आजीविका

न छांव, न सुरक्षा: दिल्ली के लेबर चौकों पर मजदूरों का संघर्ष

दिल्ली के लेबर चौकों पर काम करने वाले मजदूरों को उम्र के आधार पर भेदभाव, कम मजदूरी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में संघर्ष करना पड़ता है। जानें, कैसे निष्क्रिय कल्याणकारी राशि के उपयोग से इन्हें बेहतर बनाया जा सकता है।
अन्य भाषाओं में पढ़ें:
हिंदी
फुटपाथ पर बैठे हुए कामगार_ लेबर चौक

अक्टूबर 2025 की एक सुबह, जब बारिश हो रही थी, इंडस एक्शन की टीम नई दिल्ली के एक लेबर चौक पर पहुंची। लेबर चौक वह जगह होती है, जहां मजदूर रोजाना काम की तलाश में अनौपचारिक रूप से इकट्ठा होते हैं। वहां हमारी टीम ने एक मजदूर की दाढ़ी से काले रंग की धारियां बहती देखी। पूछने पर उन्होंने बताया कि वह अपनी दाढ़ी को स्याही से रंगते हैं, क्योंकि ठेकेदार जवान मजदूरों को काम देना पसंद करते हैं। जिन मजदूरों के बाल सफेद होते हैं, उन्हें अक्सर काम नहीं मिलता या उन्हें कम मजदूरी दी जाती है। एक दिन का काम पाने के लिए अपनी उम्र छिपाने का प्रयास इस बात को उजागर करता है कि दिल्ली के लेबर चौकों पर किसे काम मिलेगा या कौन खाली हाथ लौटेगा, यह काफी हद तक उसके हुलिए, उम्र और शारीरिक क्षमता पर निर्भर करता है।

उस महीने हमारी टीम ने तीन लेबर चौकों का दौरा किया: महारानी बाग, जहां रोज लगभग 40–50 मजदूर इकट्ठा होते हैं, वजीर नगर, जो सबसे बड़े लेबर चौकों में से एक है और जहां रोज 90–110 मजदूर जुटते हैं, और शादीपुर का एक छोटा लेबर चौक, जहां 15–20 मजदूर खड़े होते हैं। ये अनौपचारिक चौक रोजाना सुबह 7 बजे से दोपहर तक लगभग चार से पांच घंटे सक्रिय रहते हैं। यहां मजदूर अपने औजार लिए छोटे ठेकेदारों का इंतजार करते हैं, जो उन्हें एक दिन के काम के चुनते हैं। गौरतलब है कि इन चौकों पर महिला श्रमिक कहीं नजर नहीं आती, जो दर्शाता है कि दिहाड़ी मजदूरी के इस बाजार में सुरक्षा, गरिमा और कल्याण जैसे मूल्य अभी भी नदारद हैं।

न शेड, न पानी, न राहत

इन लेबर चौकों पर सुविधाएं लगभग न के बराबर होती हैं। सुबह के कुछ घंटों की राहत के बाद मजदूर तेज धूप, धूल और बारिश में यहां खड़े रहते हैं। यहां विश्राम करने की भी कोई सुविधा नहीं है। कुछ जगहों पर एकाध पेड़ की हल्की छाया मिलना भी गनीमत है। यहां पीने का पानी मुश्किल से मिलता है, शौचालय मौजूद नहीं हैं, और न ही बैठने या इंतजार करने की कोई व्यवस्था नजर आती है।

मजदूरों ने बताया कि मानसून के दौरान भारी बारिश से उनकी उत्पादकता कम हो जाती है और बीमारियां भी बढ़ जाती हैं। छाया की कमी, पर्याप्त विश्राम का अभाव, सुरक्षा उपकरणों की कमी और पानी की अपर्याप्त आपूर्ति के कारण वे अत्यधिक गर्मी से खुद को बचा नहीं पाते हैं। हाल की कड़ी गर्मी के दौरान भी कई मजदूरों को स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ा था।

भारत की गर्म और आर्द्र परिस्थितियों में तापमान में हर 1° सेल्सियस की वृद्धि से उत्पादकता लगभग 2 प्रतिशत कम हो जाती है। इससे शोषण की स्थिति पैदा होती है, जिसमें मजदूरों को ज्यादा लंबे समय तक काम करना पड़ता है और उन पर हीट स्ट्रेस तथा उससे जुड़ी अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ जाता है।

