पर्यावरण

फोटो निबंध: जलवायु अनुकूलन को नए आयाम देती नागालैंड की औरतें

नित बढ़ते तापमान में दीमापुर की महिला रेहड़ी-पटरी विक्रेता पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय सिविल-सोसाइटी नेटवर्कों का रूख कर रही हैं। उनकी यह कोशिश शहरी अनुकूलन की एक अलग और मानवीय समझ को उभारती है।
हांथ में पंखा लिए कीट पतंगों को सब्जियों से दूर करती महिला दुकानदार_ जलवायु अनुकूलन

पूर्वी हिमालय की तलहटी में बसा दीमापुर विरोधाभासों का शहर है। एक तरफ यह नागालैंड का सबसे बड़ा शहरी और आर्थिक केंद्र है, जहां रोज़ाना असम और नागा पहाड़ियों के सीमावर्ती इलाकों से व्यापारी, किसान और असंगठित क्षेत्र के मजदूर पहुंचते हैं। वहीं दूसरी तरफ, नागालैंड का नाम सुनते ही मन में हरी-भरी वादियों और सुहाने मौसम की छवि उभर आती है।

बीते कई सालों में शहरीकरण की रफ्तार ने दीमापुर में किसी भी बुनियादी ढांचे या योजना को बहुत पीछे छोड़ दिया है। नतीजतन, यह तेजी से गर्माता एक शहरी द्वीप बनकर रह गया है। पिछले दो दशकों में यहां निर्मित क्षेत्र तीन गुना हो गया है, हरित आवरण (ग्रीन कवर) में तेजी से गिरावट आयी है, और बढ़ती हुई परिनगरिय बस्तियों ने यहां की सूक्ष्म जलवायु को बदल दिया है।

एक शहर जहां सितम्बर में भी ‘महसूस होने वाला’ तापमान 38 डिग्री सेल्सीयस हो, वहां गर्मी का लोगों की जिंदगी के हर पहलू पर असर डालना लाज़िमी है। ऐसे में गर्मी का ज्यादा असर दीमापुर के रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं पर पड़ता है, जिनमें आधी से ज़्यादा नागा, कार्बी और कचरी जैसे समुदायों की स्थानीय महिलाएं हैं। ये औरतें अक्सर तिरपाल के टेंट और खुले आसमान के तले दस घंटे से ज्यादा काम करती हैं। लगभग 80 प्रतिशत औरतें मौसमी बदलाव से सीधे तौर पर प्रभावित हुई हैं। यह दर्शाता है कि जलवायु दबाव किस तरह लिंग, असंगठित कामकाज और शहरी असुरक्षा जैसे कई विषयों से गहराई से जुड़ा हुआ है।

इन सभी सीमाओं के बीच, महिलाओं के नेतृत्व में हो रहे स्थानीय प्रयास शहरी लचीलेपन की एक ऐसी वैकल्पिक और मानवीय समझ को दर्शाते हैं, जो बड़े पैमाने के हस्तक्षेपों नहीं, बल्कि दैनिक अनुकूलन की प्रक्रियाओं से बनती है।

हांथ में पंखा लिए कीट पतंगों को सब्जियों से दूर करती महिला दुकानदार_ जलवायु अनुकूलन
हांथ में पंखा लिए कीट पतंगों को सब्जियों से दूर करती महिला दुकानदार_ जलवायु अनुकूलन

पारंपरिक प्रथाओं की ओर लौटती महिला रेहड़ी-पटरी विक्रेता

दीमापुर में 60 प्रतिशत से अधिक महिला विक्रेता सब्जी बेचने के काम से जुड़ी हुई हैं। यह काम विशेष रूप से गर्मी के असर और चरम मौसम के प्रति बेहद संवेदनशील है। एक विक्रेता का कहना है, “पहले हम अपनी सब्जियों को दो से तीन दिन तक रखकर बेच सकते थे। लेकिन पिछले कुछ सालों से यह मुश्किल से एक दिन चलती हैं और फिर हमें इन्हें फेंकना पड़ता है।” ये अतिरिक्त दबाव पहले से ही कमजोर स्थिति को और मुश्किल बना रहे हैं। कोल्ड चेन और भंडारण की मूल सुविधाओं की कमी के चलते महिलाओं की आय घट रही है और उनकी दीर्घकालिक आजीविका सुरक्षा जोखिम में है।

