रोजगार के सवाल पर 2026 का बजट क्या कहता है?

भारत को दुनिया में तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। हाल ही में बेरोजगारी दर के आंकड़ों में भी गिरावट आयी है। फिर भी देश में रोजगार एक बड़ा सवाल बना हुआ है। खासकर तब, जब देश की कामकाजी और युवा आबादी लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2011 में 15–59 वर्ष के आयु वर्ग की आबादी 73.5 करोड़ थी, जो 2026 में बढ़कर 92.2 करोड़ हो चुकी है। यानी हर वर्ष औसतन सवा करोड़ नए लोग श्रम बाजार में प्रवेश कर रहे हैं।
पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) के अनुसार, सामान्य स्थिति में बेरोजगारी दर वर्ष 2017–18 के 6 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2023–24 में 3.2 प्रतिशत पर आ गई है। लेकिन प्रचलित साप्ताहिक स्थिति के तहत बेरोजगारी अब भी 4.9 प्रतिशत है, जो दिखाती है कि अभी भी बड़ी आबादी को स्थिर और नियमित काम नहीं मिल पा रहा है।
रोजगार की यह चुनौती युवाओं के लिए और गंभीर है। वर्ष 2026 में भारत की युवा आबादी (15–29 वर्ष) 36.7 करोड़ है, जो कुल आबादी का लगभग 26 प्रतिशत है। इनमें 19.2 करोड़ पुरुष और 17.6 करोड़ महिलाएं हैं। वर्ष 2023–24 में इसी वर्ग के युवाओं में बेरोजगारी दर सबसे अधिक (10.2 प्रतिशत) दर्ज की गई थी।
बजट 2026-27 में रोजगार
रोजगार का सवाल केवल काम मिलने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह सामाजिक, भौगोलिक और लैंगिक असमानताओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
इसी पृष्ठभूमि में यह देखना जरूरी है कि बजट 2026–27 इन चुनौतियों को किस तरह संबोधित करता है।
वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में रोजगार के विषय को एक स्वतंत्र और केंद्रीय मुद्दे के रूप में पेश नहीं किया, लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों के संदर्भ में इसका उल्लेख जरूर किया। उन्होंने कपड़ा विस्तार और रोजगार योजना की बात की, जिसके तहत कपड़ा उद्योग के क्लस्टरों के आधुनिकीकरण, मशीनरी और तकनीकी सुधार के लिए सहायता दी जाएगी। सेवा क्षेत्र में “शिक्षा से रोजगार और उद्यमिता” पर एक स्थायी समिति बनाने की घोषणा भी की गई है।
इसके अलावा, वित्त मंत्री ने होटल प्रबंधन पर राष्ट्रीय परिषद को भारतीय आतिथ्य संस्थान में परिवर्तित करने और 20 प्रमुख पर्यटन स्थलों पर 10,000 गाइडों को 12 सप्ताह का प्रशिक्षण देने के लिए एक पायलट कार्यक्रम की घोषणा की है। यह प्रशिक्षण भारतीय प्रबंधन संस्थानों के माध्यम से कराया जाएगा। बजट में खेल और पशुपालन जैसे क्षेत्रों में भी रोज गार और उद्यमिता को बढ़ावा देने की बात कही गई है।
2025–26 के संशोधित बजट में कटौतियां अलग तस्वीर दिखा रही हैं
बजट भाषण और उससे पहले पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया कि वर्ष 2025–26 में देश की अर्थव्यवस्था 7.4 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। लेकिन इस दावे के उलट, वित्तीय वास्तविकता कुछ और ही संकेत देती है। वर्तमान में वर्ष 2025–26 में राजस्व आय का लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा है, जिसके चलते संशोधित अनुमान में सकल राजस्व को 42.70 लाख करोड़ रुपये से घटाकर 40.77 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है।
रोजगार की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण मंत्रालयों के बजट (रुपये करोड़ में), नोट: ब.अ. – बजट अनुमान, स.अ. – संशोधित अनुमान

स्रोत: केन्द्रीय बजट दस्तावेज, भिन्न वर्ष
