

मैंने चार वर्षों तक पत्रकार के रूप में काम किया है। हाल ही में मुझे सोशल सेक्टर का हिस्सा बनने का मौक़ा मिला। मैंने एक शोध और डेटा विश्लेषण संस्था के साथ एक प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया, जो गैर-लाभकारी संगठनों, सरकारी एजेंसियों और सीएसआर परियोजनाओं के लिए सेवाएं प्रदान करती है। पत्रकारिता में मेरा काम अक्सर तय समय-सीमा और सीधे-सपाट सवालों का होता है, ताकि कहानी लिखने के लिए स्पष्ट जवाब मिल पायें। मुझे एहसास हुआ कि पत्रकारिता और सोशल सेक्टर की दुनियाओं के बीच कई समानताएं होने के बावजूद, ये एक-दूसरे से काफी अलग भी हैं।
वर्ष 2026 की शुरुआत में, मैं ग्रामीण महाराष्ट्र में एक फील्ड रिसर्च और सर्वेक्षण परियोजना का हिस्सा थी। सोलापुर, सांगली और वर्धा ज़िलों में 13 दिनों तक चले अध्ययन के दौरान मैंने कई महिला उद्यमियों से बातचीत की, ताकि उनके व्यवसाय, आय और संघर्षों को समझ सकूं। मेरा काम मानक सर्वेक्षण सवालों के माध्यम से डेटा इकट्ठा करना था। जब हमारी टीम इन महिलाओं से मिली, तो हमने अपना परिचय पत्रकार के बजाय सर्वेयर के रूप में दिया। इससे लोगों की प्रतिक्रिया में जो फ़र्क देखने को मिला, वह मेरे लिए बिल्कुल नया था।
पत्रकारिता में रिपोर्टिंग की समय-सीमा अक्सर एक कहानी के दायरे को सीमित कर देती है। इस प्रोजेक्ट में भी मेरे सामने तय लक्ष्य और समय-सीमाएं थी। चूंकि मैं वहां किसी व्यक्ति के बारे में स्टोरी कवर करने के लिए नहीं गयी थी, इसलिए लोगों ने बिना किसी झिझक के मुझसे अपनी बातें साझा की।
मैंने यह बात सबसे ज़्यादा सर्वे के आख़िरी सवाल के दौरान महसूस की। जब हमने महिलाओं से उनकी आजीविका के बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया कि पैसे ने उन्हें किस तरह आज़ादी दी है। उन पलों में उन्होंने जो कुछ साझा किया, वह सर्वे के दायरे से कहीं आगे की बात थी।
सांगली में एक दफ़ा जब हमारे सारे सवाल ख़त्म हो गए, तो एक महिला ने मुझसे कहा, “मैं अपने दोनों बच्चों की परवरिश के लिए अकेले ही अपना कारोबार चला रही हूं। मेरे पति की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गयी थी। उस समय पैसों की बहुत दिक्कत थी, क्योंकि मुझे बैंक के बारे में कुछ नहीं पता था। लेकिन अब अपने कारोबार की वजह से मैं अपने बच्चों की स्कूल की फीस भर पा रही हूं और उन्हें पढ़ा पा रही हूं।” यह सब जानने के लिए मुझे उनसे अलग से कोई सवाल नहीं पूछना पड़ा।
एक दूसरी महिला ने बताया कि अपना कारोबार शुरू करने के बाद वह घर के भीतर पितृसत्तात्मक सोच और अपेक्षाओं का पहले से ज़्यादा मज़बूती से सामना कर पा रही हैं। चूंकि यह एक मात्रात्मक (क्वांटिटेटिव) अध्ययन था, इसलिए मैं इन मानवीय अनुभवों पर वैसे लंबे नोट्स नहीं बना रही थी, जैसे एक रिपोर्टर के तौर पर बनाती। ये बातें हमारे अंतिम डेटा का हिस्सा भी नहीं बनी।
अब मैं पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है कि शायद मेरे अंदर के पत्रकार से एक स्टोरी छूट गयी। लेकिन फिर मुझे एहसास होता है कि इस अनुभव से कोई स्टोरी निकालने की जल्दबाज़ी में न होने की वजह से ही मैं लोगों की बातें कहीं ज़्यादा ध्यान से सुन पायी।
सिद्धि जोजारे एक पत्रकार हैं, जो अब विकास शोध के क्षेत्र में काम कर रही हैं।
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लेखक के बारे में
- सिद्धि जोजारे एक पत्रकार हैं और उनके पास राष्ट्रीय मीडिया मंचों में चार वर्षों की फील्ड रिपोर्टिंग और स्टोरीटेलिंग का अनुभव है। सिद्धि की रुचि गुणात्मक और मात्रात्मक डेटा संकलन (क्वालिटेटिव और क्वांटिटेटिव), सामुदायिक संवाद और तथ्यात्मक लेखन में है। वर्तमान में वह विकास संबंधी शोध, यानी डेवलपमेंट रिसर्च के क्षेत्र में काम कर रही हैं।
