मिठास के पीछे का कड़वा सच: मराठवाड़ा के गन्ना मज़दूरों की कहानी

यह लेख बीड ज़िले में काम कर रहे अशोक तांगडे भाऊ के साथ हुई बातचीत और साझा अनुभवों पर आधारित है।
मराठवाड़ा के बीड ज़िले की मिट्टी में एक अलग ही किस्म की कहानी छिपी है, एक ऐसी कहानी जिसमें आज़ादी, सूखा, मेहनत, कर्ज और संघर्ष सब एक साथ चलते हैं। यह इलाका आठ ज़िलों का एक बड़ा हिस्सा है, जिसे मराठवाड़ा कहा जाता है। जब 15 अगस्त 1947 को पूरा देश आज़ादी का जश्न मना रहा था, तब यहां के लोगों को वह आज़ादी एक साल बाद मिली। उस समय इस इलाके पर निज़ाम का राज था और उसने भारत में विलय से इनकार कर दिया था। बाद में जब सरदार वल्लभभाई पटेल ने कार्रवाई की, तब 17 सितंबर 1948 को मराठवाड़ा आज़ाद हुआ। इसलिए यहां के लोगों के मन में एक अलग तरह की ऐतिहासिक स्मृति और मानसिकता बनी, एक तरह की सरंजामी सोच, जो समाज के ढांचे में गहराई तक बैठ गई।
यह इलाका सूखा-प्रभावित है। पानी कम गिरता है, खेती भरोसेमंद नहीं है। ऐसे में 1950 के आसपास अहमदनगर ज़िले में पहली शुगर फैक्ट्री बनी और वहीं से एक नई मज़दूरी की कहानी शुरू हुई। उस समय फैक्ट्री तक गन्ना पहुंचाने के लिए रेलवे लाइन का इस्तेमाल होता था। मज़दूरों को खेतों से गन्ना काटकर बैलगाड़ियों में भरकर रेलवे पटरी तक लाना होता था, फिर वहां से गन्ना फैक्ट्री तक जाता और शक्कर बनकर उसी रास्ते से बाहर भेजी जाती। इस काम के लिए बड़ी संख्या में मज़दूरों की ज़रूरत थी, इसलिए बीड ज़िले के कुछ लोग पहली बार गन्ना काटने के काम के लिए बाहर गए। वही शुरुआत थी, जिसने धीरे-धीरे पूरी एक परंपरा का रूप ले लिया।
जैसे किसी गांव से कुछ लोग सेना में जाते हैं और फिर धीरे-धीरे पूरा गांव उसी दिशा में बढ़ने लगता है, वैसे ही बीड ज़िले में हुआ। एक बार कुछ परिवार गन्ना काटने गए, फिर दूसरे, फिर तीसरे, और देखते-देखते पूरा ज़िला हर साल गन्ना काटने के लिए बाहर जाने लगा। यह काम ब्रिटिश समय में नहीं था, यह पूरी तरह 1950 के बाद शुरू हुआ और धीरे-धीरे यह मज़दूरी यहां के लोगों की पहचान बन गई।
सरकार से बार-बार यह मांग की गई कि इन मज़दूरों की गिनती कराई जाए, उनका पंजीकरण हो, बीमा हो, ताकि उनके अधिकार तय हो सकें। लेकिन लंबे समय तक यह सब नहीं हुआ। इस बीच महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा सामने आया। एक साथी कार्यकर्ता ने देखा कि बहुत कम उम्र की महिलाएं असामान्य रूप से कमज़ोर हो रही हैं। कम उम्र में गर्भवस्था, कम उम्र में डिलीवरी, हार्ड वर्क, पौष्टिक आहार नहीं मिलना और रहने-खाने में अस्वच्छ स्थिति, सभी का परिणाम महिलाओं के शरीर पर होता है।

जब कम उम्र में लड़की की शादी होगी, तो कम उम्र में वह गर्भवती रहती है। उसे गर्भवस्था के आखिरी दिन तक काम करना पड़ता है। आख़िरी में अगर उसको पेट में दर्द होने लगा, तब काम बंद होता है। तब तक उसे काम करना पड़ता है। और डिलीवरी के बाद, कम से कम पांचवें दिन और ज़्यादा से ज़्यादा बारहवें दिन तक उसे वापस काम शुरू करना पड़ता है। बाकी सभी जगह आपने काम किया तो आपको पैसा मिलता है। यहां आपने काम नहीं किया तो आपको जुर्माना भरना पड़ता है। इसलिए काम पर लौटना अनिवार्य है। नहीं जाने से जुर्माना देना पड़ता है और वह जुर्माना छह सौ रुपए प्रति दिन होता है। अगर पति-पत्नी नहीं गए तो बारह सौ रुपए देना पड़ता है।
