अधिकार

जन आंदोलन लंबे समय तक कैसे जिंदा रहते हैं?

आंदोलन की असली ताकत सामुदायिक भागीदारी, जमीनी नेतृत्व और व्यापक गठबंधन होते हैं। छोटी-छोटी जीतों, अदालती आदेशों और नीतिगत बदलावों के बावजूद संघर्ष लगातार जारी रहता है।
जन आंदोलन लंबे समय तक कैसे जिंदा रहते हैं?
5 फ़रवरी 2026 को प्रकाशित

पानी के अधिकारों के लिए मेरा संघर्ष दो दशकों से भी ज्यादा पुराना है। साल 2000 के आस-पास मेरा काम इस सवाल से शुरू हुआ था कि क्या मुंबई में नगर शासन से जुड़े सुधार सच में जमीन पर लागू हो रहे हैं, जैसा कि 74वें संविधान संशोधन में कहा गया था?

शुरुआत में मेरा ध्यान वार्ड समितियों और लोगों की भागीदारी पर था। लेकिन जैसे-जैसे इस प्रक्रिया को समझा, यह साफ होने लगा कि समस्या सिर्फ व्यवस्थाओं की नहीं, बल्कि शासन की पूरी सोच से जुड़ी है।

मुंबई की पानी व्यवस्था को सुधारने के नाम पर लाई जा रही योजनाओं को तकनीकी समाधान बताया जा रहा था। लेकिन गहराई से देखने पर समझ आया कि ये फैसले इस बात से तय हो रहे थे कि पानी किसे मिलेगा और किसे नहीं। इनमें बहिष्करण, निजीकरण और पानी को नियंत्रण के साधन के रूप में इस्तेमाल करने की सोच साफ दिखती थी।

फेसबुक बैनर_आईडीआर हिन्दी

इसी समझ ने हमारे संघर्ष को नई दिशा दी और पानी हक समिति जैसी पहल सामने आई। शुरुआती दौर में हमने समुदायों के साथ इस बुनियादी चर्चा से काम शुरू किया कि पानी मुनाफे की चीज नहीं, बल्कि एक अधिकार है।

बीते 20 सालों में यह संघर्ष कई रूपों में आगे बढ़ा। प्रशासन से बातचीत, बातचीत से लेकर शोध, शोध से सामुदायिक संगठित प्रयासों तक, और सड़कों से अदालतों तक।

यह किसी बड़ी जीत की कहानी नहीं है। यह उस सफर की कहानी है जिसमें बार-बार कोशिशें करनी पड़ीं, गलतियां हुईं, झटके लगे, लेकिन छोटी-छोटी सफलताओं के सहारे आंदोलन जीवंत बना रहा।

राजनीतिक फैसलों को ‘तकनीकी समस्या’ बताकर पेश किया जाता है

साल 2000 के शुरुआती वर्षों में वर्ल्ड बैंक ने मुंबई में वॉटर डिस्ट्रीब्यूशन इम्प्रूवमेंट प्रोजेक्ट के लिए एक सार्वजनिक परामर्श बैठक की थी, जिसमे हम भी शामिल हुए। इसमें मुंबई के जल संकट को पूरी तरह एक तकनीकी समस्या के रूप में पेश किया गया। कहा गया कि शहर में पानी की कमी लीकेज, दबाव, क्षमता और दक्षता जैसी वजहों से है।

लेकिन ये दलीलें हमारे गले नहीं उतर रही थीं। क्योंकि मुंबई महानगरपालिका सबसे अमीर पालिका है एवं इसका जल विभाग मुनाफे में चलता है और यह एशिया में उन गिने-चुने विभागों में है, जिनके पास अपने बांध हैं। ऐसे में सिर्फ तकनीकी कमी की बात हमें अधूरी लगी।

एक शहरी गली जिसमें दोनों ओर छोटे घर और दुकानें है और कुछ लोग बीच में चर्चा करते हुए_पानी का अधिकार
पानी तक पहुंच पहुंचका सवाल, इस बात से गहराई से जुड़ा है कि शहर किसे अपना मानता है और किसे नहीं। यह अपनापन जाति, धर्म और प्रवासन के आधार पर तय होता है। | चित्र साभारः पानी हक समिति

जब हमने इस परियोजना से जुड़े दस्तावेजों को ध्यान से पढ़ा, तो समझ आया कि तकनीक और प्रबंधन से जुड़ी भाषा के पीछे असल में राजनीतिक फैसले छिपाए जा रहे थे। खासकर पानी के निजीकरण की दिशा में बढ़ते कदम। यह समझ बनते ही हमारी लड़ाई की दिशा बदल गई। पाइप और पंप की खराबी या कमी पर बहस छोड़ हम ये सवाल उठाने लगे कि पानी की उपलब्धता पर फैसले कौन ले रहा है? इसका फायदा किसे मिल रहा है? और किसे जानबूझकर बाहर रखा जा रहा है?

