सामाजिक न्याय

आखिर क्यों प्रवासी खुद को शहर का हिस्सा नहीं मान पाते?

मुंबई जिला, महाराष्ट्र
जमीन पर घेरे में बैठी महिलाओं के समूह को संबोधित करता उन्हीं के साथ बैठा एक पुरुष_प्रवासी श्रमिक
शहर में लंबे समय से रहने के बावजूद, उन्हें प्रवासी ही माना जाता है। | चित्र साभार: शाकिर शेख

मैं मुंबई के चिकलवाड़ी में रहता हूं। मेरी साथी अक्षिता मलाड में रहती हैं। हम दोनों पानी हक समिति के साथ काम करते हैं। हम दोनों ही ऐसी बस्तियों में रहते हैं, जहां वर्षों से प्रवासी श्रमिक भी हमारे साथ रहते आए हैं। इन बस्तियों में बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने के काम के दौरान हमने यह बात बहुत करीब से महसूस की है कि मुंबई में रह रहे लाखों प्रवासी मजदूरों के लिए मुंबई आज भी एक बेगाना शहर है। वे अपना हक नहीं जता पाते, अपने अधिकार नहीं मांग पाते, और अक्सर चुप रह जाते हैं, ताकि उनका रोजगार या बस्ती से उनके संबंध खतरे में न पड़ जाएं।

इस सोच को आप रे रोड की पारधीवाडा के किस्से से समझ सकते हैं। यह बस्ती मुंबई के पास सोलापुर क्षेत्र से आए मराठी भाषी पारधी समुदाय की है। शहर में लंबे समय से रहने के बावजूद, उन्हें प्रवासी ही माना जाता है। उनकी बस्ती में पानी जैसी मूलभूत सुविधा तक नहीं है। पीने का पानी जमा करने के लिए वे बारिश का पानी इकट्ठा करने की कोशिश करते हैं। कभी खाली मकानों की छतों के नीचे, कभी कारखानों के पतरों के किनारे खड़े होकर वे अपने बर्तन भरते हैं। लेकिन कई बार आसपास के लोग उन्हें वहां से भगा देते हैं। मजबूरी में कुछ लोग स्टेशन से पानी चोरी करके लाते हैं। इस संघर्ष के कारण लोगों की नज़रों में उनकी छवि और भी खराब हो गई है। खुद उनके भीतर भी यह भावना बैठ गई है कि वे इस शहर के नागरिक नहीं हैं, इसलिए वे अपने अधिकारों के लिए आवाज नहीं उठा सकते।

मुंबई में ऐसी बस्तियां केवल पारधीवाडा चिकलवाड़ी तक सीमित नहीं हैं। कुर्ला का कुरैशीनगर, मानखुर्द, शांतिनगर और अंबेडकर नगर जैसी कई बस्तियों में देश के अलग-अलग राज्यों से आए प्रवासी श्रमिक रहते हैं। यहां रहने वाले लोगों को पानी बहुत महंगे दामों पर खरीदना पड़ता है। कई जगहों पर 5 से 10 रुपये में सिर्फ 35 लीटर पानी मिलता है, जबकि शहर के बाकी हिस्सों में लगभग 5 रुपये में 1000 लीटर पानी उपलब्ध होता है। विडंबना यह है कि बहुत से लोगों को यह भी नहीं पता कि पाइपलाइन से घर तक पानी का पहुंचना उनका अधिकार है।

पंचशील नगर में हाल ही में हमने बीएमसी से बात करके किसी तरह से पानी के कनेक्शन की मंजूरी हासिल की थी। लेकिन फरवरी में उस बस्ती को गैरकानूनी बताते हुए तोड़ दिया गया। ऐसे में लोगों को लगा कि क्योंकि उन्होंने पानी की मांग की, इसीलिए उनके साथ ऐसा हुआ। इससे उनका विश्वास कमजोर होने लगा। तब हमने तुरंत बस्तियों में वापिस मकान बनाने में उनकी सहायता की।

बाद में जब पानी के कनेक्शन के लिए बीएमसी के अधिकारी आए, तो उन्होंने कहा “कनेक्शन कहां लगाएंगे? ये चार बांस और पन्नी से बना ढांचा है, इसे घर कैसे कह सकते हैं?” और पॉलिसी के हिसाब से उन्होंने उस समय कनेक्शन देने से मना कर दिया। इसके बाद हमने बस्तियों में लोगों के समूह बनाए और उन्हें सरकारी दफ्तरों में जाने के लिए तैयार किया, ताकि वे अपने अधिकारों के लिए सवाल उठा सकें। हमने अधिकारियों के साथ बैठकें भी कीं और उन्हें बताया कि कोर्ट का आदेश साफ कहता है कि अगर घर का ढांचा बना हुआ है, तो उसमें पानी का कनेक्शन दिया जा सकता है।

इस बातचीत के बाद ही लोगों को राहत मिली और बीएमसी ने उस बस्ती के 27 से अधिक घरों में पानी के कनेक्शन दे दिए।

हालांकि पानी के अलावा इन बस्तियों में बिजली, सड़क, नाली और सफाई जैसी कई मूलभूत समस्याएं भी मौजूद हैं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या लोगों की यह धारणा है कि “हम इस शहर के नहीं हैं।” इस वजह से वे अपने अधिकारों की मांग करने से हिचकते हैं। उन्हें डर रहता है कि कहीं उन्हें गैरकानूनी घोषित न कर दिया जाए, उनकी नौकरी न छिन जाए, या उनकी बस्ती न उजाड़ दी जाए।

इन अनुभवों से हमें यह समझ आया कि संसाधनों की कमी तो एक समस्या है ही, लेकिन उससे भी कहीं गहरी समस्या डर और असुरक्षा की मानसिकता है।

हमारा काम सिर्फ पाइपलाइन या कनेक्शन दिलाने तक सीमित नहीं है। हम कोशिश करते हैं कि लोग खुद को इस शहर का नागरिक मानें, यह समझें कि उनकी आवाज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी किसी और की।

अधिक जानें: श्रम अधिकारों के लिए साकी नाका के श्रमिकों का संघर्ष।

अधिक करें: लेखक से जुड़ने और उनके काम को सहयोग देने के लिए उनसे [email protected] और [email protected] पर संपर्क करें।​

लेखक के बारे में

  • अक्षिता रामचंद्र बोले मुंबई की निवासी हैं और मराठी साहित्य में एम.ए. हैं। साल 2023 से वे लोकतंत्र प्रोत्साहन केन्द्र (सीपीडी) के साथ जुड़ी हैं और ‘वॉटर फॉर ऑल’ अभियान के तहत मुंबई शहर जिला समन्वयक के रूप में कार्यरत हैं। वे बस्तियों में जल अधिकार, शहरी जल प्रबंधन और प्रशासनिक समन्वय पर काम करती हैं। सामुदायिक विकास, रणनीतिक संचार और लेखन में उनकी विशेष रुचि है।
  • शाकिर शेख मुंबई में बस्ती समन्वयक के रूप में पानी हक समिति के साथ जुड़े हैं। उन्होंने ‘पुकार’ संस्था के साथ गोवंडी की बस्तियों में पानी की कमी का बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर असर विषय पर शोध किया है। वे शहरी गरीबों के जल अधिकार और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रूप से काम करते हैं।