वैश्विक जोखिम रिपोर्ट 2026: भारत के सोशल सेक्टर के लिए क्या हैं इसके मायने?

विश्व आर्थिक मंच (वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम) स्विट्ज़रलैंड में स्थित एक स्वतंत्र गैर-लाभकारी संस्था है। इसके द्वारा हर साल वैश्विक जोखिम रिपोर्ट जारी की जाती है। यह रिपोर्ट दुनिया के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौतियों की तस्वीर पेश करती है। यह केवल सरकारों, निवेशकों या कॉर्पोरेट जगत के लिए ही नहीं, बल्कि भारत में सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले संगठनों, फंडर्स, और पेशेवरों के लिए भी काफी अहमियत रखती है।
जब कोई जोखिम आता है तो उसका असर सबसे पहले समुदायों, लोगों की आजीविका और बुनियादी सेवाओं पर पड़ता है। अमूमन इन स्थितियों में ही सामाजिक क्षेत्र के कामों की शुरुआत होती है। ऐसे में, यह समझना ज़रूरी है कि दुनिया किन खतरों की ओर बढ़ रही है और उनका असर भारत के सबसे कमज़ोर समुदायों पर किस तरह पड़ सकता है।
वैश्विक जोखिम रिपोर्ट 2026 हमें इन्हीं जोखिमों को समझने में मदद करती है। यह रिपोर्ट अल्पकाल (अगले दो वर्ष) और दीर्घकाल (अगले दस वर्ष) में दुनिया के सामने खड़े सबसे बड़े जोखिमों का आकलन करती है। इस वर्ष की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया अब एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां जोखिम अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।
भारत जैसे देश में, जहां जलवायु संकट, असमानता, बेरोज़गारी और डिजिटल परिवर्तन साथ-साथ चल रहे हैं, वहां इस रिपोर्ट के निष्कर्ष सामाजिक क्षेत्र के लिए विशेष महत्व रखते हैं।
वैश्विक तनाव का स्थानीय असर
इस वर्ष भू-आर्थिक टकराव को दुनिया का सबसे बड़ा तात्कालिक जोखिम माना गया है। यह पहली बार है कि इस जोखिम ने सूची में शीर्ष स्थान हासिल किया है। लगभग एक-तिहाई उत्तरदाताओं ने इसे अगले दो वर्षों के लिए सबसे गंभीर खतरा माना।
रूस-यूक्रेन युद्ध, लाल सागर में व्यापारिक व्यवधान, सेमीकंडक्टर आपूर्ति को लेकर अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, ये सभी उदाहरण बताते हैं कि वैश्विक व्यापार अब केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र बन चुका है।
भारत इसका प्रभाव पहले ही महसूस कर चुका है। उदाहरण के लिए, 2022 के बाद कच्चे तेल और उर्वरकों की कीमतों में हुई वृद्धि ने महंगाई बढ़ाई है। खाद्य मुद्रास्फीति का सीधा असर निम्न-आय वाले परिवारों पर पड़ा है। जब रसोई महंगी होती है, तो इसका असर सबसे पहले पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य पर पड़ता है।
सामाजिक संस्थाओं के लिए इसका मतलब यह है कि समुदायों की जरूरतें बढ़ सकती हैं, जबकि फंडिंग में और ज़्यादा अनिश्चितता आ सकती है। वैश्विक आर्थिक मंदी, सीएसआर और अंतर्राष्ट्रीय परोपकारी निवेश पर असर डाल सकती है।

गलत सूचना और एआई से जुड़ी चुनौतियां
लगातार दूसरे वर्ष गलत जानकारी और भ्रामक जानकारी को शीर्ष अल्पकालिक जोखिमों में शामिल किया गया है। यह केवल मीडिया की समस्या नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक एकजुटता के लिए सीधी चुनौती है।
रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले दो वर्षों में यह जोखिम चुनावी प्रक्रियाओं, सामाजिक ध्रुवीकरण और नागरिक विश्वास को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। 2026 तक दुनिया की आधी से अधिक आबादी उन देशों में चुनावी प्रक्रियाओं का अनुभव करेगी, जहां डिजिटल दुष्प्रचार एक प्रमुख चिंता है।
गलत सूचना सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों को कैसे बाधित कर सकती है यह हमने भारत में कोविड-19 के दौरान टीकों को लेकर फैली अफवाहों के समय देख ही लिया था। कई राज्यों में टीके लगवाने के लिए लोगों को राज़ी करने के लिए स्वास्थ्यकर्मियों को समुदायों में अतिरिक्त प्रयास करने पड़े थे।
आर्टीफिशिअल इंटेलीजेंस या एआई डिजिटल दुष्प्रचार की इस चुनौती को और जटिल बना रहा है। रिपोर्ट बताती है कि एआई-संचालित डीपफेक और स्वचालित सामग्री गलत सूचना को अभूतपूर्व पैमाने पर फैला सकती है। सामाजिक क्षेत्र में कार्यरत संस्थाओं के लिए इसका मतलब यह है कि उन्हें डिजिटल साक्षरता और तथ्य-जांच को अब अपने कार्यक्रमों का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा।
जलवायु संकट अगले दशक का सबसे बड़ा खतरा
यदि अल्पकाल में भू-राजनीति और गलत सूचना जैसे संकट हावी हैं, तो दीर्घकालिक सूची पर पर्यावरण से जुड़े जोखिमों का दबदबा है। अगले दस में पूरी दुनिया पर्यावरण से जुड़े इन चार प्रमुख जोखिमों का सामना करेगी:
- चरम मौसम की स्थितियां
- जैव विविधता को नुकसान और पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) का असंतुलन
- पृथ्वी की प्रणालियों में गंभीर परिवर्तन
- प्राकृतिक संसाधनों की कमी
रिपोर्ट के अनुसार, लगभग दो-तिहाई उत्तरदाताओं ने चरम मौसम की स्थितियों को अगले दशक का सबसे गंभीर खतरा माना।
भारत में चरम मौसम से जुड़ा यह आंकड़ा केवल सैद्धांतिक नहीं है। 2025 में उत्तर भारत में रिकॉर्ड तोड़ हीटवेव, असम और बिहार में बाढ़, और दक्षिण भारत में जल संकट ने दिखा दिया कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं, बल्कि मौजूदा समस्या है।
भारत का लगभग आधा कार्यबल कृषि और ऐसे क्षेत्रों पर निर्भर है जो जलवायु परिवर्तन को लेकर संवेदनशील हैं। ऐसे में जलवायु परिवर्तन सीधे आजीविका, खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।
असमानता और सामाजिक ध्रुवीकरण का विकास पर प्रभाव
रिपोर्ट में सामाजिक ध्रुवीकरण को लगातार प्रमुख जोखिम के तौर पर सूचीबद्ध किया गया है। आर्थिक अवसरों की असमान पहुंच, आय में बढ़ती विषमता और संस्थानों पर घटता भरोसा इस चुनौती को और गंभीर बना देते हैं। रिपोर्ट के सर्वेक्षण में बड़ी संख्या में उत्तरदाताओं ने माना कि आने वाले वर्षों में सामाजिक विभाजन और आर्थिक असमानता और गहरी हो सकती है।
भारत में यह स्थिति कई रूपों में दिखाई देती है। उदाहरण के लिए, कोविड महामारी के दौरान डिजिटल विभाजन ने शिक्षा में असमानता को उजागर किया। इस दौरान ग्रामीण भारत के लाखों बच्चे ऑनलाइन शिक्षा से वंचित रह गए। इसी तरह, रोज़गार में असमानता, लैंगिक अंतर और सामाजिक पहचान के आधार पर अवसरों की विषमता विकास की गति को प्रभावित करती है।