तिरपाल की चादरों के नीचे लगाए गए बाजार में ताजे फल और सब्जियां बेचते हुए रेहड़ी -पटरी विक्रेता_जलवायु अनुकूलन
तिरपाल की चादरों के नीचे लगाए गए बाजार में ताजे फल और सब्जियां बेचते हुए रेहड़ी -पटरी विक्रेता।

लेकिन जहां जलवायु अनुकूलन और सततता से जुड़े तंत्र या तो अपरिपक्व है या नदारद है, वहां ये महिलाएं बदलते मौसम और उसके आजीविका पर पड़ने वाले प्रभाव से निपटने के लिए पारंपरिक प्रथाओं का सहारा ले रही हैं। इनमें से कई तरीके वही हैं, जिन्हें आज प्रकृति-आधारित समाधान या नेचर बेसड सोल्यूशंस (एन.बी.एस) कहा जाता है। यानी ऐसे स्थानीय उपाय, जो पीढ़ियों से समुदाय के लोगों द्वारा पर्यावरण की देखभाल के लिए अपनाए जाते रहे हैं। मसलन, सब्जियों को केले के पत्तों में लपेटना एकल-उपयोग प्लास्टिक के इस्तेमाल को स्वाभाविक रूप से कम करता है। इसी तरह, डिस्पोज़ेबल कपों की जगह धोकर रखे जाने वाले और पुन: उपयोग योग्य स्टील के कप कचरा कम करते हैं और सजग उपभोग की संस्कृति को बढ़ावा देते हैं।

हालांकि ऐसे कई उपाय अपनाने के बावजूद, बढ़ती गर्मी में उत्पादों का जल्दी खराब होना महिलाओं के लिए रोजमर्रा का सिरदर्द बना हुआ है। नतीजतन, उनकी सब्जियों और फलों की बर्बादी होती है, जिससे विक्रेताओं और बाजारों के लिए नई चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं। इसी कारण कई स्थानीय समूहों ने जैविक कचरे के प्रबंधन के पुराने, कम-लागत वाले तरीकों (जैसे जैविक खाद बनाना) को फिर से अपनाना शुरू किया है।

दीवार के सहारे रखे हुए पत्तों के गट्ठर_जलवायु अनुकूलन
दीवार के सहारे रखे हुए पत्तों के गट्ठर।

सेवा भारत, नागालैंड, जो जैविक खाद के लिए सामूहिक प्रयास करने वाली एक संस्था है, की इलिबो सेमा बताती हैं, “कचरा हमेशा से हमारे विक्रेताओं के लिए एक बड़ी समस्या रहा है। लेकिन अब इसे संसाधन के रूप में बदला जा रहा है। स्टॉल से निकलने वाले जैविक कचरे को इकट्ठा कर के कम-लागत वाली इकाइयों में ढेर-खाद (हीप कोम्पोस्ट) में परिवर्तित किया जाता है। इससे निकलने वाले पोषक तत्वों से भरपूर तरल से पास के पेड़ों को सींचा जाता है।” जो पेड़ कभी छिटपुट थे या दिखाई ही नहीं देते थे, वे अब बाजार के इलाकों में प्राकृतिक छाया के सूक्ष्म आवास बनकर शहरी ताप से राहत पहुंचा रहे हैं।

कई महिला विक्रेता खाद-समृद्ध मिट्टी से पोषित छोटे किचन गार्डन भी संभालती हैं। दीमापुर और चूमूकेडीमा के बाजारों में पौधों और छोटे गमलों की कतारें एक छोटे लेकिन शक्तिशाली बदलाव का संकेत हैं। यह दिखाता है कि अनुकूलन केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि सततता के इर्द गिर्द देखभाल, समुदाय और स्वदेशी ज्ञान पर आधारित एक सांस्कृतिक प्रक्रिया भी है।

