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गर्मी हर साल पड़ती है… पर इसका हल क्या है?
गर्मी तो हर साल पड़ती है, लेकिन उससे निपटने के हर किसी के अपने-अपने जुगाड़ हैं—कहीं सलाह चल रही है, कहीं स्पीड, और कहीं बस काम।वैश्विक जोखिम रिपोर्ट 2026: भारत के सोशल सेक्टर के लिए क्या हैं इसके मायने?
वैश्विक जोखिम दूर लगते हैं, पर उनका असर गांवों, कस्बों और शहरों में स्पष्ट दिखता है। महंगाई, बाढ़, गर्मी, गलत सूचना, बेरोज़गारी और सामाजिक तनाव अब भारतीय सामाजिक क्षेत्र की रोज़मर्रा की हकीकत हैं। यही इस रिपोर्ट की प्रमुख प्रासंगिकता है।खंडवा की रीठी बाई ने कोदो उगाना क्यों बंद कर दिया?
2016 में रीठी बाई के घर के लोग और मवेशी कोदो खाने से बीमार हो गए। जिसके बाद उन्होंने कोदो उगाना बंद कर दिया। उनके गांव के लोग चाहते हैं कि सरकार उन्हें कोदो के ‘सुरक्षित बीज’ दे ताकि वह इसे फिर से उगा सकें।एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 का संस्थाओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
प्रस्तावित संशोधनों के तहत गैर-लाभकारी संगठनों के ऊपर यह संकट बना रहेगा कि यदि उनका एफसीआरए पंजीकरण समाप्त हो जाता है या रद्द कर दिया जाता है, तो विदेशी फंड से तैयार संपत्तियों पर उनका नियंत्रण खत्म हो सकता हैबदलते मौसम और सिकुड़ती ज़मीन के बीच मामित के झूम किसान
मिज़ोरम के मामित में झूम किसान अनिश्चित मौसम, चूहों के बढ़ते हमलों और बागान खेती के असफल प्रयोग के बीच एक बड़े संकट का सामना कर रहे हैं। तो इस नौकरी के लिए अप्लाई कौन कर रहा है?
जब जॉब डिस्क्रिप्शन पढ़कर लगे - यह रोल है या पूरी संस्था का ठेका?अमर्त्य सेन के विचारों को साकार करते देश के पांच संगठन
स्वच्छता से आजीविका तक, पांच गैर-लाभकारी संगठन अमर्त्य सेन के विकास से जुड़े विचारों को दर्शाते हैं—स्वतंत्रता, आकांक्षा, मूलभूत सेवाओं तक पहुंच और लोकतांत्रिक भागीदारी।कार्बन क्रेडिट क्या है और इसके वैश्विक स्तर पर क्या मायने हैं?
अंतर्राष्ट्रीय अनुभव दर्शाता है कि केवल “कार्बन क्रेडिट जारी करना” काफी नहीं है। उनकी गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना भी उतना ही ज़रूरी है।अप्रेज़ल: सबका अप्रैल एक जैसा नहीं होता
अप्रैल आते ही हर जगह अप्रेज़ल की बहार आने लगती है। क्या सरकारी और क्या प्राइवेट, हर कोई अप्रेज़ल की बाट जोहता है। लेकिन यह महीना सबके लिए अलग-अलग गुल खिलाता है!फोटो निबंध: मुनाफे के वादे और जोखिमों के बीच फूलों के किसान
लखनऊ के मलिहाबाद और काकोरी क्षेत्र में पारंपरिक रूप से फूलों की खेती करने वाले छोटे और सीमांत किसान आज भी मौसम, बाज़ार और बुनियादी ढांचे की चुनौतियों से जूझ रहे हैं। त्योहारों में फसलों के ऊंचे दाम मिलने के बावजूद सालभर अनिश्चितता बनी रहती है।मिठास के पीछे का कड़वा सच: मराठवाड़ा के गन्ना मज़दूरों की कहानी
मराठवाड़ा एक सूखा-प्रभावित इलाका है जहां खेती भरोसेमंद नहीं है। सन 1950 के आस-पास अहमदनगर में पहली शुगर फैक्ट्री बनी थी और वहीं से एक नई मज़दूरी की कहानी शुरू हुई।एक लड़की, जिसने हर हाल में शिक्षा को चुना
कर्नाटक के रायचूर की एक युवा फील्ड कोऑर्डिनेटर के जीवन का एक दिन। उसकी उस यात्रा के साथ, जहां वह कभी स्कूल छोड़ने की कगार पर थी, लेकिन आज अपने साथ-साथ अपने परिवार और समुदाय का सहारा बन चुकी है।