February 15, 2023

आशा कार्यकर्ता: जब अनिवार्य हैं तो औपचारिक क्यों नहीं?

आशा कार्यकर्ता सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसके बावजूद, वे लंबे घंटों, कम वेतन और सामाजिक सुरक्षा की कमी के रूप में अनिश्चित कार्य स्थितियों का अनुभव करते हैं।
13 मिनट लंबा लेख

ज़्यादातर विकासशील देशों की तरह भारत में भी लगातार अनौपचारिक रोज़गार की स्थिति बनी हुई है। इन रोज़गारों को क़ानून द्वारा पर्याप्त रूप से पंजीकृत, विनियमित या संरक्षित नहीं किए गए कामकाज की तरह देखा और परिभाषित किया जाता है। इसमें रोज़गार व्यवस्थाओं के अलग-अलग प्रकार शामिल हैं जिनमें दैनिक वेतनभोगी जैसे कि कृषि श्रमिक, अपना कामकाज करने वाले लोग जैसे फेरीवाले, और यहां तक ​​कि संविदा पर काम करने वाले श्रमिक भी शामिल हैं।

ऐसा अनुमान है कि भारत में 90 फ़ीसदी से अधिक रोज़गार अनौपचारिक की श्रेणी में आता है। श्रम बल में शामिल होने वाले लोगों की संख्या इस दशक में बढ़ने वाली है और अगर यही स्थिति बनी रही तो ये लोग अनौपचारिक रोज़गार के क्षेत्र में ही जाएंगे। यह गम्भीर चिंता का विषय है क्योंकि अनौपचारिक श्रमिकों को पर्याप्त कानूनी सुरक्षा के बिना और कई अनिश्चितताओं-असुरक्षाओं के साथ काम करना पड़ता है। जैसे कि मजदूरी भुगतान में शोषण, जोख़िम वाली परिस्थितियों में काम करना, सीमित सामाजिक सुरक्षा आदि। स्वाभाविक रूप से, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) जैसी एजेंसियों द्वारा नीतिगत प्रतिक्रियाओं और बहुपक्षीय कार्रवाई दोनों में अनौपचारिकता को कम करने पर ध्यान दिया जाता है।

अनौपचारिक सेक्टर की कमियां और अनिश्चितता, औपचारिक क्षेत्र में रोजगार के कई रूपों में भी देखने को मिलती हैं। इनमें कई ऐसे प्रमुख सरकारी कार्यक्रम भी शामिल हैं जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं काम करती हैं। इसका एक उदाहरण मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (आशा) का है।

आशा कार्यकर्ताओं के ‘अनौपचारिक’ कामकाज को समझना

आशा कार्यकर्ता, महिला सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मचारी (सीएचडबल्यू) हैं जो ज़मीनी समुदायों और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के बीच पहले- और कभी-कभी एकमात्र- सम्पर्क सूत्र के तौर पर काम करती हैं। समुदाय से ही आई हुई ये कार्यकर्ता जागरूकता लाने, स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच को सुविधाजनक बनाने और मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को बढ़ावा देने जैसे कामों को करने के लिए प्रशिक्षित की जाती हैं। इन कामों में अक्सर, महामारी जैसे संकट की अवधि में या विशिष्ट स्वास्थ्य योजनाएं लागू करने की सूरत में अतिरिक्त ज़िम्मेदारियां जुड़ जाती हैं। उदाहरण के लिए, आशा कार्यकर्ता केंद्र सरकार के एनीमिया मुक्त भारत कार्यक्रम के तहत दवाइयों (टैब्लेट) के वितरण में शामिल हैं। राज्य स्तर पर होने वाले कार्यक्रमों में भी ये शामिल होती हैं। उदाहरण के लिए तेलंगाना का केसीआर किट योजना, जिसमें आशा कार्यकर्ताओं की मदद लेकर गर्भवती महिलाओं को किट वितरित किया जाता है।

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कईकई घंटे काम करने के बावजूद भी आशा कार्यकर्ताओं का वेतन बहुत कम होता है।

