कार्बन क्रेडिट क्या है और इसके वैश्विक स्तर पर क्या मायने हैं?

जब हम कार्बन क्रेडिट की बात करते हैं, तो चर्चा अक्सर कुछ सीमित तकनीकी पहलुओं तक सिमट जाती है। लेकिन ज़मीनी हकीकत में यह कहीं अधिक जटिल और बहुआयामी है। सामाजिक और आर्थिक संदर्भ में देखें, तो कार्बन क्रेडिट सिर्फ एक वित्तीय साधन नहीं, बल्कि एक विचार, एक उभरता बाज़ार, और कई बार एक उलझन भी है, जिसे समझना आसान नहीं होता।
कार्बन क्रेडिट कोई जादुई समाधान नहीं है, जो जलवायु संकट को एक झटके में हल कर दे। यह एक तकनीकी और वाणिज्यिक ढांचे के भीतर काम करने वाला माध्यम है। कुछ हद तक एक पुल की तरह, जो उत्सर्जन को मापने, और फिर उसे बाज़ार के जरिए संचालित करने की कोशिश करता है। इसका उद्देश्य है कि प्रदूषण घटाने को सिर्फ नैतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी सार्थक बनाया जा सके, ताकि संस्थाएं और उद्योग उत्सर्जन कम करने के लिए प्रेरित हों। इस प्रक्रिया के ज़रिए, यह दुनिया के तापमान को नियंत्रित रखने के वैश्विक प्रयासों को भी एक ठोस दिशा देने की कोशिश करता है।
सरल शब्दों में कार्बन क्रेडिट क्या है?
हम अक्सर सुनते हैं कि धरती का तापमान बढ़ रहा है। इसकी बड़ी वजह वे ग्रीनहाउस गैसें हैं, जैसे कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और मीथेन, जो बिजली उत्पादन, उद्योग, खेती और परिवहन जैसी गतिविधियों से निकलती हैं। जब इन गैसों की मात्रा बढ़ती है, तो वे वायुमंडल में गर्मी को फंसाकर रखती हैं, जिससे ग्लोबल वार्मिंग तेज़ होती है। इसका सीधा असर हम दुनिया भर में बदलते मौसम, पिघलती हिम-चादरों और बढ़ते समुद्री स्तर के रूप में देख रहे हैं।
अब सोचिए कि अगर किसी ने कहीं पर इतनी ग्रीनहाउस गैसें न छोड़ी हो (यानी वातावरण में एक टन CO₂ कम गया या हटाया गया), तो इसका एक प्रमाण होता है। यही प्रमाण, बाजार में ट्रेड होने वाला कार्बन क्रेडिट है।
यानी एक कार्बन क्रेडिट = एक टन CO₂ या उसके बराबर ग्रीनहाउस गैस को बचाने/कम करने का प्रमाण।
लेकिन यह प्रमाण यूं ही नहीं मिल जाता। इसके पीछे खास तरह के प्रोजेक्ट होते हैं। जैसे, सोलर या पवन ऊर्जा से बिजली बनाना, पेड़ लगाना, या मिट्टी में कार्बन अवशोषण बढ़ाना आदि। जब ये प्रोजेक्ट साबित कर देते हैं कि उन्होंने सचमुच उत्सर्जन कम किया है, तब उन्हें कार्बन क्रेडिट मिलते हैं। इसके बाद ये क्रेडिट बाज़ार में खरीदे-बेचे जाते हैं। कंपनियां, सरकारें या अन्य संस्थाएं इन्हें इसलिए खरीदती हैं, ताकि वे अपने कुल उत्सर्जन को संतुलित कर अपना ‘नेट-ज़ीरो’ लक्ष्य पूरा कर सकें।
यह पूरी प्रक्रिया, जिसमें उत्सर्जन को मापना, उसे क्रेडिट में बदलना, बाज़ार में बेचना और फिर खरीदारों द्वारा उसे अपने लक्ष्यों के लिए इस्तेमाल करना शामिल है, कार्बन बाज़ार या कार्बन ट्रेडिंग सिस्टम कहलाती है। इस तरह, कार्बन क्रेडिट सिर्फ पर्यावरण की भाषा नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था की भी भाषा बन जाता है, जहां प्रदूषण कम करने को एक ठोस “मूल्य” मिलता है, और जलवायु कार्रवाई को आर्थिक प्रोत्साहन के साथ जोड़ा जाता है।

यह विचार कैसे विकसित हुआ?