अनुकूलन का नेतृत्व करते स्थानीय नेटवर्क

इन दिखाई देने वाले बदलावों के पीछे एक समान रूप से महत्वपूर्ण, लेकिन अक्सर अदृश्य, वितरित शासन व्यवस्था है। शहरी क्षेत्रों में पलायन करने के बावजूद लोग अपने गांव और कबीले के रिश्तों से जुड़े रहते हैं और उनके सामूहिक नियमों का पालन करते हैं। दीमापुर जैसी जगहों में, जनजातीय नागरिक-समाज संगठन या सिविल सोसायटी ऑर्गेनाइज़ेशंस (सी.एस.ओ), छात्र संघ और आस्था पर आधारित समूह, सार्वजनिक शौचालयों और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं। खासकर वहां, जहां नगरपालिका योजनाएं पूरी तरह सफल नहीं हो पाती। इस प्रकार ये संस्थाएं मिलकर एक शासन तंत्र बनाती हैं, जो जनजातीय, नगरपालिका और अनौपचारिक संस्थाओं के बीच फैला होता है।

जब औपचारिक योजना ढांचे और हीट-एक्शन प्रोटोकॉल ऐसी जगहों के लिए कारगर साबित नहीं होते, तब यही मिश्रित तंत्र जरूरी आधारभूत संरचना और सहयोग प्रदान करते हैं। शहर की महिला रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं के लिए सी.एस.ओ महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए प्रणालीगत कमियों को पूरा करने और देखभाल के छोटे-छोटे, आत्मनिर्भर तंत्र बनाने में मदद करते हैं।

चूंकि इस सामूहिक प्रयास का तानाबाना महिलाओं के काम के इर्द-गिर्द बुना है, ये बाजार महज़ व्यापारिक स्थल नहीं रह जाते, बल्कि ऐसे साझा संसाधन बन जाते हैं जिनकी देखभाल वही लोग करते हैं जो उन पर सबसे अधिक निर्भर हैं। दीमापुर की कहानी दिखाती है कि लचीलापन अक्सर रोजमर्रा के उन संवादों से जन्म लेता है, जिनमें महिलाएं गरिमा, आय और खुशहाली को साधने की कोशिश करती हैं। ये प्रयास भले ही छोटे हों, लेकिन वे कचरे, श्रम और खुशहाली के आपसी रिश्ते को नए सिरे से देखने का रास्ता खोलते हैं।

अपने स्टॉल पर बैठकर फूलों के पौधे और अन्य पौधे बेचती एक महिला_जलवायु अनुकूलन
अपने स्टॉल पर बैठकर फूलों के पौधे और अन्य पौधे बेचती एक महिला।

दैनिक अनुकूलन से जुड़ी प्रणालियों को सशक्त बनाना

दीमापुर जैसे सीमावर्ती शहरों में स्थानीय स्तर पर किया गया अनुकूलन यह दर्शाता है कि नवाचार हमेशा नया होना जरूरी नहीं है। केले के पत्तों का उपयोग, जैविक खाद बनाना और सामुदायिक संसाधन साझा करने जैसी पारंपरिक प्रथाओं का पुनरुत्थान, अपने सबसे सच्चे रूप में प्रकृति-आधारित समाधान (एन.बी.एस) हैं। ये समाधान परियोजना दस्तावेज़ों से नहीं, बल्कि देखभाल की नैतिकता और जीवन के अनुभवों से जन्म लेते हैं, जो सामुदायिक प्रयासों को केंद्र में रखते हैं।

लेकिन साथ ही, ये प्रयास सीमावर्ती शहरों में अनुकूलन की सीमाओं को भी सामने लाते हैं। महिलाओं की शक्ति उनकी सामूहिक अनुकूलन क्षमता में निहित है। फिर भी उनका दैनिक अनुकूलन अक्सर सहायक प्रणालियों के अभाव में ही नजर आता है।

