एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 का संस्थाओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) एक ऐसा कानून है, जो भारत में व्यक्तियों और गैर-लाभकारी संगठनों द्वारा विदेशी फंडिंग प्राप्त करने और उसके इस्तेमाल को नियंत्रित करता है। इसका पालन गृह मंत्रालय द्वारा सुनिश्चित किया जाता है। यह कानून मुख्य रूप से भारतीय गैर-लाभकारी संगठनों को विदेशी स्रोतों से मिलने वाले दान पर लागू होता है, न कि व्यावसायिक लेन-देन के तहत किए जाने वाले भुगतानों पर।
समय के साथ इस कानून को और सख्त बनाया गया है। इस कड़ी में वर्ष 2020 में इसमें कुछ अहम संशोधन किए गए, जिनका गैर-लाभकारी संगठनों के कामकाज पर गहरा असर पड़ा।
मार्च, 2026 में सरकार ने लोकसभा में एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 पेश किया। इसमें कई कड़े प्रावधान प्रस्तावित किए गए हैं। इनमें यह व्यवस्था भी शामिल है कि यदि किसी संगठन का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त हो जाता है या रद्द कर दिया जाता है, तो सरकार उसकी संपत्तियों का नियंत्रण अपने हाथ में ले सकती है। साथ ही, विदेशी फंड के इस्तेमाल के लिए समय-सीमा तय करने का प्रस्ताव भी इसमें शामिल है।
इस विधेयक को लेकर विरोध भी सामने आया है। संसद में विपक्ष और गैर-लाभकारी क्षेत्र से जुड़े कई लोगों का कहना है कि इससे नागरिक समाज पर सरकारी नियंत्रण बढ़ सकता है और गैर-लाभकारी संगठनों के कामकाज में बाधा उत्पन्न हो सकती है। फिलहाल, संसद के बजट सत्र के दौरान यह विधेयक पारित नहीं हो सका और इसे अभी के लिए स्थगित कर दिया गया है।
अहम बदलाव
विधेयक में प्रस्तावित संशोधन भारत द्वारा विदेशी फंडिंग के विनियमन में एक अहम बदलाव का संकेत देते हैं। सरल शब्दों में कहें, तो अगर किसी संगठन का विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 (एफसीआरए) के तहत पंजीकरण समाप्त हो जाता है—चाहे स्वेच्छा से या किसी अन्य कारण से—तो अब सरकार के पास विदेशी फंड से बनाई गई संपत्तियों को अपने नियंत्रण में लेने के लिए एक स्पष्ट प्रक्रिया और कानूनी आधार होगा।
मौजूदा कानून क्या कहते हैं?
भारतीय कानून लंबे समय से यह मानता रहा है कि परोपकारी उद्देश्यों के लिए बनाई गई संपत्तियां संस्थापकों की निजी संपत्तियां नहीं होती। उनका उपयोग सार्वजनिक हित के लिए किया जाना चाहिए।
आयकर अधिनियम, 1961 के तहत यदि कोई गैर-लाभकारी संगठन बंद हो जाता है, तो उसकी संपत्तियां किसी अन्य गैर-लाभकारी संगठन को हस्तांतरित की जानी चाहिए या फिर उनका इस्तेमाल सार्वजनिक हित में किया जाना चाहिए। इसी तरह, एफसीआरए के पहले के प्रावधानों (जिसमें 2020 का संशोधन भी शामिल है) के तहत यह व्यवस्था थी कि किसी संगठन का पंजीकरण रद्द हो जाने की स्थिति में विदेशी फंड से बनाई गई संपत्तियों का नियंत्रण सरकार अपने हाथ में ले सकती है।
एफसीआरए की धारा 15 एक नामित प्राधिकारी (अथॉरिटी) को ऐसी स्थिति में विदेशी अंशदान से बनाई गई संपत्तियों के प्रबंधन की अनुमति देती थी जहां धारा 14 के तहत किसी संगठन का पंजीकरण रद्द कर दिया गया हो या धारा 14ए के तहत उसने अपनी मर्ज़ी से पंजीकरण छोड़ा हो।
संगठन की गतिविधियों को जारी रखने के लिए उपलब्ध धनराशि पर्याप्त न होने पर यह अथॉरिटी विदेशी अंशदान का उपयोग कर सकता था या संपत्तियों का निपटान कर सकता था।
हालांकि, यह व्यवस्था केवल उन मामलों पर लागू होती थी जहां पंजीकरण रद्द किया गया हो या स्वेच्छा से छोड़ा गया हो। ऐसे मामलों में नहीं, जहां पंजीकरण केवल नवीनीकरण न होने के कारण समाप्त हो गया हो। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि ऐसी संपत्तियों का उपयोग सार्वजनिक हित में जारी रहे, और उनका निपटान केवल अंतिम विकल्प के रूप में किया जाए।
लेकिन 2026 के विधेयक में प्रस्तावित संशोधनों के तहत अब यह व्यवस्था उन संगठनों पर भी लागू होगी, जिनका एफसीआरए लाइसेंस नवीनीकरण न होने के कारण समाप्त हो जाता है।
अब क्या बदला है?