हर मजदूर को समान श्रेणी में नहीं गिना जा सकता

सार्वजनिक चर्चा में ‘दिहाड़ी मजदूरों’ को अक्सर एक ही वर्ग के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन लेबर चौक एक अलग तस्वीर दिखाते हैं। इसमें विभिन्न प्रकार के लोग शामिल होते हैं—प्रवासी और स्थानीय, कुशल और अकुशल, युवा और वृद्ध।

ये भिन्नताएं ही एक लेबर चौक की रूप-रेखा और उसके काम करने के तरीके का निर्धारण करती हैं। बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश या झारखंड से आए युवा प्रवासी पुरुष अक्सर चौक पर जल्दी पहुंचते हैं। वे भारी औजार लेकर आते हैं और अधिक शारीरिक श्रम वाले या अनिश्चित किस्म के कामों को करने के लिए भी तैयार रहते हैं। वजीर नगर के एक दौरे के दौरान लगभग पचास वर्ष के एक राजमिस्त्री ने हमें बताया कि वह रोज सुबह 6:30 बजे चौक पर पहुंचते हैं। लेकिन शायद ही कभी ऐसा हुआ हो, जब उन्हें युवा मजदूरों से पहले चुना गया हो। उन्होंने बताया, “वे (ठेकेदार) कहते हैं कि यह काम मेरे लिए बहुत मुश्किल होगा।” उन्होंने अपने औजारों की ओर इशारा करते हुए कहा कि वह दशकों से यही काम करते आए हैं। जब उन्हें काम मिलता भी है, तो अक्सर वह कोई हल्का काम या कम घंटों के लिए मिलने वाला काम होता है।

शहर में दशकों से रह रहे कई अधिक उम्र के स्थानीय मजदूर, ठेकेदारों से अपने पुराने परिचय पर निर्भर रहते हैं। लेकिन जैसे-जैसे ठेकेदारों की प्राथमिकता युवा मजदूरों की ओर बढ़ रही है, वे धीरे-धीरे इस बाजार से अलग-थलग होते जा रहे हैं। प्रवासन का राज्य, कौशल स्तर, उम्र और शारीरिक क्षमता जैसे कई पहलू यह तय करते हैं कि कौन सबसे ज्यादा देर तक इंतजार करेगा, किसे सबसे पहले काम मिलेगा और कौन खाली हाथ घर लौटेगा। जिन प्रवासी मजदूरों से हमने बात की, उनमें से कई ने बताया कि जब काम कम होता है तो वे कम मजदूरी स्वीकार कर लेते हैं, ताकि वह बिना कमाई के अपने साझा कमरों में वापस न लौटें। पूर्वी उत्तर प्रदेश से आए एक युवा मजदूर ने बताया कि दिन में मात्र 400 रुपये कमाना भी “कुछ न मिलने से बहुत बेहतर” है। भले ही इससे बचत न हो या घर पैसे न भेजे जा सकें, लेकिन कम-से-कम खाने-पीने और किराये का खर्च निकल जाता है।

लेबर चौक कोई निष्पक्ष बाजार नहीं है। यह एक सामाजिक रूप से विभाजित जगह है, जहां असुरक्षा समान रूप से नहीं, बल्कि असमान ढंग से बंटी हुई होती है। यहां मजबूरी ही एक हथियार बन जाती है, जिसका इस्तेमाल उन्हीं लोगों के खिलाफ होता है, जिनकी सुरक्षा के लिए ये स्थान बनाए गए थे।

इन चौकों पर महिलाएं लगभग पूरी तरह अनुपस्थित हैं। यह अनुपस्थिति इस बात को दर्शाती है कि निर्माण कार्य में काम का बंटवारा लिंग के आधार पर होता है। महिलाएं आमतौर पर छोटे और अस्थायी काम के लिए चौकों पर आने के बजाय निर्माण स्थलों पर, अक्सर परिवार के सदस्यों के साथ, लंबे समय तक काम करती हैं। जब उन्हें निर्माण कार्य मिलता भी है, तो उसी काम के लिए उन्हें पुरुषों से 30–40 प्रतिशत कम मजदूरी दी जाती है।

लेबर चौकों को औपचारिक रूप देने या उनमें सुधार करने के किसी भी प्रयास में इस विविधता को स्वीकार करना आवश्यक है। इतने विविध और अलग-अलग परिस्थितियों वाले कार्यबल के लिए एक ही नीति सभी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकती।

