्त से कम धनराशि (अंडरफ़ंडिंग) के मामले भी देखने को मिले। एक अनुमान के तहत, सर्वेक्षण किए गए विकासखंडों में आवंटित राशि को वास्तव में आवंटित राशि का तीन गुना होना चाहिए था, तब ही सही मायनों में मांग को पूरा किया जा सकता था।” 

नरेगा कंसोर्टियम के अश्विनी कुलकर्णी कहते हैं कि “मनरेगा के कई उद्देश्यों में से एक उद्देश्य संकट के समय सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है। महामारी और लगातार लगाए गए लॉकडाउन के कारण स्थिति बहुत बुरी हो गई थी और मनरेगा ने उम्मीद के अनुसार जरूरत के समय अपनी भूमिका निभाई। लॉकडाउन के बाद के सालों में मनरेगा के तहत, बड़ी संख्या में गांवों और परिवारों को रोज़गार मिला। पिछड़ेपन को कम करने में मनरेगा की भूमिका पर फिर से जोर दिया जा रहा है और महामारी के बाद के समय में भी इसकी महत्ता बरकरार है। नागरिक संगठनों की जिम्मेदारी है कि वे कार्यान्वयन प्रक्रिया को ठीक करने के लिए नीति निर्माताओं तक लोगों की आवाज पहुंचाएं। यह रिपोर्ट इस संबंध में एक प्रयास है।”

प्लेड शर्ट पहना एक आदमी सड़क पर चल रहा है_मनरेगा
रोज़गार की मांग से निपटने के लिए मनरेगा कार्यक्रम के व्यापक विस्तार की आवश्यकता है। | चित्र साभार: पेक्सेल्स

मुख्य निष्कर्ष 

  • सभी विकासखंडों में, वित्त वर्ष 2020-21 में मनरेगा में काम करने के इच्छुक जॉब कार्ड धारक परिवारों में से लगभग 39 प्रतिशत को एक भी दिन काम नहीं मिल सका, जबकि उन्हें औसतन 77 दिनों का काम दिया जाना चाहिए था।
  • सभी विकासखंडों में रोज़गार हासिल करने वाले सभी परिवारों में रोज़गार वाले दिनों की इच्छित संख्या और वास्तविक संख्या के बीच का अंतर 64 दिन था। 
  • मनरेगा प्रबंधन सूचना प्रणाली (मनरेगा मैनेजमेंट इन्फ़र्मेशन सिस्टम – एमआईएस) के अनुसार सर्वेक्षण में शामिल किए गए विकासखंडों में वित्तीय वर्ष 2020–21 में मज़दूरों पर खर्च की गई कुल राशि 152.68 करोड़ रुपए थी। हमारे अनुमान के अनुसार, इन विकासखंडों में काम की मांग को पूरा करने के लिए आवंटित लेबर बजट 474.27 करोड़ रुपये होना चाहिए था। यह राशि मज़दूरी पर खर्च की गई असल राशि की तीन गुना से अधिक है। 
  • सभी विकासखंडों में जरूरत के मुताबिक काम नहीं मिलने का सबसे ज्यादा जिक्र किया जाने वाला कारण मंज़ूरी प्राप्त/पहले से चल रहा काम नहीं होना था। सर्वेक्षण किए गए विकासखंडों में औसतन सभी जॉब कार्ड धारक परिवारों में से 63 प्रतिशत ने यही कारण बताया। 
  • 2020-21 में काम करने वाले सभी परिवारों में से औसतन, केवल 36 फ़ीसद को ही 15 दिनों के भीतर उनकी मजदूरी मिली। जिन परिवारों को दोनों अवधियों (कोविड के पहले और कोविड के दौरान) में काम मिला, उनके लिए मनरेगा से बढ़ी हुई कमाई ने हर विकासखंड में, आय में हुए नुकसान की लगभग 20 से 80 फ़ीसद के बीच भरपाई की।
  • मनरेगा ने ऐसे परिवारों के अन्य स्त्रोतों से होने वाली आय में हुए नुक़सान की लगभग 20 से 100 फ़ीसदी तक भरपाई की है जिन्हें कोविड के पहले रोज़गार नहीं मिला था लेकिन कोविड के दौरान उनके पास काम था। 
  • दस में से आठ से अधिक परिवारों का कहना था कि मनरेगा को प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति 100 दिन का रोज़गार मुहैया करवाना चाहिए। पांच में से तीन परिवारों का मानना है कि उनके गांव के समग्र विकास में मनरेगा का सकारात्मक योगदान रहा है।
  • कम मज़दूरी और भुगतान में होने वाले विलम्ब के बावजूद मनरेगा ने महामारी के दौरान एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इसने कुछ अति-पिछड़े परिवारों की आय में होने वाली कमी की भरपाई भी की है। लेकिन परिवारों को पूरी आर्थिक सुरक्षा देने में यह असमर्थ रहा क्योंकि अनगिनत परिवारों के संदर्भ में इसने या तो मांगों की पूर्ति नहीं की या फिर वे पूरी तरह इस कार्यक्रम से वंचित रह गए।