कार्बन क्रेडिट का विचार वैश्विक जलवायु वार्ता के साथ धीरे-धीरे आकार लेता गया। वर्ष 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल ने पहली बार विकसित देशों के लिए उत्सर्जन घटाने के बाध्यकारी लक्ष्य तय किए। इन्हें हासिल करने के लिए ‘कैप-एंड-ट्रेड’ और ‘ऑफसेट’ जैसे प्रावधान सामने आए। यानी जहां सीधे उत्सर्जन कम करना मुश्किल हो, वहां अन्य जगहों पर किए गए प्रमाणित प्रयासों के ज़रिए लक्ष्य हासिल किया जा सके। यहीं से कार्बन को एक मापी जा सकने वाली इकाई के रूप में स्वीकार्यता मिली।
वर्ष 2015 के पेरिस समझौते ने इस ढांचे को और व्यापक बनाया। अब हर देश को राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) तय करने थे। साथ ही अंतर्राष्ट्रीय कार्बन बाज़ार को भी मान्यता मिली। आज कार्बन बाज़ार एक बड़े आर्थिक क्षेत्र के रूप में उभर चुका है। विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक कार्बन बाज़ार 100 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच चुका है, और इसके विस्तार की बड़ी संभावना है।
भारत ने भी इस दिशा में अपने लक्ष्य तय किए हैं। वर्ष 2030 तक उत्सर्जन तीव्रता में 45% की कमी और वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो हासिल करने का संकल्प। इन लक्ष्यों को पाने में बाज़ार की भूमिका को देखते हुए, भारत सरकार द्वारा वर्ष 2023 में कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (सीसीटीएस) पेश की गयी।
सीसीटीएस का उद्देश्य एक राष्ट्रीय कार्बन बाज़ार का ढांचा खड़ा करना है, जिसके चरणबद्ध क्रियान्वयन की दिशा वर्ष 2026–27 के आसपास तय की गयी है। इसके तहत चुने गए क्षेत्रों/उद्योगों के लिए उत्सर्जन घटाने के मानक तय किए जाते हैं। जो इकाइयां इन मानकों से बेहतर प्रदर्शन करती हैं, वे क्रेडिट अर्जित कर सकती हैं। वहीं जो पीछे रह जाती हैं, उन्हें या तो ये क्रेडिट खरीदने होंगे या निर्धारित दंड/पर्यावरण क्षतिपूर्ति भरणी होगी।
इस तरह की नीति का मूल उद्देश्य यह है कि उत्सर्जन का केवल कागज़ों में हेरफेर न हो, बल्कि यह वास्तविक रूप से घटे। साथ ही जहां यह संभव न हो, वहां उसकी पारदर्शी, मापनीय भरपाई सुनिश्चित की जा सके।
भारत में कार्बन क्रेडिट की वास्तविक स्थिति
भारत में कार्बन क्रेडिट का विचार धीरे-धीरे ज़मीन पर आकार ले रहा है। खासतौर पर कृषि क्षेत्र में, जहां इसके नए प्रयोग सामने आ रहे हैं।
उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में आईआईटी रुड़की और राज्य सरकार ने मिलकर एक पायलट मॉडल की शुरूआत की है। इस पहल के तहत किसानों को उनकी खेती की पद्धतियों, जैसे मिट्टी में कार्बन संजोना या पेड़ लगाना, के आधार पर कार्बन क्रेडिट दिए जा रहे हैं। यह पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक मापन और सत्यापन पर आधारित है। सिद्धांत वही है: हर एक टन CO₂ के बराबर कमी या अवशोषण पर एक कार्बन क्रेडिट। इन क्रेडिट्स से होने वाली आय का एक हिस्सा, कई मामलों में लगभग 50%, सीधे किसानों तक पहुंचता है।
इस तरह के मॉडलों ने यह संकेत दिया है कि अगर ढांचा सही बने, तो कार्बन बाज़ार किसानों के लिए आय का एक नया स्रोत बन सकता है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, बड़ी संख्या में किसान इस प्रक्रिया से जुड़कर सामूहिक रूप से उल्लेखनीय आय अर्जित कर चुके हैं।
