अधिकार
कश्मीरी जनजातियों के सामने रोज़गार या शिक्षा में से एक को चुनने की दुविधा क्यों है?
मौसमी प्रवासन, कम आय और जाति-आधारित भेदभावों के चलते गुज्जर बकरवाल और चोपन जैसी कश्मीरी जनजातियों तक शिक्षा नहीं पहुंच पा रही है।फ़ोटो निबंध: भारत की आदिवासी महिला नेता क्या अलग कर रही हैं?
महिलाओं को सशक्त बनाने और युवा लड़कियों के लिए शिक्षा सुनिश्चित करने से लेकर अपने लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने तक का काम कर रही आदिवासी नेताओं के जीवन की झलक।गढ़चिरौली की एक युवा-आदिवासी सरपंच जो न नक्सलियों से डरती है, न पुलिस से
एक युवा-आदिवासी महिला सरपंच के जीवन का एक दिन जो अपने समुदाय को कागजी कार्रवाई करने से लेकर आपात परिस्थितियों में मदद पहुंचाने तक का काम करती है।आशा कार्यकर्ता: जब अनिवार्य हैं तो औपचारिक क्यों नहीं?
आशा कार्यकर्ता सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसके बावजूद, वे लंबे घंटों, कम वेतन और सामाजिक सुरक्षा की कमी के रूप में अनिश्चित कार्य स्थितियों का अनुभव करते हैं।मनरेगा में हर साल बुज़ुर्ग कार्यबल का बढ़ना अनौपचारिक क्षेत्र की ख़राब रोज़गार नीतियों का संकेत है
भारत के कार्यबल की उम्र बढ़ने के साथ अनौपचारिक क्षेत्र की नीतियों में सुधार की जरूरत भी बढ़ रही है। बुज़ुर्ग श्रमिकों को बेरोजगारी से बचाने के लिए वित्तीय सुरक्षा उपाय अपनाए जाने चाहिए।कोविड-19 ने साफ़ किया है कि ग्रामीण रोज़गार को बनाए रखने में मनरेगा की क्या भूमिका है
एक अध्ययन के मुताबिक़ मनरेगा ने कोविड-19 के दौरान गांवों में रोज़गार की स्थिति को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया है लेकिन इसका बजट और जवाबदेही बढ़ाने की ज़रूरत है।भारत का एक ज़िम्मेदार और सक्रिय नागरिक कैसे बनें?
तरीके जिनकी मदद से एक नागरिक मतदान से इतर भी सरकार से जुड़कर स्थानीय, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर नीति-निर्माण में हिस्सा ले सकता है।आईडीआर इंटरव्यूज । बेज़वाड़ा विल्सन
सफ़ाई कर्मचारियों द्वारा मैनुअल स्कैवेंजिंग की प्रथा के विरुद्ध ताउम्र संघर्ष करनेवाले बेज़वाड़ा विल्सन दलितों के नेतृत्व में ज़मीनी स्तर पर तैयार किए जाने वाले आंदोलन की बात करते हैं। वह चाहते हैं कि यह आंदोलन इस अमानवीय प्रथा का अंत करने में मददगार साबित हो और इस प्रथा के शिकार लोगों को इससे मुक्ति मिल सके।अनौपचारिक श्रमिकों के लिए सुरक्षित प्रवास की स्थायी व्यवस्था कैसे की जा सकती है
कोविड-19 महामारी के दौरान हमने देखा भारत में प्रवासी मज़दूरों की संख्या कितनी बड़ी और दशा कैसी दुर्भाग्यपूर्ण है। यह आलेख स्वयंसेवी संस्थाओं को इन असंगठित मज़दूरों को मुख्यधारा में शामिल करने से जुड़े कुछ उपाय सुझाता है।