धीरे-धीरे यह भी साफ हुआ कि पानी तक पहुंच का सवाल, इस बात से गहराई से जुड़ा है कि शहर किसे अपना मानता है और किसे नहीं। यह अपनापन जाति, धर्म और प्रवासन के आधार पर तय होता है।

कई जगहों पर पानी की पाइपलाइन बस्तियों के पास या उनके बीच से गुजरती है, लेकिन उन बस्तियों को पानी नहीं मिलता। गहराई से देखें तो एक साफ पैटर्न दिखता है। इन बस्तियों के नाम अक्सर दलित-बहुजन नेताओं के नाम पर होते हैं- भीम नगर, अंबेडकर नगर, अशोक सम्राट नगर, शिवाजी नगर, सिद्धार्थ नगर, गौतम नगर। यहां रहने वाले ज्यादातर लोग दलित, ओबीसी और मुसलमान हैं।

इन नामों में यह भी छिपा होता है कि वे एक ऐसे शहर में सम्मान से जीने की कोशिश करते हैं, जो उन्हें अवैध मानता है। अक्सर मुसलमान बस्तियों को बांग्लादेशी, प्रवासियों को बाहरी और गरीबों को अतिक्रमणकारी कहकर उनका पानी का अधिकार छीन लिया जाना ‘जायज’ ठहराया जाता है।

परियोजना के विरोध के चलते पानी के निजीकरण की योजना तो वापस ले ली गई। लेकिन इसके बाद एक और अहम सवाल सामने आया कि जब निजीकरण नहीं हुआ तो आज भी इतनी बस्तियों को पानी क्यों नहीं मिल रहा?

सबूत ही आपके आंदोलन को बाहरी दुनिया में वैधता देते हैं

बस्तियों को आखिर पानी क्यों नहीं मिल रहा? इस बात का जवाब ढूंढने के लिए हमारा ध्यान व्यवस्थित और गहरे अध्ययन पर गया। हमारा मानना था कि पानी की मांग को सिर्फ एक मानवीय अधिकार के रूप में ही नहीं बल्कि ठोस आंकड़ों के साथ सामने रखना भी जरूरी है। हमने मुंबई की लगभग 106 अनौपचारिक बस्तियों का अध्ययन किया, जहां लोगों को पानी नहीं मिल रहा था।

पानी के टैंकर के पीछे कतार में रखी पानी भरने के लिए कैन और आसपास खड़े कुछ व्यक्ति_पानी का अधिकार
कई परिवार अपनी आमदनी का 25 प्रतिशत तक पानी खरीदने में खर्च कर रहे थे, वह भी ऐसा पानी, जो अक्सर दूषित होता था। | चित्र साभारः पानी हक समिति

जल्द ही हमें समझ आ गया कि सिर्फ यह देखना काफी नहीं है कि पानी कहां नहीं पहुंच रहा, बल्कि यह भी देखना जरूरी है कि पानी आ कहां से रहा है। इसी सोच के साथ हमने उन इलाकों में भी काम शुरू किया, जहां से मुंबई को पानी मिलता है, जैसे कालू और वैतरणा बांध के आसपास रहने वाले समुदाय।

इन अध्ययनों से सामने आया कि मुंबई में 20 लाख से ज्यादा लोग ऐसे हैं, जिनके पास पानी तक कोई कानूनी पहुंच नहीं है। कई परिवार अपनी आमदनी का 25 प्रतिशत तक पानी खरीदने में खर्च कर रहे थे, वह भी ऐसा पानी, जो अक्सर दूषित होता था। इसका असर लोगों की सेहत पर पड़ा, बच्चों की पढ़ाई बाधित हुई, और राजनीतिक व पुलिस संरक्षण में चलने वाले वाटर माफिया का शोषण बढ़ता गया।

हमने यह भी पाया कि मिडिल वैतरणा बांध के निर्माण के दौरान विस्थापित हुए समुदायों को पानी के कनेक्शन का वादा किया गया था। लेकिन जमीन देने के बावजूद, इनमें से कई लोगों को आज तक पानी नहीं मिला।