उत्तरी भारत के ही पंजाब और हरियाणा में भी छोटे किसानों को ध्यान में रखकर ऐसे कार्यक्रम शुरू हुए हैं, जहां प्राकृतिक या कम-उत्सर्जन वाली खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। उदाहरण के तौर पर, डायरेक्ट सीडिंग और नो-टिलेज जैसी तकनीकें न केवल मिट्टी की सेहत सुधारती हैं, बल्कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को भी कम करती हैं। इस कमी को मापकर किसानों को कार्बन क्रेडिट दिए जा सकते हैं, जो उनकी आय में अतिरिक्त योगदान देते हैं।
दक्षिण भारत में भी यह प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। कर्नाटक के कोप्पल ज़िले में नाबार्ड के सहयोग से चल रहे कुछ पायलट कार्यक्रमों में बायोमास प्रबंधन और बागवानी (जैसे आम के पेड़ लगाना) को कार्बन प्रोजेक्ट्स से जोड़ा गया है। हालांकि, यहां एक दूसरी तस्वीर भी दिखती है। भुगतान में देरी, सत्यापन की जटिल प्रक्रिया और संचार की कमी जैसी चुनौतियां किसानों के भरोसे को प्रभावित करती हैं। यह याद दिलाता है कि कार्बन बाज़ार सिर्फ अवसर नहीं, बल्कि संस्थागत क्षमता और पारदर्शिता की भी मांग करता है।
कुल मिलाकर, भारत का अनुभव यह बताता है कि कार्बन क्रेडिट अब बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट्स तक सीमित नहीं है। कृषि, जो लंबे समय तक जलवायु बहस में हाशिये पर थी, एक संभावित आय के स्रोत के रूप में उभर रही है। लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या हम इसे किसानों के लिए भरोसेमंद, सरल और न्यायसंगत बना पाते हैं।
कार्बन क्रेडिट सिर्फ खेती तक सीमित नहीं है। मुंबई मेट्रो लाइन्स 2ए और 7 ने भी कार्बन न्यूट्रलिटी हासिल की है क्योंकि सार्वजनिक परिवहन में लोगों के शिफ्ट होने से प्रति वर्ष लाखों टन CO₂ की बचत हुई और इसके लिये 85,849 कार्बन ऑफसेट यूनिट भी प्राप्त हुए हैं। इसी तरह तमिलनाडु सरकार ने डिकार्बोनाइजेशन की जिला स्तरीय योजना और डिजिटल ट्रैकर लॉन्च किया है। यह सीधे कार्बन क्रेडिट जारी नहीं करता, बल्कि स्थानीय उत्सर्जन कम करने वाली गतिविधियों को पहचानने और रिकॉर्ड करने के लिये जमीनी ढांचे को तैयार करता है। यह पहल शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर में भी कार्बन बचत को प्रमाणित करती है।

कार्बन क्रेडिट की कहानी सिर्फ खेतों और किसानों तक सीमित नहीं है। मुंबई मेट्रो की लाइन 2ए और 7 को कार्बन न्यूट्रलिटी की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। बड़ी संख्या में लोगों के निजी वाहनों से सार्वजनिक परिवहन की ओर शिफ्ट होने से हर साल बड़ी मात्रा में CO₂ उत्सर्जन में कमी आती है। इस तरह की बचत को मापकर और प्रमाणित करके इन परियोजनाओं को हजारों की संख्या में कार्बन ऑफसेट यूनिट्स भी मिलते हैं। यह दिखाता है कि सही ढंग से डिजाइन किया गया शहरी परिवहन न सिर्फ सुविधाजनक होता है, बल्कि जलवायु के लिए भी ठोस योगदान दे सकता है। दूसरी ओर, तमिलनाडु सरकार का प्रयास एक अलग लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण पहलू सामने लाता है। राज्य ने जिला स्तर पर डिकार्बोनाइजेशन की योजना और एक डिजिटल ट्रैकर शुरू किया है। भले ही यह पहल सीधे कार्बन क्रेडिट जारी नहीं करती, लेकिन यह उन गतिविधियों को पहचानने, मापने और दर्ज करने का ढांचा तैयार करती है जो उत्सर्जन को कम करती हैं। इन उदाहरणों से साफ है कि कार्बन बचत अब केवल ग्रामीण या कृषि क्षेत्र का मुद्दा नहीं रही।
कार्बन क्रेडिट कैसे काम करता है?
