लैंगिक विषय

एक लड़की, जिसने हर हाल में शिक्षा को चुना

कर्नाटक के रायचूर की एक युवा फील्ड कोऑर्डिनेटर के जीवन का एक दिन। उसकी उस यात्रा के साथ, जहां वह कभी स्कूल छोड़ने की कगार पर थी, लेकिन आज अपने साथ-साथ अपने परिवार और समुदाय का सहारा बन चुकी है।
स्कूल से लौटती छात्राएं_शिक्षा

मुझे सामाजिक क्षेत्र में काम के बारे में जब पता चला, तब मैं 14 साल की थी। मेरा इससे परिचय कर्नाटक हेल्थ प्रमोशन ट्रस्ट (केएचपीटी) के एक कार्यक्रम के दौरान हुआ, जो लड़कियों के सशक्तिकरण पर आधारित था। केएचपीटी एक गैर-लाभकारी संस्था है, जो स्वास्थ्य और कल्याण के क्षेत्र में काम करती है। कर्नाटक के कोप्पल जिले के हनुमसागर गांव के हमारे स्कूल में उनकी एक कम्युनिटी ऑर्गनाइज़र आयी, जिन्होंने वहां जीवन कौशल (लाइफ स्किल्स) की कक्षाएं संचालित की। उस समय मैं कक्षा 8 में थी और मैंने इस कार्यक्रम में दो साल तक भाग लिया। जब मैंने दसवीं कक्षा पास की, तो मेरे परिवार (माता-पिता और दो छोटे भाई) ने मुझसे पढ़ाई छोड़ने के लिए कहा। उनका मानना था कि मेरा आगे पढ़ने का कोई फायदा नहीं था। लेकिन लड़कियों के सशक्तिकरण पर केंद्रित वह कार्यक्रम मेरे भीतर आगे पढ़ने का दृढ़ संकल्प जगा चुका था। इसलिए मैंने अपने परिवार की बात मानने से इनकार कर दिया।

उस समय घर में केवल मेरी मां ही कमाने वाली एकमात्र सदस्य थी। मुझे लगा कि अगर मुझे अपनी पढ़ाई जारी रखनी है, तो मुझे भी कमाना होगा। वर्ष 2018 में, केएचपीटी ने मुझे अपने एक प्रोजेक्ट में न्यूट्रिशन वॉलंटियर के रूप में काम करने का अवसर दिया। मैं समुदाय स्तर पर डेटा इकट्ठा करने, पोषण किट वितरण और कुछ जागरूकता सत्र आयोजित करने का काम करती थी। इसकी एवज में मुझे प्रतिदिन 100 रुपए मिलते थे, जिससे मुझे पढ़ाई में मदद मिली। वर्ष 2021 में बीए पूरा करने के बाद, मैंने केएचपीटी में कम्युनिटी ऑर्गनाइज़र के रूप में काम करना शुरू किया। वहां मैं किशोर लड़कियों के लिए जीवन कौशल की कक्षाएं लेने लगी। मैं एक पंचायत के चार से पांच गांवों का ज़िम्मा संभालती थी। वर्ष 2023 से मैं रायचूर में फील्ड कोऑर्डिनेटर के रूप में काम कर रही हूं और तीन से चार पंचायतों को संभाल रही हूं।

 इन सभी भूमिकाओं में मेरा काम और मेरी दिनचर्या दोनों अलग-अलग थे। मेरे जीवन में एक और बड़ा बदलाव मेरी शादी से पहले और बाद के समय में आया।

 दिन की शुरुआत: शादी से पहले और शादी के बाद

वर्ष 2023 तक मैं कोप्पल में अपने परिवार के साथ रहती थी, और मेरा दिन सुबह चार बजे शुरू होता था। मैं घर के कामों और परिवार के लिए खाना बनाने से दिन की शुरुआत करती थी। मेरे पास एक साथ तीन ज़िम्मेदारियां थीं—कॉलेज, केएचपीटी के साथ काम, और अतिरिक्त आमदनी के लिए एक सब्ज़ी की दुकान। मुझे केवल महीने का दूसरा शनिवार और एक साप्ताहिक छुट्टी मिलती थी, जब मैं कॉलेज जा पाती थी। बाकी समय मैं केएचपीटी के साथ फील्डवर्क करती थी। जब भी सुबह या शाम को समय मिलता, मैं सब्ज़ियां बेचती थी।

