पलायन और प्रतिबंध से जूझती तटीय ओडिशा की महिलाएं​

Location Icon गंजम जिला, ओडिशा ​
एक साथ खड़ी कुछ महिला श्रमिक_रोजगार
​​पुरुष​ ​तो रोजगार के लिए पलायन कर लेते हैं, लेकिन महिलाओं के सामने कई तरह की परेशानियां खड़ी हो जाती हैं। | चित्र साभार: सी. एच. पद्मिनी

तटीय ओडिशा में स्थित मछुआरों का गांव पोडमपेटा, जहां मेरा घर है, वर्ष 2007 से समुद्र के बढ़ते स्तर के संकट से जूझ रहा है। वर्ष 2011 तक ज्वार-भाटे और लगातार कटाव ने इस गांव को चार हिस्सों में बांट दिया था, जिससे लगभग 475 परिवारों को अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था।​ 

​​अधिकतर परिवारों को सरकार की एक योजना के तहत पुनर्वासित किया गया, जिसमें हर परिवार को 3.5 लाख रुपये का मुआवजा दिया गया था। लेकिन इस विस्थापन ने उन्हें तट से हमेशा के लिए दूर कर दिया। इसके साथ ही उनकी आजीविका के पारंपरिक काम, जैसे लघु स्तर पर मछली पकड़ना और मछली सुखाना भी उनसे छिन गए। ऐसे में लोगों की मुश्किलें तब और बढ़ जाती हैं जब राज्य में सात महीने तक मछली पकड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है, ताकि ऑलिव रिडली प्रजाति के कछुओं के अंडों का संरक्षण किया जा सके। इस दौरान हर परिवार को मिलने वाला 15,000 रुपये का कुल मुआवजा उनके गुजारे के लिए काफी नहीं है, खासकर तब जब उनके लिए वैकल्पिक रोजगार और मछली सुखाने की बुनियादी सुविधाएं मौजूद ही नहीं हैं।​ 

​​अब कई परिवार अपने गुजारे के लिए समूह बनाकर दिहाड़ी मजदूरी की तलाश में बेंगलुरु या विशाखापट्टनम जैसे शहरों की ओर मौसमी तौर पर पलायन करने लगे हैं। ऐसे में उनके बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है और वे कम उम्र में ही घर पर हाथ बंटाने के लिए काम करने लगते हैं। वहीं माता-पिता भी साहूकारों के कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं। मेरे अपने परिवार की कहानी भी इससे अलग नहीं है। मेरे पिता, जो मछुआरे हैं, अब मछली पकड़ने पर लगे प्रतिबंध के दौरान रोजगार के लिए तटीय केरल की ओर पलायन कर लेते हैं।​ 

​​प्रतिबंध के दौरान बंदरगाह के अभाव और मछली सुखाने की सुविधा न होने के कारण, कई परिवार खुले में ही मछली सुखाने के लिए मजबूर होते हैं। मुश्किल यह है कि इस दौरान ही सबसे अधिक संख्या में मछलियां उपलब्ध होती हैं, जिससे यह प्रतिबंध और कठोर हो जाता है।​ 

​​पुरुष​ ​तो रोजगार के लिए पलायन कर लेते हैं, लेकिन महिलाओं के सामने कई तरह की परेशानियां खड़ी हो जाती हैं। सूखी मछली तैयार करना, जो बरसों से उनका पारंपरिक काम रहा है, अब ढांचे और साधनों की कमी के कारण पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है। पर्याप्त शेड, मछलियों में नमक मिलाने की मेज या उन्हें सुखाने की जालियों की कमी के चलते महिलाओं की त्वचा पर संक्रमण और चकत्ते होना आम है। उनके पास न तो कोल्ड स्टोरेज की सुविधा है और न ही बाजार तक पहुंचने के साधन। पोडमपेटा की रहने वाली बी एलीबुधि बताती हैं, “हमारे पास कोल्ड स्टोरेज नहीं है। जब तक हम बाजार पहुंचते हैं, हमारी मछली सड़ने लगती है। इसलिए बिचौलिए भी उसे बहुत कम दाम में खरीदते हैं।”​ 

