हम आदिवासियों के स्वास्थ्य की जड़ें जंगल में हैं

जब भी आदिवासी समुदाय ‘निशुल्क’ स्वास्थ्य सेवा या शिक्षा जैसी सार्वजनिक व्यवस्थाओं के प्रति हिचकिचाहट व्यक्त करते हैं, तो इसे अक्सर हमारी मान्यताओं, व्यवहार या जागरूकता की कमी की समस्या के रूप में देखा जाता है। लेकिन दक्षिण कर्नाटक के बिलिगिरिरंगना बेट्टा (बीआर हिल्स) के वन क्षेत्रों में पले-बढ़े एक प्रथम पीढ़ी के सोलिगा आदिवासी विद्वान के रूप में मेरा अनुभव कुछ और ही कहता है।
आदिवासी समुदायों के लिए, जंगलों के बिना स्वास्थ्य की बात अधूरी है। राज्य के प्रति हमारा अविश्वास एक लंबे इतिहास से जुड़ा है, जहां हमारे लोगों को लगातार हाशिए पर रखा गया है।
जंगल और प्रकृति यह दर्शाते हैं कि भोजन, आजीविका, स्वतंत्रता और उपचार की पद्धतियां रोज़मर्रा के जीवन में कैसे एक साथ जुड़ी होती हैं। इसके बावजूद, इतिहास में हमेशा से आदिवासी समुदायों के घरों, ज़मीनों और पवित्र स्थलों पर उनके अधिकारों को ‘जनजातीय विकास’ और ‘वन्यजीव संरक्षण’ के नाम पर नकारा गया है। इन नीतियों ने हमें उन जंगलों और संसाधनों से दूर कर दिया है, जो हमारे जीवन का आधार हैं। इसके परिणामस्वरूप हमारे समुदायों में कुपोषण, प्रवासन, शिक्षा में रुकावट और बीमारियों में बढ़ोतरी हुई है।
मैं पिछले 28 वर्षों से चामराजनगर में अपने समुदाय के मित्रों और साथियों के साथ काम कर रहा हूं। यह जिला बेट्टा कुरुबा, जेनु कुरुबा और सोलिगा जैसे समुदायों का घर है, जो कर्नाटक की 50 अनुसूचित जनजातियों में शामिल हैं। इनमें से लगभग 12 समुदाय (सोलिगा सहित) स्वयं को आदिवासी के रूप में चिह्नित करते हैं और उनका जंगलों से गहरा संबंध है।
चामराजनगर में आदिवासी समुदाय उन क्षेत्रों में रहते हैं, जो अब बांदीपुर और बिलिगिरि रंगनाथस्वामी मंदिर (बीआरटी) टाइगर रिज़र्व तथा माले महादेश्वर हिल्स और कावेरी वन्यजीव अभयारण्यों का हिस्सा हैं।
ये सभी क्षेत्र विभिन्न वन्यजीव संरक्षण कानूनों के तहत संरक्षित वन घोषित किए गए हैं। यह वन अधिकार अधिनियम से पहले की बात है। वन विभाग द्वारा कई वर्षों तक इन कानूनों का उपयोग आदिवासी लोगों को उन जंगलों से दूर रखने के लिए किया गया है, जहां वे पारंपरिक रूप से रहते आए हैं।
विस्थापन का व्यापक और निरंतर प्रभाव
पोडु (सोलिगा गांवों) में हमारा जीवन वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के प्रतिकूल प्रावधानों के खिलाफ कई आंदोलनों से जुड़ा रहा है। बीआर हिल्स को पहले वन्यजीव अभयारण्य के रूप में स्थापित किया गया और बाद में इसे टाइगर रिज़र्व बनाया गया। इन घोषणाओं के साथ ही शहद, नेल्ली (आंवला), अंतवाला कायी (रीठा) और सीगे (बबूल) जैसे वन उत्पादों के संग्रह पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जो हमारे दैनिक उपभोग, देखभाल और आजीविका का हिस्सा हैं।
इन प्रतिबंधों के साथ-साथ, कुछ दशकों पहले हमारे लोगों को उनके घरों और पोडु से निकाल कर विस्थापित कर दिया गया। अधिकांश मामलों में, जो समुदाय परंपरागत रूप से पहाड़ी और वन क्षेत्रों में रहते थे, उन्हें पूरी तरह अपरिचित और दूरस्थ जगहों पर बसाया गया, जिससे उन्हें अपनी जीवन-शैली में बड़े बदलाव करने के लिए मजबूर होना पड़ा। उदाहरण के लिए, बीआरटी टाइगर रिज़र्व के निर्माण के दौरान विस्थापित सोलिगा लोगों को येरकाना गड्डे गांव में बसाया गया, जहां उन्हें छोटे और तंग घरों में रहना पड़ा, जो हमारे पारंपरिक घरों से बिल्कुल अलग थे।