आशा सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का एक अपरिहार्य हिस्सा हो गई हैं और इन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) का ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड भी जीता है। इसके बावजूद नियमित कर्मचारी के रूप में उनकी स्थिति विवादास्पद है। हालांकि सरकार की सांख्यिकीय शाखाओं द्वारा इन्हें श्रमिकों के रूप में गिना जाता है लेकिन व्यवहार में उन्हें नियमित कामगारों के बराबर नहीं माना जाता है। इसके बदले आशा कार्यकर्ताओं की नियुक्ति को रोज़गार के गैर-मानक श्रेणी में रखा जाता है। गैर-मानक रोज़गार के कई रूप हो सकते हैं जैसे आउटसोर्स, संविदात्मक, दैनिक वेतन, या स्वयंसेवी कार्य, और आशा कार्यकर्ताओं का काम इनमें से अंतिम श्रेणी में आता है। इसके कारण, अनौपचारिक श्रमिकों की तरह आशा कार्यकर्ताओं को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इनमें से कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं:

1. काम के घंटे

आशा कार्यकर्ताओं को अंशकालिक (पार्ट-टाइम) कार्यकर्ता के रूप में देखा गया था जिन्हें दिन में केवल चार से पांच घंटे काम करना होता है। हालांकि ग्रामीण इलाक़ों में एक आशा कार्यकर्ता लगभग 1,000 लोगों की ज़िम्मेदारी सम्भालती है, जबकि यह आंकड़ा शहरी इलाक़ों में 2,500 का है। इस विशाल जनसंख्या की सेवा के लिए बहुत अधिक समय की आवश्यकता है। बीते कुछ सालो में, इन्हें दिए कामों, समुदाय के प्रति देखभाल कर्तव्यों, रिकॉर्ड रखने की ज़रूरतों, और विशेष रूप से, महामारी जैसी आपात स्थितियों के दौरान अतिरिक्त जिम्मेदारियों का मतलब है कि आशा कार्यकर्ता काम के तय घंटों की बजाय लगातार घंटों काम करती रहती हैं।

2. वेतन

कर्नाटक में एक सहायक नर्स/मिडवाइफ के लिए न्यूनतम वेतन 12,580 रुपये से लेकर 13,540 रुपये प्रति माह है। जबकि हिमाचल प्रदेश में एक अर्ध-कुशल स्वास्थ्य कार्यकर्ता का न्यूनतम वेतन 10,175 रुपये से 11,100 रुपये प्रति माह है। लेकिन आशा कार्यकर्ताओं की स्थिति ऐसी नहीं है जिन्हें पार्ट-टाइम स्वयंसेवकों के रूप में देखा जाता है और जिन्हें वेतन नहीं बल्कि प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन राशि के साथ कुछ मानदेय दिया जाता है। मानदेय की यह राशि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग है। मीडिया रिपोर्टें बताती हैं कि आमतौर पर यह राशि कुछ हज़ार रुपए से अधिक की नहीं होती है। इसके अलावा कुछ हज़ार रुपए और प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन के रूप में भी दिए जाते हैं। इसलिए काम के लम्बे घंटों के बावजूद भी आशा कार्यकर्ता बहुत कम कमाती हैं और उन्हें अपने ओवरटाइम के लिए भी किसी प्रकार का भुगतान नहीं मिलता है।

आशा कार्यकर्ताएं जमीनी समुदायों और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के बीच संपर्क के पहले बिंदु के रूप में काम करती हैं। | चित्र साभार: पब्लिक सर्विस इंटरनैशनल / सीसी बीवाय

3. काम करने की स्थिति

बुनियादी अधिकारों को लागू करने के लिए विरोध प्रदर्शन का सहारा लेने, व्यावसायिक सुरक्षा और काम करने की स्थिति की बात आने पर आशा कार्यकर्ताओंं को बार-बार नीचा दिखाया गया है। उदाहरण के लिए, महामारी के दौरान, ‘कोविड योद्धा’ नाम दिए जाने के बावजूद, उन्हें व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों के लिए लड़ना पड़ा। यह केवल महामारी के कारण सामने आनी वाली तार्किक चुनौतियों को नहीं दिखाता है, बल्कि बड़े पैमाने पर मौजूद अव्यवस्था का संकेत है। महामारी से पहले भी, आशा ने परिवहन विकल्पों या भत्तों के प्रावधान के लिए (काफी हद तक अधूरी रह गई) मांगों को उठाया था। यह स्थिति तब है जब वे फ़ील्ड-वर्कर हैं और उन्हें विषम समय में और संभावित असुरक्षित वातावरण में मरीजों को देखना पड़ता है।