चयन, रोजी-रोटी और सामाजिक ऊंच-नीच

दिल्ली में लगभग 300–400 लेबर चौक हैं, जहां श्रमिकों को हमेशा ही कम मजदूरी से संतोष करना पड़ता है। सुबह लगने वाला यह श्रम बाजार पूरी तरह नियोक्ता-प्रधान (बायर्स मार्केट) है। ठेकेदार जानते हैं कि यहां बड़ी संख्या में जरूरतमंद मजदूर काम की तलाश में आते हैं। वे इसी परिस्थिति का फायदा उठाकर मजदूरी दरें कम कर देते हैं।

अप्रैल 2025 में दिल्ली सरकार ने अकुशल मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी 710 रुपये प्रतिदिन तय की थी। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। कई बार दिन भर के काम के लिए 500 रुपये तक मिलने पर भी मजदूर आपस में उससे कम दर पर काम करने को तैयार हो जाते हैं। कुछ तो 400 रुपये या उससे भी कम पर काम करने को तैयार हो जाते हैं। कुशल कामगारों, जैसे बढ़ई या पेंटर, ने बताया कि उन्हें रोजाना 450–650 रुपये मिलते हैं, जबकि राजमिस्त्री को आमतौर पर 350–500 रुपये मिलते हैं।

मजदूरों को शायद ही कभी अपनी मजदूरी और मेहनत के हिसाब से पैसे मिल पाते हैं। उप-ठेकेदार ग्राहकों से एक दिन के काम के लिए 700–900 रुपये तक लेते हैं, लेकिन मजदूर को मुश्किल से उसका आधा पैसा मिलता है। इस तरह वे 60–100 प्रतिशत तक का मुनाफा अपने पास रख लेते हैं। अधिकांश परिवारों की मासिक आय 13,000 रुपये से अधिक नहीं होती, जबकि कई बार एक ही परिवार के दो सदस्य काम कर रहे होते हैं। यह दिल्ली के अनुमानित मूल जीवनयापन वेतन (22,696 रुपये) से काफी कम है। कई मजदूरों ने बताया कि अब उनके लिए बुनियादी जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो गया है।

मजदूर धूप में इंतजार करते हैं, जबकि कल्याण निधियां निष्क्रिय पड़ी हैं

लेबर चौक की यह स्थिति कानून और जमीनी वास्तविकता के बीच की दूरी को भी उजागर करती है। भवन और अन्य निर्माण श्रमिक अधिनियम के तहत निर्माण श्रमिकों को कल्याण बोर्ड में पंजीकरण कराना अनिवार्य है। पंजीकरण होने पर श्रमिकों को पेंशन, स्वास्थ्य सहायता और बच्चों के लिए छात्रवृत्ति जैसी सुविधाओं का अधिकार मिलता है। लेकिन इन लेबर चौकों पर काम करने वाले अधिकांश श्रमिक आज भी इन लाभों से पूरी तरह वंचित हैं।

कई मजदूरों के पास लेबर कार्ड नहीं हैं या उनके लिए इसका नवीनीकरण कराना मुश्किल होता है, जिससे वे महत्वपूर्ण अधिकारों और कल्याणकारी योजनाओं से वंचित रह जाते हैं। जो मजदूर आवेदन करते भी हैं, वे अक्सर देरी या अस्वीकृति की शिकायत करते हैं। फरवरी 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में 3 लाख से भी कम निर्माण श्रमिकों के पास सक्रिय लेबर कार्ड हैं। इससे पता चलता है कि एक बड़ी संख्या में मजदूर कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। दूसरी ओर, उनके लिए निर्धारित धनराशि खर्च ही नहीं हो रही। वर्षों से निर्माण उद्योग से कल्याण उपकर (वेलफेयर सेस) के रूप में राज्यों ने हजारों करोड़ रुपये इकट्ठा किए हैं। पूरे देश में लगभग 70,000 करोड़ रुपये सरकारी खजाने में निष्क्रिय पड़े हैं। जुलाई 2024 तक दिल्ली में ही 4,271 करोड़ रुपये का उपकर खर्च नहीं हुआ था। भारत के कई अन्य राज्यों में भी यही स्थिति है, हालांकि कुछ राज्य अब इसे सुधारने के लिए विभिन्न प्रयोग कर रहे हैं।