इन निष्कर्षों के साथ हमने नगर निगम, मानवाधिकार आयोग और राज्य सरकार, हर संभव जगह अपनी बात पहुंचाई लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते कहीं से ठोस जवाब नहीं मिला।

इसके बाद हम सड़कों पर उतरे। रैलियां और प्रदर्शन किए गए ताकि इस मुद्दे पर ज्यादा ध्यान जाए। कुछ जनप्रतिनिधियों ने समर्थन भी जताया, लेकिन जमीनी हालात में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। तब हमने न्यायपालिका का रुख किया।

हमने अपने सारे अध्ययन एक जगह जुटाए, विशेषज्ञों की राय ली और याचिका तैयार की। हमारे तर्क संविधान पर आधारित थे। 74वें संशोधन के तहत पानी की जिम्मेदारी नगरपालिकाओं की है, और अनुच्छेद 21 के तहत पानी तक पहुंच सम्मानजनक जीवन के अधिकार का हिस्सा है।

अदालत में नगर निगम ने खुद माना कि 53,000 से ज्यादा अनधिकृत इमारतों को मानवीय आधार पर पानी दिया जा रहा है, जबकि अनौपचारिक बस्तियों को इससे वंचित रखा गया है। इस विरोधाभास को दर्ज करते हुए अदालत ने अंततः निर्देश दिया कि नगर निगम को ऐसी बस्तियों के लिए पीने के पानी की नीति बनानी होगी, जिन्हें अब तक बाहर रखा गया था।

इस पूरे अनुभव ने हमारे इस विश्वास को और मजबूत किया कि आंदोलनों को बाहरी दुनिया में वैधता दिलाने का सबसे मजबूत आधार शोध और सबूत ही होते हैं।

समुदाय का भरोसा ही आंदोलन की असली ताकत है

इस प्रक्रिया में निर्णायक मोड़ तब आया, जब यह साफ हुआ कि जिन बस्तियों की सच्चाई को समझने हम निकले थे, वहीं के लोग इस समझ की अगुवाई भी कर रहे हैं। अध्ययन उनके अनुभवों, उनकी भाषा और उनकी जरूरतों से निकलकर सामने आए। इस वजह से यह काम किसी बाहरी मूल्यांकन जैसा नहीं रहा, बल्कि समुदाय की अपनी आवाज बन गया। हमने जो कुछ भी सीखा और समझा, उसे अपने तक सीमित नहीं रखा। हर निष्कर्ष समुदाय के साथ साझा किया और आगे क्या करना है पर उनके साथ चर्चा की। इन्हीं चर्चाओं से पानी परिषद का विचार सामने आया। तब तक हम किसी औपचारिक समिति के रूप में संगठित नहीं थे, लेकिन परिषद में हुई बातचीत ने यह साफ कर दिया कि संघर्ष को आगे ले जाने के लिए सामूहिकता ही हमारी असली ताकत होगी।

अदालत में नगर निगम ने खुद माना कि 53,000 से ज्यादा अनधिकृत इमारतों को मानवीय आधार पर पानी दिया जा रहा है, जबकि अनौपचारिक बस्तियों को इससे वंचित रखा गया है।

समय के साथ यह भी समझ आया कि कोई भी आंदोलन तब तक मजबूत नहीं होता, जब तक प्रभावित लोग खुद उसे अपना संघर्ष न मानें। 2012 से 2014 के बीच जब अदालत में सुनवाई चल रही थीं, तो वहां हमारी मौजूदगी सीमित रहती थी। लेकिन अदालत के बाहर असली काम चलता रहता था। हर सुनवाई के बाद हम वापस बस्तियों में जाते, लोगों को बताते कि क्या हुआ और आगे क्या संभावनाएं हैं।

समुदाय का समर्थन भीड़ से नहीं, भरोसे से बनता है। लोग तब ही मजबूती से साथ खड़े होते हैं, जब उन्हें यह भरोसा हो कि फैसले उनके बिना नहीं होंगे, कि यह लड़ाई उनके हक की है और उनकी भागीदारी से ही आगे बढ़ेगी। यही भरोसा आंदोलन को जमीन से जोड़ता है और उसे टिकाऊ बनाता है।