सरकार ने बजट घाटे और बढ़ते सार्वजनिक ऋण को नियंत्रित रखने के उद्देश्य से कुल व्यय में भी कटौती की है। नतीजतन, 2025–26 का कुल बजट संशोधित अनुमान में बजट अनुमान से लगभग 1 लाख करोड़ रुपये कम हो गया। इसका सीधा असर केंद्रीय प्रायोजित योजनाओं पर पड़ा है। इन योजनाओं का सम्मिलित बजट 5.41 लाख करोड़ रुपये से घटकर 4.20 लाख करोड़ रुपये रह गया है। इसी तरह, कुल पूंजीगत व्यय भी 15.48 लाख करोड़ रुपये से घटकर 14.03 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया।
इन कटौतियों का असर उन मंत्रालयों पर सबसे ज्यादा पड़ा है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, ग्रामीण और शहरी विकास जैसे बुनियादी क्षेत्रों से जुड़े हैं और जिनकी भूमिका रोजगार पैदा करने में भी अहम है। विशेष रूप से जल शक्ति मंत्रालय और आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय के बजट में क्रमशः लगभग 58 प्रतिशत और 40 प्रतिशत तक की कटौती की गई है।
रोजगार के लिहाज से महत्त्वपूर्ण अन्य मंत्रालयों की स्थिति भी ऐसी ही है। श्रम एवं रोजगार मंत्रालय, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय और कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय, सभी के वर्ष 2025–26 के संशोधित बजट में 47 से 61 प्रतिशत तक की कटौती हुई है। खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय का बजट भी इस दौरान लगभग 18 प्रतिशत कम किया गया है (सारणी–1)।
ध्यान देने वाली बात यह है कि वर्ष 2026–27 के बजट में भी इन मंत्रालयों के लिए किसी ठोस बढ़ोतरी का संकेत नहीं मिलता। यानी जिन क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होने की उम्मीद की जाती है, वे लगातार संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं।
वीबी-जी राम जी यानी मनरेगा पर सवाल बरकरार
ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन की जिम्मेदारी मुख्य रूप से ग्रामीण विकास मंत्रालय पर है। इसी मंत्रालय के तहत रोजगार गारंटी कानून मनरेगा लागू किया जाता रहा है, जिसकी जगह अब विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण), यानी वीबी-जी राम जी लाया गया है। सबसे अहम बदलाव मनरेगा को लेकर हुआ है।
बजट 2026–27 में वीबी-जी राम जी के लिए 95,692 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो पिछले वर्ष मनरेगा के लिए रखे गए 86,000 करोड़ रुपये से अधिक है। इसके अलावा, इस वर्ष मनरेगा के लिए भी 30,000 करोड़ रुपये का अलग से प्रावधान किया गया है। कुल मिलाकर देखें तो रोजगार गारंटी के लिए आवंटित राशि पहले की तुलना में बढ़ी हुई दिखती है।
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह राशि सभी ग्रामीण परिवारों को गारंटी के अनुसार 125 दिन का रोजगार देने के लिए काफी होगी? मनरेगा पर काम करने वाले कई विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा प्रावधान इसके लिए नाकाफी है। साथ ही, वीबी-जी राम जी के क्रियान्वयन के लिए राज्य सरकारों को पहले से अधिक आवंटन करना होगा और इस योजना का क्रियान्वयन खेती के मौसम में दो महीने के लिए स्थगित रहेगा। यानी बजट में बढ़ोतरी के बावजूद रोजगार की गारंटी को लेकर चुनौतियां बनी हुई हैं।
ग्रामीण विकास की योजनाओं का बजट (रुपये करोड़ में)
स्रोत: केन्द्रीय बजट दस्तावेज, भिन्न वर्ष
इसके अलावा दीन दयाल उपाध्याय–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और प्रधानमंत्री आवास योजना–ग्रामीण जैसी ग्रामीण विकास मंत्रालय की योजनाओं का बजट भी नहीं बढ़ा है। ये सभी योजनाएं ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय के अवसर बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती हैं।