मेरी एक छोटी दुकान थी, जहां मैं सुबह 10 बजे तक बैठकर सब्ज़ियां बेचती थी। उसके बाद मुझे काम पर जाना होता था। शाम 6 से 8 बजे तक मैं फिर से सब्ज़ियां बेचती थी। रात करीब 9 बजे घर लौटती, मां के साथ मिलकर खाना बनाती और फिर हम साथ में खाना खाकर सो जाते। उस समय मेरा दिन कुछ ऐसा ही होता था।

मैं 18 साल की उम्र तक समुदाय में लड़कियों को एकजुट करने के लिए लगातार वॉलंटियर के रूप में काम करती रही। मेरा मानना था कि अगर दूसरी लड़कियां मुझे काम करते हुए देखेंगी, तो उन्हें भी प्रेरणा मिलेगी। इसी दौरान केएचपीटी में कम्युनिटी ऑर्गनाइज़र की एक स्थायी नौकरी निकली और मैंने उसके लिए आवेदन किया। मैंने इस पद पर दो साल तक काम किया।

धीरे-धीरे मेरे परिवार को समझ आने लगा कि मैं अपनी पढ़ाई और काम, दोनों से घर में योगदान दे रही हूं। उन्होंने दोनो कामों को जारी रखने के लिए मेरा समर्थन करना शुरू कर दिया। मैंने अपनी कमाई से अपने भाइयों की पढ़ाई में भी मदद की। मैंने सुनिश्चित किया कि मेरा एक भाई आईटीआई से प्रशिक्षण पूरा करे। दूसरे भाई की पढ़ाई में रुचि नहीं थी। मैंने उसे एक छोटा सब्ज़ी का व्यवसाय शुरू करने में मदद की, ताकि वह कमाई कर सके।

कुछ समय के बाद मेरी शादी की चर्चा होने लगी। मुझे पता था कि शादी के बाद लड़कियां अपने ससुराल जाती हैं और घर व अन्य ज़िम्मेदारियां संभालती हैं। मैं इसके लिए तैयार थी। लेकिन मैं इस बात को लेकर भी स्पष्ट थी कि मैं काम जारी रखना चाहती हूं, अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं और आगे चलकर अपना खुद का बिज़नेस शुरू करना चाहती हूं। मुझे पता था कि मैं ऐसे साथी के साथ नहीं रह सकती, जो मेरे इन सपनों का समर्थन नहीं करता।

पांच साल तक मैंने शादी और अपने जीवन के बारे में गंभीरता से सोचा। मेरी मां चाहती थी कि मैं जल्दी शादी कर लूं। लेकिन परिवार द्वारा सुझाया गया व्यक्ति मेरे विचारों से मेल नहीं खाता था। जब मैंने अपने पसंद के व्यक्ति को चुना, तो कई चुनौतियां आयी। यह एक अंतर-जातीय विवाह था और मेरे माता-पिता पूरी तरह इसके खिलाफ थे।

मामला इतना बढ़ गया कि बात पुलिस स्टेशन तक पहुंच गयी। मुझे और मेरे पति को वहां बुलाया गया और मुझे धमकाया गया। लेकिन मुझे केएचपीटी के स्फूर्ति गर्ल्स एम्पावरमेंट कार्यक्रम से ताकत मिली थी। इस कार्यक्रम के दौरान हम कई जगहों पर गए थे, जिसमें एक पुलिस स्टेशन भी शामिल था। इस कार्यक्रम के दौरान हमें कानून, अपने अधिकारों और अपनी बात रखने के बारे में सिखाया गया था। उस प्रशिक्षण की वजह से मैं यह जानती थी कि पुलिस से कैसे बात करनी है, क्या कहना है और अपने पक्ष पर कैसे डटे रहना है।

मेरे परिवार ने मेरी शादी में दहेज और सोना देने की योजना बनाई थी। लेकिन मेरा दृढ़ विचार था कि अपने ससुराल एक रुपया भी लेकर नहीं जाउंगी। आज मैं और मेरा साथी किराए के घर में अपने जीवन की शुरुआत कर रहे हैं और अपनी कमाई से धीरे-धीरे सब कुछ बना रहे हैं।

 अब मैं सुबह 7 बजे उठती हूं। मैं और मेरे पति मिलकर दिन की शुरुआत करते हैं और साथ मिलकर घर के काम करते हैं।

