अमर्त्य सेन के विचारों को साकार करते देश के पांच संगठन

पानी और स्वच्छता, ग्रामीण रोज़गार, वित्तीय साक्षरता, खाद्य असुरक्षा और सक्रिय नागरिकता जैसे विभिन्न मुद्दों पर काम करने वाले पांच संगठन, जो अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में सक्रिय हैं, आखिर एक-दूसरे से क्या समानता रखते हैं?
भले ही ये संगठन अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रहे हों, लेकिन भारत में नागरिक समाज की बुनियाद कुछ साझा विचारों और दर्शन पर आधारित रही है। इनमें अमर्त्य सेन का काम विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं, जो मौजूदा दौर में भी विकास संबंधी चुनौतियों के लिए प्रासंगिक है। उनके विचारों में सबसे प्रभावशाली तर्क अर्थशास्त्र और दर्शन के संगम पर स्थित हैं। इसमें वह मानव व्यवहार की समझ के साथ-साथ यह नैतिक प्रश्न भी उठाते हैं कि समाज को कैसे काम करना चाहिए।
सेन एक ऐसे विश्व की कल्पना करते हैं, जो मानव गरिमा और स्वायत्तता पर आधारित हो। एक प्रोफेसर और लेखक के रूप में उनका काम अकादमिक जगत के साथ-साथ नीति-निर्माताओं और कई तरह के पेशेवरों तक पहुंचा है, जिसने सिद्धांतों और ज़मीनी हकीकत के बीच एक सेतु बनाया है।
इस लेख में ओडिशा, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और केरल के कई संगठनों के सदस्य यह साझा कर रहे हैं कि अमर्त्य सेन के विचारों ने उनके काम को कैसे प्रभावित किया है। हालांकि ये पूरे क्षेत्र का प्रतिनिधित्व नहीं करते, लेकिन ये विचार (चार प्रमुख अवधारणाओं पर आधारित) दिखाते हैं कि सेन के आदर्श आज भी भारतीय नागरिक समाज को दिशा दे रहे हैं।
स्वतंत्रता के रूप में विकास
सेन के अनुसार, विकास को केवल आर्थिक विकास के संकीर्ण दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे “उन वास्तविक स्वतंत्रताओं, जिनका लोग आनंद लेते हैं, के विस्तार की प्रक्रिया” के रूप में समझना चाहिए। इनमें नागरिक और राजनीतिक अधिकार, सामाजिक न्याय, गरीबी से बाहर निकलने के आर्थिक अवसर और वंचना का अंत शामिल हैं।
ओडिशा में समुदाय-प्रबंधित जल और स्वच्छता सेवाओं पर ग्राम विकास का दशकों का काम सेन की इसी सोच को अपनाता है और इसे व्यवहार में लागू करता है।
ओडिशा में समुदाय-प्रबंधित जल और स्वच्छता (जयपद्मा आर वी और लिबी टी जॉनसन)
1980 के दशक में, ग्राम विकास ओडिशा के कई गांवों, जैसे गंजाम जिले के सामियापल्ली और तमाना, में काम कर रहा था। यहां परिवारों के पास स्वच्छ पेयजल की सुविधा नहीं थी। इसके कारण लोग बार-बार बीमार पड़ते थे। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते थे, उनके अभिभावकों की दिहाड़ी प्रभावित होती थी, और जो थोड़ी बहुत आय थी, वह इलाज पर खर्च हो जाती थी।
इस समस्या का तकनीकी समाधान सरल लगता था- शौचालय और पाइप से पानी की आपूर्ति। लेकिन, एक शुरुआती ख़याल यह भी था कि जब तक गांव के सभी परिवार इसमें हिस्सा नहीं लेंगे, तब तक यह पहल सार्थक नहीं होगी। शुरुआत में अपेक्षाकृत संपन्न और ऊंची जाति के परिवार शौचालय बनाने के लिए अधिक तैयार थे, ख़ासकर पाइप से पानी मिलने के वादे के कारण। लेकिन उन कम आय वाले परिवारों का क्या, जिनके पास शौचालय बनाने के लिए संसाधन नहीं थे? क्या उन्हें खुले में शौच करने के लिए मजबूर होना पड़ता, जिससे जल स्रोतों के प्रदूषण का जोखिम बना रहता?
