बदलते मौसम और सिकुड़ती ज़मीन के बीच मामित के झूम किसान

मिज़ोरम के पहाड़ी जिले मामित की आबादी लगभग 8,000 है। यह राज्य की राजधानी आइज़ोल से करीब 110 किलोमीटर दूर स्थित है। मामित के स्थानीय समुदाय (मुख्य रूप से मिज़ो और ब्रू) पीढ़ियों से झूम, यानी स्थानांतरित खेती के ज़रिए इस भू-भाग पर खेती-बाड़ी करते आए हैं। यह खेती स्थिर वर्षा, कम लागत और रासायनिक उर्वरकों पर लगभग न के बराबर निर्भरता के सहारे चलती है। झूम केवल खेती की एक पद्धति नहीं है। यह एक कृषि कैलेंडर, सामुदायिक परंपरा और स्थानीय ज्ञान का जीवंत भंडार है, जो कई सदियों से यहां रहने वाले परिवारों में पीढ़ी दर पीढ़ी पहुंचता रहा है।

करीब एक दशक पहले तक यह व्यवस्था सुचारु रूप से चल रही थी। बारिश समय पर होती थी, फसलें भरोसेमंद थी, और परिवारों के पास खाने तथा भंडारण के लिए पर्याप्त उपज होती थी। इसके लिए रासायनिक उर्वरकों की ज़रूरत भी बहुत कम पड़ती थी। लेकिन वर्ष 2016-17 के आसपास हालात बदलने लगे। पिछले एक दशक में झूम खेती जिस स्थिर नींव पर टिकी थी, वह धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ने लगी। वर्षा अनिश्चित हो गई, मिट्टी का क्षरण बढ़ने लगा, और बुवाई व कटाई का समय भरोसेमंद नहीं रहा। इसकी भरपाई के लिए किसानों को रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों का सहारा लेना पड़ा। खासतौर पर उन खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए, जिन्हें हाथ से साफ करना अब पहले की तुलना में कहीं अधिक मुश्किल हो गया था। ये सब ऐसे इनपुट थे, जिनकी इस व्यवस्था में पहले शायद ही कभी ज़रूरत पड़ती थी। इसलिए अधिकांश किसानों ने इन्हें अपनी जेब से ख़रीदा, क्योंकि सरकार की ओर से कोई सब्सिडी नहीं मिलती थी। हालांकि कभी-कभार स्प्रे पंप रियायती दरों पर उपलब्ध करा दिए जाते थे।

धीरे-धीरे खेती का वह कैलेंडर, जो कभी समुदाय के लिए सबसे भरोसेमंद मार्गदर्शक हुआ करता था, अब बिखरने लगा। और इसके साथ एक ऐसा खतरा भी बढ़ता गया, जिसकी गंभीरता और आवृत्ति की किसानों ने कल्पना नहीं की थी जैसे – खेतों में चूहों के हमले।
मिज़ोरम में बांस की तीन प्रमुख प्रजातियां पायी जाती हैं, जिनमें हर एक अलग-अलग अंतराल पर फलती-फूलती है। एक प्रजाति हर पांच साल में, दूसरी हर दस साल में और तीसरी हर बीस साल में फूलों से लदती है। बांस में फूल आने पर उस पर बड़ी मात्रा में फल लगते हैं, जिससे चूहों की आबादी अचानक तेज़ी से बढ़ जाती है। यह फल खत्म होने के बाद चूहे भोजन की तलाश में किसानों की फसलों की ओर रुख करते हैं।
वर्ष 2025 में बम्बूसा तुल्दा (जिसे स्थानीय तौर पर रावतिंग बांस कहा जाता है) में बड़े पैमाने पर फूल आने से मिज़ोरम में चूहों के हमले और भीषण हो गए थे। बांस की इस प्रजाति में लगभग हर 48 साल में फूल आते हैं। लेकिन मामित के किसानों के लिए चूहे महज़ अकेली समस्या नहीं हैं। वे एक ऐसे व्यापक संकट का हिस्सा हैं, जिसमें खेती के हर चरण में जानवर और कीट फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