स्कूल की कक्षा में बैठी शिक्षिकाएं_शिक्षा
मेरा मानना था कि अगर दूसरी लड़कियां मुझे घर से बाहर निकलकर काम करते हुए देखेंगी, तो उन्हें भी ऐसा करने के लिए प्रेरणा मिलेगी।|चित्र साभार: रुबिया बेग़म

लड़कियों के साथ दोपहर का समय: ताकि वे वह न झेलें, जो मैंने झेला

कम्युनिटी ऑर्गनाइज़र के रूप में मुझे समुदाय की लड़कियों के साथ काम करना था। जब मेरे माता-पिता ने मुझसे पढ़ाई छोड़ने को कहा था, तब मुझे एहसास हुआ कि यह केवल मेरी समस्या नहीं है। मेरी उम्र की कई लड़कियों को स्कूल छोड़ने के लिए कहा जाता है। कुछ लड़कियों को तो उससे भी पहले पढ़ाई छोड़ने के लिए कहा जाता है। मुझे पता था कि मैं उनके लिए एक सहारा बनना चाहती हूं।

शुरुआत में यह आसान नहीं था। मैं खुद भी एक किशोरी जैसी दिखती थी और उन्हीं लड़कियों के साथ काम कर रही थी जो लगभग मेरी ही उम्र की थी। समुदाय के कई लोग सवाल उठाते थे कि मैं आखिर क्या योगदान दे सकती हूं। मैं बार-बार गांव के प्रमुख लोगों, जैसे पंचायत डेवलपमेंट ऑफिसर (पीडीओ) और बाल संरक्षण अधिकारियों से मिलती थी और धैर्यपूर्वक उनसे बात करती थी। मैंने उन्हें अपनी गतिविधियों में शामिल किया और उन्होंने धीरे-धीरे मेरे काम की अहमियत को समझना शुरू किया।

मेरा मानना था कि अगर दूसरी लड़कियां मुझे काम करते हुए देखेंगी, तो उन्हें भी प्रेरणा मिलेगी।

मेरे काम में घर-घर जाकर परिवारों से बात करना, लड़कियों को दोबारा पढ़ाई में लाने के लिए, उनके पोषण स्तर को बेहतर बनाने और बाल विवाह को टालने के लिए काउंसलिंग करना शामिल था। शाम करीब 4 बजे जब लड़कियां स्कूल से लौटती थीं, तो मैं उनके साथ दो घंटे के जीवन कौशल सत्र लेती थी।

इस दौरान मेरे फील्ड सुपरवाइज़र ने मेरा पूरा साथ दिया। उन्होंने मुझे नए विचार दिए और कार्यक्रम की तय गतिविधियों से आगे सोचने के लिए प्रोत्साहित किया। ऐसे ही एक विचार ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि गांव के एक बड़े त्योहार, गणेश हब्बा, में लड़कियों को क्यों शामिल नहीं किया जाता? इस त्योहार को परंपरागत रूप से केवल लड़के ही आयोजित करते हैं।

जब गणेश जी की मूर्ति को रात में विसर्जन के लिए ले जाया जाता है, तो केवल लड़के ही उस जुलूस में शामिल होते हैं। वे नाचते हैं, संगीत बजाते हैं और पूरे आयोजन का नेतृत्व करते हैं।

लड़कियों ने सवाल उठाना शुरू किया कि वे ऐसा क्यों नहीं कर सकती? वे क्यों नहीं नाच सकती? उनके लिए संगीत क्यों नहीं हो सकता? हमने फिर से पंचायत से बात की। शुरुआत में कई आपत्तियां दर्ज हुई। उदाहरण के लिए, हमें ‘लड़कियां रात में बाहर नहीं रह सकती’ जैसे तर्क सुनने को मिले। लेकिन बार-बार बातचीत के बाद, हम उन्हें मनाने में सफल रहे।

उस साल लड़कियां भी विसर्जन जुलूस में शामिल हुई। वहां डीजे संगीत था, उन्होंने सड़कों पर नृत्य किया, गणेश जी का विसर्जन किया और सुरक्षित घर लौटी।