4. सामाजिक सुरक्षा

आशा कर्मचारी राज्य बीमा (ईएसआई) और कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ़) योजनाओं के प्रावधानों के अंतर्गत नहीं आती हैं, संगठनों द्वारा इनकी मांग उठाई गई है। ई-श्रम कार्यक्रम में उन्हें शामिल किया जाना शायद उनकी अनौपचारिकता को सबसे अच्छी तरह से दिखाता है, जिसकी शुरुआत विशेष रूप से असंगठित श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा के प्रावधान के लिए एक डेटाबेस बनाने के लिए की गई है। हालांकि इसके द्वारा प्रदान की जाने वाली सुरक्षा स्वागतयोग्य है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली का अभिन्न अंग होने के बावजूद आशा कार्यकर्ताओं को असंगठित कामगार माना जाता है। इसी तरह, 2018 में, केंद्र सरकार ने आशा लाभ पैकेज पारित किया, जिसने दो योजनाओं के तहत योग्य आशा कार्यकर्ता को सामाजिक बीमा की सुविधा दी। हालांकि, ये सार्वजनिक बीमा योजनाएं हैं जो नागरिकों के लिए बहुत ही मामूली प्रीमियम पर उपलब्ध हैं। इसमें आशा के लिए एकमात्र लाभ यह है कि प्रीमियम सरकार द्वारा वहन किया जाता है। यह आशा कार्यकर्ताओं द्वारा की जाने वाली मांगों के पूरा होने से कोसों दूर है। आशा कार्यकर्ताओं के लिए सामाजिक सुरक्षा की कमी का मामला बड़े पैमाने पर तब सामने आया जब उन्होंने चिकित्सा कवरेज के विस्तार, बकाया भुगतान और वेतन में वृद्धि के लिए 2020 में देशव्यापी विरोध प्रदर्शन किया। 

इन चुनौतियों के अलावा, आशा कार्यकर्ता एक ऐसे समाज में जमीनी महिला कार्यकर्ता हैं, जिसकी जड़ें पितृसत्तात्मक मानदंडों में गहरे धंसी हैं। इससे उन्हें समुदाय के सदस्यों द्वारा किए जाने वाले उत्पीड़न और कभी-कभी हिंसा का भी सामना करना पड़ता है। महिलाओं के रूप में, उनके पास सामाजिक रूप से अपने परिवारों की देखभाल करने की, अतिरिक्त थोपी गई जिम्मेदारी भी होती है जो एक अवैतनिक कार्य है।

भविष्य की ओर देखना

यह अनौपचारिकता केवल आशाओं तक ही सीमित नहीं है। विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों में श्रमिकों की कई अन्य श्रेणियां हैं जिन्हें ऐसी ही चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इनमें आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और मिड-डे मील बनाने वाले भी शामिल हैं। अक्सर ही इसके पीछे का कारण इनके काम की अंशकालिक प्रवृति को माना जाता है। हालांकि सभी यह जानते और मानते हैं कि इनकी भूमिकाएं महज पार्ट-टाइम होने से कहीं अधिक हैं। उदाहरण के लिए, आंगनवाड़ी श्रमिक, एक स्वास्थ्य कर्मी और एक शिक्षा कर्मी दोनों के रूप में काम करते हैं। इसके अलावा, अक्सर ही इन्हें इनके क्षेत्र से बाहर के काम भी सौंपे जाते हैं जैसे कि दवा देना, विधवाओं और विकलांग व्यक्तियों की पहचान और सर्वेक्षण करना, और कुछ मामलों में मवेशियों का सर्वेक्षण करना भी इनके जिम्मे होता है।

हम इन श्रमिकों के लिए क्या बेहतर कर सकते हैं?

इसका जवाब बहुत ही सरल है: हमें इनके श्रम की पहचान करनी चाहिए और उनकी कार्य स्थितियों को औपचारिक बनाना चाहिए।

उनके काम करने की स्थिति और वेतन को औपचारिक रूप देने से आशा को वह सुरक्षा मिलेगी जिसकी उन्हें जरूरत है और वे अपना काम बेहतर तरीके से करने में सक्षम होंगी।

और अनुभव ने हमें दिखाया है कि सरकारों के लिए ऐसा करना संभव है। पाकिस्तान में सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का उदाहरण देखें जिनके काम को ऑल पाकिस्तान लेडी हेल्थ वर्कर्स (एलएचडबल्यू) एसोसिएशन के प्रयासों के चलते सफलतापूर्वक औपचारिक रूप दिया गया है। हालांकि वे अब भी कई अन्य प्रकार के संघर्षों और देर से मिलने वाले भुगतानों का सामना कर रही हैं, लेकिन उनकी औपचारिकता के कई सकारात्मक प्रभाव पड़े हैं। उदाहरण के लिए, इससे उन महिला स्वास्थ्य कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि हुई जो आमतौर पर आर्थिक रूप से पिछड़ी पृष्ठभूमि से आती हैं। चूंकि वे अपने घरों में अधिक कमाने वाली होती हैं, इस औपचारिकता का उनके बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों के प्रबंधन, और उनके घरों के दिन-प्रतिदिन के कामकाज पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। भारत में, ओडिशा सरकार ने हाल ही में यह घोषणा की है कि वह संविदा पर काम कर रहे श्रमिकों को नियमित करेगी जो यह दिखाता है कि औपचारिक बनाना संभव है। 