महिलाओं को माहवारी के समय घर में रहना पड़ता है और फिर उसको छह सौ रुपये प्रति दिन देना पड़ता है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे महिलाएं माहवारी का टैक्स भर रही हैं। इसलिए महिलाएं कितनी भी बीमार क्यों न हों, फिर भी अपने काम पर जाना नहीं छोड़तीं। एकदम बिस्तर पर गिर गईं, तभी वे काम पर नहीं गईं। महिलाओं से बातचीत करने पर हमें यह भी पता चला कि उनमें से कई महिलाओं के गर्भाशय निकाल दिए गए हैं। यह जानकारी सुनकर हमें उनकी स्वास्थ्य समस्याओं और परिस्थितियों के बारे में और गहराई से समझने का अवसर मिला।
इतनी कम उम्र में ऐसा क्यों हुआ, यह सवाल उठने लगा। जांच-पड़ताल करने पर सामने आया कि यह समस्या बड़ी संख्या में महिलाओं के साथ हो रही है। इस मुद्दे को आगे बढ़ाया गया और धीरे-धीरे यह बात मीडिया तक पहुंची: बीबीसी, द हिन्दू जैसे मंचों पर भी यह खबर आई। लेकिन स्थानीय स्तर पर इस पर ज़्यादा असर नहीं हुआ, क्योंकि इस इलाके में शुगर फैक्ट्री और राजनीति का गहरा संबंध है।
यहां लगभग हर बड़े नेता का किसी न किसी शुगर फैक्ट्री से जुड़ाव है। पूरे महाराष्ट्र में लगभग 210 शुगर फैक्टरियां हैं, जिनमें से आधी सहकारी हैं और आधी निजी। यह शुगर लॉबी इतनी ताकतवर है कि सरकार भी इनके खिलाफ कदम उठाने से बचती है। ऐसे में मज़दूरों की समस्याएं अक्सर अनदेखी रह जाती हैं।
जहां ये मज़दूर रहते हैं, वहां रहने की स्थिति बेहद खराब होती है। छोटे-छोटे अस्थायी झोपड़े, जहां सिर और पैर एक साथ अंदर नहीं समा पाते। पानी, शौचालय, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव। ऊपर से सामाजिक भेदभाव, उन्हें “गबाड़े” कहकर पुकारा जाता है, जो उन्हें नीचा दिखाने वाला शब्द है।
तब यह तय किया गया कि अगर सरकार आंकड़े नहीं दे रही, तो खुद ही आंकड़े तैयार किए जाएं। एक छोटे से कारखाने से शुरुआत की गई। वहां पता चला कि करीब साढ़े तीन सौ ट्रक गन्ना रोज़ आते हैं और हर ट्रक पर लगभग बीस मज़दूर काम करते हैं- दस पुरुष और दस महिलाएं। जब इस संख्या को पूरे महाराष्ट्र की फैक्ट्रियों से जोड़ा गया, तो यह आंकड़ा लगभग 12 से 14 लाख मज़दूरों तक पहुंच गया। इनमें से करीब आठ लाख मज़दूर अकेले बीड ज़िले से आते हैं, बाकी आसपास के ज़िलों- परभणी, लातूर, नगर, जालना और औरंगाबाद के सीमावर्ती इलाकों से।
इन मज़दूरों के साथ उनके बच्चे भी जाते हैं। अगर आठ लाख मज़दूर दंपति हैं, तो उनके साथ लाखों छोटे बच्चे भी जाते हैं। छोटे बच्चों की देखभाल के लिए बड़ी बच्चियां जाती हैं, क्योंकि देखभाल का काम लड़कियों को दिया जाता है। इस तरह लगभग छह लाख बच्चे भी इस मज़दूरी के चक्र में फंस जाते हैं, जिनका कोई दोष नहीं होता।
जहां ये मज़दूर रहते हैं, वहां रहने की स्थिति बेहद खराब होती है। छोटे-छोटे अस्थायी झोपड़े, जहां सिर और पैर एक साथ अंदर नहीं समा पाते। पानी, शौचालय, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव। ऊपर से सामाजिक भेदभाव, उन्हें “गबाड़े” कहकर पुकारा जाता है, जो उन्हें नीचा दिखाने वाला शब्द है।