गठबंधन आंदोलनों को मजबूत बनाते हैं

हमारा आंदोलन एक दिन में खड़ा नहीं हुआ। यह धीरे-धीरे मजदूर संगठनों, युवा समूहों, सिविल सोसाइटी संस्थाओं और समुदाय के नेताओं के साथ रिश्ते बनाते हुए बना। साल 2005 की शुरुआत में, जब मुंबई की सैकड़ों अनौपचारिक बस्तियां तोड़ी गईं, तब हमने बेदखली के खिलाफ और पुनर्वास के अधिकार के लिए कई समुदायों के साथ मिलकर काम किया। इसी प्रक्रिया में हमारा जुड़ाव आवास अधिकार पर काम करने वाले समूहों से हुआ, जो आगे चलकर पानी के अधिकार की इस लड़ाई में हमारे सहयोगी बने।

इन गठबंधनों ने हमें यह भी सिखाया कि कोई भी आंदोलन सिर्फ एक मुद्दे तक सीमित नहीं रह सकता, क्योंकि जमीनी समस्याएं कभी अकेले नहीं होतीं। जब हमने आवास, पानी और स्वास्थ्य के आपसी रिश्तों को समझा, तो व्यापक और टिकाऊ गठबंधन बन पाए।

हालांकि अदालत ने हमारे पक्ष में फैसला दिया, लेकिन उसके अमल की दिशा में ठोस प्रगति नहीं हुई। इसके बाद हमने सामुदायिक संगठन को और तेज किया और उन सभी बस्तियों तक पहुंचने की कोशिश की, जहां पानी नहीं था। इसका नतीजा यह हुआ कि 40 से ज्यादा समूहों का एक बड़ा समन्वय नेटवर्क खड़ा हुआ। इसी नेटवर्क से पानी पिलाओ अभियान की शुरुआत हुई।

इस नेटवर्क के जरिए लगभग 2,000 लोग अपने घरों से बोतलों में पानी लेकर नगर निगम पहुंचे। उन्होंने नगर आयुक्त को वह पानी दिखाया और एक सीधा सवाल पूछा—“क्या आप यही पानी अपने बच्चे को पिलाएंगे?”

इस पूरे अनुभव ने हमें यह सिखाया कि गठबंधन किसी आंदोलन की बुनियादी संरचना होते हैं। सहयोगियों के बिना कोई भी आंदोलन आखिरकार अपने ही बोझ तले दब जाता है।

जीत अक्सर चरणबद्ध होती है और नए सवाल भी सामने लाती है

साल 2017 में बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के तीन साल बाद नगर निगम ने वॉटर फॉर ऑल नीति पेश की, लेकिन यह कई मायनों में अधूरी थी। उदाहरण के लिए, केंद्र सरकार की जमीन, साल्ट पैन, वन भूमि और रेलवे की जमीन पर रहने वाले लोगों को पानी का कनेक्शन लेने से पहले जमीन के मालिक विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) लेना जरूरी था। यह शर्त कई समुदायों के लिए पानी तक पहुंचने में एक बड़ी बाधा बन गई।

सभा को संबोधित करता एक युवा_पानी का अधिकार
हर सुनवाई के बाद हम वापस बस्तियों में जाते, लोगों को बताते कि क्या हुआ, क्या कहा गया, और आगे क्या संभावनाएं हैं। | चित्र साभारः पानी हक समिति

नीति आते ही हमने समुदायों को संगठित करना शुरू किया, ताकि वे पानी के कनेक्शन के लिए आवेदन कर सकें। साथ ही हम नए सबूत भी जुटाते रहे। कोरोना महामारी के दौरान हमने टेलीफोनिक सर्वे किए, ताकि यह समझा जा सके कि जिन लोगों के पास पानी नहीं है, उन पर कोविड का क्या असर पड़ा। इस अध्ययन ने मीडिया का ध्यान खींचा और नगर निगम को एक बार फिर हमसे बातचीत करने पर मजबूर किया। परिणामस्वरूप साल 2022 में वॉटर फॉर ऑल नीति का संशोधित रूप सामने आया।

लेकिन एक बेहतर नीति आ जाने से संघर्ष खत्म नहीं हुआ। बल्कि आंदोलन एक नए चरण में दाखिल हो गया—जहां जोर नीति के अमल, निगरानी और अब तक हासिल अधिकारों की रक्षा पर था। इस अनुभव ने हमें यह सिखाया कि किसी भी आंदोलन की स्थिरता इस पर निर्भर करती है कि शुरुआती जीत के बाद आगे की योजना क्या है। कागज पर लिखी बातों को जमीन पर उतारना उतना ही जरूरी है।