नीति निर्माताओं के लिए यह स्वीकार करना महत्वपूर्ण है कि आशा और ऐसे कई कार्यकर्ता जमीनी स्तर पर आवश्यक कार्य करते हैं। उनके काम करने की स्थिति और वेतन को औपचारिक बनाने से उन्हें वह सुरक्षा मिलेगी जिसकी उन्हें जरूरत है और वे अपना काम बेहतर ढंग से करने में सक्षम होंगे। ये मूलभूत अधिकार हैं जिन्हें मानवाधिकारों के रूप में और आईएलओ के उचित कामकाज एजेंडे के तहत उपलब्ध कराया जाना चाहिए। आशा कार्यकर्ता स्वयं भी पिछले कुछ समय से इन मांगों को सामने रख रही हैं और कई महत्वपूर्ण हितधारक समूहों ने इन्हें अपना समर्थन भी दिया है। विभिन्न सरकारी योजनाओं (आशा सहित) में श्रमिकों की विभिन्न श्रेणियों के लिए काम करने की स्थिति, वेतन  और सामाजिक सुरक्षा पर भारतीय श्रम सम्मेलन के 45वें और 46वें दोनों ही सत्रों में चर्चा हुई। 46वें आईएलसी की सिफारिशों में ईएसआई और ईपीएफ के तहत आशा कार्यकर्ताओं को शामिल करने की बात की गई थी।

2020 में श्रम केंद्रित संसदीय स्थायी समिति ने भी कहा कि आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के काम को औपचारिक रूप दिया जाना चाहिए। प्रोत्साहन और मानदेय के आधार पर उनका वेतन तय किया जाना चाहिए, और उन्हें केवल मानदेय कार्यकर्ता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। 

हालांकि इन श्रमिकों को औपचारिक रूप देने से बेशक राज्यों के वित्तीय ढांचे पर प्रभाव पड़ेगा लेकिन उन्हें इसे स्वास्थ्य सेवा और अच्छे काम में लम्बे समय के लिए किए गए निवेश के रूप में देखना चाहिए। जैसा कि पाकिस्तान में एलएचडबल्यू के उदाहरण से देखा जा सकता है औपचारिक बनाने से वैध श्रमिकों के रूप में आशा कार्यकर्ताओं को बेहतर स्वीकृति और पहचान के साथ अधिक सार्वजनिक दृश्यता प्राप्त हो सकती है। उनके काम को औपचारिक बनाने का एक अर्थ यह भी है कि उनके काम को आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह की महत्ता मिलेगी।

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  • फ़्रंटलाइन स्वास्थ्य कर्मियों पर लिखे इस प्राइमर को पढ़ें।
  • इस विडीयो में आशा कार्यकर्ताओं के जीवन के एक दिन की झलक पाएं।
  • आशा कार्यकर्ता के इस इंटरव्यू को पढ़ें जिसने बताया है कि कैसे हम सार्वजनिक स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र में आशा की भूमिका के बारे में दोबारा सोच सकते हैं।

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लेखक के बारे में
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सुदेव माधव

सुदेव माधव बैंगलोर स्थित बुटीक पॉलिसी और डेवलपमेंट कंसल्टिंग फर्म प्राग्मा डेवलपमेंट एडवाइजर्स एलएलपी में सहयोगी सलाहकार हैं। एक मानवविज्ञानी के रूप में सुदेव ने आदिवासी समुदायों के साथ नीलगिरि बायोस्फीयर रिजर्व में व्यापक स्तर पर फील्डवर्क किया है।

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अनिरुद्ध चक्रधर

अनिरुद्ध चक्रधर एक सार्वजनिक नीति सलाहकार और प्राग्मा डेवलपमेंट एडवाइजर्स एलएलपी में संस्थापक भागीदार हैं। यह बैंगलोर स्थित एक बुटीक नीति और विकास परामर्श फर्म है।

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