इसके साथ ही आगे की राह स्पष्ट हो गयी: सच्ची गरिमा और स्वतंत्रता का अर्थ है कि हर घर समाधान का हिस्सा बने। यह अमर्त्य सेन के विचार से मेल खाता है कि विकास का मतलब वास्तविक स्वतंत्रताओं का विस्तार है; यह व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि सामूहिक सशक्तिकरण का प्रश्न है।
हालांकि, सभी को साथ लाना एक महत्वपूर्ण कदम था, लेकिन गरीब परिवारों की दैनिक वास्तविकताओं और आर्थिक सीमाओं को ध्यान में रखते हुए योगदान के नए तरीके, जो सबके लिए सुगम हों, तय करने की ज़रूरत थी। इसके लिए वित्त, सामग्री और श्रम का एक साझा कोष बनाया गया, जिसमें हर परिवार अपनी क्षमता के अनुसार योगदान देता था। इसका उद्देश्य यह था कि सबसे गरीब और सबसे संपन्न, दोनों वर्गों को समान सुविधाएं मिलें और निर्णय लेने में दोनों का बराबरी का हक हो।
गांव-दर-गांव महिलाओं ने इस बदलाव में केंद्रीय भूमिका निभाई। उन्होंने अपनी समस्याओं को खुलकर सामने रखा, मसलन, तालाबों और कुओं के पास खुले में असुविधाजनक परिस्थितियों में नहाना, और मासिक धर्म के दौरान रोज़ाना होने वाली अपमानजनक घटनायें। इसी के परिणामस्वरूप उन्होंने अपने लिए स्नानघर बनाने की मांग पर ज़ोर दिया। महिलाओं के नेतृत्व में ग्राम समितियां बनाई गईं, जिन्होंने इन सुविधाओं का प्रबंधन संभाला।
इन अनुभवों में लोगों के लिए ‘वास्तविक स्वतंत्रता’ केवल स्वच्छता के भौतिक ढांचे में नहीं थी, बल्कि उससे जुड़ी गरिमा में भी थी। इसके साथ ही, बेहतर स्वच्छता सुविधाओं ने कई गांवों को सभी परिवारों के लिए पक्के घर बनाने के लिए प्रेरित किया। इस प्रयास में सहभागी ग्रामीण लोगों के विचार भी मिलते-जुलते थे। गंजाम जिले के तमाना गांव की ललिता मलिक के शब्दों में, “हमारे शौचालय हमारे घरों से भी बेहतर हैं।”
इन गांवों के लोगों के लिए सबसे बड़ा बदलाव व्यक्तिगत समृद्धि नहीं, बल्कि सामूहिक गरिमा था। जैसे-जैसे परिवार एक साथ काम करने लगे, लिंग, जाति और वर्ग के भेद धुंधले पड़ने लगे, और पूरे समुदाय का कल्याण प्राथमिकता बनता गया।
यही अमर्त्य सेन के “स्वतंत्रता के रूप में विकास” का वास्तविक रूप है। उनका तर्क था कि विकास को स्वतंत्रता के विस्तार के रूप में देखने का मतलब है कि हम साधनों पर नहीं, बल्कि परिणामों पर ध्यान दें। इस प्रकार प्रगति का सही मापदंड केवल आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि यह है कि वह लोगों को क्या हासिल करने में सक्षम बनाती है, एक ऐसा जीवन जो वंचना और अपमान से मुक्त हो। यहां नागरिक समाज की भूमिका महत्वपूर्ण है। यह वहां हस्तक्षेप करता है जहां सरकार के प्रयास काफी नहीं होते, और उन बाधाओं को चुनौती देता है जो लोगों के अधिकारों और स्वायत्तता को सीमित करती हैं।

क्षमता दृष्टिकोण
अमर्त्य सेन के अनुसार, कोई व्यक्ति क्या हासिल कर सकता है, यह उसके आर्थिक अवसरों, राजनीतिक स्वतंत्रता और स्वास्थ्य व शिक्षा जैसी सुविधाओं पर निर्भर करता है। यदि विकास स्वतंत्रताओं के विस्तार में निहित है, तो इन्हें केवल लोगों को मिलने वाले औपचारिक अधिकारों के रूप में नहीं समझा जा सकता। वास्तविक स्वतंत्रता इस बात में है कि लोग वह बन सकें और वह कर सकें, जिसकी वे आकांक्षा रखते हैं। इसलिए, जीवन की गुणवत्ता और कल्याण को केवल आय या संपत्ति से नहीं, बल्कि लोगों की वास्तविक क्षमताओं से मापा जाना चाहिए। यानी वह जीवन बनाने और जीने की क्षमता, जिसे लोग मूल्यवान मानते हैं।