इसी तरह जल शक्ति मंत्रालय के तहत आने वाले जल जीवन मिशन का बजट भी नहीं बढ़ा है। जल जीवन मिशन न केवल बुनियादी सुविधा से जुड़ी एक बड़ी योजना है, बल्कि इसके माध्यम से निर्माण, रख-रखाव और सेवा से जुड़े कई तरह के रोजगार भी पैदा हो सकते हैं। शहरी क्षेत्रों में आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के तहत प्रधानमंत्री आवास योजना–शहरी और अन्य योजनाएं लागू की जाती हैं, जिनसे शहरों में रोजगार को बढ़ावा मिलने की उम्मीद रहती है।
शहरी विकास की योजनाओं का बजट (रुपये करोड़ में)
स्रोत: केन्द्रीय बजट दस्तावेज, भिन्न वर्ष
अगर सरकार की रोजगार संवर्धन से जुड़ी इन योजनाओं को करीब से देखें, तो किसी बड़े बदलाव के संकेत नहीं मिलते। जैसा कि सारणी 2 व 3 के आंकड़े दिखाते हैं, इन सभी योजनाओं के बजट में 2025–26 के संशोधित अनुमान में कटौती की गई है और 2026–27 में भी, एक–दो अपवादों को छोड़ दें तो, इन योजनाओं के बजट या तो पिछले वर्ष के बराबर ही रहे हैं या फिर कम हो गए हैं।
आवंटन बनाम असर
सारणी 2 से साफ होता है कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का बजट पिछले पांच वर्षों से 19,000 करोड़ रुपये पर ही अटका हुआ है। यही नहीं, इस योजना में आवंटित बजट का पूरा उपयोग भी लगातार नहीं हो पाया है। वर्ष 2025–26 में तो आवंटित राशि का 60 प्रतिशत से भी कम खर्च का अनुमान है । प्रधानमंत्री आवास योजना–ग्रामीण और स्वच्छ भारत मिशन–ग्रामीण की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। इन योजनाओं में भी आवंटन और वास्तविक खर्च के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है।
ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के स्वरोजगार को बढ़ावा देने वाले दीन दयाल अंत्योदय राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम ) की तस्वीर भी ऐसी ही है। पिछले दो वर्षों में इस योजना का वास्तविक खर्च आवंटन से कम रहा है, और वर्ष 2026–27 में भी इसका बजट लगभग वर्तमान वर्ष के बराबर ही रखा गया है। हालांकि, इस वर्ष महिला उद्यमियों के लिए शी-मार्ट की घोषणा की गई है, जो महिलाओं को बाजार से जोड़ने में सहायक हो सकती है, लेकिन यह पहल अकेले ग्रामीण महिला रोजगार की व्यापक चुनौतियों का समाधान नहीं करती।
इस वर्ष प्रधानमंत्री कौशल और रोजगार क्षमता परिवर्तन (पीएम-सेतु) योजना की घोषणा की गई है, जो उन्नत आईटीआई के माध्यम से लागू की जाएगी
पिछले दो वर्षों में प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी के तहत बजट उपयोग बेहद कम रहा है-वर्ष 2024–25 में केवल 19 प्रतिशत और वर्ष 2025–26 (संशोधित अनुमान) में 37 प्रतिशत। वहीं वर्ष 2026–27 में स्वच्छ भारत मिशन-शहरी का बजट वर्ष 2023–24 और वर्ष 2024–25 की तुलना में लगभग आधा कर दिया गया है।
जल जीवन मिशन का अनुभव भी यही बताता है कि बड़ी योजनाओं में समस्या केवल आवंटन की नहीं, बल्कि क्रियान्वयन की है। वर्ष 2024–25 में इस योजना का केवल 32 प्रतिशत बजट खर्च हो पाया था, जबकि वर्ष 2025–26 में इसके 25 प्रतिशत तक ही खर्च होने का अनुमान है। वर्ष 2026–27 में भी इस योजना का बजट लगभग मौजूदा स्तर पर ही रखा गया है, जिससे इसके रोजगार सृजन की क्षमता पर सवाल उठते हैं।
रोजगार से जुड़ी अन्य योजनाएं
कुछ मंत्रालयों, जैसे श्रम एवं रोजगार मंत्रालय और कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय के बजट में वर्ष 2023–24 की तुलना में वर्ष 2026–27 तक उल्लेखनीय बढ़ोतरी दिखती है। लेकिन इसी अवधि में खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई ) मंत्रालय के बजट में कोई खास वृद्धि नहीं हुई है। युवा मामले और खेल मंत्रालय के बजट में जरूर सीमित बढ़ोतरी देखने को मिलती है (सारणी–1)।