इसके अलावा, चूंकि हमारी आय का एक बड़ा हिस्सा वन उत्पादों पर निर्भर था, विस्थापन और प्रतिबंधों ने प्रभावित समुदायों में आर्थिक संकट पैदा कर दिया। समय के साथ, यह हमारे लोगों के लिए बड़े पैमाने पर प्रवासन का कारण बना। उदाहरण के लिए, सोलिगा समुदाय के लोग आज रोज़गार की तलाश में कर्नाटक के अन्य हिस्सों के साथ-साथ केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों तक पलायन कर रहे हैं। इस तरह अपने घरों से अलग किए जाने के कारण हमारी सांस्कृतिक परंपराएं, मौखिक इतिहास और सामुदायिक ज्ञान भी धीरे-धीरे विलुप्त हो रहा है। इस विस्थापन के चक्र ने लोगों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव डाला है, जिसमें विशेष रूप से आदिवासी युवाओं में शराब और नशे की लत शामिल है।
ये सभी सरकारी कार्रवाई के प्रणालीगत परिणाम हैं। ऐसे में हमारा यह सवाल लाज़िमी है कि जो लोग राज्य के हाथों बार-बार उत्पीड़न का सामना कर चुके हैं, वे उस राज्य की स्वास्थ्य प्रणाली पर भरोसा कैसे करें? जब कोई व्यवस्था लोगों की आजीविका और आवाजाही को सीमित कर देती है, बच्चों की शिक्षा में रुकावट बनती है और लोगों को उनके अपने ही घरों में अवैध करार देती है, तो वह स्वाभाविक रूप से अविश्वास पैदा करती है।
इतना ही नहीं, जब आदिवासी आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए दूर-दराज के अस्पतालों में जाते हैं, तो उनके अनुभव अक्सर अमानवीय होते हैं। ऐसे में यदि कोई आदिवासी समुदाय बाहरी स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी दवाओं को स्वीकार करने से इनकार करता है, तो यहअज्ञानता या अंधविश्वास नहीं है। यह उनकी आत्मनिर्भरता, अस्तित्व के लिए संघर्ष और अपनी गरिमा तथा पारंपरिक जीवन शैली को पुनः स्थापित करने का प्रयास है।
जन स्वास्थ्य, जनजातीय स्वास्थ्य और दृष्टिकोण का सवाल
इस दृष्टिकोण से देखें, तो जनजातीय स्वास्थ्य का प्रश्न सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की समझ से बिल्कुल अलग दिखाई देता है। समाधान केवल अस्पताल बनाने या हमें ‘स्वस्थ रहने’ के बारे में जानकारी देने भर से नहीं होगा। विशेषकर तब, जब हमें हमारे पारंपरिक आहार और औषधि के स्रोतों से दूर कर दिया गया हो।
कुछ वैकल्पिक तरीके हैं, जिनको अपनाकर सरकार और नागरिक समाज, आदिवासी समुदायों के साथ मिलकर उनके स्वास्थ्य पर काम कर सकते हैं:
1. अभाव की भाषा छोड़ें, गरिमा की भाषा अपनाएं
यदि प्रशासन हम जैसे आदिवासी समुदायों को सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में वास्तव में शामिल करना चाहता है, तो उसे हमें ‘अभाव’ के नजरिए से देखना बंद करना होगा। उसे यह मान्यता छोड़नी होगी कि ‘सोलिगा (आदिवासी) लोगों के पास ज्ञान की कमी है,’ क्योंकि हम अपने जंगल और स्वास्थ्य, दोनों को भली-भांति जानते हैं।
जब बाहरी लोग हमारे जीवन को ‘अज्ञानता’ या ‘आदिमता’ के रूप में देखते हैं, तो वे दो महत्वपूर्ण बातों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं: (क) प्रकृति से जुड़ी हमारी जीवंत ज्ञान प्रणाली, और (ख) वह राजनीतिक इतिहास, जिसने सरकारी सेवाओं से हमारे संबंध को प्रभावित किया है।
इन जंगलों में हमने रागी, अनगिनत किस्म की जड़ें, जंगली सूरन, कंद, खाने लायक मशरूम और कई हरी पत्तेदार सब्जियां उगायी हैं। इनमें से कई—जैसे कड्डीसोप्पु और जावनेसोप्पु—विटामिन, एंटी-ऑक्सीडेंट, मिनरल और घुलनशील प्रोटीन से भरपूर माने जाते हैं। जंगल से मिलने वाले कंद और फलों की स्थानीय बाजारों में भी काफी मांग है। यहां तक की हमारे पास सिकल सेल रोग जैसी बीमारियों के लिए भी पारंपरिक उपचार पद्धतियां हैं। ये वन उत्पाद, और उनके साथ पशु-प्रोटीन, जो हम इन इलाकों में शिकार के माध्यम से प्राप्त करते थे, हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। जंगलों से दूर होने का मतलब इन सभी संसाधनों से दूर होना है, जिसका सीधा असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है।