इस चरण में हमारी भूमिका समुदायों को सक्षम बनाने की रही, न कि उनकी जगह काम करने की। हमने लोगों को आवेदन प्रक्रिया समझने में मदद की, नई नौकरशाही अड़चनों से निपटने के तरीके साझा किए और पीछे ले जाने वाली कोशिशों का सामना किया। उदाहरण के तौर पर, हर बस्ती में 5 से 10 लोगों के कार्य समूह बनाए गए, जो पानी के कनेक्शन से जुड़े आवेदनों की स्थिति पर लगातार नजर रखते थे। आज मुंबई में लगभग 80 सामुदायिक नेता हैं, जो यह जिम्मेदारी अपने स्तर पर संभाल रहे हैं।

नीतियों जितना ही अहम है, जमीनी भ्रामकता दूर करना

हम बार-बार यह तर्क सुनते आए हैं कि अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले लोग अवैध हैं, भुगतान नहीं करते है, या फिर नागरिक ही नहीं हैं। नीतियां बदलने के बावजूद, यही कहानियां उनके बहिष्करण को जायज ठहराती रहीं।

लाइन में लगी महिलाएं जो हाथ में पानी की प्लास्टिक की बोतले लिये हुए हैं_पानी का अधिकार
हमने नगर आयुक्त को वह पानी दिखाया और एक सीधा सवाल पूछा—“क्या आप यही पानी अपने बच्चे को पिलाएंगे?” | चित्र साभारः पानी हक समिति

हमें समझ आया कि जब तक इन धारणाओं को चुनौती नहीं दी जाएगी, तब तक नीतिगत उपलब्धियां भी कमजोर बनी रहेंगी। इसलिए हमने उस मिथक को तोड़ने पर काम किया कि अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले लोग पानी की चोरी करते हैं या व्यवस्था पर बोझ हैं। हमने यह दिखाया कि शहर में आने वाले कुल पानी का एक-तिहाई से ज्यादा नॉन-रेवेन्यू वॉटर माना जाता है, और इसका बड़ा हिस्सा अनौपचारिक तरीके से बड़ी कंपनियों, होटल उद्योग और आवासीय परिसरों तक पहुंचता है। हमारा तर्क साफ था कि निगरानी शहरी गरीबों पर नहीं, बल्कि इन संस्थागत बकायेदारों पर होनी चाहिए।

इस तरह हमने विमर्श को अवैध झुग्गियां पानी चुरा रही हैं से हटाकर बस्तियों को पानी से वंचित किया जा रहा है, की दिशा में मोड़ा।

इन वर्षों के संघर्ष ने एक और बुनियादी सवाल भी सामने रखा कि शहर आखिर किसका है? किसी समुदाय के शहर पर अधिकार को मान्यता देने का मतलब है कि पानी जैसी बुनियादी जरूरतों को किसी रियायत की तरह नहीं, बल्कि अधिकार की तरह देखा जाए। इस सोच ने हमारे लिए बहुत कुछ बदल दिया। इसने अधिकारों को नागरिक जिम्मेदारियों से जोड़ा और यह समझ दी कि टिकाऊ आंदोलन के लिए समुदायों को सिर्फ शामिल होने की मांग से आगे बढ़कर स्वामित्व का दावा करना होगा।

इसी आधार पर हमने यह कहा कि अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले लोग भी उतने ही नागरिक हैं, जितने बड़े अपार्टमेंट में रहने वाले। इसलिए बेदखली की बजाय नियमन जरूरी है, और पानी से वंचित करने की बजाय न्यायसंगत दरें तय की जानी चाहिए।

आज आंदोलन एक ऐसे चरण में है जो शायद पहले जितना दिखता नहीं, लेकिन उतना ही राजनीतिक है। हजारों परिवारों तक पानी पहुंच चुका है, लेकिन अब जोर इस बात पर है कि ये उपलब्धियां समान रूप से लागू हों, समय के साथ टिकें, और उन लोगों तक भी पहुंचे जो अब भी बाहर हैं। नौकरशाही अड़चनें और बदलती राजनीतिक प्राथमिकताएं इन हासिलों को लगातार चुनौती देती रहती हैं।

आज आंदोलन को जिंदा रखने का मतलब है सतर्क रहना, हालात के हिसाब से रणनीतियां बदलना, और सामूहिक स्वामित्व की भावना में गहराई से जमे रहना।

यह लेख अंग्रेजी में पढ़ें

अधिक जानें

  • जानें, सामाजिक बदलाव के लिए जमीनी अनुभवों से सीखना।
  • जानें, महिलाओं के नेतृत्व को पहचानने के अवसर में तब्दील एक संकट।
  • जानें, लोकतंत्र में जन आंदोलनों का क्या महत्त्व है?

लेखक के बारे में