1. लोगों में स्वायत्तता का निर्माण: प्रदान (डी. नरेंद्रनाथ)
पिछले पांच दशकों से प्रदान पूरे भारत में ग्रामीण समुदायों के साथ काम कर रहा है, ताकि केवल आजीविका के अवसर ही नहीं, बल्कि लोगों की क्षमताओं और स्वायत्तता का भी विकास हो सके।
वर्ष 1987 में राजस्थान के अलवर में पहला स्वयं सहायता समूह स्थापित करने के बाद, प्रदान ने ऐसे समूहों का आजीविका के लिए वित्त इकट्ठा करने के उद्देश्य से अन्य राज्यों में विस्तार किया। झारखंड के कोडरमा और हज़ारीबाग, मध्य प्रदेश के केसला और ओडिशा के मयूरभंज जैसे क्षेत्र इनमे प्रमुख थे। इन समूहों का उद्देश्य बचत और ऋण को बढ़ावा देना था, ताकि ग्रामीण महिलाएं शोषणकारी साहूकारों पर निर्भर रहने के बजाय छोटे ऋण प्राप्त कर सकें। हालांकि, जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि केवल वित्त तक पहुंच महिलाओं के समग्र कल्याण, या अमर्त्य सेन के शब्दों में, उनकी क्षमताओं या उनकी वास्तविक स्वतंत्रताओं को बढ़ाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
भले ही महिलाएं पोल्ट्री जैसे छोटे उद्यमों के माध्यम से आय बढ़ाने लगी, लेकिन परिवार के भीतर शक्ति समीकरणों में बहुत बदलाव नहीं आया था। कई मामलों में महिलाओं का कार्यभार और बढ़ गया, क्योंकि पुरुष घरेलू ज़िम्मेदारियां लेने को तैयार नहीं थे। महिलाएं अभी भी महत्वपूर्ण निर्णयों से बाहर थीं। मसलन, कौन सी फसल उगाई जाये, बेटियों की शादी कब हो, या अर्जित कमाई का उपयोग कैसे किया जाए। कुछ मामलों में, परियोजना से जुड़ी गतिविधियों के कारण महिलाओं की बढ़ी हुई आवाजाही ने उन्हें घरेलू हिंसा के प्रति और अधिक असुरक्षित बनाया।
इसलिए स्वयं सहायता समूह के दृष्टिकोण को ‘क्षमता’ के नज़रिए से पुनः परखा गया। इसका मतलब था कि वित्तीय सेवाओं से आगे बढ़कर महिलाओं की स्वायत्तता को मज़बूत किया जाए। हमने इसके लिए कई प्रयास किए और प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए गए, जिनसे महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हों और उन्हें व्यापक मुद्दों पर बात करने के अवसर मिलें। इसके फलस्वरूप संपत्ति और संसाधनों पर नियंत्रण, स्वास्थ्य और शिक्षा तक पहुंच, आवाजाही, और राजनीतिक भागीदारी जैसे विषयों पर चर्चा हुई। भेदभाव व लैंगिक हिंसा, जिन पर पहले खुलकर बात नहीं होती थी, उन पर भी खुलकर चर्चा हुई। समूहों और उनके संघों ने इन मुद्दों को सामूहिक रूप से उठाना शुरू किया, और समय के साथ महिला अधिकार मंच और नारी अदालत जैसे प्लेटफॉर्म उभर कर सामने आए।
इस प्रकार एसएचजी एकजुटता के समूह बन गए, और 2000 के दशक की शुरुआत तक प्रदान ने इन्हें अपनी सामुदायिक संगठन रणनीति का हिस्सा बना लिया।
2. टिम्बकटु कलेक्टिव की स्वशक्ति पहल (जयपद्मा आर वी)
टिम्बकटु कलेक्टिव ने ‘स्वशक्ति’ (या आत्मबल) पहल की शुरूआत की, जो आंध्र प्रदेश के सूखा प्रभावित क्षेत्रों, जैसे श्री सत्य साई ज़िले, में वंचित और उपेक्षित महिलाओं के बीच एक सामाजिक-आर्थिक आंदोलन का रूप ले चुकी है। यहां महाशक्ति फेडरेशन जैसे सहकारी संगठनों ने महिलाओं को अपने आर्थिक और सामाजिक जीवन पर नियंत्रण लेने में सक्षम बनाया है।