2. संवाद और सहयोग से विश्वास और रिश्ते कायम करें
आज की जरूरत यह नहीं है कि हम केवल भौतिक ढांचे और योजनाएं बनाने पर अपना ध्यान केंद्रित करें। बल्कि हमें एक ऐसा मंच तैयार करना है, जो हमारे युवाओं, बुज़ुर्गों और ‘सिस्टम’ के बीच गहरे संवाद और जुड़ाव को प्रोत्साहित करे। हमारा जिला संघ (आदिवासी समुदाय काजिला स्तरीय समूह) हर साल एक ऐसा मंच आयोजित करता है। इसमें हम गैर-लाभकारी संगठनों, शोधकर्ताओं और जिला स्तरीय स्वास्थ्य, जनजातीय कल्याण और अन्य सरकारी विभागों को आमंत्रित करते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में इन सालाना संवादों ने स्वास्थ्य और अन्य क्षेत्रों में काम करने वाले गैर-आदिवासी लोगों को हमारे समुदाय और हमारी ज़रूरतों को बेहतर समझने में मदद की है। यह उन्हें अपने व्यवहार पर मंथन करने और भरोसा जीतने वाली बेहतर प्रक्रियाएं अपनाने का अवसर भी देता है। उदाहरण के लिए, कर्नाटक सरकार ने इन संवादों के माध्यम से ट्राइबल हेल्थ नैविगेटर कार्यक्रम को अपनाया और उसे आगे बढ़ाया। इस कार्यक्रम के तहत सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हुए सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा सहायता लेने वाले आदिवासी और गैर-आदिवासी लोगों की मदद करते हैं।
अकादमिक संस्थानों, नागरिक समाज और सरकारी एजेंसियों द्वारा ऐसे संवाद मंचों को सार्थक रूप से विकसित किया जाना चाहिए।
इस दृष्टिकोण को सहभागी शोध और स्वास्थ्य प्रणालियों के मूल्यांकन में भी अपनाया जा सकता है। हमारे जिले में, इन चर्चाओं ने हमारे समुदाय को महत्वपूर्ण मुद्दों को सामने रखने के लिए एक मंच दिया है। उदाहरण के लिए, हमने मांग की है कि हमारे समुदाय की महिलाओं को आशा कार्यकर्ता के रूप में नियुक्त किया जाए। इन मंचों ने हमें यह अवसर भी दिया है कि हम शोध संस्थानों के अध्ययन के डिज़ाइन और कार्यान्वयन की आलोचना कर सकें और उन पर सवाल उठा सकें। ऐसे सहयोग अल्पकालिक सर्वेक्षणों की तुलना में स्वास्थ्य पर अधिक प्रभाव डाल सकते हैं।
3. वन अधिकारों को आदिवासी स्वास्थ्य के मूल आधार की मान्यता दी जाए
वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) का लागू होना हमारे अधिकारों के संघर्ष में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। वर्ष 2005 में, जिला बुडाकट्टू गिरिजना अभिवृद्धि संघ और तालुक बुडाकट्टू गिरिजना अभिवृद्धि संघ ने एट्री और वीजीकेके जैसे संगठनों के सहयोग से वन विभाग और जिला प्रशासन के समक्ष लघु वन उपज (जिस पर उस समय प्रतिबंध था) एकत्र करने के सामुदायिक अधिकारों के लिए आवेदन करना शुरू किया। इसके बाद हमने भूमि अधिकारों के लिए आवेदन करना शुरू किया।
कई वर्षों के निरंतर प्रयासों के बाद, वर्ष 2010 में पहली बार हमारे जिले के चार संरक्षित वन क्षेत्रों में लगभग 1,000 परिवारों को व्यक्तिगत पट्टे (टाइटल डीड) प्राप्त हुए। हमने यह भी सुनिश्चित किया कि गांव से लेकर जिला स्तर तक अधिनियम के तहत सभी समितियों में हमारा प्रतिनिधित्व हो। 2 अक्टूबर, 2011 को हमने बीआरटी टाइगर रिज़र्व में 25 वन अधिकार समितियों के लिए सामुदायिक वन अधिकारों के पट्टे सफलतापूर्वक प्राप्त किए।
हमारा संघर्ष आज भी जारी है, क्योंकि बांदीपुर और नागरगोल के कई सोलिगा, बेट्टाकुरुबा और जेनुकुरुबल गांवों को अभी भी उनके अधिकार नहीं मिले हैं, और इस क्षेत्र में एफआरए अभी भी समान रूप से लागू नहीं हुआ है।