मज़दूरी का सिस्टम भी ऐसा है कि मज़दूर कर्ज के जाल में फंस जाता है। काम शुरू करने से पहले ही उसे एडवांस दिया जाता है और फिर उसी पैसे के बदले पूरा सीजन काम करना पड़ता है। पुराने कर्ज पर नया कर्ज जुड़ता जाता है। अगर कोई मज़दूर अपना मुकादम (ठेकेदार) बदलना चाहता है, तो उसे पहले पुराने कर्ज को ब्याज सहित चुकाना पड़ता है। इसलिए ज़्यादातर मज़दूर उसी चक्र में फंसे रहते हैं।
हिसाब-किताब का पूरा नियंत्रण मुकादम के पास होता है। मज़दूर को पता ही नहीं होता कि उसने कितना काम किया और उसका कितना पैसा बनता है। कई बार ट्रकों की स्लिप गायब कर दी जाती है और मज़दूर की मेहनत कागज़ों में कम कर दी जाती है। सीजन खत्म होने पर जब हिसाब होता है, तो मज़दूरों को पहले शराब और खाना दिया जाता है, फिर उनसे हिसाब पर सहमति ले ली जाती है।
धीरे-धीरे इस स्थिति के खिलाफ आवाज़ उठने लगी। मज़दूरों का पंजीकरण कराने की मांग की गई। एक प्रशासनिक अधिकारी ने इस दिशा में पहल की और गांव स्तर पर पंजीकरण का एक फॉर्म तैयार किया गया। लेकिन व्यवहार में यह प्रक्रिया बहुत धीमी रही और लाखों मज़दूरों में से सिर्फ कुछ सौ का ही पंजीकरण हो पाया।
इस बीच मज़दूरों और कार्यकर्ताओं ने मिलकर महिलाओं को हिसाब-किताब सिखाना शुरू किया। जब महिलाओं ने हिसाब समझना शुरू किया, तो उन्होंने मुकादम की गड़बड़ियां पकड़नी शुरू कर दीं। एक महिला ने करीब डेढ़ लाख रुपये की गड़बड़ी पकड़ी और अपना पैसा वापस लिया। इससे मुकादम डरने लगे और कई जगह महिलाओं को काम से निकालने की धमकी दी जाने लगी।
मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह मुद्दा लगातार उठता रहा। विदेशी अखबारों और संस्थाओं ने जब इन फैक्ट्रियों की स्थितियों पर रिपोर्ट तैयार की, तो अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में दबाव बना। कुछ फैक्ट्रियों ने मज़दूरों को जूते, हेलमेट, पानी और डॉक्टर जैसी सुविधाएं देना शुरू किया, लेकिन यह अभी भी सीमित स्तर पर है।
आज भी हर साल लाखों मज़दूर मराठवाड़ा से निकलते हैं। वे गन्ना काटते हैं, शक्कर बनाते हैं, दूसरों के जीवन में मिठास घोलते हैं, लेकिन उनकी अपनी ज़िंदगी संघर्ष और कड़वाहट से भरी रहती है। फिर भी बदलाव की एक उम्मीद जगी है, अब मज़दूर सवाल पूछ रहे हैं, महिलाएं हिसाब समझ रही हैं, संगठन मज़बूत हो रहे हैं।
यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। यह एक चलती हुई लड़ाई है;
सम्मान, अधिकार और इंसानियत के लिए।
लेखक के बारे में
- महीपाल मोहन दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम करते हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं।
- अशोक तांगड़े महाराष्ट्र के बीड जिले के एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जो मानवाधिकार और मज़दूरों के अधिकारों के लिए कार्य करते हैं। वे विभिन्न सामाजिक संस्थाओं से जुड़कर दलित, आदिवासी और मज़दूर वर्ग के हितों के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने बाल विवाह रोकने, अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देने और मज़दूरों के बच्चों की शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं। इसके अलावा उन्होंने आपदा पीड़ितों के पुनर्वास और सामाजिक न्याय के लिए भी सक्रिय भूमिका निभाई है।