2026 के विधेयक में प्रस्तावित संशोधन के तहत जोड़ी गई धारा 16ए में स्पष्ट रूप से यह कहा गया है कि यदि किसी संगठन का पंजीकरण रद्द हो जाता है, उसके द्वारा स्वेच्छा से वापस कर दिया जाता है या नवीनीकरण न होने के कारण समाप्त हो जाता है, तो सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकारी उसके विदेशी फंड और उनसे जुड़ी संपत्तियों का नियंत्रण अपने हाथ में ले सकता है।
यदि बाद में संगठन का एफसीआरए लाइसेंस बहाल कर दिया जाता है, तो संगठन द्वारा संपत्तियों का यह हस्तांतरण वापस लिया जा सकता है।
हालांकि, यदि समय रहते पंजीकरण बहाल नहीं किया जाता है, तो यह अधिग्रहण स्थायी हो जाता है। ऐसी स्थिति में संपत्तियां सरकारी निकायों को हस्तांतरित की जा सकती हैं या फिर बेची जा सकती हैं। उनकी बिक्री से प्राप्त राशि किसी मंत्रालय, विभाग, प्राधिकरण या केंद्र सरकार, राज्य सरकार या किसी स्थानीय निकाय की किसी एजेंसी को दी जा सकती है, या फिर भारत की संचित निधि में जमा की जा सकती है।
भारत की संचित निधि सरकार का मुख्य खाता है, जिसमें कर, ऋण और अन्य स्रोतों से प्राप्त सभी राजस्व जमा किए जाते हैं और जिससे अधिकांश सार्वजनिक खर्च किए जाते हैं। इस निधि से धन केवल संसद की मंजूरी के बाद ही निकाला जा सकता है।

मिश्रित फंडिंग से बनी संपत्तियों का क्या होगा?
कई गैर-लाभकारी संगठन अपनी संपत्तियां घरेलू और विदेशी—दोनों तरह की फंडिंग के मिश्रण से बनाते हैं। 2026 के विधेयक में कहा गया है कि पूरी तरह से या आंशिक रूप से विदेशी फंड से बनाई गई संपत्तियों का पूर्ण रूप से अधिग्रहण किया जा सकता है।
संगठन घरेलू फंड से बने संपत्ति के हिस्से को वापस पाने के लिए आवेदन कर सकते हैं, लेकिन यह तभी संभव होगा जब उस हिस्से को स्पष्ट रूप से अलग किया जा सकता हो।
व्यावहारिक स्तर पर यह काफी कठिन है, क्योंकि फंडिंग अक्सर अलग-अलग स्रोतों से इकट्ठा की जाती है और किसी संपत्ति के मूल्य को किसी एक विशेष स्रोत से जोड़कर देखना आसान नहीं होता। उदाहरण के लिए, हो सकता है कि ज़मीन घरेलू फंड से खरीदी गई हो, जबकि उस पर भवन का निर्माण विदेशी फंड से किया गया हो। ऐसी स्थिति में यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि ऐसी संपत्तियों का मूल्यांकन कैसे होगा, उनका बंटवारा किस आधार पर किया जाएगा, या उनका अधिग्रहण किस तरह किया जाएगा। इससे खासकर उन संगठनों के लिए बड़ी अनिश्चितता पैदा होती है, जिन्होंने बुनियादी ढांचे के निर्माण में निवेश किया है।
बुनियादी ढांचे के लिए फंड जुटाना और मुश्किल हो सकता है
ऐतिहासिक रूप से विदेशी अनुदान का इस्तेमाल स्कूलों, अस्पतालों और प्रशिक्षण केंद्रों जैसे बुनियादी ढांचे के निर्माण में होता रहा है। लेकिन संपत्तियों के अधिग्रहण का जोखिम और मिश्रित फंडिंग को लेकर बनी अनिश्चितता का संयुक्त असर यह हो सकता है कि डोनर और संगठन, दोनों ही दीर्घकालिक बुनियादी ढांचे में निवेश को लेकर अधिक सतर्क हो जाएं।