हमारे समुदायों में स्वास्थ्य और कल्याण को समझने के लिए भूमि का यह संघर्ष अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब हम स्वास्थ्य की बात करते हैं, तो हम केवल ‘बीमारी’ और ‘दवा’ के बारे में नहीं सोचते। यदि हमें ये भूमि अधिकार मिलते हैं, तो हम इस ज़मीन पर खेती कर सकते हैं, विभिन्न प्रकार की फसलें उगा सकते हैं, बागवानी कर सकते हैं और फल उगा सकते हैं। जैसे, सोप्पु (हरी पत्तेदार सब्जियां), रागी/ज्वार (मिलेट्स), अवरे (चौड़ी सेम) और तोगरी (अरहर)।

भूमि अधिकार हमारे लिए पौष्टिक आहार तक पहुंच सुनिश्चित करने का माध्यम बन गए हैं, जिसका सीधा असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है। इसके अलावा, शहद की बिक्री (लगभग 220 रुपये प्रति किलोग्राम) से होने वाली आय सीधे परिवारों की दैनिक ज़रूरतों को पूरा करती है।हमें जंगलों के जल स्रोतों में मछली पकड़ने का अधिकार भी है, जिससे हम अपने भोजन में मीट शामिल कर पाते हैं, जो प्रोटीन का एक बड़ा स्त्रोत है।
इस प्रकार, भूमि अधिकार, सामुदायिक वन अधिकार, लघु वन उपज तक पहुंच और गरिमापूर्ण शासन, ये सभी आदिवासी समुदायों के पोषण, आय सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य के मूल आधार हैं। यदि सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियां जंगलों और अधिकारों को स्वास्थ्य से अलग-थलग करती हैं, तो वे बार-बार असफल होंगी।
4. संरक्षण में अधिकार-और-स्वास्थ्य प्रभाव का आकलन अनिवार्य हो
टाइगर रिज़र्व या वन्यजीव अभयारण्य जैसे संरक्षण उपाय लागू करते समय यह सुनिश्चित होना चाहिए कि वे आदिवासी समुदायों के भूमि अधिकारों, तथा उनसे जुड़े स्वास्थ्य और कल्याण को नुकसान न पहुंचाएं। इतिहास पर नज़र डालें तो टाइगर रिज़र्व या वन्यजीव अभयारण्य की घोषणा से पहले लोगों के अधिकारों का निपटान बहुत कम ही किया गया है।
मेरा मानना है कि संरक्षणवादियों को भूमि अधिकारों के साथ-साथ यह भी आकलन करना चाहिए कि उनके प्रस्तावित सुझावों का आदिवासी समुदायों के स्वास्थ्य और विकास पर क्या प्रभाव पड़ेगा। यह इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि संरक्षण की प्रक्रिया अब ऐसे मॉडल की ओर बढ़ रही है, जो समुदायों को पूरी तरह जंगलों से बाहर करने की कोशिश करती है। ऐसी पहलों का गंभीर असर केवल लोगों पर ही नहीं, बल्कि पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र पर भी होता है।
इस लेख के लिए प्रशांत एन श्रीनिवास ने कन्नड़ से अंग्रेजी अनुवाद और अतिरिक्त संपादकीय सहयोग दिया है।
इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ें।
*इस अनुवाद में मूल लेख के सभी हाइपरलिंक बिना किसी परिवर्तन के शामिल किए गए हैं।
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लेखक के बारे में
- डॉ. सी.मादेगौड़ा कर्नाटक के सोलिगा आदिवासी समुदाय के एक अकादमिक-एक्टिविस्ट और सामुदायिक लीडर हैं। उन्होंने जिला बुडाकट्टू गिरिजना अभिवृद्धि संघ के सचिव और एट्री में शोधकर्ता के रूप में चामराजनगर जिले के बीआरटी टाइगर रिज़र्व और अन्य वनक्षेत्रों में समुदायों के लिए वन अधिकार सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। उनका काम समुदाय-आधारित संरक्षण, उद्यमिता, आदिवासी विकास एवं स्व-शासन, और पारंपरिक ज्ञान पर केंद्रित है। उन्होंने आईपीएच बेंगलुरु के स्वास्थ्य शोधकर्ताओं के साथ मिलकरस्वास्थ्य अधिकारों और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सहभागी शोध को आगे बढ़ाने का काम किया है
