कृषि

फोटो निबंध: मुनाफे के वादे और जोखिमों के बीच फूलों के किसान

लखनऊ के मलिहाबाद और काकोरी क्षेत्र में पारंपरिक रूप से फूलों की खेती करने वाले छोटे और सीमांत किसान आज भी मौसम, बाज़ार और बुनियादी ढांचे की चुनौतियों से जूझ रहे हैं। त्योहारों में फसलों के ऊंचे दाम मिलने के बावजूद सालभर अनिश्चितता बनी रहती है।
बहुत सारे फूल_फूलों की खेती

“शादी, दीवाली, उत्सव है तो फूलों की खेती में आम समय से तीन-चार गुना तक का लाभ होता है, उसके अलावा तो सब कुछ मांग पर निर्भर करता है। थोड़ा-सा भी रंग फीका हो, तो फूलों का दाम घट जाता है। यह खेती पूरी तरह से अनिश्चितताओं से भरी हुई है।”

लखनऊ के मलिहाबाद के किसान राहुल की यह बात फूलों की खेती की हकीकत को साफ तौर पर बयान करती है। कागज़ों और प्रचार में भले ही फूलो की खेती (फ्लोरीकल्चर) को मुनाफे वाली खेती बताया जा रहा हो, लेकिन ज़मीनी स्तर पर छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह जोखिम और अस्थिरता से भरा हुआ क्षेत्र है। भारत दुनिया के प्रमुख फूल उत्पादक देशों में शामिल है और यहां लाखों हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में फूलों की खेती होती है। लेकिन लखनऊ और इसके आसपास के क्षेत्रों में फूलों के किसानों की स्थिति इस चमकदार तस्वीर से काफी अलग नज़र आती है।

लखनऊ में अनुमानतः 15 से 18 हज़ार हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में फूलों की खेती की जा रही है। लखनऊ के आसपास के क्षेत्रों में खासतौर पर छोटी जोत के किसान इससे जुड़े हैं। राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के अनुसार देश के कुल फूल उत्पादकों में से 85 प्रतिशत से अधिक छोटे और सीमांत किसान हैं। इन किसानों के पास संसाधनों और आधुनिक तकनीक का अभाव है। फूलों के किसानों के सामने बुनियादी ढांचे की कमी के साथ-साथ बाज़ार की अस्थिरता एक बड़ी चुनौती है। छोटे किसानों के लिए इस मुनाफे वाली खेती का पूरा लाभ उठाना एक कठिन संघर्ष बना हुआ है।

फूलो के गमलों के साथ दो व्यक्ति_फूलों की खेती
मौसम में थोड़ा-सा भी बदलाव फूलों के आकार, रंग और ताज़गी पर असर डालता है, जिससे बाज़ार में उनकी कीमत कम हो जाती है। | चित्र साभारः अनामिका चौधरी

लखनऊ जिले में मलिहाबाद और काकोरी के आसपास के क्षेत्र में आम के बागों के बीच बड़े-बड़े फूलों की खेती से सजे खेत दिखते हैं। इस क्षेत्र में पारंपरिक तौर पर पुरुषों के साथ-साथ महिलाएं और बच्चे सभी फूलों के काम में शामिल होते हैं। 

लखनऊ के चौक इलाके में स्थित कंचन फूल मंडी, गोमतीनगर के किसान बाज़ार की फूल मंडी और कई अन्य छोटी-बड़ी फूल मंडियों में आसपास के किसान अपने फूलों को बेचने के लिए आते हैं। यहां के किसान मुख्यतः गेंदा, जरबेरा, गुलाब, ग्लैडियोलस (छड़ी) और डेज़ी के फूलों की खेती करते हैं। इस इलाके में फूलों की खेती विविध और चक्रीय है। कई फसलें साल में दो से तीन बार बोई जा सकती हैं, जबकि गुलाब, रजनीगंधा और चमेली जैसे पौधे एक बार लगाने पर कई वर्षों तक फसल देते रहते हैं।