एक हालिया कैग रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2019 से वर्ष 2023 के बीच दिल्ली ने 1,174 करोड़ रुपये उपकर के रूप में एकत्र किए, लेकिन केवल 605 करोड़ रुपये ही खर्च किए। खर्च की गयी राशि में से 527 करोड़ रुपये (87 प्रतिशत) कोविड-19 के दौरान दी गई अनुग्रह राशि (एक्स ग्राशिया) के रूप में वितरित किए गए। यह दिखाता है कि बीओसीडब्ल्यू अधिनियम के तहत दिल्ली में श्रमिकों के लिए उपलब्ध 17 व्यापक कल्याण योजनाओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। पूरे भारत में लगभग आधे राज्यों ने इस अधिनियम के तहत इकट्ठा हुए उपकर का 50 प्रतिशत से भी कम उपयोग किया है।

2024 राज्य सभा डेटा ग्राफ
सूत्र: 2024 राज्य सभा डेटा

सभी राज्यों के विश्लेषण से यह भी सामने आया कि पश्चिम बंगाल, जहां के मजदूर संघ मजबूत माने जाते हैं, में उपकर निधि के उपयोग की दर सबसे कम है। यह चिंता का विषय है, क्योंकि इस समस्या का समाधान श्रम पारिस्थितिकी तंत्र के सभी हितधारकों के संयुक्त प्रयास से ही संभव है।

निष्क्रिय पड़ी इन निधियों की समस्या बीओसीडब्ल्यू प्रणाली के भीतर गहरे संरचनात्मक मुद्दों की ओर इशारा करती है। राज्यों में पंजीकरण और नवीनीकरण प्रक्रियाएं अब भी दस्तावेज-आधारित और असंगठित हैं। इससे अक्सर ठिकाना बदलने वाले प्रवासी मजदूरों के लिए पोर्टेबिलिटी लगभग असंभव हो जाती है। कल्याण बोर्ड योजनाओं की घोषणा पर अधिक ध्यान देते हैं, परंतु इन योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने को वरीयता नहीं दी जाती। ठेकेदारों के अनुपालन और उपकर के उपयोग की निगरानी भी सीमित है। परिणामस्वरूप, लेबर चौक, जहां मजदूर रोज इकट्ठा होते हैं, कल्याणकारी योजनाओं से लगभग अछूते रह जाते हैं।

हाल के सकारात्मक कदम और संभावित समाधान

विशेषज्ञ लंबे समय से इस अंतर को पाटने के लिए लक्षित हस्तक्षेपों की मांग करते रहे हैं। बीओसीडब्ल्यू अधिनियम के तहत वर्ष 2018 की मॉडल वेलफेयर परियोजनाओं ने विशेष रूप से प्रमुख मजदूर एकत्रीकरण स्थलों पर ट्रांजिट आवास, मजदूर शेड, मोबाइल शौचालय और क्रेच जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने की सिफारिश की थी। इनमें से कुछ सिफारिशें दिल्ली और अन्य शहरों में आंशिक रूप से लागू भी हुई हैं।

हाल ही में लागू की गयी नई श्रम संहिताएं, विशेष रूप से सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020, लेबर चौकों की स्थिति सुधारने की आवश्यकता को और अधिक महत्वपूर्ण बना देती हैं। इन सुधारों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अधिक लोगों को ‘मजदूर’ की परिभाषा में शामिल किया जाए और प्रवासी तथा असंगठित श्रमिकों को लाभों की पोर्टेबिलिटी मिले। लेकिन जमीनी स्तर पर, विशेषकर लेबर चौकों पर, यह बदलाव अभी भी लगभग नदारद है। मजदूर आज भी अनौपचारिक बातचीत और सौदेबाजी के माध्यम से काम खोजते हैं, और उन्हें यह भी ठीक से पता नहीं होता कि नए ढांचे उन्हें वास्तविक सुरक्षा कैसे प्रदान करेंगे।

नई श्रम संहिताओं का महत्व मौजूदा सुरक्षा उपायों को बदलने में नहीं, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे क्रियान्वयन संबंधी अंतर को दूर करने में है।