विधेयक में धारा 12 में प्रस्तावित संशोधन सरकार को यह अधिकार देता है कि वह ‘प्रायर परमिशन’ मार्ग से प्राप्त विदेशी फंड के उपयोग के लिए समय-सीमा तय कर सके।
संभावना है कि विदेशी डोनर अब मूल्य बढ़ाने वाली संपत्तियों—जैसे ज़मीन, भवन और कोष निधि—और कार्यक्रम के संचालन से जुड़ी संपत्तियों—जैसे लैपटॉप, टैबलेट और रोज़मर्रा के उपकरणों—के बीच अधिक स्पष्ट अंतर करेंगे। पहली श्रेणी की संपत्तियां पूंजीगत मानी जाती हैं, समय के साथ उनका मूल्य या तो वही रहता है या बढ़ता है, और उन पर नियंत्रण खोने का जोखिम अधिक होता है। ऐसे में डोनर इनके लिए फंड देने में अधिक हिचकिचा सकते हैं। इसके विपरीत, कार्यक्रम संबंधी संपत्तियों के इस्तेमाल की अवधि अपेक्षाकृत कम होती है, उनका मूल्य तेज़ी से घटता है, और वे सेवा प्रदान करने की प्रक्रिया में सहायक होती हैं। इसलिए डोनर इनके समर्थन को जारी रखने में अधिक सहज महसूस कर सकते हैं।
नतीजतन, विदेशी फंडिंग का रुझान दीर्घकालिक बुनियादी ढांचे की बजाय कार्यक्रम के संचालन, मानव संसाधन और तकनीक-आधारित हस्तक्षेपों की ओर बढ़ सकता है।
अगर संगठन एफसीआरए फंड का इस्तेमाल केवल कार्यक्रमों के लिए करें तो?
जब एफसीआरए फंड का इस्तेमाल विभिन्न गतिविधियों के लिए किया जाता है, तो संगठन अक्सर लैपटॉप, उपकरण या वाहन जैसी चीज़ें खरीदते हैं। कानूनी रूप से इन्हें भी विदेशी अंशदान से बनाई गई संपत्तियों के रूप में देखा जाता है, भले ही वे केवल कार्यक्रम के संचालन का सहायक हिस्सा हों।
इसलिए, भले ही ऐसी संपत्तियों का जोखिम अपेक्षाकृत कम होता है—क्योंकि समय के साथ उनका मूल्य घटता जाता है और उनका आर्थिक महत्व सीमित होता है—लेकिन फिर भी वे कानून के दायरे में आती हैं।
पूर्व अनुमति (प्रायर परमिशन) लाइसेंस के लिए समय-सीमा
विधेयक में धारा 12 में प्रस्तावित संशोधन सरकार को यह अधिकार देता है कि वह ‘प्रायर परमिशन’ मार्ग से प्राप्त विदेशी फंड के उपयोग के लिए समय-सीमा तय कर सके। यानी, फंड का इस्तेमाल केवल निर्धारित उद्देश्य के लिए ही नहीं, बल्कि तय समयावधि के भीतर भी करना होगा।
संपत्तियों के अधिग्रहण से जुड़े प्रावधानों के साथ मिलाकर देखें, तो यह संशोधन एक स्पष्ट दिशा की ओर इशारा करता है: विदेशी फंडिंग का रुख अब लंबी अवधि के निवेश की बजाय अल्पकालिक और कार्यक्रम-केंद्रित उपयोग की ओर मोड़ा जा रहा है।
क्या अब भी स्पष्ट नहीं है
हालांकि विधेयक यह स्पष्ट करता है कि संपत्तियों का अधिग्रहण किस तरह किया जाएगा, लेकिन रोज़मर्रा की प्रक्रियाओं से जुड़े कई सवाल अब भी अनिश्चित बने हुए हैं। जैसे:
- एफसीआरए के आवेदनों (खासकर अस्वीकृतियों) पर संगठन को सुनवाई का अवसर देने के बाद कारण सहित आदेश जारी करना अब तक एक मानक प्रक्रिया क्यों नहीं है?