टिम्बकटु ने 1995 के आंध्र प्रदेश म्यूचुअली एडेड को-ऑपरेटिव सोसाइटीज़ ऐक्ट का उपयोग करते हुए ग्रामीण महिलाओं द्वारा, उनके लिए और उनके प्रबंधन में चलने वाले वित्तीय संस्थानों की स्थापना की। इस कानून ने सहकारी संस्थाओं को बिना सरकारी वित्तीय सहायता के स्वतंत्र रूप से काम करने की अनुमति दी, जिससे लोकतांत्रिक, सदस्य-आधारित संस्थाएं मज़बूत हुई। महिलाओं को एसएचजी और सहकारी समूहों में संगठित कर हमने बचत और ऋण की मज़बूत व्यवस्था बनायी।
सदस्य अपनी बचत को एक साझा कोष में जमा करती हैं, जिससे वे कम ब्याज़ पर छोटे ऋण ले सकती हैं। 1990 के दशक में जहां हर सदस्य प्रति माह 10 रुपये बचत करती थी, वहीं आज यह राशि बढ़कर लगभग 100–500 रुपये प्रति माह हो गई है। महिलाएं अब 2,00,000 रुपये तक का ऋण ले सकती हैं। पुनर्भुगतान की अवधि निर्धारित होती है, लेकिन ज़रूरत के अनुसार इसमें लचीलापन भी रखा गया है। ऋण परामर्श की प्रक्रिया ने महिलाओं को बेहतर पुनर्भुगतान योजना बनाने में मदद की है, और समय के साथ ऋण का उपयोग आपात ज़रूरतों से हटकर उत्पादक कार्यों, जैसे व्यवसाय शुरू करना और संपत्ति निर्माण, की ओर बढ़ा है।
विकास तब आगे बढ़ता है, जब लोगों को अपने जीवन को आकार देने की वास्तविक स्वतंत्रता मिलती है।
स्वशक्ति पहल केवल वित्त तक सीमित नहीं रही। इसने शिक्षा में निवेश किया और घरेलू हिंसा, बाल विवाह, परित्याग और संपत्ति अधिकार जैसे मुद्दों पर मुफ़्त कानूनी सहायता प्रदान की। सूक्ष्म बीमा और सामाजिक सुरक्षा पर ध्यान देते हुए, स्वशक्ति ने गरिमा, विकल्प और सम्मान को बढ़ावा दिया और परंपरागत लैंगिक मानदंडों को चुनौती दी।
स्वशक्ति अमर्त्य सेन के उस विचार का उदाहरण है, जिसमें वास्तविक स्वतंत्रताओं के विस्तार के लिए महिलाओं को अपनी शक्तियों को पहचानने, भविष्य को सुरक्षित करने और अपने समुदायों में नेतृत्व करने के अवसर दिए जाते हैं। यह दिखाता है कि कैसे व्यक्तिगत स्तर पर विकसित की गई क्षमताएं, जैसे कौशल, आत्मविश्वास और एकजुटता, सामूहिक प्रयासों के साथ मिलकर गरीबी, भेदभाव और लैंगिक असमानताओं को चुनौती दे सकती हैं।
अमर्त्य सेन के विचारों में एक सामान्य सूत्र यह है कि स्वतंत्रता और विकास का अर्थ है लोगों को ऐसा जीवन जीने की क्षमता देना, जो गरिमा से पूर्ण हो और गरीबी व अन्य वंचनाओं से मुक्त हो। इसी दृष्टिकोण को वह ‘अधिकार’ की अवधारणा में भी प्रस्तुत करते हैं।
विकास के लिए ‘अधिकार’ का दृष्टिकोण
अमर्त्य सेन बताते हैं कि किसी व्यक्ति की वस्तुओं और सेवाओं (जिसमें भोजन भी शामिल है) तक पहुंच उसकी सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है, न कि किसी क्षेत्र में उपलब्ध कुल संसाधनों या अधिकारों पर। वह लिखते हैं, “भुखमरी इस बात को रेखांकित करती है कि कुछ लोगों के पास खाने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं है। यह इस बात को रेखांकित नहीं करती कि खाने के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध नहीं है।”
वर्ष 1943 के बंगाल अकाल पर उनके शोध से यह सामने आया कि 30 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु केवल खाद्यान्न की कमी के कारण नहीं हुई थी, बल्कि औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार की नीतियों के कारण संसाधनों का असमान वितरण हुआ, जिससे व्यापक भुखमरी फैली। यह समझ आज भी महत्वपूर्ण है। भारत में रिकॉर्ड स्तर पर खाद्यान्न भंडार मौजूद हैं, फिर भी 81 करोड़ से अधिक लोग मुफ़्त राशन पर निर्भर हैं।