करीब 800 झूम किसान, जो लगभग 158 एकड़ भूमि पर खेती करते हैं, इस संकट से प्रभावित हुए हैं। किसानों के अनुसार, उन्हें हर साल लगभग 40,000 रुपये तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है। जिन किसानों के पास करीब 2 बीघा जैसी छोटी जोत है, उनके यहां चूहों के हमलों के बाद कुल उपज का केवल 10 से 20 प्रतिशत ही बच पाता है। इस नुकसान का पैमाना इतना बड़ा था कि राज्य सरकार को भी संभावित अकाल जैसी स्थिति को लेकर सतर्क होना पड़ा।
जब फसलें बर्बाद होती हैं, तो किसान इसकी सूचना वन विभाग को देते हैं। मामित के एक किसान कहते हैं, “जब ये जंगली जानवर हमारी फसलें नष्ट कर देते हैं, तो हम इसकी शिकायत वन विभाग से करते हैं। लेकिन शिकायत करने के बाद भी हमें कोई मदद नहीं मिलती और हमारी समस्याओं का ठीक से समाधान नहीं होता। हर साल वन विभाग हमसे इन घटनाओं की रिपोर्ट देने को कहता है और हम देते भी हैं, लेकिन हमें अब भी समाधान का इंतज़ार है।”
खेती पर निर्भर परिवारों के लिए उपज का नुकसान महज कृषि से जुड़ा एक आंकड़ा भर नहीं है। इसका सीधा मतलब है खाद्य संकट, कर्ज़ और लगातार बढ़ता आर्थिक दबाव। यह संकट किसी एक मौसम के साथ खत्म नहीं होता, बल्कि हर खराब फसल के साथ और गहराता जाता है।

बागान आधारित खेती का नुस्खा
बार-बार फसलें खराब होने की स्थिति में मामित के किसान अब सुपारी, रबर और ऑयल पाम जैसी वैकल्पिक बागान फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। इन्हें अपेक्षाकृत स्थिर आय के स्रोत के रूप में देखा जाता है। सरकार कभी-कभी रबर और ऑयल पाम के बीज उपलब्ध कराती है, लेकिन यह सहयोग अक्सर शुरुआती इनपुट तक ही सीमित रहता है।

हालांकि, यह बदलाव अपने साथ नई चुनौतियां भी लेकर आया है। इन फसलों से आमदनी शुरू होने में लंबा समय लगता है और शुरुआत में भारी निवेश की जरूरत पड़ती है। साथ ही इनके लिए ऐसी तकनीकी समझ भी चाहिए, जो अभी कई झूम किसानों के पास नहीं है। इसके अलावा खेती योग्य जमीन पर दबाव भी बढ़ रहा है। मामित के एक किसान बताते हैं, “मैं तीन साल बाद फिर इस झूम क्षेत्र में खेती शुरू करने लौटा हूं। एक फसल लेने के बाद मैं इस क्षेत्र को बागान में बदल दूंगा, क्योंकि अब झूम खेती के लिए पर्याप्त ज़मीन नहीं बची है और सामुदायिक खेती वाली लगभग सारी ज़मीन इस्तेमाल हो चुकी है।”

विकल्पहीनता
बागान आधारित फसलों की ओर यह बदलाव किसानों को वह स्थिरता नहीं दे पाया है, जिसकी उम्मीद की गयी थी। सुपारी, रबर और ऑयल पाम भी जलवायु परिवर्तन से पैदा हो रही चरम मौसमी परिस्थितियों के प्रति उतने ही संवेदनशील हैं, जिससे उनकी उपज प्रभावित होती है। वहीं, चूहों की समस्या, जिसने झूम की फसलों को तबाह किया था, अब इन बागानों के छोटे पौधों और भंडारित उपज को भी नुकसान पहुंचा रही है।
इसका नतीजा यह है कि जिन किसानों ने समय, पैसा और मेहनत लगाकर इस कठिन बदलाव को अपनाया था, वे खुद को फिर उसी स्थिति में पाते हैं, जिससे निकलने की कोशिश कर रहे थे। यानी फसल का नुकसान, आर्थिक दबाव और असुरक्षित रोज़गार। केवल बागान-आधारित खेती इस संकट का समाधान नहीं है।

मामित के किसान अब फसल बर्बादी के मुआवज़े के लिए वन विभाग का रुख करने लगे हैं। लेकिन उनमें से कई यह नहीं जानते कि वे और क्या मांग सकते हैं या अपनी बात किसके सामने रखें? कभी-कभार जो मांगें अधिकारियों तक पहुंचती भी हैं, वे बेहद सीमित होती हैं। मसलन, ऑयल पाम की प्रोसेसिंग में सहयोग या आगे की प्रक्रिया के लिए मार्गदर्शन।
लेकिन ऐसा कोई दीर्घकालिक योजना ढांचा अभी मौजूद नहीं है, जो इन समुदायों को साथ लेकर खेती का जोखिम कम करने और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ढलने की दिशा में काम करे।
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लेखक के बारे में
- रोडिंगलिआन, आईडीआर के नॉर्थ-ईस्ट मीडिया फेलो हैं। वे एक डॉक्युमेंट्री फिल्म निर्माता हैं और डम्पारेंगपुई, मिज़ोरम में रहते हैं। उन्होंने कई उत्तर-पूर्वी राज्यों में सक्रिय कई समाजसेवी संस्थाओं के साथ डॉक्युमेंट्री प्रोजेक्ट्स पर काम किया है। रोडिंगलिआन वन्यजीवों पर फिल्म बनाने और प्रकृति संरक्षण में गहरी रुचि रखते हैं। इससे पहले ग्रीन हब फेलो भी रह चुके हैं।
