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जब औरतों के नारों से गूंज उठेंगी सड़कें
1400 महिलाओं की मज़दूर यूनियन बनने के पीछे क्या है संघर्ष की कहानी? देखिए कैसे घर से बीड़ी बनाने वाली महिलाओं ने शोषण के खिलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद की।प्रकृति को बचाने वालों का ख़याल कौन रखेगा?
संरक्षण के काम में जुटे लोग किस कीमत पर इसे अंजाम दे रहे हैं? सीमित संसाधनों के संकट से जूझते संरक्षणकर्मियों का मानसिक स्वास्थ्य भी अब संकट में है।दावत-ए-नेटवर्किंग!
कॉन्फ्रेंस के लंच में सिर्फ मेनू नहीं, रिश्ते भी परोसे जाते हैं। अपनी नेटवर्किंग को मुकाम तक पहुंचाने के लिए अपनाइए हमारे कुछ ख़ास नुस्खे!विकलांगता पर काम करने वाली संस्थाओं को फंडिंग क्यों नहीं मिलती?
भारत में सीएसआर फंडिंग का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा विकलांगता क्षेत्र तक पहुंचता है। एक नयी रिपोर्ट बता रही कि है कि इस स्थिति को कैसे बदला जा सकता है।सुई और धागे से अवसर बुनने का सामाजिक उद्यम
क्या कारीगरों का हित और कारोबार, दोनों साथ चल सकते हैं? लखनऊ की चिकनकारी से निकला एक सामाजिक उद्यम बता रहा है कि स्थानीय स्तर पर रोज़गार की दिशा कैसे बदली जा सकती है।क्या दिल्ली के गांवों का शहर पर हक़ नहीं है?
जून 2025 में दिल्ली के नारायणा गांव में एक जनसुनवाई हुई। इसने दशकों की सरकारी उपेक्षा के साथ-साथ स्थानीय समुदाय के उभरते प्रतिरोध को भी सामने रखा।आपको वेलकम किट मिली क्या?
हर नौकरी एक वेलकम किट साथ लाती है। बस किसी में लैपटॉप होता है, तो किसी में सर्वे का रजिस्टर। पेश है कॉर्पोरेट और एनजीओ की दुनिया का एक आम पहला दिन।डेटा से नहीं, लोगों से सीखना
भारत के ट्रकिंग समुदाय के साथ काम करते हुए हमने जाना कि फील्ड में समय बिताना, भरोसा बनाना और उन समुदायों को समझना कितना अहम है, जो अक्सर औपचारिक आंकड़ों से बाहर रह जाते हैं।बदलते मॉनसून के दौर में बारिश की एक-एक बूंद सहेजना जरूरी
जलवायु परिवर्तन, अल नीनो और बदलते मॉनसून के बीच भारत में चरम मौसम की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे समय में बारिश की हर बूंद का संरक्षण ही जल और खाद्य सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार है।फंडर से बातचीत? योगा से होगा!
फंड आए न आए, सांस आती रहेगी!जून 2026 एफसीआरए संशोधन: नॉन-प्रॉफिट संस्थाओं के लिए इसके क्या मायने हैं?
गृह मंत्रालय ने एफसीआरए नियमों में संशोधन किया है। जानिए क्या सब बदला है और आपकी संस्था कैसे इन नए नियमों का पालन कर सकती है।सरल कोश: बेसलाइन सर्वे क्या होता है और यह क्यों ज़रूरी है?
जब कोई संस्था किसी नए कार्यक्रम या पहल की शुरुआत करती है, तो ‘बेसलाइन सर्वे’ शब्द अक्सर उसकी शुरुआती तैयारियों में सुनने को मिलता है।