सामाजिक न्याय

क्या भारत की स्वास्थ्य बीमा व्यवस्था सच में सभी की रक्षा करती है?

स्वास्थ्य बीमा का उद्देश्य बीमारी के समय आर्थिक बोझ को कम करना है। लेकिन बड़ी संख्या में विकलांग व्यक्तियों के लिए बीमा तक पहुंच अब भी चुनौतीपूर्ण है।
व्हील चेयर पर बैठा एक व्यक्ति_स्वास्थ्य बीमा

भारत में गरीब तबके के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में लगातार प्रयास हो रहे हैं। आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी-पीएमजेएवाई) भारत सरकार की इसी कोशिश को दिखाती है। इस योजना के तहत केंद्र सरकार देश के 50 करोड़ से ज्यादा लोगों को मुफ्त इलाज की सुविधा प्रदान करने का दावा करती है। इसके अलावा, “2047 तक सभी के लिए बीमा” जैसी घोषणा भी बीमा कवरेज में हरेक व्यक्ति को शामिल करने की सरकार की मंशा को उजागर करती है।   

लेकिन किसी भी योजना की सफलता को सिर्फ उसके दायरे में शामिल या उसमें नामांकित लोगों की संख्या के आधार पर नहीं आंका जा सकता। असल सवाल तो यह है कि क्या वह योजना उन लोगों तक पहुंच पा रही है जिन्हें उसकी सबसे ज्यादा जरूरत है? मौजूदा आंकड़े यही बताते हैं कि स्वास्थ्य बीमा तक विकलांग लोगों की पहुंच आज भी आसान नहीं है। यही नहीं, कई विकलांग व्यक्तियों को तो इसकी जानकारी तक नहीं है।  

जागरूकता की कमी: जब जानकारी ही न पहुंचे 

स्वास्थ्य बीमा का उद्देश्य बीमारी के समय आर्थिक बोझ को कम करना है। लेकिन बड़ी संख्या में विकलांग व्यक्तियों की इस तक पहुंच नहीं है। नेशनल सेंटर फॉर प्रमोशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट फॉर डिसेबल्ड पीपल (एनसीपीईडीपी) भारत का एक गैर सरकारी संगठन है। यह विकलांग व्यक्तियों के रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और उनके अधिकारों के लिए काम करता है। इसके द्वारा साल 2023 से 2025 के बीच एक राष्ट्रीय सर्वे किया गया। इसमें 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 5,000 से भी ज़्यादा विकलांग व्यक्तियों को शामिल किया गया।  

इसमें सामने आया कि 80 प्रतिशत विकलांग जनों के पास कोई स्वास्थ्य बीमा नहीं था। इसी सर्वे में यह भी पाया गया कि 41 प्रतिशत विकलांग लोगों को आयुष्मान भारत योजना के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। इस स्थिति के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। जैसे: 

  • जानकारी का ऐसी भाषा में उपलब्ध न होना जिसे विकलांग व्यक्ति आसानी से समझ सकें  
  • ऐसे जागरूकता अभियानों का अभाव जो विकलांगता व्यक्तियों को ध्यान में रखते हों  
  • सरकारी संदेशों, सूचनाओं, नोटिस वगैरह का ऐसे प्रारूप में न उपलब्ध होना जिन्हें विकलांग व्यक्ति आसानी से समझ सकें 

ज़ाहिर सी बात है कि जब लोगों तक जानकारी पहुंच ही नहीं रही है, तो पात्रता का सवाल भी बेमानी हो जाता है। अधिकारों का कागज पर होना और हकीकत में उन पर अमल हो पाना दोनों अलग बातें हैं। 

पात्रता के नियम और बीमा पैकेज: क्या इनमें वास्तविक जरूरतें शामिल हैं? 

स्वास्थ्य बीमा योजना की एक और बड़ी खामी इसकी मौजूदा व्यवस्था है। इसके लाभार्थियों की पहचान सामाजिक-आर्थिक जनगणना (एसईसीसी) 2011 के आंकड़ों के आधार पर की जाती है जो कि काफी पुराने हैं। इस वजह से कई ऐसे लोग भी योजना से बाहर रह जाते हैं जो वास्तव में पात्र हैं। साथ ही, पात्रता के स्पष्ट मानदंडों के अभाव की वजह से भी कई लोग योजना से वंचित रह जाते हैं। 

मौजूदा बीमा योजनाओं में अक्सर अस्पताल में भर्ती होने और अन्य स्वास्थ्य जरूरतों के लिए अधिकतम खर्च की सीमा तय होती है। इसे सब-लिमिट कहा जाता है। ऐसे में इलाज का खर्च उस सीमा से ज्यादा हो जाने पर बाकी पैसा मरीज को खुद देना पड़ता है।  