यहां गेंदे की खेती सबसे ज़्यादा होती है। किसान आमतौर पर साल में दो बार इसकी पौध तैयार करते हैं। इस क्षेत्र में दो तरह के गेंदे लगाए जाते हैं — जाफरी (फ्रेंच) और अफ्रीकन। जाफरी गेंदा दो रंगों वाला होता है, जैसे लाल के साथ नारंगी या पीला। वहीं अफ्रीकन गेंदा आकार में बड़ा होता है और आमतौर पर पीले या नारंगी में से किसी एक रंग का होता है।

मौसम पर निर्भरता

इस क्षेत्र में फूलों की खेती भले ही विविध और सालभर चलने वाली हो, लेकिन इसकी सफलता काफी हद तक प्राकृतिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। मौसम में थोड़ा-सा भी बदलाव फूलों के आकार, रंग और ताज़गी पर असर डालता है, जिससे बाज़ार में उनकी कीमत कम हो जाती है। गेंदे की खेती इसका प्रमुख उदाहरण है। यह फसल ज़्यादा गर्मी या बारिश को सहन नहीं कर पाती है। गर्मी बढ़ने पर मार्च के आखिरी सप्ताह तक बची हुई फसल को नष्ट करना पड़ता है। ऐसे में किसान अपनी खड़ी फसल को या तो उखाड़ देते हैं या नई फसल उगाने के लिए पौधों के सूखने के बाद उन्हें जला देते हैं।

फूलो के खेत में दो लोग_फूलों की खेती
कई बार किसानों के पास मंडी बंद होने या सप्लाई न होने की सूचना नहीं होती है। नतीजन, किसान फूल तोड़कर रख तो लेते हैं, लेकिन बेच नहीं पाते हैं। | चित्र साभारः अनामिका चौधरी

लखनऊ, मलिहाबाद की महिला किसान शिवानी कुमारी कहती हैं कि चाहे फसल खराब हो जाए या ज़्यादा हो जाए, सब कुछ हमें ही देखना पड़ता है। फूलों के किसानों के लिए कोई योजना नहीं है। फसल बीमा योजना जैसी कोई भी योजना यहां लागू नहीं होती है। टीवी पर सिर्फ विज्ञापन ही देखा है, बाकी ज़मीनी स्तर पर कभी इसका कोई लाभ नहीं मिला है। 

कटाई के बाद का संकट

केवल उत्पादन ही नहीं, बल्कि फसल तैयार होने के बाद की चुनौतियां भी किसानों के लिए उतनी ही गंभीर हैं। मंडी तक की दूरी ज़्यादा होने की वजह से बाज़ारों तक पहुंचते-पहुंचते फूल अपनी ताज़गी और बाज़ार मूल्य दोनों खो देते हैं। साथ ही, माल ढुलाई का खर्च भी बढ़ जाता है। काकोरी के रहमानपुर गांव के किसान बताते हैं कि उन्हें 25-30 किलोमीटर दूर कंचन फूल मंडी (चौक) में अपने फूलों को बेचने जाना पड़ता है। इतनी दूरी का सफर तय करने की वजह से फूल टूटकर कम हो जाते हैं जिससे उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है।

उचित रख-रखाव और पैकेजिंग के अभाव की वजह से भी फूलों के किसानों की फसल का एक बड़ा हिस्सा बर्बाद हो जाता है। कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीईडीए) के 2023 के आंकड़ों के अनुसार, फूलों के किसानों के कुल उत्पादन का लगभग 25 फीसदी से 40 फीसदी हिस्सा कटाई के बाद ही बर्बाद हो जाता है। इस मामले में गुलाब और ग्लैडियोलस जैसे नाज़ुक फूलों की स्थिति तो बहुत ही खराब है। मंडी की दूरी, स्टोरेज की सुविधा न होने की वजह से किसानों की मेहनत कूड़े के ढेर में बदल जाती है।