कार्बन क्रेडिट की पूरी व्यवस्था कुछ स्पष्ट चरणों में समझी जा सकती है। जब कोई किसान, संस्था या प्रोजेक्ट ऐसा काम करता है, जिससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम होता है या वातावरण से अधिक कार्बन अवशोषित होता है तो सबसे पहले इस कमी को एक तय पद्धति के तहत मापा जाता है। इसी सत्यापन के आधार पर उन्हें कार्बन कटौती प्रमाणपत्र (सीआरसी) मिलते हैं। बाद में यही प्रमाण एक मानकीकृत रूप में कार्बन क्रेडिट बन जाते हैं, जिन्हें बाज़ार में खरीदा-बेचा जा सकता है।
इस बाज़ार में मुख्य रूप से दो तरह के खरीदार होते हैं।
एक वे, जिन पर कानूनन उत्सर्जन घटाने की बाध्यता होती है जैसे कुछ उद्योग या ऊर्जा क्षेत्र की कंपनियां। अगर वे तय सीमा के भीतर अपने उत्सर्जन को कम नहीं कर पाते, तो उन्हें कार्बन क्रेडिट खरीदकर इसकी भरपाई करनी होती है।
दूसरे वे, जो स्वेच्छा से यह रास्ता अपनाते हैं (अक्सर अपनी कॉर्पोरेट जिम्मेदारी या नेट-ज़ीरो लक्ष्यों को पूरा करने के लिए)। इसे स्वैच्छिक कार्बन बाज़ार कहा जाता है, जहां कंपनियां अपनी छवि और जलवायु प्रतिबद्धताओं के तहत क्रेडिट खरीदती हैं।
जहां तक कीमत का सवाल है, कार्बन क्रेडिट कोई तय दर पर नहीं बिकता। इसका मूल्य अलग-अलग देशों, बाज़ारों और नियमों के अनुसार बदलता रहता है। उदाहरण के लिए, यूरोप के अनुपालन बाज़ार में कार्बन की कीमत अपेक्षाकृत अधिक रही है, क्योंकि वहां नियम सख्त हैं और मांग स्थिर है। वहीं भारत जैसे देशों में यह बाज़ार अभी विकसित हो रहा है, इसलिए यहां मूल्य निर्धारण के तौर-तरीके भी धीरे-धीरे आकार ले रहे हैं।
कार्बन क्रेडिट मिलने की प्रक्रिया
किसी किसान के लिए कार्बन क्रेडिट पाना सीधा काम नहीं है, बल्कि यह कई चरणों में पूरा होता है। सबसे पहले तो किसानों को किसी प्रोजेक्ट डेवलपर या एग्रीगेटर के साथ जुड़ना पड़ता है, जो कई किसानों को मिलाकर एक बड़ा प्रोजेक्ट बनाता है। यानी शुरुआत से ही किसान को बाहरी संस्थाओं पर निर्भर रहना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर, मध्यप्रदेश और हरियाणा में कुछ ऐसी पहलें हुई हैं, जहां किसानों को इस तरह कार्बन क्रेडिट से जोड़ा गया है।
सबसे पहले किसान की खेती की मौजूदा स्थिति देखी जाती है, जिसे बेसलाइन कहा जाता है। इसमें जमीन, फसल और उर्वरकों के इस्तेमाल से जुड़ी जानकारी इकट्ठा की जाती है। यह काम ही कई छोटे किसानों के लिए मुश्किल हो जाता है, क्योंकि उनके लिए इतना सारा डेटा देना आसान नहीं होता। इसके बाद किसानों को कुछ नई खेती के तरीके अपनाने होते हैं, जैसे कम रासायनिक उर्वरक इस्तेमाल करना या पेड़ लगाना। हालांकि इन बदलावों का असर दिखने में भी समय लगता है।
साथ ही, इन सब कामों का लगातार रिकॉर्ड रखना पड़ता है। इसे निगरानी, रिपोर्टिंग और सत्यापन (एमआरवी) कहा जाता है। यह प्रक्रिया तकनीकी होती है और समय भी लेती है। बीच-बीच में एक बाहरी एजेंसी आकर जांच करती है कि जो बदलाव दिखाए जा रहे हैं, वे सच में हुए हैं या नहीं। इसके बाद ही कार्बन क्रेडिट दिए जाते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में किसान को जमीन के कागज, पहचान पत्र, बैंक की जानकारी और कई सालों के लिए समझौते जैसे दस्तावेज़ भी देने होते हैं। यही वजह है कि छोटे और सीमांत किसानों के लिए इसमें शामिल होना और इससे नियमित कमाई करना आसान नहीं होता है।