अध्ययन के सुझाव

  • रोज़गार की बढ़ी हुई मांग को पूरा करने के लिए कार्यक्रम को व्यापक रूप से विस्तार देने की आवश्यकता है। फील्ड पदाधिकारियों को प्रशासनिक कर्मियों की संख्या में कम से कम दोगुनी बढ़त करने की ज़रूरत है।
  • अधूरी रह गई मांगों को पूरा करने के लिए अनुमति दिए जा सकने वाले कामों का दायरा बढ़ाने और व्यक्तिगत संपत्ति बनाने की बजाय सामुदायिक कार्यों को प्राथमिकता देने की ज़रूरत है।
  • यह सुनिश्चित किया जाए कि रोज़गार की मांग के लिए मज़दूरों को कंप्यूटरीकृत रसीद दी जाती हो। 
  • किए गए कामों, कमाई गई मजदूरी आदि के साथ जॉब कार्ड अपडेट करने की ज़रूरत है। जॉब कार्डों पर जानकारी को मैन्युअल रूप से अपडेट करने के अलावा प्रत्येक पंचायत को, बैंकों की पासबुक अपडेशन सुविधा की तरह जॉब कार्ड-प्रिंटिंग सुविधा से लैस करना होगा। 
  • सुनिश्चित करें कि मजदूरी और काम के विवरण के साथ मजदूरी पर्ची प्रिंट की जाए और धन हस्तांतरण आदेश (एफटीओ) आने के बाद श्रमिकों को दी जाए।1  
  • सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों एवं अधिनियम के अनुपालन के तहत यह सुनिश्चित किया जाए कि वेतन भुगतान में देरी होने पर मुआवजे का भुगतान पूरी तरह किया जाए। यानी, तब तक नज़र रखी जाए जब तक कि श्रमिकों के खातों में मज़दूरी जमा नहीं हो जाती।
  • सार्वजनिक स्थलों पर मनरेगा और बैंकिंग अधिकारों से संबंधित ‘अपने अधिकारों के बारे में जानें’ जैसी जानकारियों को प्रमुखता से लिखकर प्रदर्शित करें। 
  • सुनिश्चित करें कि प्रत्येक ग्राम पंचायत में सात रजिस्टरों को वहां के कर्मचारी अपडेट करते हों।2 इससे कर्मचारियों के अनुभव और एमआईएस पर जानकारी के बीच समानता पर नज़र रखने में मदद मिल सकती है। 
  • मनरेगा मजदूरी दरों को कम से कम राज्य की न्यूनतम मजदूरी या फरवरी 2019 में अनूप सत्पथी समिति द्वारा अनुशंसित 375 रुपये प्रति दिन के दर तक बढ़ाया जाना चाहिए।
  • सुनिश्चित करें कि ग्राम पंचायतों को फंड पहले ही प्राप्त हो जाए और उनके पास काम आवंटित करने का अधिकार हो। इससे 73वें संविधान संशोधन के आदेश का पालन करने और मांग बढ़ने पर काम की उपलब्धता सुनिश्चित करने में आसानी होगी। 
  • सुनिश्चित करें कि समय पर और पर्याप्त धन के साथ सामाजिक ऑडिट होती रहे। उल्लंघन के मामले में स्पष्ट दंड मानदंडों के साथ, शामिल प्रत्येक एजेंसी को—जिसमें बैंक, भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम, और यूआईडीएआई जैसे भुगतान मध्यस्थ शामिल हैं—सोशल ऑडिट के दायरे में लाया जाए। 

मांग का पूरा न होना और समय पर मज़दूरी न मिलना चिंता का विषय रहा है। समग्र ग्राम विकास और समुदायों को सशक्त बनाने में सहायता करते हुए भारत के सबसे कमजोर परिवारों को आय सुरक्षा प्रदान करके, इस चिंता से निपटने में मनरेगा की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। इन लक्ष्यों को प्रभावी ढंग से प्राप्त करने के लिए, इनके आवंटन में वृद्धि करने, सरकार की जवाबदेही बढ़ाने और संरचनात्मक मामलों के लिए केवल तकनीकी सुधारों से बचने की आवश्यकता लगातार बनी हुई है।

इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ें

फुटनोट:

  1. लाभार्थी के खाते में सीधे मजदूरी हस्तांतरित करने के लिए कार्य के सत्यापन के बाद कार्यान्वयन एजेंसी (ग्राम पंचायत/ब्लॉक) द्वारा एफटीओ तैयार किए जाते हैं। 
  2. सात रजिस्टरों में जॉब कार्ड (आवेदन, पंजीकरण और जारी करना), घरेलू रोजगार, ग्राम सभा (बैठक और सामाजिक लेखा परीक्षा) मिनट, मांग, आवंटन और काम का पंजीकरण, मज़दूरी का भुगतान, शिकायत और सामग्री से संबंधित जानकारी होती है।

अधिक जानें

  • उन चुनौतियों के बारे में और जानें जिनका सामना नरेगा श्रमिकों को तब करना पड़ता है जब वे अपनी मजदूरी प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
  • 2005 में नरेगा के पहली बार पारित होने के बाद से इसके विकास के बारे में पढ़ें।
  • महामारी के दौरान नरेगा के प्रदर्शन को विस्तार से जानें

लेखक के बारे में
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अमित बसोल

अमित बसोल अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं। इसके अतिरिक्त वे सेंटर फ़ॉर सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट के प्रमुख भी हैं। उनका शोध रोजगार, गरीबी, असमानता और संरचनात्मक परिवर्तन पर केंद्रित है।

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राजेंद्रन नारायणन

राजेंद्रन नारायणन अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, बैंगलोर में स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड साइंसेज के सहायक प्रोफेसर हैं। वे लिबटेक इंडिया के संस्थापक सदस्य हैं। लिबटेक इंडिया एक ऐसा संगठन है जो ग्रामीण सामाजिक नीतियों की पारदर्शिता और जवाबदेही पर काम करता है और कई अधिकार-आधारित अभियानों में सक्रिय रूप से शामिल है।

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