मांग, उत्पादन और मूल्य की चुनौती

उत्पादन और परिवहन की समस्याओं के साथ-साथ बाज़ार की प्रकृति भी इस खेती को और जटिल बना देती है। फूलों की मांग सामान्य फसलों की तरह स्थिर नहीं होती है। त्योहारों, शादियों व अन्य खास मौकों पर मांग अचानक बढ़ जाती है। अगर किसान इन अवसरों के अनुसार फूल तैयार नहीं कर पाते, तो उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता और उनके मुनाफे पर असर पड़ता है।

अगर हम फूलों की बड़ी व्यवसायिक (कमर्शियल) कंपनियों को देखें, तो पाएंगे कि यहां फूलों के मूल्य में उतार-चढ़ाव अपेक्षाकृत नियंत्रित रहता है। उदाहरण के तौर पर, वेलेंटाइन वीक में एक गुलाब की कीमत सामान्य तौर पर लगभग 50 से 120 रुपए तक पहुंच जाती है। इसके बाद भी कीमतों में कोई खास फर्क नहीं देखने को मिलता है। इसके विपरीत, छोटे और मध्यम किसान इस स्थिरता का लाभ नहीं उठा पाते हैं। 

बाजार में फुल बेचते लोग_फूलों की खेती
यहां गेंदे की खेती सबसे ज़्यादा होती है। किसान आमतौर पर साल में दो बार इसकी पौध तैयार करते हैं। | चित्र साभारः अनामिका चौधरी

त्योहारों के मौकों पर फूलों के किसानों को भले ही फूलों के चौगुना दाम मिल जाएं, लेकिन यह स्थिति बहुत कम समय के लिए रहती है। फूलों के किसानों के हालात को बयां करते हुए काकोरी के किसान रामाश्रय कहते हैं, “हमारे लिए कोई नीति नहीं है। एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) यहां सब गायब है। आज भी फूल न बिकने की स्थिति में किसानों को मंडी में फूल फेंकना पड़ता है।” रामाश्रय की बात से पता चलता है कि उत्पादन और बिक्री का सही तालमेल न होने पर फूलों की खेती में जोखिम और अस्थिरता काफी बढ़ जाती है।

नाज़ुकता और बाज़ार की सूचना की कमी

बाज़ार की अनिश्चितताओं के बीच सूचना की कमी किसानों की मुश्किलों को और भी बढ़ा देती है। इस क्षेत्र में फूलों के किसानों को समय पर बाज़ार से जुड़ी जानकारी नहीं मिल पाती है। कई बार किसानों के पास मंडी बंद होने या सप्लाई न होने की सूचना नहीं होती है। नतीजन, किसान फूल तोड़कर रख तो लेते हैं, लेकिन बेच नहीं पाते हैं। फूल बहुत ही नाज़ुक होते हैं और बहुत जल्दी खराब हो जाते हैं। अधिकतर किसानों के पास उन्हें तोड़कर सुरक्षित रखने के लिए कोई साधन नहीं होता है।

फूलो की गठरियो के साथ लोग_फूलों की खेती
काकोरी के रहमानपुर गांव के किसान बताते हैं कि उन्हें 25-30 किलोमीटर दूर कंचन फूल मंडी (चौक) में अपने फूलों को बेचने जाना पड़ता है। | चित्र साभारः अनामिका चौधरी

खासतौर पर छोटे और मध्यम स्तर के किसानों के पास टूटे हुए फूलों को स्टोर करने के लिए कोई साधन नहीं होता है। एक से दो दिन तक तो फूलों को पानी डालकर खिला हुआ रखा जा सकता है, लेकिन 48 घंटे बीतने के बाद मंडी पहुंचने पर फूलों की कीमत घट जाती है। वहीं, फूलों की मांग कम होने पर उनके न बिकने की स्थिति भी आ जाती है। ऐसे में कई बार किसानों को पूरी तरह नुकसान उठाना पड़ता है।