रोजगार सृजन से जुड़ी एक अहम पहल प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना है, जिसे पहले ‘नया रोजगार सृजन योजना’ कहा जाता था। इस योजना का उद्देश्य औपचारिक रोजगार को बढ़ावा देना, कंपनियों को नई नौकरियां सृजित करने के लिए प्रोत्साहित करना और सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करना है। वर्ष 2025–26 में इसके लिए 20,000 करोड़ रुपये रखे गए थे, लेकिन संशोधित बजट में यह राशि घटकर केवल 848 करोड़ रुपये रह गई। वर्ष 2026–27 में इसके लिए फिर से 20,082 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। उम्मीद की जा सकती है कि इस वर्ष यह योजना पूरी तरह लागू हो पाएगी।
कौशल विकास
कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय के अंतर्गत स्किल इंडिया कार्यक्रम के तहत आने वाली प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का बजट वर्ष 2025–26 में 2,700 करोड़ रुपये था, जिसे संशोधित अनुमान में घटाकर 2,000 करोड़ रुपये कर दिया गया। वर्ष 2026–27 में इसका बजट 2,800 करोड़ रुपये रखा गया है।
हालांकि, हाल ही में आई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के पहले तीन चरणों में प्रशिक्षित 56.14 लाख उम्मीदवारों में से केवल 41 प्रतिशत को ही रोजगार मिल पाया। रिपोर्ट में योजना के क्रियान्वयन से जुड़ी कई अन्य खामियां भी उजागर हुई हैं।
इसके अलावा, इस वर्ष प्रधानमंत्री कौशल और रोजगार क्षमता परिवर्तन (पीएम-सेतु) योजना की घोषणा की गई है, जो उन्नत आईटीआई के माध्यम से लागू की जाएगी और पहले से चल रही कुछ योजनाओं की जगह लेगी। इसके लिए 6,140 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
महिला रोजगार
महिला रोजगार के संदर्भ में बजट में ‘शी-मार्ट’ की घोषणा के अलावा कोई बड़ी पहल नहीं दिखती। आर्थिक सर्वेक्षण ने खुद यह स्वीकार किया है कि महिलाओं पर घरेलू देखभाल और केयर वर्क का बोझ उनके रोजगार में भागीदारी की दिशा में एक बड़ी बाधा है। इसके बावजूद, इस दिशा में ठोस नीतिगत हस्तक्षेप या बड़े निवेश की घोषणा नहीं की गई।
इस दिशा में महिलाओं के रोजगार को सहारा देने वाली आंगनवाड़ी (सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0) तथा पालना (क्रेच) योजना और वर्किंग महिला आवास (सखी निवास) जैसी योजनाएं, जो एक बड़ी योजना “सामर्थ्य” के अंतर्गत आती हैं, का बजट या तो मामूली बढ़ा है या लगभग स्थिर ही रहा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि केयर इकोनॉमी को अभी भी नीति-स्तर पर पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिल पा रही है।
महिलाओं के रोजगार में बढ़ोतरी: राहत या भ्रम?
इस दौरान सबसे उल्लेखनीय बदलाव महिलाओं की कार्य भागीदारी दर में देखा गया है। वर्ष 2017–18 में जहां महिलाओं की कार्य भागीदारी दर 23 प्रतिशत थी, वहीं वर्ष 2023–24 में यह बढ़कर 41.7 प्रतिशत हो गई। हालांकि, यह वृद्धि असमान रही है। शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की कार्य भागीदारी दर 20 प्रतिशत से बढ़कर केवल 28 प्रतिशत हुई, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह 25 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 48 प्रतिशत तक पहुंच गई (सारणी–1)। इसके बावजूद, पुरुषों और महिलाओं की कार्य भागीदारी दर के बीच अब भी काफी बड़ा अंतर बना हुआ है।हाल के वर्षों में, खासतौर पर महिलाओं के रोजगार में जो बढ़ोतरी हुई है, वह मुख्यतः ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि से जुड़े स्वरोजगार के रूप में ही सामने आई है।
वर्ष 2018 में लगभग 50 प्रतिशत कामकाजी महिलाएं स्वरोजगार में थी, जो वर्ष 2024 में बढ़कर 66 प्रतिशत हो गई। ग्रामीण क्षेत्रों के मामले में आंकड़े बताते हैं कि 73 प्रतिशत महिलाएं और 59 प्रतिशत पुरुष स्वरोजगार में व्यस्त हैं। इनमें से अधिकांश छोटे किसान हैं और खेती के छोटे-छोटे कामों में लगे हुए हैं, जिनकी आय सीमित और अस्थिर है।