इसके अलावा, बीमा के तहत जिन स्वास्थ्य जरूरतों को कवर किया जाता है विकलांगों की स्वास्थ्य से जुड़ी जरूरतें महज उतने तक ही सीमित नहीं होतीं। स्वास्थ्य से जुड़ी उनकी जरूरतें उससे कहीं बढ़कर हैं, जिसमें शामिल हैं: 

  • नियमित जांच 
  • पुनर्वास (रिहैबिलिटेशन) 
  • सहायक उपकरण 
  • मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं 
  • ऑपरेशन के बाद की थेरेपी 

यही नहीं, उम्रदराज विकलांग व्यक्तियों के लिए निरंतर देखभाल बेहद जरूरी होती है। यदि यह व्यवस्था न हो, तो उन्हें बार-बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ सकता है जिससे उनका इलाज का खर्च भी बढ़ सकता है। जब बीमा पैकेज असल जिंदगी की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को पूरी तरह नहीं समेटते, तो कवरेज अधूरा रह जाता है। 

पहुंच की प्रक्रियाओं में समावेशन की जरूरत 

स्वास्थ्य बीमा सिर्फ कागजी दस्तावेज नहीं है। इसे इस्तेमाल कर पाने के लिए विकलांग लोगों को जमीनी स्तर पर कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। इसके लिए उन्हें अस्पतालों और काउंटरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, फॉर्म भी भरने पड़ते हैं। अक्सर दिक्कतें यहीं से शुरू होती हैं। इसकी वजह यह है कि:  

  • कई अस्पताल दिव्यांगों की जरूरतों के मुताबिक नहीं होते हैं। 
  • प्रशिक्षित स्टाफ और सांकेतिक भाषा जानने वाले दुभाषियों की कमी रहती है। 
  • कागजी प्रक्रिया काफी कठिन होती है। 
  • शिकायत दर्ज करने और उसका समाधान पाने में भी कठिनाई आती है। 

ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में ये चुनौतियां और ज्यादा बढ़ जाती हैं। इस तरह से जानकारी की कमी, ढांचागत समस्याओं और समूची प्रक्रिया आसान न होने की वजह से पात्र होने के बावजूद विकलांग लोगों के लिए बीमा का लाभ ले पाना काफी मुश्किल हो जाता है। 

कानूनी और संवैधानिक दायित्व 

स्वास्थ्य बीमा तक सभी की समान पहुंच केवल कल्याणकारी पहल का विषय नहीं है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत यह समानता और गरिमा के अधिकार से भी जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में यह स्पष्ट किया है कि गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार में स्वास्थ्य का अधिकार भी शामिल है। 

एक बुजुर्ग महिला वॉकर लेकर सड़क पर चलती हुई_स्वास्थ्य बीमा
लाभार्थियों की पहचान सामाजिक-आर्थिक जनगणना (एसईसीसी) 2011 के आंकड़ों के आधार पर होना स्वास्थ्य बीमा योजना की एक बड़ी खामी है। | चित्र साभार: पिक्साबे/सीसी बीवाय

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 भी स्वास्थ्य सेवाओं, बीमा और सामाजिक सुरक्षा तक दिव्यांगजनों की समान पहुंच और उनकी शामिलियत की बात करता है। कानून यह भी अपेक्षा करता है कि सरकार दिव्यांग व्यक्तियों के लिए किफायती या निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करे और बीमा के मामले में उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार को रोके। 

हालांकि कानून में इन प्रावधानों के होने के बावजूद, कई बार नीतियों और उनके क्रियान्वयन के बीच अंतर दिखाई देता है। इसलिए आवश्यक है कि स्वास्थ्य बीमा योजनाओं की संरचना और प्रक्रियाएं इन कानूनी और संवैधानिक प्रतिबद्धताओं के अनुरूप हों। 

आगे की राह : बीमा का एक समावेशी और टिकाऊ ढांचा 

ऊपर के विश्लेषण के आधार पर कुछ स्पष्ट सुझाव सामने आते हैं। इन्हें नीतिगत सुधार के रूप में देखा जा सकता है। ये कुछ इस प्रकार हैं:  

1. विकलांगता को ही पात्रता का आधार बनाया जाए 

  • एबी-पीएमजेएवाई में विकलांगता को पात्रता का स्वतंत्र आधार माना जाए। 
  • विकलांगता प्रमाणपत्र दिखाने पर व्यक्ति का स्वतः नामांकन हो जाए। 
  • सरकार के पास मौजूद विकलांगता डेटाबेस और सामाजिक कल्याण योजनाओं की जानकारी को मिलाकर विकलांग व्यक्तियों का सक्रिय नामांकन किया जाए। 

2. विकलांग लोगों के जीवन के अलग-अलग चरणों की जरूरतों के अनुसार बीमा पैकेज के दायरे को बढ़ाया जाए

  • अस्पताल में भर्ती के अलावा अन्य स्वास्थ्य सेवाओं को भी पैकेज में शामिल किया जाए। 
  • पुनर्वास, सहायक उपकरण, मानसिक स्वास्थ्य और ऑपरेशन के बाद की थेरेपी को कवर किया जाए। 
  • वरिष्ठ नागरिकों और उम्रदराज विकलांग व्यक्तियों के लिए निरंतर देखभाल को प्राथमिकता दी जाए। 