भारत के लिए मुख्य लाभ
स्थानीय समुदायों के लिए आय का नया स्रोत
भारत में इसका सबसे स्पष्ट असर ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में दिख रहा है। जब किसान ऐसी पद्धतियां अपनाते हैं जो मिट्टी में कार्बन को संजोती हैं, जैसे कम जुताई, फसल अवशेष प्रबंधन या वृक्षारोपण, तो वे सिर्फ पर्यावरण के लिए ही नहीं, अपनी आय के लिए भी काम कर रहे होते हैं। अगर इस बदलाव को ठीक से मापा और प्रमाणित किया जाए, तो यही प्रयास कार्बन क्रेडिट में बदलकर अतिरिक्त कमाई का जरिया बन सकता है। यह आय भले ही अभी हर जगह स्थिर या समान न हो, लेकिन यह संकेत देती है कि जलवायु कार्रवाई को स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा सकता है।
प्रदूषण कम करने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन
कार्बन बाज़ार उद्योगों के व्यवहार को भी प्रभावित करता है। जब कंपनियों के सामने यह विकल्प होता है कि या तो वे अपना उत्सर्जन घटाएं या फिर क्रेडिट खरीदें, तो कई बार वे ऊर्जा दक्षता बढ़ाने, नवीकरणीय ऊर्जा अपनाने या कम-उत्सर्जन तकनीकों में निवेश करने की ओर झुकते हैं। इस तरह, पर्यावरणीय जिम्मेदारी एक लागत भर नहीं रह जाती, बल्कि एक रणनीतिक निर्णय बन जाती है।
वैश्विक मानकों से जुड़ने का अवसर
भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम देश को अंतर्राष्ट्रीय जलवायु ढांचे से जोड़ने की दिशा में एक कदम है। अगर भारतीय प्रणाली को संयुक्त राष्ट्र के जलवायु ढांचे के मानकों के अनुरूप विकसित किया जाता है, तो देश में उत्पन्न कार्बन क्रेडिट वैश्विक बाज़ारों में भी स्वीकार्य हो सकते हैं। हालांकि, यह पूरी प्रक्रिया अभी शुरुआती दौर में है।
इस राह की चुनौतियां भी हैं
कार्बन क्रेडिट का विचार जितना आकर्षक लगता है, उसकी ज़मीनी हकीकत उतनी ही जटिल है। इसकी प्रभावशीलता इस बात पर टिकी है कि इसे कितनी पारदर्शिता, सटीकता और न्याय के साथ लागू किया जाता है।
मापन और सत्यापन की कठिनाई
कार्बन क्रेडिट की असली ताकत उसकी विश्वसनीयता में है। यानी जो उत्सर्जन घटाने या अवशोषण का दावा किया जा रहा है, वह सचमुच हुआ भी है या नहीं। इसे साबित करने के लिए एक मज़बूत एमआरवी (निगरानी, रिपोर्टिंग और सत्यापन) ढांचे की ज़रूरत होती है। बड़े प्रोजेक्ट्स में यह अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन छोटे किसानों या अलग-थलग प्रयासों के स्तर पर इसे सटीक रूप से मापना और दर्ज करना काफी चुनौतीपूर्ण है। भारत में यह ढांचा अभी विकसित हो रहा है।
विश्वसनीयता और गुणवत्ता पर सवाल
इस मामले में वैश्विक अनुभव भी पूरी तरह आश्वस्त करने वाला नहीं रहा है। कई अध्ययनों ने संकेत दिया है कि कुछ ऑफसेट प्रोजेक्ट्स ने जितनी उत्सर्जन कटौती का दावा किया, उतनी कटौती वास्तविकता में नहीं हुई। दोहरी गिनती (एक ही कमी को दो जगह गिन लेना), लीकेज (एक जगह कमी, लेकिन दूसरी जगह बढ़ोतरी) और अस्थायित्व जैसी समस्याएं इस बाज़ार की विश्वसनीयता को प्रभावित करती हैं। इससे यह सवाल उठता है कि हर कार्बन क्रेडिट का वास्तविक पर्यावरणीय मूल्य कितना सही है?
