महिला भागीदारी
पलायन के साये में महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य
झारखंड की ग्राम पंचायत मुखिया पिंकी बारदा बता रही हैं कि पलायन से प्रभावित गांवों में महिलाओं का जीवन किन चुनौतियों, अकेलेपन और आपसी सहारे के बीच गुज़रता है।जब औरतों के नारों से गूंज उठेंगी सड़कें
1400 महिलाओं की मज़दूर यूनियन बनने के पीछे क्या है संघर्ष की कहानी? देखिए कैसे घर से बीड़ी बनाने वाली महिलाओं ने शोषण के खिलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद की।सुई और धागे से अवसर बुनने का सामाजिक उद्यम
क्या कारीगरों का हित और कारोबार, दोनों साथ चल सकते हैं? लखनऊ की चिकनकारी से निकला एक सामाजिक उद्यम बता रहा है कि स्थानीय स्तर पर रोज़गार की दिशा कैसे बदली जा सकती है।पेंच टाइगर रिज़र्व: फसलों और जानवरों के बीच रोशनी का पहरा
पेंच टाइगर रिज़र्व से सटे छह गांवों में सोलर लाइटें कुछ किसानों के लिए एक नयी उम्मीद बनकर आयी हैं। लेकिन अभी भी कई घर ऐसे हैं, जो बदलाव की बाट जोह रहे हैं।रूढ़ियों को तोड़कर दीवारों को जोड़ती एक महिला ठेकेदार
ईंट, सीमेंट और सरिया के काम को पुरुषों का काम कहा जाता है। जानिए निर्माण स्थल की चुनौतियों, मज़दूरों के समन्वय और रोज़मर्रा की ज़िम्मेदारियों के बीच एक महिला कान्ट्रैक्टर के अनुभव क्या हैं।पुरुष-प्रधान पेशे में अपनी राह बनाती महिला ऑटो चालक
चेन्नई की दो महिला ऑटो चालक इस पेशे में महिलाओं के सामने आने वाली बाधाओं, और उन चुनौतियों से लड़ने के लिए शुरू की गई अपनी यूनियन की कहानी साझा कर रही हैं।न छांव, न सुरक्षा: दिल्ली के लेबर चौकों पर मजदूरों का संघर्ष
दिल्ली के लेबर चौकों पर काम करने वाले मजदूरों को उम्र के आधार पर भेदभाव, कम मजदूरी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में संघर्ष करना पड़ता है। जानें, कैसे निष्क्रिय कल्याणकारी राशि के उपयोग से इन्हें बेहतर बनाया जा सकता है।कड़े श्रम कानून कैसे बनते हैं प्रगति में बाधा?
पुलियाबाजी के इस पॉडकास्ट में जानिए कि श्रम कानूनों में आए बदलाव कौन से जरूरी सवाल उठाते हैं, जिनके जवाब तलाशा जाना महत्वपूर्ण है।रोजगार के सवाल पर 2026 का बजट क्या कहता है?
बजट 2026 के रोजगार दावे मनरेगा, मजदूरी और सरकारी योजनाओं की जमीनी सच्चाइयों से मेल खाते नहीं दिखते। असंगठित श्रमिकों के हालात दर्शाते हैं कि कौशल विकास के बावजूद स्थायी रोजगार अब भी एक दूर का लक्ष्य है।फोटो निबंध: जलवायु अनुकूलन को नए आयाम देती नागालैंड की औरतें
नित बढ़ते तापमान में दीमापुर की महिला रेहड़ी-पटरी विक्रेता पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय सिविल-सोसाइटी नेटवर्कों का रूख कर रही हैं। उनकी यह कोशिश शहरी अनुकूलन की एक अलग और मानवीय समझ को उभारती है।हमारे स्कूलों से क्यों नदारद है सावित्रीबाई फुले की कहानी?
क्या हमारे स्कूलों और विश्वविद्यालयों में सावित्रीबाई फुले के कद के मुताबिक उनकी बात की जाती है, उनसे हमारा परिचय बतौर देश की पहली शिक्षिका क्या हमारे स्कूलों और कॉलेजों में करवाया जाता है?फोटो निबंध: बीमारी और एकाकीपन के बीच नमक उगाता अगरिया समुदाय
कच्छ के छोटे रण में नमक की खेती करने वाली अगरिया महिलाएं पानी, भोजन और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में जीने के लिए विवश हैं।