एम एस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन (एमएसएसआरएफ) की भवानी आर वी बताती हैं कि इस दृष्टिकोण ने महाराष्ट्र, ओडिशा और तमिलनाडु में खाद्य असुरक्षा से निपटने के उनके काम को कैसे प्रभावित किया।

सामुदायिक अनाज बैंकों के माध्यम से खाद्य असुरक्षा का समाधान (भवानी आर वी)
हालांकि हरित क्रांति के बाद भारत में कुल खाद्य उत्पादन और भंडार बढ़े हैं, लेकिन हाशिए पर रहने वाले समुदाय, विशेषकर आदिवासी क्षेत्रों में, आज भी स्थायी और मौसमी दोनों प्रकार की खाद्य असुरक्षा का सामना करते हैं। यहां अप्रत्यक्ष भूख, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी, स्थानीय स्तर पर खाद्य संकट और यहां तक कि अकाल जैसी स्थितियां भी देखने को मिलती हैं, जो खाद्य कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण उत्पन्न होती हैं।
एमएसएसआरएफ के काम का एक हिस्सा लोगों को उनके खाद्य अधिकारों के बारे में जागरूक करना था। इसके लिए ‘एंटाइटलमेंट कार्ड’ बनाए गए, जिनमें सभी सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों की जानकारी दी जाती थी, और लोगों को राशन प्राप्त करने में सहायता दी जाती थी। गांवों के कम्युनिटी हंगर फाइटर्स (सीएचएफ) ने इस जागरूकता को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।
काम का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू फार्मिंग सिस्टम फॉर न्यूट्रिशन (एफएसएन) दृष्टिकोण पर आधारित था, जिसे एम एस स्वामीनाथन ने प्रस्तावित किया था। एफएसएन को स्थानीय कृषि-परिस्थितियों और पोषण संबंधी ज़रूरतों के अनुसार डिज़ाइन किया गया है। महाराष्ट्र के वर्धा जिले और ओडिशा के कोरापुट के गांवों के समूह में यह कार्य किया गया, जिसमें पोषण की कमी का आकलन किया गया, समुदाय के साथ निष्कर्ष साझा किए गए और मिलकर यह समझा गया कि कृषि को कैसे पोषण-संवेदनशील बनाया जा सकता है।
सीएचएफ के सदस्यों को संतुलित आहार, कुपोषण के पीढ़ीगत प्रभाव और विशेष रूप से किशोरियों तथा गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए पोषण के महत्व पर प्रशिक्षण दिया गया। इस दौरान सामाजिक वर्जनाओं को भी चुनौती दी गई। सीएचएफ के सदस्य सामुदायिक स्तर पर बदलाव के प्रतिनिधि बने। उन्होंने विविध आहार को बढ़ावा दिया और महिलाओं के अंत में भोजन करने जैसी रूढ़िवादी सामाजिक प्रथाओं का विरोध किया।
ओडिशा और तमिलनाडु में ग्रामीणों की मदद से अनाज बैंक स्थापित किए गए, ताकि खराब मौसम में भी खाद्य उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके। इसमें समुदायों को एक निश्चित मात्रा में खाद्यान्न का भंडार बनाए रखने को लेकर सक्षम बनाने के लिए ज़रूरी विकेंद्रीकरण भी शामिल था।
यह अनुभव अमर्त्य सेन के उस विचार से प्रेरित है, जिसमें अधिकार-आधारित दृष्टिकोण अपनाकर भोजन तक समान पहुंच सुनिश्चित करने पर ज़ोर दिया गया है। यह दृष्टिकोण केवल कुल उत्पादन और भंडार पर ध्यान देने से आगे की सोचता है और भारत के सबसे कमज़ोर समुदायों के पोषण स्तर को समझने पर केंद्रित है। इनमें से कई लोग स्वयं वे हैं, जो इन राष्ट्रीय आंकड़ों में शामिल खाद्यान्न का उत्पादन करते हैं।