सामाजिक क्षेत्र के लिए यह संकेत है कि सेवा वितरण के साथ-साथ सामाजिक विश्वास और समावेशन को मजबूत करना भी उतना ही आवश्यक है।

तैयारी की कमी सबसे बड़ा जोखिम है
रिपोर्ट का एक चिंताजनक निष्कर्ष यह है कि अधिकांश उत्तरदाता वैश्विक संस्थाओं की क्षमता को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। केवल लगभग 17 प्रतिशत लोगों ने माना कि दुनिया जटिल वैश्विक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार है।
यह आंकड़ा सामाजिक क्षेत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह है कि आने वाले संकटों का सामना करने में स्थानीय संस्थाओं, सामुदायिक नेटवर्कों और नागरिक समाज की भूमिका और बढ़ेगी। भारत में ओडिशा इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। 1999 के सुपर साइक्लोन में यहां 10,000 से अधिक लोगों की जान गई थी। लेकिन हाल के चक्रवातों में बेहतर तैयारी और सामुदायिक भागीदारी के कारण यहाँ मृत्यु दर में भारी कमी आई।
इस रिपोर्ट से यह समझ आता है कि जो संस्थाएं जोखिम के आकलन, डिजिटल सुरक्षा, जलवायु संबंधी संकटों का सामना करने की क्षमता और वित्तीय विविधता पर निवेश करेंगी, वे भविष्य में अधिक प्रभावी साबित होंगी।
भारतीय सामाजिक क्षेत्र के लिए मुख्य सबक
इस रिपोर्ट से भारत के सोशल सेक्टर के लिए पांच स्पष्ट संदेश सामने आते हैं:
- स्थानीय कार्यक्रमों को वैश्विक रुझानों से जोड़कर देखना होगा।
- जलवायु, तकनीक और असमानता को अलग-अलग नहीं, बल्कि परस्पर जुड़े मुद्दों के रूप में समझना होगा।
- समुदायों की बदलते हालात के साथ खुद को ढालने की क्षमता पर निवेश बढ़ाना होगा।
- डिजिटल भरोसे और सूचना को खोजने, समझने, जांचने और उसे सही तरीके से इस्तेमाल करने को प्राथमिकता देनी होगी।
- कोई संस्था दीर्घकाल में तभी सफल हो सकेगी जब वह संकटों और बदलावों के समय भी अपने काम को प्रभावी तरीके से जारी रख पाएगी।
वैश्विक जोखिमों की चर्चा अक्सर दूर की लगती है, लेकिन उनका असर हमारे गांवों, कस्बों और शहरों में साफ दिखाई देता है। महंगाई, बाढ़, गर्मी, गलत सूचना, बेरोज़गारी और सामाजिक तनाव, ये सभी भारतीय सामाजिक क्षेत्र के रोज़मर्रा के काम का हिस्सा बन चुके हैं।
दरअसल, यही इस रिपोर्ट की सबसे बड़ी प्रासंगिकता है। यह हमें बताती है कि सामाजिक क्षेत्र अब केवल सेवा प्रदाता या संकट के समय राहत पहुंचाने वाली व्यवस्था भर नहीं रह गया है। जलवायु आपदाओं से निपटने से लेकर डिजिटल दुष्प्रचार पर रोक लगाने तक, आज उससे अपेक्षा की जाती है कि वह बदलती चुनौतियों को समय रहते समझे, समुदायों के साथ मिलकर उनका सामना करे और उन प्रणालियों को मजबूत बनाए, जिन पर लोगों का जीवन टिका है।
भारत में यह ज़िम्मेदारी और भी बड़ी है। यहां विकास, असमानता, तकनीक और पर्यावरण, चारों एक साथ आगे बढ़ रहे हैं। ऐसे में, वैश्विक जोखिमों को समझना केवल अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर नज़र रखना नहीं, बल्कि यह समझना है कि उनका असर गांव की आजीविका, शहर की बस्तियों, स्कूलों, अस्पतालों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर किस तरह पड़ेगा।
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