इस दिशा में श्रम और रोजगार मंत्रालय (एमओएलई) ने अनौपचारिक श्रम बाजारों के लिए वर्कर फैसिलिटेशन सेंटर और डिजिटल हस्तक्षेप जैसी योजनाएं शुरू की हैं। ई-श्रम पोर्टल और डिजिटल लेबर चौक जैसे प्रयोगों का उद्देश्य श्रमिकों के लिए रोजगार और उनके काम का एक बुनियादी रिकॉर्ड बनाना, योजनाओं की जानकारी देना और शिकायत निवारण की व्यवस्था करना है। सैद्धांतिक रूप में, ये प्रयास लेबर चौकों को मात्र अनौपचारिक भर्ती स्थलों से बदलकर सामाजिक सुरक्षा के प्रवेश द्वार में तब्दील कर सकते हैं।

साथ ही, लेबर चौकों को औपचारिक रूप देने के प्रयास इस वास्तविकता के साथ भी जुड़े हैं कि अधिकांश निर्माण कार्य अब भी अल्पकालिक, अनौपचारिक और छोटे ठेकेदारों के माध्यम से संचालित होते हैं। स्वयं मजदूरों ने इस तनाव को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया है। जहां वे स्वास्थ्य सहायता, पेंशन और बच्चों की शिक्षा जैसी पहचान-आधारित सुविधाओं को महत्व देते हैं, वहीं वे ऐसी औपचारिक व्यवस्था को लेकर सतर्क भी हैं जो उनके काम की अस्थायी प्रकृति को ध्यान में न रखे।

बीओसीडब्ल्यू ढांचे के अंतर्गत मौजूदा कानून पहले से ही इन अधिकारों को मान्यता देते हैं। फिर भी मजदूर बताते हैं कि अक्सर दस्तावेजीकरण की जटिलताएं, लाभों में पोर्टेबिलिटी की कमी और जमीनी स्तर पर सहायता का अभाव उन्हें इन सुविधाओं तक वास्तविक पहुंच से वंचित कर देता है। इस संदर्भ में नई श्रम संहिताओं का महत्व मौजूदा सुरक्षा उपायों को बदलने में नहीं, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे क्रियान्वयन संबंधी अंतर को दूर करने में है। ये संहिताएं लाभों की पोर्टेबिलिटी सुनिश्चित कर सकती हैं, पंजीकरण प्रक्रिया को सरल बना सकती हैं और ऐसी परस्पर प्रणालियां बना सकती हैं, जो अनौपचारिक श्रम बाजार के वास्तविक स्वरूप को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित करें। इससे निर्माण श्रमिकों को प्रशासनिक ढांचे द्वारा समर्थित कानूनी सुरक्षा के रूप में बड़ी राहत मिल सकती है।

आराम करते हुए कामगार_लेबर चौक
सार्वजनिक चर्चा में ‘दिहाड़ी मजदूरों’ को अक्सर एक ही वर्ग के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन लेबर चौक एक अलग तस्वीर दिखाते हैं। | चित्र साभार: गुफरान खान

एक गरिमापूर्ण रास्ता

कुछ राज्य-स्तरीय पहलें यह दिखाती हैं कि समाधान संभव हैं। ओडिशा के भुवनेश्वर में राज्य सरकार ने डुमडुमा और कल्पना स्क्वायर में लेबर वेटिंग सेंटर शुरू किए हैं। इन केंद्रों में बैठने की छायादार व्यवस्था, पीने का पानी और शौचालय उपलब्ध हैं, जिससे मजदूरों को काम का इंतजार करने के लिए एक सम्मानजनक स्थान मिलता है। ऐसी पहलें यह साबित करती हैं कि सुविचारित हस्तक्षेप व्यवहारिक भी हैं और प्रभावी भी। लेबर चौकों में सुधार के लिए एक चरणबद्ध दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, मध्यम अवधि में कल्याण सेवाओं की पहुंच बढ़ाई जाए और दीर्घकाल में संरचनात्मक सुधार किए जाएं।

इन सब सुधारों में यह ध्यान रखा जाए कि मजदूर स्वयं किन बातों को सबसे अधिक आवश्यक मानते हैं।

तात्कालिक कदम: चौक पर गरिमा, सुरक्षा और पूर्वानुमेयता (प्रेडिक्टेबिलिटी)

मजदूर हमेशा बताते आए हैं कि शेड, पीने का पानी, शौचालय और बैठने की जगह उनकी सबसे बड़ी जरूरतें हैं। ये बुनियादी सुविधाएं ही तय करती हैं कि काम का इंतजार सहनीय होगा या शारीरिक रूप से मुश्किल। इसलिए राज्य निर्माण बोर्ड, आवास और शहरी कार्य मंत्रालय, शहरी आश्रय बोर्ड और अन्य विभाग निम्नलिखित कदम उठा सकते हैं:

  • आश्रय और सुविधाएं: हर बड़े मजदूर चौक पर बैठने की व्यवस्था, पीने का पानी और शौचालय के साथ छायादार प्रतीक्षा स्थल उपलब्ध कराए जायें। छत्तीसगढ़ में चल रही लेबर कैंटीन, जहां मजदूरों को अत्यंत रियायती दर पर भोजन मिलता है, इसका एक अच्छा उदाहरण हैं।
  • औपचारिक प्रतीक्षा केंद्र: बड़े मजदूर चौकों को फ्लाइओवर, मेट्रो स्टेशनों या बस डिपो के पास व्यवस्थित केंद्रों में बदला जा सकता है, जैसा कि श्रम मंत्रालय के वर्कर फैसिलिटेशन सेंटर सुधारों में प्रस्तावित है।
  • गर्मी और बारिश से सुरक्षा: कड़ी गर्मी और मानसून जैसे मौसम के दौरान अस्थायी सुविधाएं स्थापित की जायें।
  • डिजिटल लेबर चौक की स्थापना: श्रम मंत्रालय द्वारा शुरू किए गए डिजिटल लेबर चौक एप को जमीनी स्तर पर लागू किया जाए और मजदूरों की प्रतिक्रिया के आधार पर समय के साथ इसे बेहतर बनाया जाए।

मध्यकालिक कदम: कल्याण सेवाओं को मजदूरों तक पहुंचाना

अधिकांश मजदूरों को लेबर कार्ड और कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी ही नहीं थी। जो लोग इनके बारे में जानते भी थे, उनके लिए पंजीकरण एक महंगी, अनिश्चित और समय लेने वाली प्रक्रिया थी। विशेषकर प्रवासी मजदूर, जिन्हें अक्सर काम के लिए जगह बदलनी पड़ती है। इन चिंताओं को ध्यान में रखते हुए राज्य के बीओसीडब्ल्यू बोर्ड और ट्रेड यूनियन निम्नलिखित कदम उठा सकते हैं:

  • सुविधाओं को चौक पर ही मुहैया कराना: लेबर चौकों पर ही लेबर कार्ड पंजीकरण और नवीनीकरण, स्वास्थ्य जांच, शिकायत निवारण और ई-श्रम पंजीकरण की सुविधा दी जाए। उदाहरण के लिए, गुजरात की मोबाइल मेडिकल वैन मजदूरों तक सीधे स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने का एक मॉडल प्रस्तुत करती है।
  • लक्षित निधि उपयोग: बचे हुए बीओसीडब्ल्यू उपकर का एक हिस्सा नियमित सुविधा शिविरों और मोबाइल कल्याण इकाइयों के लिए उपयोग किया जाए, जैसा कि श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने सुझाया है।
  • प्रक्रियाओं में सहायता प्रदान करना: दस्तावेजीकरण, बैंक खाते से जुड़ाव और आधार सीडिंग में सहायता दी जाए, ताकि अधिक से अधिक लोगों को इनमे शामिल किया जा सके।
  • मजदूर अक्सर कहते हैं कि सुविधाओं को औपचारिक बनाने का अर्थ कानूनी दर्जा नहीं, बल्कि यह है कि “क्या लाभ वास्तव में हम तक पहुंचता है?” इसलिए सबसे निचले स्तर तक सेवाएं पहुंचाना नियमों के विस्तार से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

दीर्घकालिक कदम: अनुपालन नहीं, पहुंच महत्वपूर्ण है

अधिकतर मजदूर सुविधाओं की औपचारिकता को लेकर मिश्रित भावनाएं व्यक्त करते हैं। जहां वे स्वास्थ्य सेवा, पेंशन और बच्चों की शिक्षा सहायता जैसे लाभों का स्वागत करते हैं, वहीं उन्हें यह डर भी रहता है कि औपचारिक रिकॉर्ड उनके काम के लचीलेपन को कम कर सकते हैं या बिना सुरक्षा के सरकारी निगरानी को बढ़ा सकते हैं। इन आशंकाओं को दूर करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें निम्नलिखित कदम उठा सकती हैं:

  • लेबर चौकों को प्रशासनिक केंद्र के रूप में मान्यता: शहरी नियोजन और श्रम कल्याण ढांचों में लेबर चौकों को औपचारिक रूप से शामिल किया जाए।
  • सुविधा-आधारित औपचारिकता: वर्कर फैसिलिटेशन सेंटर और डिजिटल प्रणालियों का विस्तार किया जाए, साथ ही जमीनी स्तर पर मजबूत सहायता व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
  • परस्पर जुड़ी प्रणालियां: लाभों को किसी एक ठेकेदार से न जोड़ते हुए विभिन्न राज्यों और नियोक्ताओं के बीच पोर्टेबिलिटी सुनिश्चित की जाए।

मजदूरों के लिए सुविधाओं की सार्थक औपचारिकता का अर्थ अनुबंध या नियमों को कड़ाई से लागू करना नहीं, बल्कि पोर्टेबिलिटी, भरोसा और निरंतर सहायता है, भले ही उनका काम अस्थायी क्यों न हो।

इन सुधारों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए श्रम एवं रोजगार मंत्रालय, आवास और शहरी कार्य मंत्रालय, दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड और निर्माण कल्याण बोर्डों के बीच समन्वय आवश्यक होगा। साथ ही, नागरिक समाज संगठन और ट्रेड यूनियन भी डिजाइन, क्रियान्वयन और जवाबदेही सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, ताकि सुधार वास्तव में मजदूरों के जीवन अनुभवों को प्रतिबिंबित करें।

दिल्ली के लेबर चौकों की मुश्किलों को आसान बनाया जा सकता है, बशर्ते नीतिगत उपेक्षा पर काम किया जाए। जब धनराशि पहले से उपलब्ध है और दिशा-निर्देश भी मौजूद हैं, तो हर लेबर चौक की स्थिति सुधारना केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रश्न है। ओडिशा का उदाहरण दिखाता है कि जब सरकारें निर्णायक कदम उठाती हैं, तो बदलाव संभव है।

दिल्ली ही नहीं, बल्कि भारत के सभी शहरों को लेबर चौकों को शहरी अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण केंद्रों के रूप में देखना चाहिए। यदि सरकारें इन चौकों को शेड, पानी और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं से सुसज्जित करें, तो वे इन्हें सुरक्षा और अवसर के केंद्र में तब्दील कर सकती हैं, और उन मजदूरों को गरिमामय जीवन दे सकती हैं जिन पर शहरों की अर्थव्यवस्था टिकी हुई है।

इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ें

अधिक जानें

  • जानिए, क्या है अरबों के टेक्सटाइल उद्योग में श्रमिकों से जुड़ा कड़वा सच?
  • जानिए, कैसे दिल्ली के लेबर चौकों से पानी का बुनियादी हक गायब है?
  • जानिए, कैसे मजदूर और कारीगर ऑनलाइन कर रहे हैं नौकरी की तलाश?

लेखक के बारे में

  • हर्षिल शर्मा इंडस एक्शन में गवर्न्मेंट रिलेशंस के निदेशक हैं, जहां वह दिल्ली, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश की सरकारों के साथ मिलकर श्रमिकों के लिए कल्याणकारी प्रणालियों को बेहतर बनाने पर काम करते हैं। वह एक श्रम अर्थशास्त्री हैं और श्रम कल्याण तथा नीतिगत सुधारों के क्षेत्र में एक दशक से अधिक का अनुभव रखते हैं। जेएनयू से श्रम अध्ययन में पीएचडी प्राप्त हर्षिल अपने शोध, डेटा और जमीनी अनुभवों के जरिए ऐसी समावेशी और सुलभ नीतिगत पहल तैयार करते हैं, जो नीति और वास्तविक जीवन के प्रभाव के बीच एक कड़ी का काम करती है।
  • उमंग कामरा इंडस एक्शन में इम्पैक्ट और शोध के वरिष्ठ प्रबंधक हैं। वह शोध, सामाजिक सुरक्षा नीति और जलवायु सहनशीलता के संगम पर काम करते हैं। उमंग को नीति निर्माण और उसके क्रियान्वयन का अनुभव है और उन्होंने दिल्ली श्रम विभाग के साथ भी काम किया है। उन्होंने घरेलू रेजिलिएंस और निर्माण श्रमिक कल्याण पर बहु-राज्यीय अध्ययनों का नेतृत्व किया है। उमंग ने ग्रिनेल कॉलेज, अमेरिका से इतिहास और नीति अध्ययन में स्नातक की डिग्री प्राप्त की है।