इसके अलावा, अमर्त्य सेन के अधिकार, क्षमता और विकास संबंधी विचारों में लोगों के सामाजिक जीवन के सुधार पर विशेष ध्यान दिया गया है, जिसमें नागरिक और राजनीतिक अधिकार तथा स्वतंत्रताएं शामिल हैं।
विमर्शात्मक प्रक्रियाओं में भागीदारी के माध्यम से विकास
वर्ष 2004 के अपने एक भाषण में अमर्त्य सेन ने कहा, “लोकतंत्र को देखने के दो अलग-अलग तरीके हैं…एक दृष्टिकोण, जिसे मैं ‘पब्लिक बैलट परिप्रेक्ष्य’ कहूंगा, यह लोकतंत्र को मुख्य रूप से बहुमत के शासन के रूप में देखता है और मतदान की स्वतंत्रता तथा चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर ध्यान देता है। दूसरा दृष्टिकोण, जिसे मैं ‘पब्लिक रीज़न परिप्रेक्ष्य’ कहता हूं, लोकतंत्र को सहभागी तर्क-विमर्श और सार्वजनिक निर्णय-प्रक्रिया के अवसर के रूप में देखता है…”
सेन का ‘सार्वजनिक तर्क-विमर्श’ के रूप में लोकतंत्र का विचार इस बात पर ज़ोर देता है कि नागरिक अपने जीवन को प्रभावित करने वाले निर्णयों में सार्थक रूप से भाग ले सकें। ऐसे विमर्शात्मक मंच अधिक समावेशी और न्यायपूर्ण परिणाम ला सकते हैं—केवल लोगों को अधिकारों और सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच दिलाकर ही नहीं, बल्कि वर्ग, जाति, धर्म और लिंग पर आधारित सत्ता के रूढ़िवादी ढांचों को चुनौती देकर भी।
वर्ष 1996 में केरल की लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट सरकार ने पीपुल्स प्लान कैंपेन (पीपीसी) की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य सत्ता और संसाधनों को स्थानीय स्तर पर स्थानांतरित करना और नागरिकों को विकास प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनाना था। वर्ष 1962 में स्थापित जन विज्ञान आंदोलन केरल शास्त्र साहित्य परिषद (केएसएसपी) ने इस अभियान के दौरान लोगों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।
केरल में सहभागी स्थानों का विस्तार (सुवोजीत चट्टोपाध्याय)
यह अभियान ई एम एस नम्बूदरीपाद के उस विचार से प्रेरित था, जिसमें लोगों की भागीदारी के माध्यम से समाजवाद की परिकल्पना की गयी थी। इसका उद्देश्य था राज्य को लोगों के करीब लाना और स्थानीय योजनाओं को मज़बूत करना, जिससे बाज़ार की शक्तियों पर समुदायों का नियंत्रण सुनिश्चित हो सके। इस प्रक्रिया में वास्तविक विकेंद्रीकरण हुआ और राज्य की योजना निधि का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा पंचायतों और नगरपालिकाओं को दिया गया। साथ ही, कर्मचारी और निर्णय लेने की शक्तियां भी स्थानीय निकायों को सौंप दी गयी, जिससे पंचायतें प्रशासनिक इकाइयों से बदलकर वास्तविक स्थानीय स्वशासन की संस्थाएं बन गईं।
केएसएसपी के सदस्यों ने सरकारी अधिकारियों, निर्वाचित प्रतिनिधियों और स्वयंसेवकों को प्रशिक्षण दिया, ताकि वे स्थानीय स्तर पर व्यापक योजना बना सकें। स्थानीय योजनाओं और विकास से जुड़ी तकनीकी अवधारणाओं को सरल बनाया गया, ताकि हर व्यक्ति प्रक्रियाओं को समझ सके और सक्रिय रूप से उनमें भाग लेकर अपनी आवाज़ लोगों तक पहुंचा सके। यह अमर्त्य सेन के उस विचार को दर्शाता है, जिसमें सूचित सार्वजनिक तर्क-विमर्श के तहत विमर्शात्मक प्रक्रिया को सभी नागरिकों के लिए सुलभ बनाना ज़रूरी है, चाहे उनकी औपचारिक शिक्षा का स्तर कुछ भी हो।