3. सुलभता को मूल सिद्धांत बनाया जाए 

  • जानकारी कई फॉर्मेट में उपलब्ध हो। जैसे, ऑडियो, वीडियो, ब्रेल में आदि।  
  • अस्पतालों की बनावट दिव्यांगों की जरूरतों के मुताबिक हो। 
  • स्टाफ को संवेदनशील बनाया जाए और उन्हें तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाए। 
  • शिकायत निवारण और बीमा लोकपाल की व्यवस्था को सरल और सुलभ बनाया जाए, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में। 

4. निगरानी और भागीदारी 

  • विकलांग लोगों के बारे में अलग से आंकड़े इकट्ठे किए जाएं। 
  • निगरानी का एक प्रभावी तंत्र बनाया जाए। 
  • विकलांग व्यक्तियों के लिए काम करने वाले संगठनों को नीति-निर्माण की प्रक्रिया में शामिल किया जाए। 

इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि नीतियों पर अमल हो और समय-समय पर उनमें सुधार हो सके।  

आर्थिक और प्रणालीगत दृष्टि से समावेशन क्यों है जरूरी  

विकलांगों का समावेशन केवल सामाजिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। विकलांगों को समय पर इलाज मिलने से उनमें स्वास्थ्य से जुड़ी जटिलताएं कम होती हैं और अस्पताल में उनके ठहराव की अवधि घटती है। इसके परिणामस्वरूप भविष्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च भी कम होता है। 

विकलांगों के लिए बीमा का कवरेज बढ़ाने और इसकी एक टिकाऊ व्यवस्था लागू करने के लिए बीमा कंपनियों के जोखिमों का बंटवारा जरूरी है। उन्हें सरकार की वित्तीय मदद मिलनी चाहिए और इसकी निगरानी होनी चाहिए कि वे नियमों के मुताबिक काम कर रही हैं या नहीं। इसमें कोई दो राय नहीं कि विकलांगों की एक स्वस्थ, बीमित और सक्रिय आबादी अर्थव्यवस्था में सक्रियता के साथ निरंतर योगदान दे सकती है। 

स्वास्थ्य सुविधाओं तक विकलांगों की समान पहुंच उनके प्रति सहानुभूति या उनके कल्याण का मसला नहीं है। यह संवैधानिक दायित्व, कानूनी जिम्मेदारी और आर्थिक आवश्यकता तीनों है। अगर “2047 तक सभी के लिए बीमा” का लक्ष्य हासिल करना है, तो नीति निर्माण के केंद्र में उन समूहों को रखना होगा जो आज सबसे अधिक वंचित हैं। असल सुरक्षा सूची में नाम दर्ज होने भर से नहीं मिल जाती। यह तब मिलती है जब बीमारी और आर्थिक संकट के समय व्यवस्था वास्तव में लोगों को सहारा दे सके। 

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अधिक जानें 

  • जानें, भारत में विकलांगता पेंशन योजना की असफलता के कारण क्या हैं? 
  • जानें, विकलांग जन के लिए प्रोग्राम बनाते समय क्या ध्यान में रखना चाहिए?
  • जानें, कोविड-19 महामारी के दौरान विकलांग व्यक्तियों के संघर्ष।

लेखक के बारे में

  • वामिका गुप्ता असिस्टेंट प्रोग्राम मैनेजर हैं और विकास क्षेत्र में विशेष रूप से दिव्यांगता समावेशन से जुड़े मुद्दों पर काम करती हैं। उन्होंने इंडियन स्कूल ऑफ डेवलपमेंट मैनेजमेंट (आईएसडीएम) से डेवलपमेंट मैनेजमेंट में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा और दिल्ली विश्वविद्यालय से कॉमर्स में स्नातक किया है। इससे पहले वे इको इंडिया और स्टार्ट अप के साथ काम कर चुकी हैं, जहां उन्होंने सामाजिक संगठनों के साथ समन्वय और कार्यक्रम प्रबंधन में भूमिका निभाई। विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के साथ उनके अनुभव ने समावेशी विकास के प्रति उनकी समझ और प्रतिबद्धता को मजबूत किया है।
  • अक्षय जैन एनसीपीईडीपी में प्रोग्राम मैनेजर हैं और संस्था की एडवोकेसी व रिसर्च से जुड़े कामों को संभालते हैं। विकास क्षेत्र में पांच से अधिक वर्षों के अनुभव के साथ वे दिव्यांगता अधिकार और समावेशी समाज के मुद्दों पर काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि कानून तभी असरदार होते हैं जब वे जमीन पर लागू हों। अक्षय खास तौर पर युवाओं को शिक्षित और सशक्त बनाने को सामाजिक बदलाव की अहम ताकत मानते हैं।