मंडी व्यवस्था और किसान

वैसे तो मंडी का कोई तयशुदा नियम नहीं होता, लेकिन फूलों के किसान बताते हैं कि वे सुबह जितनी जल्दी मंडी पहुंचते हैं, उन्हें फूलों की उतनी ही अच्छी कीमत या आढ़ती/बिचौलिए मिल जाते हैं। आढ़ती का काम होता है व्यापारियों और किसानों के बीच उचित दामों पर फूलों को बिकवाना। उसी कीमत का कुछ हिस्सा वह अपने कमीशन के तौर पर निर्धारित करता है। यह व्यवस्था किसानों के लिए सुविधाजनक और नुकसानदायक दोनों है। बिचौलियों पर निर्भरता, बिक्री के बाद भुगतान और भंडारण की अपर्याप्त व्यवस्था की वजह से किसानों को अपनी उपज कम कीमत पर थोक व्यापारियों या एजेंटों को बेचनी पड़ती है।

इंटरनैशनल जर्नल ऑफ इनोवेशन रिसर्च एंड डेवलपमेंट में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार उपभोक्ता जो कीमत चुकाता है, उसका बड़ा हिस्सा किसानों तक नहीं पहुंच पाता है। भारत में खुली खेती में किसानों को एक रुपए में से केवल 38 प्रतिशत से लेकर 70 प्रतिशत तक का हिस्सा ही मिल पाता है, जबकि हाई-टेक खेती में यह बढ़कर 55 प्रतिशत से लेकर 80 प्रतिशत तक हो जाता है। हालांकि यह भी आदर्श स्थिति नहीं है।

मंडी में बिक्री का इंतजार करते किसान_फूलों की खेती
फूलों की मांग कम होने पर उनके न बिकने की स्थिति भी आ जाती है। ऐसे में कई बार किसानों को पूरी तरह नुकसान उठाना पड़ता है। | चित्र साभारः अनामिका चौधरी

इन सभी चुनौतियों के बीच यह सवाल अहम हो जाता है कि क्या फूलों की खेती वास्तव में किसानों के लिए आजीविका का टिकाऊ विकल्प बन सकती है? फूलों की खेती को स्थायी और लाभकारी बनाने के लिए सबसे पहले बुनियादी ढांचे और बाज़ार व्यवस्था को मज़बूत करना ज़रूरी है। स्टोरेज और बेहतर सप्लाई चेन की कमी के कारण किसान अपनी उपज को लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रख पाते, जिससे उन्हें जल्दबाज़ी में कम दाम पर बिक्री करनी पड़ती है। 

इतना ही नहीं गांव या क्लस्टर स्तर पर छोटे कोल्ड स्टोरेज, प्री-कूलिंग यूनिट और परिवहन की सुविधाएं हों, तो फूलों की शेल्फ लाइफ (उन्हें सुरक्षित रखने की अवधि) बढ़ाई जा सकती है और किसान बाज़ार तक बेहतर पहुंच बना सकते हैं। साथ ही, फूलों के किसानों के लिए हितकारी नीतियां बनाना और उन्हें नियमित प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता देना ज़रूरी है। तभी किसानों के लिए फूलों की खेती एक टिकाऊ और लाभकारी व्यवसाय बन सकती है।

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लेखक के बारे में

  • अनामिका चौधरी उत्तर प्रदेश के लखनऊ के नज़दीक फूलों और बागों के बीच बसे एक गांव से हैं। उनका परिवार पारंपरिक रूप से फूलों की खेती करता आ रहा है। उन्होंने पुरातत्वशास्त्र में परास्नातक किया है। वे पिछले डेढ़ साल से स्वतंत्र रिसर्चर और लेखिका के तौर पर फेमिनिज़म इन इंडिया, यूथ की आवाज़ जैसे प्लेटफॉर्म्स के लिए लेख लिख रही हैं। उन्हें लैंगिक भेदभाव, पर्यावरण, स्वास्थ्य, हाशिए के समुदायों से जुड़े मुद्दों पर लिखना पसंद है। फिलहाल वे शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत एक गैर सरकारी संगठन के साथ काम कर रही हैं। इसके तहत उन्होंने कोविड के दौरान स्कूलों से ड्रॉप आउट हो चुकी किशोरियों को स्कूलों से दोबारा जोड़ने का कार्य किया।