केएसएसपी का एक महत्वपूर्ण योगदान सरल संसाधन सामग्री, जैसे मार्गदर्शिका और पुस्तिकाएं, तैयार करना और जल प्रबंधन, शिक्षा तथा जन स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में स्थानीय ज़रूरतों के अनुरूप वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग प्रदान करना था। इसने ग्राम सभाओं को उनके विकास प्राथमिकताओं को परियोजनाओं में बदलने में मदद की, जिससे उन्हें उच्च सरकारी स्तर पर भेजकर वित्तीय सहायता प्राप्त की जा सके। समुदाय के सदस्यों को औपचारिक प्रक्रियाओं में शामिल कर और विकास सेमिनार आयोजित कर, केएसएसपी ने समावेशी निर्णय-प्रक्रिया को बढ़ावा दिया और राज्य स्तर पर बड़े पैमाने पर लागू एक विमर्शात्मक लोकतंत्र का मॉडल प्रस्तुत किया।
राजस्थान से केरल तक की ये तमाम पहलें अमर्त्य सेन के एक केंद्रीय विचार को दर्शाती हैं: विकास तब आगे बढ़ता है, जब लोगों को अपने जीवन को आकार देने की वास्तविक स्वतंत्रता मिलती है। सेन के विचारों और विकास से जुड़े ज़मीनी कार्यों के बीच यह सामंजस्य, उनके विचारों की व्यापकता और स्थायित्व को दर्शाता है।
विकास को टिकाऊ बनाना और सामूहिक स्वायत्तता को बड़े पैमाने पर बनाए रखने (व्यक्तिगत गरिमा को सुरक्षित रखते हुए) के लिए राज्य और नागरिक समाज के बीच वास्तविक साझेदारी आवश्यक है। यह साझेदारी विकास को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक बनी रहती है। साथ ही यह भी आवश्यक है कि स्वतंत्रता, गरिमा और लोकतांत्रिक भागीदारी जैसे मूल्यों को बनाए रखा जाए। ये वही मूल्य हैं, जो अमर्त्य सेन के योगदान के केंद्र में हैं और जिनसे प्रेरित होकर उनके विचार आज भी व्यवहार में जीवित हैं।
*इस अनुवाद में मूल लेख के सभी हाइपरलिंक बिना किसी परिवर्तन के शामिल किए गए हैं।
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लेखक के बारे में
- सुवोजीत चट्टोपाध्याय पूर्वी अफ्रीका और दक्षिण एशिया में शासन और विकास से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं। उनकी रुचि नीति-निर्माण, विकास को प्रभावित करने वाले क्रियान्वयन संबंधी प्रश्नों और विकास की राजनीति के अध्ययन में है। सुवोजीत ने अर्थशास्त्र में स्नातक की डिग्री दिल्ली के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से प्राप्त की है, तथा इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल मैनेजमेंट, आनंद और इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज़, ससेक्स (यूके) से परास्नातक डिग्रियां हासिल की हैं।
- लिबी जॉनसन ग्राम विकास, ओडिशा के कार्यकारी निदेशक हैं। वह एक विकास प्रबंधन विशेषज्ञ हैं जिनके पास सरकारी और गैर-सरकारी दोनों क्षेत्रों में ज़मीनी स्तर और नीति स्तर पर काम करने का 22 वर्षों से अधिक का अनुभव है। उन्होंने ग्रामीण प्रबंधन संस्थान, आणंद, गुजरात से ग्रामीण प्रबंधन में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया है। 1999 के ओडिशा सुपर साइक्लोन के बाद लिबी ने ग्राम विकास की राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण गतिविधियों का समन्वय किया। लिबी ने केरल और तमिलनाडु में मछुआरों के सामूहिक प्रयास एसआईएफ़एफ़एस द्वारा हिंद महासागर में सुनामी के बाद के पुनर्निर्माण के लिए भी काम किया है।