मेरे लिए एक मुस्लिम लड़की होने के नाते, एक त्योहार में अन्य लड़कियों की इस तरह की भागीदारी सुनिश्चित करना आसान नहीं था। मेरा अपना परिवार भी इस पर टिप्पणी करता था कि मैं स्कूटी चलाकर काम पर जाती हूं। उन्हें लगता था कि यह लड़कियों के लिए सही नहीं है। कुछ समुदायों में, जैसे अनुसूचित जाति की बस्तियों में, शुरुआत में मुझे स्वीकार ही नहीं किया गया। अपने काम के माध्यम से मैं अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की लड़कियों को साथ ले आयी। ऐसी लड़कियां, जो अमूमन एक-दूसरे के इलाकों में भी नहीं जाती थी। मैंने लड़कियों के साथ अच्छे संबंध बनाए और उनसे खुलकर बात की। मैंने उनसे कहा कि अगर हमें बदलाव लाना है, तो हमें साथ मिलकर खड़ा होना होगा। धीरे-धीरे, इस बातचीत ने असर दिखाना शुरू कर दिया।

इन लड़कियों के माध्यम से, मैं धीरे-धीरे समुदाय में अपनी जगह बनाने लगी। समय के साथ विरोध कम हुआ। लड़कियों के साथ भरोसा स्थापित होने के कारण उन्होंने मुझे, यानी एक मुस्लिम महिला को, अपने क्षेत्र में काम करने की नज़र से स्वीकार कर लिया। आखिरकार, मैं समुदाय में फिर से अपना काम शुरू करने में सफल रही।

हमने इंटरनेशनल डे ऑफ द गर्ल चाइल्ड और विमेंस डे जैसे दिवस भी मनाने शुरू किए, जिन्हें पहले हमारे क्षेत्र में कभी नहीं मनाया गया था। केवल बाहरी मदद पर निर्भर रहने के बजाय, मैंने समुदाय और आसपास की फैक्ट्रियों से संसाधन जुटाए और 80,000 रुपए इकट्ठा किए, ताकि लड़कियों के लिए टी-शर्ट उपलब्ध कराई जा सके। जहां पंचायत लड़कों के लिए आसानी से मदद करती है, जैसे खेलकूद प्रतियोगिताओं के लिए यूनीफॉर्म या संसाधन देना, वहीं लड़कियों की ज़रूरतें अक्सर अनदेखी कर दी जाती हैं। इसलिए हमने लड़कियों के लिए भी खेल प्रतियोगिताएं आयोजित की।

मैंने यह भी सुनिश्चित करने के प्रयास किए कि गांव के हर स्कूल में मेंस्ट्रुअल डिस्पोज़ल सिस्टम लगाया जाए। मैंने पत्र लिखे, आवेदन किए और लगातार पंचायत से संपर्क बनाए रखा। इसके परिणामस्वरूप, मैं समुदाय की लड़कियों के लिए एनीमिया जांच कराने हेतु 10,000 रुपए की राशि प्राप्त करने में सफल रही।

कोप्पल में काम करने के दो वर्षों के दौरान, लड़कियों और मेरे जीवन, दोनो में बड़ा बदलाव आया। 16 लड़कियां स्कूल छोड़ चुकी थी। मैंने उनके परिवारों के साथ मिलकर काम किया, ताकि वे दोबारा स्कूल में दाखिला लें और अपनी पढ़ाई जारी रखें।

प्रशासन के साथ शाम का समय: सतत बदलाव के लिए

जब मुझे लगा कि मुझे और सीखने और आगे बढ़ने की ज़रूरत है, तो मैं रायचूर आ गयी। यह बदलाव आसान नहीं था। मैं वहां के लोगों को नहीं जानती थी और शुरुआत में उनका बर्ताव बहुत अच्छा नहीं था। मैंने अपनी स्कूटी छोड़ दी थी, लेकिन मुझे बस के रास्तों की जानकारी नहीं थी। धीरे-धीरे लोगों ने मुझे स्वीकार करना शुरू किया और समय के साथ रायचूर मुझे अपना सा लगने लगा। इस दौरान मेरी शादी भी हुई।

तब तक मैं एक ऐसे प्रोजेक्ट में फील्ड कोऑर्डिनेटर बन चुकी थी, जिसका उद्देश्य पंचायत प्रणाली में संरचनात्मक बदलाव लाना था, ताकि वह किशोर लड़कियों की ज़रूरतों के प्रति अधिक संवेदनशील बन सके। मैंने सिस्टम के भीतर मेंटर की पहचान की-जैसे आशा कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी स्टाफ, शिक्षक और ग्राम पंचायत सदस्य-और उन्हें प्रशिक्षित किया ताकि वे लड़कियों के साथ जीवन कौशल शिक्षा को आगे बढ़ा सकें। हमें यह समझ आया कि अगर बदलाव को टिकाऊ बनाना है, तो सिस्टम को खुद ही (हमारी गैर-मौजूदगी में भी) इन प्रयासों की ज़िम्मेदारी लेनी होगी।