सीमित क्षेत्रीय कवरेज
अभी तक भारत में कार्बन बाज़ार का दायरा पूरी तरह व्यापक नहीं है। जब तक बड़े उत्सर्जन वाले क्षेत्र, जैसे थर्मल पावर, तेल-गैस, इस्पात और परिवहन संगठित रूप से इस ढांचे में शामिल नहीं होते, तब तक कुल प्रभाव सीमित ही रहेगा। मौजूदा पहलें महत्वपूर्ण हैं, लेकिन व्यापक असर के लिए बड़े सेक्टरों की भागीदारी ज़रूरी है।
मुनाफे के बंटवारे में असमानता
एक अहम सवाल यह भी है कि कार्बन क्रेडिट से होने वाली कमाई किसके पास जाती है? कई मामलों में देखा गया है कि प्रोजेक्ट्स से उत्पन्न आय का बड़ा हिस्सा बीच के स्तर जैसे प्रोजेक्ट डेवलपर्स, एग्रीगेटर्स और सर्टिफिकेशन एजेंसियां ले जाती हैं, जबकि छोटे किसान या समुदाय अपेक्षाकृत कम लाभ पाते हैं। कई अध्ययनों में पाया गया है कि प्रोजेक्ट्स से होने वाला लाभ अक्सर छोटे किसानों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाता या उन्हें बहुत कम हिस्सा मिलता है। उदाहरण के लिए, हरियाणा और मध्यप्रदेश में किए गए एक अध्ययन में किसानों ने बताया कि उन्हें कार्बन क्रेडिट प्रोजेक्ट्स से लगभग कोई आर्थिक लाभ नहीं मिला। कुछ अध्ययनों में किसानों ने यह भी बताया कि उन्हें यह स्पष्ट जानकारी नहीं होती कि उनके नाम पर कितने क्रेडिट बने और उनसे कितनी आय हुई। भुगतान में देरी और स्वामित्व को लेकर अस्पष्टता जैसे मुद्दे किसानों के भरोसे को और कमजोर करते हैं।
वैश्विक अनुभव से सीख
यूरोपियन यूनियन की उत्सर्जन व्यापार प्रणाली जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि सख्त नियम, स्पष्ट लक्ष्य और सशक्त निगरानी के बिना कार्बन बाज़ार प्रभावी नहीं बन सकता है। अंतर्राष्ट्रीय अनुभव यह भी बताता है कि केवल “क्रेडिट जारी करना” काफी नहीं है। उनकी गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है।
अंततः, भारत का वर्ष 2070 तक नेट-जीरो का लक्ष्य बेहद महत्वाकांक्षी है। कार्बन बाज़ार इसमें एक अहम भूमिका निभा सकता है, लेकिन यह अकेला समाधान नहीं है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या हम एक ऐसा तंत्र बना पाते हैं जो वैज्ञानिक रूप से मजबूत, सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण और प्रशासनिक रूप से भरोसेमंद हो। जहां उत्सर्जन वास्तव में घटे और स्थानीय समुदायों को उसका स्पष्ट और सीधा लाभ भी मिले।
एलजीटी वेंचर फिलैंथ्रॉपी में सीनियर इन्वेस्टमेंट मैनेजर श्रीजन, एशिया में संस्था के संरक्षण कार्यों का नेतृत्व करते हैं और जैव विविधता व जलवायु संकट से निपटने के लिए समुदाय आधारित समाधानों पर काम करते हैं। उनके विशेष योगदान के साथ, इस लेख को जूही मिश्रा और कुमार उन्नयन ने तैयार किया है।
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- इंडिया डेवलपमेंट रिव्यू (आईडीआर) डेवलपमेंट कम्यूनिटी में काम कर रहे नेतृत्वकर्ताओं के लिए बना भारत का पहला स्वतंत्र मीडिया प्लैटफ़ॉर्म है। हमारा लक्ष्य भारत में सामाजिक प्रभाव से जुड़े ज्ञान का विस्तार करना है। हम वास्तविक दुनिया की घटनाओं से हासिल विचारों, दृष्टिकोणों, विश्लेषणों और अनुभवों को प्रकाशित करते हैं।