सेवा से जुड़ी एक जमीनी नेता टेमजेमलेमला कहती हैं, “महिला रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं के लिए शहर पर एक सार्थक, न्यायसंगत और गरिमापूर्ण अधिकार तभी संभव है, जब स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट, 2014 जैसी समर्थकारी नीति को उसकी मूल भावना के अनुरूप और पूरी तरह लागू किया जाए।” हालांकि टाउन वेंडिंग कमेटी (टी.वी.सी) जैसे एक्ट की प्रमुख धाराएं और व्यवस्थाएं औपचारिक रूप से बनाई गई हैं, लेकिन व्यवहार में वे पूरी तरह क्रियाशील नहीं हैं। यह समस्या शहर की औपचारिक शहरी शासन व्यवस्था में मौजूद व्यापक खामियों से और गहरी हो जाती है, जिसका असर रोजमर्रा के कामों पर पड़ता है।

ऐसे में, नीतिगत संबंधों को मजबूत करना जरूरी है। स्थानीय नवाचार की जगह लेने के लिए नहीं, बल्कि उसे और सशक्त करने के लिए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि इन महिलाओं के रोजमर्रा के प्रयासों को संस्थागत सहयोग, जिसके वे योग्य हैं, मिल सके।

अपने स्टॉल पर बैठकर पौधे बेचती और हाथ से टोकरी बुनती महिला विक्रेताएं_जलवायु अनुकूलन
अपने स्टॉल पर बैठकर पौधे बेचती और हाथ से टोकरी बुनती महिला विक्रेताएं।

दीमापुर की अनुकूलन और समुदाय-आधारित एन.बी.एस की कहानी यहां की सीमाओं से कहीं आगे के संकेत देती है। सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखंड और असम के पहाड़ी जिलों जैसे कई तीव्रता से बढ़ते हुए हिमालयी शहरी क्षेत्र भी इसी वर्ग में आते हैं। इनमें तीव्र परि-शहरी विस्तार, नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र, विविध आबादी, सीमित नगरपालिका क्षमता और अनौपचारिक देखभाल प्रणालियों पर निर्भरता जैसी समान चुनौतियां शामिल हैं।

इसलिए इन संदर्भों में अनुकूलन केवल औपचारिक योजना ढांचों से नहीं मिल सकता। बल्कि इसकी शुरुआत उन सामाजिक आधारभूत संरचनाओं को समझने से होनी चाहिए, जो पहले से ही सतह के नीचे काम कर रही हैं। विशेषकर, तीन बातों पर ध्यान देना चाहिए:

  1. सामूहिक कार्यवाई में सक्षम शक्तिशाली सामुदायिक नेटवर्क।
  2. मिश्रित शासन स्थल, जहां नागरिक समाज और अनौपचारिक समूह संस्थागत खामियों को पूरा कर सकें।
  3. स्थानीय ज्ञान प्रणालियां, जिनमें पारिस्थितिक स्मृति और आपसी सहयोग की सांस्कृतिक परंपराएं मौजूद हों।

न्यायसंगत और टिकाऊ अनुकूलन के लिए समाधान वहीं से शुरू होने चाहिए, जहां अनुकूलन पहले से मौजूद है—यानी समुदायों के हाथों में। इसे ऐसी प्रणालियों द्वारा भी मजबूत किया जाना चाहिए, जो उनके स्थानीय ज्ञान और अनुभव पर आधारित हो।

यह लेख आइ.यू.सी.एन, इंडिया की हिमालय फॉर दी फ्यूचर पहल के अंतर्गत स्टोरीज़ ऑफ होप मीडिया फ़ेलोशिप का परिणाम है।

इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ें।

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लेखक के बारे में

  • बोका रोचिल्ल दीमापुर, नागालैंड से हैं और पेशे से एक नीति विश्लेषक और शहरी मामलों के कार्यकर्ता हैं। वह आई.यू.सी.एन इंडिया की हिमालय फॉर द फ्यूचर पहल के तहत स्टोरीज ऑफ होप के मीडिया फेलो हैं। वह एन.वाई.सी.सी.फ़ेलोशिप के तहत #दग्रीनिंगदीमापुरप्रोजेक्ट, जो शहरी लचीलेपन की पुनर्कल्पना के लिए राज्य-समाज सहयोग का एक प्रयास है, का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्होंने टी.आई.एस.एस मुंबई से शहरी नीति एवं शासन में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की है।