​​समस्या केवल यहीं तक सीमित नहीं है। समुदाय को सुरक्षित जेट्टी (नाव), विश्राम स्थल और पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी मुहैया नहीं हैं। कई महिलाओं को मत्स्यपालन से जुड़ी योजनाओं की जानकारी ही नहीं है। जिन्हें जानकारी है, वे विस्थापन के बाद कागजी कार्यवाही में देरी के चलते उनका लाभ नहीं ले पाती। ग्राम पंचायत विकास योजना जैसी प्रक्रियाओं में भी महिलाओं की भागीदारी बहुत कम रहती है। मछुआरा समुदाय की महिलाएं, खासतौर से वे जो समुद्री कटाव की वजह से विस्थापित हुई हैं, अक्सर स्थानीय विकास पर होने वाली ग्राम सभाओं से दूर कर दी जाती हैं। नतीजतन, मछली पकड़ने पर मौसमी प्रतिबंध या मुआवजे जैसे जरूरी फैसलों में उन्हें शामिल नहीं किया जाता, जबकि इन नीतियों का सीधा असर उनकी आजीविका पर पड़ता है।​ 

​​इन चुनौतियों को कम करने की दिशा में कुछ प्रयास किए गए हैं। उदाहरण के लिए, सौर ड्रायरों का पुनःप्रयोग शुरू किया गया है। इनके जरिए महिलाएं स्वच्छ और सुरक्षित तरीके से मछली सुखा सकती हैं, जिससे अनियमित मौसम या जगह की कमी के बावजूद मछली खराब होने से बच जाती है। लंबे समय तक चलने वाली मछली-बंदी के दौरान यह तकनीक बेहद फायदेमंद साबित होती है।​ 

​​समुदाय की पहल से एक अग्रिम चेतावनी प्रणाली भी तैयार की गयी है। इसमें स्थानीय वॉलंटियर, मोबाइल अलर्ट और सार्वजनिक सायरन के उपयोग से तटीय इलाकों में रहने वालों को चक्रवातों या तूफानों की पहले से सूचना दी जाती है। ​​मैं वॉलंटरी इंटीग्रेशन फॉर एजुकेशन एंड वेलफेयर ऑफ सोसाइटी (व्यूज) नामक एक गैर-लाभकारी संस्था के साथ काम करती हूं,​ ​जो​​ आस-पास के गांवों की किशोरियों को डिजिटल उपकरणों की ट्रेनिंग भी दे रहा है, ताकि वे वैकल्पिक रोजगार के रास्ते तलाश सकें।​ 

​​लेकिन केवल इतनी कोशिशें काफी नहीं हैं। हमें बड़े स्तर पर सहयोग की जरूरत है। चाहे वह बुनियादी ढांचे का विकास हो या बाजार की सुविधा। साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि स्थानीय योजनाओं, जलवायु नीतियों और मत्स्य प्रबंधन से जुड़े फैसलों में विस्थापित परिवारों और मछली पालन पर आश्रित महिलाओं की राय भी ली जाए।

पद्मिनी व्यूज संस्था में डिजिटल लिटरेसी ट्रेनर हैं। 

इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ें

​​अधिक जानें:​ पढ़ें,​ ओडिशा के कोरापुट में बारिश में देरी से लोक संस्कृति पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?​ 

अधिक करें: लेखक से जुड़ने और उन्हें सहयोग देने के लिए उनसे [email protected] पर संपर्क करें।


और देखें


दिल्ली की फेरीवालियों को समय की क़िल्लत क्यों है?
Location Icon दिल्ली

जलवायु परिवर्तन के चलते ख़त्म होती भीलों की कथा परंपरा
Location Icon महाराष्ट्र

क्या अंग्रेजी भाषा ही योग्यता और अनुभवों को आंकने का पैमाना है?
Location Icon महाराष्ट्र

राजस्थान की ग्रामीण लड़की यूट्यूब का क्या करेगी?
Location Icon राजस्थान