कक्षा में गोला बनाकर बैठी छात्राएं_शिक्षा
कोप्पल में काम करने के दो वर्षों के दौरान, लड़कियों और मेरे जीवन, दोनो में बड़ा बदलाव आया।|चित्र साभार: रुबिया बेग़म

उदाहरण के लिए, मैं नियमित रूप से आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ काम करती हूं। मैं उनके साथ बैठकर उस जीवन कौशल सामग्री की समीक्षा करती हूं, जिसे उन्हें पढ़ाना होता है। मैं यह भी देखती हूं कि उन्होंने कितने सत्र पूरे किए हैं और कौन से पाठ अभी बाकी हैं। अगर उन्हें कुछ सत्र लेने में कठिनाई होती है, तो मैं उन्हें प्रशिक्षित करती हूं और यह समझने में मदद करती हूं कि लड़कियों के साथ बेहतर तरीके से कैसे जुड़ा जाए।

इसके साथ-साथ, मैं स्थानीय समितियों को सक्रिय और मजबूत बनाने पर भी काम करती हूं। जैसे, विमन एंड चाइल्ड प्रोटेक्शन कमिटी और मक्कला ग्राम सभा (बच्चों की संसद)। इसके लिए, मैं ग्राम पंचायत सदस्यों के साथ चर्चा करती हूं, उनसे नियमित रूप से मिलती हूं, उन्हें बैठकों के आयोजन की याद दिलाती हूं और यह सुनिश्चित करने के लिए फॉलो-अप करती हूं कि ये मंच वास्तव में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं या नहीं। समय के साथ, मैंने स्थानीय लोगों के साथ अच्छा तालमेल बना लिया है और अब वे मेरी बातों को स्वीकार करते हैं। मैं जो मॉड्यूल और विचार उनके साथ साझा करती हूं, वे उन्हें भी अपनी ज़िम्मेदारियों को बेहतर तरीके से निभाने में मदद करते हैं।

इन अनुभवों ने मुझे आत्मविश्वास दिया है और अपने विचारों को स्पष्टता और दृढ़ता के साथ व्यक्त करने में मदद की है।

दिन का अंत: बिलकुल वैसा, जैसा मैं हमेशा चाहती थी

जब मैं शाम को घर लौटती हूं, तो रात के खाने की तैयारी शुरू करती हूं। उसी समय, मैं अपने पति की पढ़ाई में भी मदद करती हूं। वह दसवीं कक्षा की परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, और मैंने उनका नामांकन करवाने के लिए उनकी फीस भरी है। चूंकि वह एक होटल में काम करते हैं और अक्सर देर से घर आते हैं, इसलिए मैं उनकी ओर से उनकी ऑनलाइन कक्षाएं अटेंड करती हूं और फिर रात का खाना बनाती हूं। जब वह रात करीब 8 बजे काम से लौटते हैं, तो हम साथ में खाना खाते हैं। खाने के बाद, मैं लगभग एक घंटे तक उन्हें वह पढ़ाती हूं जो मैंने ऑनलाइन सत्र में सीखा होता है।

इसके बाद, रात 9 से 10 बजे के बीच हम साथ में टहलने जाते हैं। इस समय हम अपने दिन के बारे में बात करते हैं-मेरे फील्डवर्क में क्या हुआ, उनके काम पर क्या हुआ, हमारी चिंताएं क्या हैं, और भविष्य के लिए हमारी योजनाएं क्या हैं।

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लेखक के बारे में

  • रुबिया बेग़म कर्नाटक हेल्थ प्रमोशन ट्रस्ट (केएचपीटी) के साथ कर्नाटक के रायचूर में फील्ड कोऑर्डिनेटर के रूप में काम करती हैं। उन्होंने राजनीति विज्ञान में स्नातक किया है और उनके पास सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में चार वर्षों का अनुभव है। रुबिया को रायचूर में उनके सामाजिक कार्य के लिए स्थानीय गैर-लाभकारी संस्थाओं से सम्मान भी मिला है। उनका सपना है कि वे अपना ऐसा बिज़नेस शुरू करें, जिसमें उनका समुदाय के साथ निरंतर जुड़ाव बना रहे।