- क्या धारा 8 कंपनियों में विदेशी शेयरधारिता को विदेशी अंशदान माना जाएगा?
- प्रशासनिक स्तर पर किए गए अस्वीकृति आदेशों के खिलाफ अपील की प्रक्रिया क्या होगी?
इस ढांचे के भीतर काम कर रहे गैर-लाभकारी संगठनों के लिए इसके क्या मायने हैं?
यह संशोधन भारतीय कानून के लंबे समय से स्थापित सिद्धांत को और मज़बूत करता है, जिसके अनुसार सार्वजनिक हित के लिए बनाई गई संपत्तियां निजी संपत्ति नहीं मानी जाती। लेकिन अब जो बदला है, वह है इस सिद्धांत को लागू करने की स्पष्टता और उस पर सरकारी नियंत्रण की सीमा।
गैर-लाभकारी संगठनों के लिए इसका मतलब यह है कि उन्हें एफसीआरए नवीनीकरण और अनुपालन से जुड़ी समय-सीमाओं पर बेहद सावधानी से नज़र रखनी होगी। साथ ही, विदेशी फंड का इस्तेमाल बुनियादी ढांचे और अन्य दीर्घकालिक संपत्तियों के निर्माण के लिए करते समय अतिरिक्त सतर्कता बरतनी होगी। खासकर जहां घरेलू और विदेशी, दोनों तरह की फंडिंग का इस्तेमाल एक साथ किया गया हो, वहां संपत्तियों की संरचना और वित्तीय व्यवस्था को बहुत सोच-समझकर तैयार करना होगा।
कुल मिलाकर, ये संशोधन इस ओर संकेत करते हैं कि विदेशी फंडिंग को अब ज़मीन या बुनियादी ढांचे जैसी दीर्घकालिक संपत्तियां बनाने की बजाय अल्पकालिक कामों और कार्यक्रमों के समर्थन के लिए अधिक उपयुक्त माना जा रहा है।
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लेखक के बारे में
- निवेदिता कृष्णा (एसीएस, एलएलबी) सामाजिक क्षेत्र में वकालत का काम करती हैं। अपनी संस्था पैक्टा के माध्यम से वह उद्देश्य-आधारित संगठनों (जिसमें गैर-लाभकारी संस्थाएं और सीएसआर शामिल हैं) की स्थापना और सतत विकास लक्ष्यों को लागू करने में सहयोग करती हैं। पैक्टा कानूनी परामर्श, अनुपालन, संचालन रणनीति और नीतिगत सलाहकारी सेवाएं भी प्रदान करती है।
- नमन खटवानी का कार्यक्षेत्र विवाद समाधान और सामाजिक क्षेत्र तक फैला हुआ है। उन्होंने कई लॉ फर्मों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं के चैंबर्स के साथ काम करते हुए भारत की अदालतों और न्यायाधिकरणों के समक्ष जटिल मामलों में पैरवी और कानूनी कार्य किया है। वह नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु में विज़िटिंग फैकल्टी भी हैं। नमन ने कोलंबिया लॉ स्कूल से एलएलएम और नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरिडिकल साइंसेज़ से बीए एलएलबी (ऑनर्स) की डिग्री प्राप्त की है।