स्वरोजगार में लगी लगभग आधी महिलाएं घर के काम या खेती में बिना वेतन सहायता कार्य करती हैं। यानी वे काम तो करती हैं, लेकिन उन्हें सीधे तौर पर कोई आय नहीं मिलती। स्वरोजगार करने वालों में नियोक्ता बनने वालों का अनुपात भी बेहद कम है। जहां पुरुषों में यह लगभग 9 प्रतिशत है, वहीं महिलाओं में यह 1 प्रतिशत से भी कम है (सारणी–4)।
स्वरोजगार में लगे लोगों के प्रकार 2024 (%)
स्रोत : पीएललएफएस
हालांकि इन आंकड़ों के आधार पर महिलाओं के रोजगार में हुई वृद्धि को पूरी तरह सकारात्मक नहीं कहा जा सकता। हां, इसका एक सकारात्मक पहलू यह जरूर है कि बिना वेतन सहायता कार्य करने वाली महिलाओं की गिनती अब आंकड़ों में होने लगी है, जो पहले अक्सर अदृश्य रहती थीं। यह श्रम को पहचान देने की दिशा में एक अहम कदम है।
मजदूरी और आय: काम बढ़ा, कमाई घटी
रोजगार की स्थिति को केवल यह देखकर नहीं समझा जा सकता कि कितने लोग काम कर रहे हैं। उतना ही जरूरी है यह देखना कि उस काम से उन्हें कितनी आय हो रही है और क्या वह आय उनके जीवन को सुरक्षित बना पा रही है। इस कसौटी पर देखें तो पिछले कुछ वर्षों की तस्वीर चिंताजनक है।
वर्ष 2017–18 से वर्ष 2023–24 के बीच, स्वरोजगार और नियमित रोजगार दोनों में लगे लोगों की वास्तविक मासिक आय में गिरावट दर्ज की गई है। आर्थिक सर्वेक्षण 2024–25 के अनुसार, वर्ष 2023–24 में स्वरोजगार करने वाले पुरुषों की वास्तविक मासिक आय वर्ष 2017–18 की तुलना में 9.1 प्रतिशत कम थी। महिलाओं के मामले में यह गिरावट और भी तेज रही। इस अवधि में स्वरोजगार करने वाली महिलाओं की वास्तविक आय लगभग 32 प्रतिशत घट गई।
यह गिरावट केवल स्वरोजगार तक सीमित नहीं है। नियमित नौकरी करने वाले पुरुषों की वास्तविक मासिक आय भी इस अवधि में 6.4 प्रतिशत कम हुई, जबकि महिलाओं की आय में 12.5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। यानी जिन नौकरियों को अपेक्षाकृत सुरक्षित और स्थिर माना जाता है, वहां भी आय का स्तर कमजोर पड़ा है।
इस पूरी अवधि में केवल अनियमित मज दूरी करने वालों की आय में मामूली बढ़ोतरी देखने को मिली है। लेकिन यह बढ़ोतरी भी इतनी नहीं है कि महंगाई और असुरक्षित काम के जोखिमों की भरपाई कर सके।
देश में कम आय और कृषि व स्वरोजगार आधारित रोजगार की इस स्थिति को देखते हुए, रोजगार बढ़ाने की दिशा में उन मंत्रालयों और योजनाओं का बजट बढ़ते हुए उनके प्रभावी क्रियान्वयन जोर दिया जाना चाहिए था।
लेकिन इस बजट घोषणा में “शिक्षा से रोजगार और उद्यमिता” समिति का उद्देश्य, सेवा क्षेत्र को विकसित भारत के प्रमुख घटक के रूप में मजबूत करने के लिए सुझाव देना है। इस बजट में सेवा क्षेत्र को “युवा भारत की आकांक्षाओं को पूरा करने के बड़े रास्ते” की तरह देखा गया है।
इनके अलावा बजट में 10,000 करोड़ रुपये के एसएमई ग्रोथ फंड की घोषणा की गई है और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष करों में सुधारों के जरिए विनिर्माण को बढ़ावा देने की बात कही गई है। साथ ही बढ़ते पूंजीगत खर्च, जैसे सड़क, रेल और पुल निर्माण से भी रोजगार सृजन की उम्मीद जताई गई है।
लेकिन ये सभी उपाय मुख्यतः दीर्घकालीन हैं। मौजूदा रोजगार के संदर्भ में देखें तो यह एक ऐसी खाई है, जो बजट के रोजगार-दावे और जमीनी हकीकत के बीच अभी भी बरकरार है।
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लेखक के बारे में
- नेसार अहमद बजट एनालिसिस एंड रिसर्च सेंटर ट्रस्ट के संस्थापक निदेशक हैं। उन्हें सार्वजनिक वित्त, नीति अनुसंधान, जेंडर रिस्पॉन्सिव बजट, चाइल्ड बजट, तथा भूमि और अनैच्छिक विस्थापन जैसे विषयों पर काम करने का लंबा अनुभव है। इन विषयों पर उनके कई शोध और प्रकाशन भी प्रकाशित हो चुके हैं।
